शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

धर्मयुग की पत्रकारिता / मनमोहन सरल





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संस्मरण




धर्मयुग का समय : पत्रकारिता से जुड़ी यादें, कुछ कड़वी, कुछ मीठी


यह महज संयोग ही था कि मैं पत्रकार बना। बचपन में चाह थी कि मैं डॉक्‍टर कहलाऊँ। यहाँ तक कि कुछ बड़ा होने पर मैंने घर के दरवाजे पर चाक से लिख भी दिया था 'डॉ. मनमोहन खन्‍ना, एम.बी.बी.एस.'। हाँ, तब मैं अपना पारिवारिक सरनेम ही इस्‍तेमाल करता था। 'सरल' उपनाम तो बहुत बाद में आया और उसकी भी एक कहानी है, जिसका जिक्र बाद में कर पाऊँगा। मेरा जन्‍म एक नौकरीपेशा परिवार में हुआ था। दादा सरकारी महकमे में ट्रेजरार थे। दादी तो जब बाबूजी नौ वर्ष के थे, उन्‍हें छोड़कर भगवान को प्‍यारी हो गई थीं। दादा के छोटे भाई घर-बार छोड़ कर गंगा किनारे 'विदुर कुटी' में रहने लगे थे, बल्कि बिजनौर की उस प्रसिद्ध 'विदुर कुटी' का पुनरुद्धार भी उनके प्रयासों से हो चुका था। चाचा लोग मस्‍तमौला थे, खासकर छोटे चाचा तो कबूतर उड़ाने और घुड़सवारी के शौकीन थे। अलबत्‍ता बाबूजी बहुत मेहनती थे और अपने छोटे भाइयों को सँभालने में भी लगे रहते थे। पर किसी का दूर-दूर तक पत्रकारिता अथवा साहित्‍य से कोई रिश्ता न था। मेरा जन्‍म नजीबाबाद में हुआ था, किंतु बचपन बिजनौर वाले घर में ही बीता था। बाबूजी महकमा बंदोबस्त में थे सो उनका ट्रांस्‍फर होता रहता था। उनके तबादले पर हम लोग बरेली चले गए, फिर आजमगढ। कई साल माँ ही हमें घर पर पढाती रहीं और इस बीच मैंने उनसे खूब सारी कहानियाँ सुनीं - धार्मिक भी, पौराणिक भी और तिलिस्‍मी भी। माँ की हस्‍तलिपि बहुत खूबसूरत थी - मोती जैसे अक्षर। मुझे याद है लकड़ी की तख्‍ती को खूब घोट कर चमकाना और उस पर खड़िया से सरकंडे की कलम से लिखना और सलेट पर गिनती और पहाड़े सीखना। जब मुझे खूब पढ़ना आ गया तो 'चंद्रकांता संतति' वगैरह सब पढ़ डालीं। और भी बहुत कुछ पढ़ा, जिसका ब्‍योरा अब याद नहीं।
स्‍कूल सीधे चौथी कक्षा में गया। स्‍कूल घर से काफी दूर था। पैदल जाता था - उम्र रही होगी कोई 6 साल। रास्‍ते में कचहरी पडती थी। उसके बाहर अक्‍सर लाशें पड़ी मिलती थीं, जो गाँव वालों की होती थीं, जिन्‍हें किसी-न-किसी आपसी झगड़े या विवाद में दूसरे पक्ष के लोगों ने मार दिया होता था। वे शायद तस्‍दीक या प्रमाण के लिए लाई जाती होंगी, यह मुझे पता न था। उन्‍हें देखकर मन में बहुत से सवाल उठते थे कि कोई किसी दूसरे को जान से मार क्‍यों देता है और कैसे मार देता है। क्‍या आदमी का जीवन इतना क्षणभंगुर होता है? और भी बहुत कुछ मन में आता था पर मेरा बाल मन इन सवालों के जवाब तलाशने के न तो योग्‍य था और न मैंने उन्‍हें जानने की कोशिश की। पर वह सब देख कर अक्‍सर बेहद दुखी मन और भारी कदमों से स्‍कूल जा पाता था।
एक दिन सकूल में छुट्टी घोषित हो गई। पता चला कि किसी बहुत बड़े कवि-चित्रकार की मृत्‍यु हो गई है, जिन्हें देश में सबसे पहला नोबेल पुरस्‍कार मिला था। अगले दिन जब टीचर ने उनके बारे में बताया तो पता चला कि वे कवींद्र रवींद्रनाथ ठाकुर थे और यह भी कि नोबेल पुरस्‍कार क्‍या होता है।
इसके बाद पता चला कि दूसरा विश्‍व युद्ध शुरू हो गया है। क्‍यों होते हैं युद्ध और इनसे क्‍या हासिल होता है? कौन लड़ता है और उन्‍हें क्‍या मिलता है - ऐसे कितने ही सवाल उठे पर उनका समाधान सोचना किसे आता था? फिर एक दिन बाबूजी हड़बड़ाए हुए आए और कहा हम सब बिजनौर जाएँगे। जापानी फौज बर्मा तक आ पहुँची है और कभी भी कलकत्‍ता पर बम गिरा सकती है। कलकत्‍ता से आजमगढ़ दूर ही कितना है? यों भी यहाँ ब्‍लैक आउट तो होने ही लगा था और साइरन बजते ही हमें सकूल से कई बार भगा दिया गया था।
