मंगलवार, 18 नवंबर 2014

महिला पत्रकारिता की दशा दिशा का पूरा सच




प्रस्तुति-- सृष्टि शरण मोना सिन्हा


पुस्तक समीक्षा/ लीना
 भारतीय संस्कृति में, सभ्यता में, अध्यात्म और दर्शन में, स्त्री परंपरागत रूप से जाग्रत और सशक्त रही है। हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में स्त्रियों की सहभागिता स्वतंत्रता से पूर्व तो थी ही, स्वतंत्रता के बाद यह सहभागिता अधिक मुखर रही है। यह कहना है सुधा शुक्ला का जिसे उन्होंने अपनी शोधपरक पुस्तक ‘महिला पत्रकारिता’ में सामने भी रख दिया है।
प्रस्तुत पुस्तक में यों तो पहला अध्याय ‘उत्तर प्रदेश की हिन्दी पत्रकारिता में स्त्री  सहभागिता’ है, जिसकी शुरुआत उन्होंने भारतीय संस्कृति व स्त्री लेखन से की है। इसमें लेखिका सुधा शुक्ला ने बौद्ध कालीन स्त्री लेखन तक की जानकारी दी है।
लेकिन जल्द ही यह पुस्तक देश में महिला पत्रकारिता के सुखद मोड़ की ओर मुड़ जाता है, सरोजनी नायडू से शुरुआत। एनी बेसेंट जो स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय महिला पत्रकारिता का मुखर चेहरा रहीं थीं, की विस्तृत चर्चा एक अलग अघ्याय में है। वे हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास को भी किताब में प्रस्तुत करती हैं। पुस्तक में भारतेन्दु युग और पत्र-पत्रिकाओं में स्त्री स्वर की भी चर्चा होती है। स्वतंत्रता के पूर्व और स्वतंत्रता के पश्चात के पत्रों का इतिहास भी वे बताती हैं। वे बताती हैं कि किस तरह राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान समाज सुधार भी बराबर चलता रहा था और साथ ही हर पत्र में समसामयिक विषयों पर लेख भी। उस दौरान स्त्रियों के अधिकार को लेकर चलने वाले पत्र- पत्रिकाओं देश हितैषी से लेकर हिंदोस्थान तक की बात वह बताती हैं।
स्वतंत्रता पूर्व व बाद के दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं का विस्तृत ब्योरा पुस्तक में है कि वे पत्र कब निकले, उसका प्रभाव कैसा था, उनके सम्पादक कौन रहे आदि- आदि। प्रमुख नेत्रियों अध्याय में पुस्तक उन प्रमुख महिला नेत्रियों/ समाजसेवियों की चर्चा करता है, जिन्होंने अपने लेखों आदि के माध्यम से भी समाज सुधार का प्रचार-प्रसार किया। किताब में महिला दशक, महिला वर्ष या महिला विशेषांक के नाम पर पत्र पत्रिकाओं द्वारा दी गई प्रस्तुतियों की चर्चा भी विस्तार से मिलती है। दर्जनों पत्र पत्रिकाओं में किस विषय पर किस शीर्षक से लेख छापे गए, यह सब जानकारी भी रोचक लगती है।
पुस्तक में वर्तमान महिला पत्रकारिता की दशा-दिशा पर भी पूरी बहस की गई है। उनके वजहों की चर्चा भी। लेखिका बताती हैं कि आज गंभीर सामग्रीवाली महिला पत्रिकाओं की भारी कमी हैं और ग्लैमर व सिनेमावाली पत्रिकाओं की भरमार हो गई है। वर्तमान में खासकर उत्तर प्रदेश की दसियों महिला पत्रकारों की जानकारी भी लेखिका ने विस्तार से मुहैया करायी है। हालांकि उन्हें इनमें अपना भी नाम व ब्योरा देने से बचना चाहिए था।
पुस्तक का सबसे जानदार हिस्सा है विभिन्न पत्रकारों, संपादकों, कवि व लेखकों से  साक्षात्कार। इसके सवाल व दिए गए जबाव वर्तमान महिला पत्रकारिता की दशा दिशा पर बहुत कुछ कह जाते हैं। आज महिलाओं के बारे में क्या लिखा जा रहा है या क्या जानकारी उन्हें मुहैया करायी जा रही है- इस पर कई पत्रकार संपादक स्वयं सवाल खड़े करते है। और वे यह भी बताते हैं कि क्या कुछ वास्तव में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इन साक्षात्कारों में समकालीन महिला पत्रकारों के बारे में भी चर्चा होती है।
हालांकि पुस्तक में क्रमिकता का अभाव दिखता है, बावजूद इसके, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की शोध परियोजना के अंतर्गत प्रकाशित यह पुस्तक - “महिला पत्रकारिता” जानकारीपरक है और इसमें शोध करनेवालों के लिए भी अच्छी सामग्री है। 
पुस्तक - महिला पत्रकारिता
लेखिका - सुधा शुक्ला
प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन,4/19, आसफ अली रोड नई दिल्ली -11000

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