हम सब फिर से बिजनौर आ गए। कुछ दिन बाद स्‍कूल में बड़ा उत्‍सव हुआ। तमाम शहर में खूब मिठाइयाँ बाँटी गईं। सई साँझ से आसमान आतिशबाजियों से भर गया। हम बच्‍चों के तो पौ बारह हो गए। तालियाँ बजा-बजा कर तमाशा देखा। बाद में पता लगा कि विश्‍व युद्ध में इंग्‍लैंड-अमेरिका जीत गए हैं और यह सारा आयोजन जीत का जश्‍न मनाने का है।
याद तो अपने देश की आजादी मिलने वाले दिन की रौनक की भी थी। तमाम दिन 16 अगस्‍त को हम दोस्‍त शहर घूम घूम कर जायजा लेते रहे थे। जश्‍न का वह आलम नहीं दिखा, जो विश्‍वयुद्ध की समाप्ति पर बिजनौर ने पाया था। सबब शायद यह रहा होगा कि वह खर्च अँग्रेज बहादुर के खजाने से हुआ होगा। पर यहाँ भी पूरे मेरठ में बंदनवार लगे थे और तिरंगे झंडे और झंडियाँ लगी थीं। तब उम्र थी 13 साल से भी कम। तब तक मेरी राजनीतिक समझ विकसित न हो पाई थी, इसलिए कारण की समीक्षा तो नहीं कर पाता था, किंतु इतना जरूर समझा था कि जनता में खुशी और गम का मिला-जुला भाव था। स्‍वतंत्र होने के साथ-साथ देश तीन हिस्‍सों में तकसीम जो हो गया था। इसका मलाल कम न था।
हाई स्कूल साढ़े 13 साल की उम्र में ही पास कर लिया था और कॉलेज जाना शुरू हो चुका था। तब हम शाहपीर वाले घर में आ गए थे। कॉलेज पहुँच कर तुकबंदी वाली कविताओं ने रोमानी गीतों का रूप ले लिया था। हालाँकि किसी वास्‍तविक या काल्‍पनिक प्रेमिका का दूर-दूर तक पता न था। मुझे हमेशा लगता है कि ज्‍यादातर प्रेम-विषयक कविताएँ किसी अनजानी और अनुपस्थिति प्रेमिका को लक्ष्‍य करके ही लिखी जाती रही हैं।
गद्य और कहानियाँ लिखने का आरंभ भी महज एक इत्तिहाफ ही था। उस दिन मन कुछ अनमना था। बैठक में एक कलैंडर टँगा था, जिस पर कश्‍मीर का दृश्‍य था। उसे देख कर फिल्‍म 'बरसात' याद आने लगी और उससे प्रेरित होकर एक कहानी लिख मारी। अचरज यह भी हुआ कि वह छप भी गई - शायद 'मस्‍ताना जोगी' या 'प्रसाद' में। फिर और भी लिखीं और विषय ढूँढ़कर लेख भी लिखे। इस तरह लिखने का सिलसिला शुरू हो गया और लिखे हुए के छपने का भी।
छोटे भाई को ढोर डॉक्‍टर बनने के लिए मथुरा भेज दिया गया। मेरा नंबर नहीं आया। यों भी बाबूजी की आर्थिक स्थिति पहले जैसी नहीं रही थी और उनका स्‍थानांतरण सहारनपुर कर दिया गया था। दो जगहों पर रहने से खर्च भी बढ़ गया था। मैंने नौकरी करने की पेशकश शुरू कर दी। पर यह आसान न था। डिफेंस एकाउंट के दफ्तर में लोअर डिवीजन क्‍लर्क की नियुक्ति मिली पर पोस्टिंग नैनी में की गई। जाने का सवाल ही नहीं उठता था। बहुत हाथ पैर मारे। दो बार मिलिट्री बोर्ड के इंटरव्‍यू दिए। लिखित और इंटेलिजेंस टेस्‍ट में अच्‍छा स्‍थान पाया, किंतु इंटरव्‍यू में नहीं चुना गया। ऐसा हर बार ही होता रहा... चाहे यूपीएससी वाली जगह हो, जबलपुर की ऑडिनेंस फैक्‍टरी में नियुक्ति हो, रेलवे का या विकास अधिकारी की। कानपुर के एचबीटीआई में आगे पढ़ने के लिए प्रवेश चाहा पर वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी।
इस बीच मेरठ की साहित्यिक संस्‍था 'प्रगतिशील साहित्‍यकार परिषद्' से संपर्क हो गया हो तो लिखना तेज हो गया। आखिर प्रति सप्‍ताह कुछ नया सुनाना जो पड़ता था। परिषद से जुड़ने से वरिष्‍ठ कवि रघुवीर शरण मित्र, ऐतिहासिक कथाकार आनंदप्रकाश जैन, कहानीकार लाडलीमोहन, गीतकार भारतभूषण, इतिहासकार अरुण जैसे उन दिनों के मेरठवासी साहित्‍यकारों से संपर्क स्‍थापित हो गया।
बाबूजी ने जब मेरा यह रुझान देखा तो उन्‍होंने हिंदी में एमए करने को कहा। साथ ही शाम को एलएलबी कक्षाओं में भी प्रवेश ले लिया। उसी साल एक वर्ष के लिए प्रसिद्ध गीतकार गोपालदास नीरज कॉलेज में लेक्‍चर बन कर आए। उनसे अच्‍छी आत्‍मीयता हो गई, जिसने मेरे गीतकार को उचित दिशा दी। उनमें से कई गीत 'अजंता' और 'विशाल भारत' में पहले पृष्‍ठ पर छपे। 'विशालभारत' में तो उनकी व्‍याख्‍या भी दी जाती थी।
रोमानी कविताओं ने मुझे कक्षा में खासा लोकप्रिय बना दिया। अक्‍सर क्‍लास में कतिवा-पाठ होता और खूब गा-गा कर गीत सुना कर वाहवाही लूटता। कॉलेज मैग्‍जीन के हिंदी भाग का संपादन भी सौंप दिया गया मुझे।
अब उपनाम की बात। मेरे पारिवारिक परिचय के दायरे में एक लड़की थी, जो उम्र में मुझसे बड़ी थी। दरअसल, सरला मेरे एक सहपाठी की बुआ थी। उसकी एक बड़ी बहन भी थी, सरोज। मेरे मन में उनके प्रति ठीक वैसा ही भाव था, जैसा मेरे सहपाठी के मन में रहा होगा। सरला बहुत खूबसूरत थी। उसे घर में सब प्‍यार से सरल पुकारते थे। मेरठ में होली के बाद एक मेला लगता है - 'नौचंदी'। एक शाम दोनों परविार उसमें घूम रहे थे। सरला भी थी। कुछ शरारती दोस्‍तों ने उसे मेरे साथ देख लिया। बस, अगले दिन उसका नाम मेरे साथ जोड़ दिया गया, जबकि मेरा रिश्‍ता एक परिचित मित्र का ही था। लेकिन अंतर्मन में कुछ ऐसा जरूर रहा होगा कि उपनाम के रूप में वह नाम मेरे साथ जुड़ गया।
जब एमए हो चुका तो नौकरी की तलाश फिर से तेज हो गई। पता नहीं, कहाँ-कहाँ एप्‍लाई किया पर एक इंटरव्‍यू के लिए बुलावा आया - बागपत के एक दूर दराज कस्‍बे से। गया, इंटरव्‍यू जैसा तो कुछ न हुआ। बस, कहा गया कि नियुक्ति 160 रु पर होगी पर मिलेंगे सौ रुपये और रसीद देनी होगी 160 की। मेरा मन इसे मानने को तैयार न था। यों भी जगह बहुत उजाड़-सी थी। सो वापस लौट आया और भविष्‍य का इंतजार करने लगा। तभी गाजियाबाद से एक कॉल आई। गया पर जब पहुँचा तब तक नियुक्ति हो चुकी थी। निराश लौट ही रहा था कि मन में आया कि प्रिंसपल पास में ही तो रहते हैं। उनसे मिलने की कोशिश की जाए। झिझकते-झिझकते दरवाजे की घंटी दबा दी। श्री बी एस माथुर सौहार्द से मिले। तब तक छपी अपनी सब पुस्‍तकें ले गया था। वे सब उनकी मेज पर सजा दीं। वे प्रभावित लग रहे थे। कहा कि मैं अपना पता आदि छोड़ जाऊँ, जगह हुई तो बुला लेंगे। मैं इस तरह से उत्तर सुनने का आदी हो चुका था, इसलिए बहुत आशान्वित न था। पर अगले सप्‍ताह ही अचरज जैसे मेरा इंतजार कर रहा था। महानंद मिशन कॉलेज दिल्‍ली के छात्रों से चलता था। जिनको दिल्‍ली में प्रवेश नहीं मिलता था, वे वहाँ आते थे। संख्‍या बढ़ जाने पर एक और सेक्‍शन खोलना पड़ा था, इसलिए जगह हो गई थी।
एक-दो साल सब ठीक चला। इस बीच अगले सत्र में से.रा. यात्री भी आ गए। तब वे प्रसिद्ध कथाकार नहीं हुए थे, बल्कि प्रेमगीत लिखा करते थे। मेरे एक सीनियर थे आनंदप्रकाश कौशिक। हम तीनों ने दयानंद नगर में एक फ्लैट किराए पर ले लिया और हम सब एक साथ रहने लगे।
लगता है कि इत्तिफाक फिर से मेरा इंतजार कर रहा था। एक दिन पीरियड खाली था। स्‍टॉफरूम में 'हिंदुस्‍तान टाइम्‍स' देख रहा था कि मेरी नजर दो पंक्तियों के एक विज्ञापन पर पड़ी। लिखा था - 'बंबई से निकलने वाले एक हिंदी साप्‍ताहिक के लिए योग्‍य सहायक संपादक की आवश्‍यकता है।' एप्‍लाई करने के लिए केवल बाक्‍स नंबर दिया गया था। तभी यात्री ने स्‍टॉफरूम में प्रवेश किया। उन्‍हें मैंने वह छोटा-सा विज्ञापन दिखाया तो वे बोले कि एप्‍लाई करने में क्‍या हर्ज है और मैंने अगले दिन प्रार्थनापत्र भेज दिया।
शायद, आठ-दस दिन में बुलावा आ गया। इंटरव्‍यू के लिए बुलाया गया था। पत्‍नी ने कहा कि चले जाओ, इस बहाने बंबई (तब वह मुंबई नहीं हुआ था) भी देख लोगे। धर्मवीर भारती से मेरा कोई परिचय न था। खतोकिताबत तक नहीं रही थी।
इंटरव्‍यू के समय ही पहली बार मिला था। 'ज्ञानोदय' आदि में उनको पढ़ता जरूर रहा था। कुछ किताबें भी पढ़ चुका था। सच तो यह था कि तब तक मैंने अखबार का कोई दफ्तर तक न देखा था। हाँ, एक बार 'नवभारत टाइम्‍स' के प्रधान संपादक अक्षयकुमार जैन से मिलने जरूर गया था। मैंने बताया कि मेरा बचपन नजीबाबाद से शुरू हुआ था। बाबूजी साहू परिवार को बचपन से जानते थे। बताया तो यह गया था कि शांतिप्रसाद जी और श्रेयांस जी उनके साथ ही खेले थे। जब मेरी ओर से सब तरफ निराशा ही दिख रही थी, बाबूजी ने शांतिप्रसाद जी को मेरे लिए पत्र लिखा, जिसका उत्तर भी तुंरत आ गया। साहूजी ने अक्षय जी से जाकर मिलने को कहा था और यह भी कि उन्‍होंने अक्षय जी को भी लिख दिया है। इस तरह पहली बार किसी अखबार के दफ्तर जाना हुआ और वह भी मात्र अक्षय जी के चैंबर में ही। अक्षय जी अपनी स्‍नॉबरी के लिए जाने जाते थे। उन्‍होंने वही-सा जवाब दे दिया कि अभी तो कोई जगह नहीं है, अपना पता छोड़ जाइए। जब अवसर होगा, बुला लेंगे।
वह दिसंबर की कोई तारीख थी, भारती जी से उनके केबिन में मिलना हुआ। मेज पर अपनी सभी प्रकाशित पुस्‍तकें रख दीं, जिन पर उन्‍होंने नजर तक न डाली। मुझे उपसंपादक की जगह तजबीज की तो मैंने कहा कि मैंने तो सहायक संपादक के पद के लिए आवेदन किया है, जिसके जवाब में भारती जी बोले कि वे उस पद के लिए तो रघुवीर सहाय अथवा सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना को लाने की सोच रहे है, फिलहाल तुम यह स्‍वीकार कर लो। फिर बात वेतन को लेकर उठी। पाँच इन्‍क्रीमेंट ऑफर किए गए, फिर भी वे मेरी अपेक्षा के अनुरूप न थे। इंटरव्‍यू बोर्ड के समक्ष भी यही बात दोहरा दी गई।
वे सब फॉर्मेलिटीज पहले ही निबटा लेना चाहते थे। सो मेडिकल जाँच भी करा ली गई और नियुक्ति-पत्र के साथ एक दस्‍तावेज और बनाया गया कि मैं फलाँ तारीख को अवश्‍य ज्‍वाइन कर लूँ। उस तरह के अनुबंध की क्‍या अहमियत हो सकती थी, यह मैं आज भी नहीं समझ पाया। मतलब यह कि भारती जी चाहते थे कि मैं नियुक्ति स्‍वीकार कर लूँ।
बहरहाल, थोड़ा-बहुत घूमघाम कर मैं लौट आया। संपादकीय विभाग कैसा होता है, मैंने झाँक कर भी नहीं देखा।
गाजियाबाद पहुँच कर साथियों से सलाह ली गई। पत्‍नी अध्‍यापन कर रही थीं, किंतु वे आसन्‍नप्रसवा थीं और प्रसव के लिए मायके इलाहाबाद जाना चाहती थीं। बंबई की समस्‍याओं को देखते वेतन मुझे कम लग रहा था। माँ-बाबूजी तो बिल्‍कुल तैयार न थे। उनके अनुसार इतनी दूर जाना, खासकर, बंबई जाना जान-बूझकर समस्‍याओं के समुद्र में कूदना था। पत्‍नी का तर्क था कि नौकरी तो उन्‍हें छोड़नी पड़ेगी और कम-से कम चार-पाँच महीने इलाहाबाद ही रहना पड़ेगा। मैं इस बीच बंबई में रहने का कामचलाऊ इंतजाम कर सकता हूँ।
इन सब बातों और घटनाओं के विवरण जान कर क्‍या किसी को गुमान भी होता है कि इनका मेरे पत्रकार बनने की संभावना से कोई रिश्‍ता है, नहीं ना? लेकिन नियति के आगे किसी चली है? कहते हैं न, 'होइए वही जो राम रचि राखा'। पर अब मैं सोचता हूँ कि परोक्ष या अपरोक्ष रूप में इन सब ने एक पूर्वपीठिका तो जरूर बनाई है, जो मेरे पत्रकार जीवन पर कहीं-न-कहीं प्रभाव डालती अवश्‍य रही है।
अंततः जनवरी की 14 तारीख को मैंने 'धर्मयुग' के संपादकीय विभाग में प्रवेश लिया। पहली बार देखा कि सब सहयोगी कैसे काम करते हैं। सहायक संपादक कोई था नहीं, वरिष्‍ठतम मुख्‍य उपसंपादक थे हरिमोहन शर्मा। उनके बाद थे आनंदप्रकाश सिंह जो हमेशा जैसे उलझन में रहते थे। संपत ठाकुर गंभीर लगे और पन्‍नालाल व्‍यास निरंतर व्‍यस्‍त दिखाई दिए या शायद, वे व्‍यस्‍त दिखने का अभिनय करते थे। प्रसिद्ध उपन्‍यासकार उदयशंकर के सुपुत्र प्रमोद शंकर ने तो मेरे साथ ही ज्‍वाइन किया था।
आरंभ में जो पृष्‍ठ मुझे सौंपे गए, वे मेरी रुचि के ही थे। बस, साप्‍ताहिक भविष्‍य के अनुवाद को छोड़ कर। वह कोई विेदेशी महिला भेजती थी, अँग्रेजी में। यद्यपि किसी अखबार की डेस्‍क पर काम करने का यह पहला अवसर था, मुझे कोई दिक्‍कत नहीं हुई। सब समझने में थोड़ा समय जरूर लगा।
शायद, दूसरा या तीसरा ही दिन रहा होगा वह कि दोपहर बाद मेरी मेज के सामने एक सज्‍जन आ कर बैठ गए, कत्‍थई रंग का मामूली सा सूट पहने थे और गले में नायलोन की टाई लटक रही थी। उनके हाथ में एक सफेद रंग का पाउच था, जिसे उन्‍होंने मेरी मेज पर रख दिया था। उस पर 'हिंदी ग्रंथ रत्‍नाकर' छपा हुआ था। अपना हाथ बढ़ा कर हाथ मिलाने का आह्वान करते हुए बोले, 'आप मनमोहन सरन हैं न? मैं हूँ कन्‍हैयालाल नंदन। बंबई में आपका स्‍वागत करता हूँ। एक कॉलेज में पढ़ाता हूँ और यह त्रैमासिक पत्रिका भी निकालता हूँ।' और उन्‍होंने अपने पाउच से निकालकर एक पत्रिका सामने रख दी।
उनके और उनकी पत्रिका 'आधार' के बारे में मैंने पहले सुना न था, फिर भी जैसे तपाक से वे मिले थे, उससे मुझे अच्‍छा लगा। हाँ, रामावतार चेतन को जरूर जानता था, जो उनके साले थे। शुरू में मैं चैंबूर में रहता था, जहाँ की व्‍यवस्‍था 'पराग' के संपादक मेरे मेरठ के परिचित आनंदप्रकाश जैन ने कर दी थी, इसलिए चेतन ली के घर भी जा चुका था।
नंदन जी से यह मुलाकात किस तरह मित्रता में बदल गई, यह शायद वक्‍त का तकाजा रहा होगा। खुद ही उनकी अपनी पैरवी करने का कमाल ही था कि उन्‍हें भारती जी को झुकाने में ज्‍यादा वक्‍त नहीं लगा। यों भी भारती जी की रघुवीर सहाय या सर्वेश्‍वर दयाल को धर्मयुग में लाने की मुहिम नाकाम हो गई। सर्वेश्‍वर तो इंटरव्‍यू देने तक न आए। रघुवीर सहाय आए तो जरूर पर उन्‍होंने मुंबई में रहने से इनकार कर दिया। नंदन जी ने अपने रसूक से पुष्‍पा (शर्मा) को स्‍कूल में नौकरी दिलवा दी, जिसके कारण उनका भारती जी के साथ मुंबई में रह सकना संभव हो गया।
इस प्रकार अंततः श्री कन्‍हैयालाल नंदन धर्मयुग के सहायक संपादक बन गए। इसके बाद बड़ी तेजी उनमें स्‍पष्‍टतः परिवर्तन सामने आया। उनका ट्रेडमार्क कत्‍थई सूट चरित्र अभिनेता हंगल का तराशा हुआ सलेटी सूट में बदला, एक कमरे का चाल जैसी खोली यशवंत नगर के रो हाउस में बदली, हिंदी ग्रंथ रत्‍नाकर वाला पाउच पोर्टफोलियो बैग में बदला, आदि, आदि। लेकिन इस सब में एक साल के करीब लगा।
इस बीच मैं नंदन जी के मश्विरे से गोरेगाँव में ही रहने लगा। पहले डबल इंक्रीमेंट दिए गए। फिर मुझे मुख्‍य उपसंपादक भी बना दिया गया। मुझसे जो वरिष्‍ठ थे उनका ट्रांस्‍फर कर दिया गया। आनंदप्रकाश सिंह 'सारिका' में और जो मुख्‍य उपसंपादक थे हरिमोहन शर्मा, उन्‍हें नवभारत टाइम्‍स में। इन्‍हीं दिनों 'सरिका' के संपादक रतनलाल जोशी छोड़कर चले गए और आनंदप्रकाश जैन ने 'पराग' के साथ 'सारिका' का संपादन आरंभ कर दिया। उन्‍होंने मुझे भी 'सारिका' में लेने की पेशकश की, जिसे मैंने विनम्रता से अस्‍वीकार कर दिया। कारण स्‍पष्‍ट था।
अब मुझ पर उत्तरदायित्‍व बढ़ गए। विभागीय कामों के अलावा प्रोडक्‍शन की जिम्‍मेदारी भी आ गई, यानी तमाम साथियों के पृष्‍ठों को चेक करना, उनकी बेहतरी के लिए सुझाव देना। अंकों की प्‍लानिंग में भारती जी की सहायता करना और विशेषांकों की तैयारी में हाथ बँटाना। बाद में जब नंदन जी आ गए, तो यह सब उनके ऊपर आ गया, किंतु प्रोडक्‍शन की जिम्‍मेदारी मुझ पर ही रही। पर हाँ, उन्‍हीं दिनों धर्मयुग ने 'कथा दशक' आरंभ किया। उसकी योजना स्‍वयं भारती जी ने बनाई थी, किंतु यह उनकी सदाशयता ही थी कि उस श्रृंखला का पूरा क्रेडिट उन्‍होंने मुझे दिया। यों कहानीकारों की सूची बनाने में सुझाव देना और उनसे कहानी तथा वक्‍तव्‍य समय से मँगाने को जिम्‍मेदारी सौंप दी गई थी।
'कथा दशक' के तुरंत बाद सत्तर के दशक के बाद उभरे महत्‍वपूर्ण युवा कथाकारों की एक नई श्रृंखला आरंभ होती थी, जिसका पूरा दायित्‍व मुझे दिया गया। इस श्रृंखला में सबसे पहला नाम था ज्ञानरंजन का उनके बाद इस क्रम में कौन थे, अब मुझे याद नहीं हैं किंतु संजीव, शैवाल, अखिलेश जैसे नाम अब भी याद हैं।
नंदन जी के विभाग में आ जाने के बाद सब काम ठीक-ठाक चलने लगा। गोरेगाँव से हम दोनों साथ ही निकलते थे और अगर नंदन जी को कहीं अन्‍यत्र जाना न होता तो लौटते भी साथ ही थे। जब वे धर्मयुग में नहीं आए थे, अँग्रेजी में आए लेखों का अनुवाद उनसे कराया जाता था। मैं लाकर शाम को देता था और वे अगले दिन ही अनुवाद करके पहुँचा दिया करते थे। तब उनके कारण मेरे कई निजी काम भी आसानी से हो जाया करते थे। नया होने के कारण मुझे छुट्टी नहीं मिल सकती थी और तब तक मेरी पत्‍नी इलाहाबाद में ही थी। जब वे आ गईं तब दोनों परिवारों का बड़ा आत्‍मीय रिश्‍ता बन गया था। तब तक नंदन जी अपने पुराने घर में ही रहते थे, जो मेरे घर से थोड़ा दूर था। फिर भी शाम को या छुट्टी के दिन हम मिल लिया करते थे।
भारती जी ने जैसे बंबई के कास्‍मोपोलिटकल स्‍वरूप को पहचान लिया था उन्‍होंने हिंदी लेखकों के अलावा दूसरी भाषाओं के लेखकों से संपर्क स्‍थापित करने आरंभ कर दिए थे। प्रति दूसरे शनिवार को हम 'महानगर में लेखन की समस्‍याएँ' विषय देकर गोष्ठियाँ आयोजित करते थे। इनमें हिंदी के अतिरिक्‍त अन्‍य भाषाओं के लेखक कवि विशेष कर बुलाए जाते थे। इन्‍हीं आयोजनों के कारण राजेंद्रसिंह बेदी, कृश्‍नचंदर, गुलाबदास ब्रोकर, सरदार जाफरी, ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास, पं. नरेंद्र शर्मा, इस्‍मत चुगताई, सलमा सद्दीकी, शांताराम, गंगाधर गाडगिल, नामदेव ढसाल, जैसे अनेक प्रख्‍यात हिंदीतर लेखकों से परिचय हो सका था। सिंधी तथा कुछ दक्षिण के लेखकों को भी जानने का मौका मिला। शनिवार की गोष्ठियों के अलावा भूलाभाई देसाई ऑडीटोरियम में एक पूरे दिन का सेमिनार भी आयोजित किया गया था, जिसकी पूरी रूपरेखा में मैंने सहयोग दिया था और उस सेमिनार का संचालन भी किया था। संचालन का मेरे लिए यह पहला अवसर था। मैं कुछ झिझक रहा था किंतु भारती जी ने कहा कि नहीं, यह तुम्‍हें ही करना होगा।
तब तक शायद नंदन जी की नियुक्ति नहीं हुई थी, या वे किसी वजह से उपलब्‍ध नहीं थे। यह पहला अवसर नहीं था, नंदन जी कई महत्‍वपूर्ण अवसरों पर मौजूद नहीं रहे थे। ऐसा ही एक अवसर था जब प्रख्‍यात कवि रामधारीसिंह दिनकर का निधन हुआ। अंक लगभग तैयार था। भारती जी मॉरीशस गए हुए थे और नंदन जी छुट्टी पर थे। मैंने हरिवंशराय बच्‍चन से उनका साक्षात्‍कार लेने के लिए फोन किया, जिसके उत्तर में उन्‍होंने कहा कि मैं दिनकर जी पर बहुत सहानुभूतिपूर्ण नहीं बोल पाऊँगा। मुझे उनसे हमेशा कई शिकायतें रही हैं। मैं इंटरव्‍यू में अगर उन सब का भी उल्‍लेख करूँ तो क्‍या आप छापना चाहेंगे। बच्‍चन जी जैसे वरिष्‍ठ साहित्‍यकार से मुझे यह आशा न थी। यह तो मुझे मालूम था कि दिनकर जी से उनके रिश्‍ते अच्‍छे नहीं रहे हैं किंतु यह उन शिकायतों को रेखांकित करने का समय न था। फिर पद्मा सचदेव से लिखवाया गया। नरेंद्र शर्मा का साक्षात्‍कार करा लिया तथा अन्‍य सामग्री तुरंत ही दिल्‍ली से मँगवा ली थी।
अज्ञेय जी के निधन के समय भी भारती जी विदेश में थे किंतु नंदन जी तब विभाग में थे। पर अज्ञेय जी पर पूरा अंक निकालने के स्‍थान पर मात्र सूचना दे दी गई। बाद में जब भारती जी लौटे तो वे बहुत नाराज हुए और दुखी भी हुए। बाद में अवसर ढूँढ़ कर एक समूचा अंक अज्ञेय जी को स‍मर्पित किया गया।
सबसे कठिन समय तब था, जब भारती जी बांग्‍लादेश के युद्धक्षेत्र में गए थे। वे मोर्चे पर अटक गए थे। उस समय भी नंदन जी शायद बीमारी के अवकाश पर थे। हमें उस कठिन समय में तीन अंक निकालने पड़े थे। गणेश मंत्री और हरिवंश के सहयोग से वे अंक निकाले और ऐसी सामग्री दी कि उसकी चर्चा होती रही। धर्मयुग का मुकाबला हमेशा अँग्रेजी के इलेस्ट्रेट वीकली से होता था, जिसके संपादक उन दिनों खुशवंत सिंह थे। हमारे उन तीनों अंकों को मैनेजमेंट ने वीकली से बेहतर माना था। बल्कि मैंने भारती जी की डाक में जनरल मैनेजर का वह पत्र भी पढ़ा था, जिसमें उन्‍होंने मेरी तारीफ की थी। पर पता नहीं क्‍यों भारती जी ने वह मुझे नहीं दिखाया। भले ही मेरे इस कार्य की प्रशंसा वाला वह नोट छिपा लिया हो, प्रकट में उन्‍होंने स्‍वयं उन तीनों अंकों की प्रशंसा की।
धर्मयुग ने मुझे कई दुर्लभ मौके भी दिए, जो अविस्‍मरणीय रहेंगे। पूर्व और पश्चिम यूरोप की यात्राएँ, जिनमें दो बार लंदन और पेरिस जाना भी शामिल रहा। सोवियत रूस और अमेरिका के आमंत्रण, जो आम तौर पर कम ही दिए जाते हैं। बल्कि जो रूस हो आता है, उसे अमेरिकन वीसा विरल ही मिलता है। स्‍केंडिवियन देशों की यात्राएँ और नीदरलैंड तथा जर्मनी जाने के अवसर भी मिले। भारत में भी कई महत्‍वपूर्ण एसाइंमेंट के सिलसिले में कई जगहों पर भेजा गया, जिनके अनुभव आज भी स्‍मृति में स्‍थायी हैं।
मुझे यह तो पता नहीं कि वे कौन से कारण थे कि नंदन जी की तरफ से भारती जी का मोहभंग हो गया था, किंतु अवश्‍य यह उनकी कार्यप्रणाली या क्षमता के कारण रहा होगा। इसका सबसे बड़ा स्‍वरूप तब सामने आया, जब नंदन जी ने टाइम्‍स के सेक्रेटरी प्‍यारेलाल शाह से मिल कर भारती जी के विरोध में हस्‍ताक्षर अभियान चलाया। वह दिन बहुत सरगर्मी का था। भारती जी अपने केबिन में बैठे चुरुट-पर-चुरुट पी रहे थे। मैं उनके सामने कुछ देर बैठा रहा था। विभाग में एक उपसंपादक थे स्‍नेह कुमार चौधरी, उन्‍होंने हस्‍ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया। यहाँ तक कि जब कैंटीन के हॉल में शाह साहब ने सबको इकट्टा करके भारती जी पर दोषारोपण की झड़ी लगा दी, तब चौधरी ने साहस दिखा कर उनका विरोध भी किया। भारती जी सब सुनते रहे, पर उत्तर में कुछ बोले नहीं।
इलाहाबाद से आए तो जरूर थे भारती जी किंतु उनका मन वहीं रहता था। निराला जी के निधन पर वे तुरंत गए थे। अपने पूर्व गुरुओं या इलाहाबाद के साथियों के बंबई आगमन पर गो‍ष्ठियाँ और पार्टियाँ की जाती थीं। डॉ. धीरेंद्र वर्मा हों या रामकुमार वर्मा हों, उनका भरपूर स्‍वागत किया जाता था। बाद में यह परिपाटी, न जाने क्‍यों, समाप्‍त हो गई। माखनलाल चतुर्वेदी के प्रति भी भारती जी की अगाध श्रद्धा था। कई बार उनसे मिलने खंडवा भी गए थे।
जब बच्‍चों का कालम मुझे दिया गया था (यह एकदम शुरू की बात है) तब उसका स्‍वरूप मैंने अपनी तरह बनाने की कोशिश की थी। 'सरल भैया की चिट्ठी' भी प्रति सप्‍ताह लिखता था। बाद में एक और कालम शुरू किया था 'आओ बच्‍चो, तुम्‍हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्‍तान की' जिसमें प्राय पूरे पृष्‍ठ का एक रंगीन चित्र दिया जाता था और उसके साथ उस स्‍थान का विवरण देता हुआ छोटा-सा लेख होता था। यह बच्‍चों में बहुत लोकप्रिय हुआ था।
इसी तर्ज पर 'चित्र वीथी' शुरू हुई थी। इसकी योजना 1968 में बनी थी। सोचा यह गया था कि पूरे पृष्‍ठ को समकालीन चित्रकला को समर्पित किया जाय। चित्रकार की कलाकृति का रंगीन चित्र और साथ ही उसका चित्र दिया जाए और संक्षेप में उसका, उसकी कला और उसके भारतीय समकालीन कला में योगदान पर लिखा जाय। आरंभ हुआ 3 नवंबर 1968 के अंक से और सबसे पहले चित्रकार थे मकबूल फिदा हुसेन। प्रति सप्‍ताह एक प्रतिष्ठित चित्रकार को प्रस्‍तुत किया जाने लगा। यह कालम शायद तीन वर्ष तक चला। वरिष्‍ठ चित्रकार ही नहीं, बाद में नए प्रतिभावान चित्रकारों को भी इस क्रम में शामिल किया गया। अगर मैं कहूँ कि 'चित्र वीथी' ने ही मुझे कला समीक्षक बना दिया, तो यह अनुचित न होगा। बाद में धर्मयुग में जितना भी कला-विषयक लेखन होता, वह मुझे ही सौंपा जाता। बाद में सहयोगी समाचार पत्र 'नवभारत टाइम्‍स' के लिए भी प्रति सप्‍ताह कला समीक्षा लिखने का भार मुझे दिया गया और जब तक सुरेंद्रप्रताप सिंह का 'रविवार' छपता रहा, उसके लिए भी कला और रंगमंच के आयोजनों पर 'रंगमोहन' नाम से लिखता रहा। कभी-कभी दूसरे सहयोगियों की गलतियों पर परदा डालने की जरूरत पड़ती थी। छोटी-मोटी ऐसी घटनाएँ तो कई आ पड़ीं किंतु एक का उल्‍लेख किया जा सकता है, जो नए पोप के अभिषेक से जुड़ी है और इसमें साथी उदयन शर्मा से भयंकर भूल हुई थी। मामला मुख्‍य शीर्षक का था। वह उस अंक की कवर स्‍टोरी थी और लेख के प्रथम पृष्‍ठ के तीन रंगों के सिलेंडर बन चुके थे। जब हम काले रंग वाले फार्म को देखने गए, जिसमें आलेख का टेक्‍स्‍ट होता था, तो पाया कि मुख्‍य शीर्षक गलत है, जो एकदम उल्‍टा अर्थ देता है। उदयन परेशान और मैं चिंतित कि यह किस तरह सुधारा जाय। आखिर प्रिटिंग सुप्रिंटेंडेंट के पास गया और उसे गलती की भयंकरता को समझाया। वह स्‍वयं ईसाई था। उसने मदद का भरोसा दिलाया। पर तीन रंगों के नए सिलेंडर तो बिना मैनेजमेंट की अनुमति के बनाए नहीं जा सकते थे। उसने रास्‍ता निकाला कि उन तीनों सिलेंडरों में से शीर्षक घिस कर हटा दिया जाए और नया शीर्षक तुरंत कंपोज कराकर सिर्फ काले रंग में दे दिया जाय। और कोई रास्‍ता न था। चारों सिलेंडर नए बनाने के लिए तो बात ऊपर तक जाती। आखिर यह प्रस्‍ताव मानने के अलावा कोई चारा न था। तुरंत नया शीर्षक तैयार किया गया और उदयन शर्मा की भूल का परिष्‍कार हो गया, जिसका भारती जी तक को पता न लगा।
इससे भी बड़ी घटना एक और हुई। स्‍टाकहोम से सतीकुमार योरोपनामा भेजा करते थे। उस किस्‍त में एक विवरण था, जिसमें कहा गया था कि इन दिनों यूरोप में आस्‍थावान संकट में हैं। साथ में एक छोटा-सा रेखाचित्र था, जिसमें ईश्‍वर पर शैतान को हावी होते दिखाया गया था। चित्र का चुनाव स्‍वयं भारती जी ने किया था। व्‍यवस्‍था यह थी कि मैं मशीन से छपने वाली प्रथम कापी चेक किया करता था। रात के नौ बजे उस बार कापी पास करनी थी, जो मैं कर चुका था और घर जाने ही वाला था कि नाडिग आ गए। वह उन दिनों तक्‍नीशियन थे, जर्मन थे। सुरूर में आए थे। अंक की प्रति पृष्‍ठ-दर-पृष्‍ठ देखी। फोरमैन को रंगीन पृष्‍ठ से संबंधित कुछ सुधार की हिदायत दी और अंक पलटने लगे। उस रेखांकन पर आ कर मजाक में जो बोले वह तो लिखा नहीं जा सकता, किंतु उसका मतलब यही था कि चित्र में जो दिखाया गया है, वह आपत्तिजनक है। मशीन धड़ाधड़ छापे जा रही थी और तब तक कई हजार प्रतियाँ छप चुकी थीं। नाडिग ने उसी मजाकिया ढंग से भारती जी को घर पर फोन किया। वे तुरंत आए और तस्‍वीर को ध्‍यान से देखा। नाडिग की बात समझते देर न लगी। मशीन तुरंत रुकवा दी गई और नाडिग ने सिलेंडर को इस तरह घिसवाया कि रेखांकन का सिर्फ एक भाग दिखाई दे। आगे छपने वाली प्रतियों के लिए तो व्‍यवस्‍था हो गई, पर जो 11 हजार प्रतियाँ छप चुकी हैं, उनका क्‍या किया जाय? यह विकट समस्‍या थी। उन्‍हें नष्‍ट तो किया नहीं जा सकता था। आखिर हल यह निकाला गया कि उस चित्र पर हाथ से काला रंग पोता जाय। पूरी रात मैं यह काम करता रहा। नंदन जी को भी बुला लिया गया और हमने सुबह तक एक-एक प्रति पर उस छपी हुई तस्‍वीर पर काला रंग पोता।
इस तरह की घटनाओं दुर्घटनाओं की फेहरिस्‍त तो बहुत लंबी है और भी कई यादें तो हैं, उनकी विशाल भीड़ में से कुछ प्रसंग निकाल पाना बड़ा दुष्‍कर कार्य है। बच्‍चन जी के शब्‍द उधार लें तो 'क्‍या भूलूँ, क्‍या याद करूँ' वाली स्थिति है। सब स्‍मृतियाँ मीठी ही नहीं हैं, कड़वे और दुखी होने के क्षण भी बहुत बार आए हैं। ऐसे में यह विचार भी आया कि पत्रकारिता में कहाँ फँस गया। कॉलेज की नौकरी बड़े आराम की थी। पर साथ ही यह भी सोचा कि तब वहाँ किसी किस्‍म की चुनौती कहाँ थी? बिना चुनौतियों से जूझते जिंदगी का मजा ही क्‍या है?

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