मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

कंप्यूटर क्रांति युग में इंटरनेट











-विजयकुमार मल्होत्रा 

प्रस्तुति-- राहुल मानव, राकेश 

1. कंप्यूटर, टी.वी. और टेलीफ़ोन के नए आयाम :
कंप्यूटर, टी.वी. और टेलीफ़ोन के क्षेत्र में आई क्रांति के प्रभाव से आज भारत का कोई शहर या गाँव अछूता नहीं रह गया है। उड़ीसा से हर गाँव का पटवारी आज कंप्यूटर पर अपनी ही भाषा उड़िया में ज़मीन की ख़रीद-फ़रोख़्त का हिसाब रखने लगा है। गाँव-गाँव में केबल टी.वी. के माध्यम से भारतवासी विश्व भर के अच्छे-बुरे कार्यक्रम देखने लगे हैं, यह बात दीगर है कि पश्चिम से आई इस भीषण सांस्कृतिक आंधी ने भारत के छोटे-बड़े शहरों, कस्बों और गाँव को रौंदकर रख दिया है। उपभोक्ता संस्कृति के फलने-फूलने से गाँव के सीधे-सादे लोग साधनों की कमी के बावजूद कैप्टन कुक आटा, टाटा नमक, रिन डिटर्जेंट, ओनिडा वाशिंग मशीन और अंकल चिप्स की माँग करने लगे हैं। यह आर्थिक प्रगति है या अवनति, इस पर विचार करने का यह मंच नहीं है, लेकिन टेक्नोलॉजी की दृष्टि से यह निश्चय ही भारत में आई विशाल क्रांति का परिचायक है। टेलीफ़ोन के क्षेत्र में सर्वप्रथम एस.टी.डी, फिर पेजर और अब सेल्यूलर मोबाइल रेडिया टेलीफ़ोन ने भारत के गाँव-गाँव को विश्व भर से जोड़ दिया है।

2. इंटरनेट : तीनों साधनों का मिलन :
इस विशाल क्रांति के बावजूद ये तीनों साधन कंप्यूटर, टी.वी. और टेलीफ़ोन अभी तक अलग-अलग उपकरण ही रहे हैं, किंतु इंटरनेट के माध्यम से एक ऐसी क्रांति भारत की दहलीज पर खड़ी है, जिससे तीनों साधनों का संयुक्त रूप से दोहन करने की सुविधा उपलब्ध रहेगी, अर्थात आप कंप्यूटर को टेलीफ़ोन और मोडेम नामक उपकरण के साथ जोड़कर घर बैठे हुए कंप्यूटर के स्क्रीन पर विश्व के किसी भी कोने में स्थित व्यापारिक संस्थान के साथ संवाद स्थापित कर सकेंगे, अपने माल को विज्ञापित कर सकेंगे, किसी भी पुस्तकालय की पुस्तक को पढ़ सकेंगे, कोई भी फ़िल्म देख सकेंगे, अपने पसंदीदा कलाकार से संपर्क कर सकेंगे अर्थात सारा विश्व सिमटकर आपके टी.वी. स्क्रीन पर आ जाएगा।

ई-मेल के नाम से प्रचलित यह सुविधा अभी तक स्क्रीन पर संदेशों के लिखित आदान-प्रदान तक ही सीमित रहती थी, किंतु इंटरनेट के माध्यम से आप अपने प्रियजनों की आवाज़ भी सुन सकेंगे, उनकी सूरत देख सकेंगे और उनसे बाकायदा संवाद कर सकेंगे, कंप्यूटर की भाषा में ध्वनि, दृश्य और पाठ के सम्मिलित रूप को मल्टी मीडिया कहा जाता है।
3. सूचना प्रौद्योगिकी का पहला चरण : डिजिटल स्विच :
आइए अब हम कंप्यूटर नेटवर्क के माध्यम से सुलभ इंटरनेट के क्रमिक विकास और इसके विभिन्न अनुप्रयोगों को सिलसिलेवार समझने का प्रयास करें ताकि इसका उपयोग दैनिक जीवन में करते हुए संपूर्ण विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकें। वस्तुत: आज का युग सूचना युग है। आज इस बात की प्रबल आवश्यकता है कि सूचनाओं का आदान-प्रदान तीव्र गति से कम से कम समय में विश्व के एक छोर से दूसरे छोर तक किया जाए। छोटे से छोटे उद्यमी से लेकर बड़े से बड़े निगमित व्यापारिक संस्थान के लिए आवश्यक है कि उसकी पहुँच अद्यतन सूचनाओं तक बनी रहे। प्रौद्योगिकी बहुत तेज़ी के साथ बदल रही है और उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए नवीनतम सूचनाओं तक अपनी पहुँच बनाए रखना निहायत ज़रूरी है। अनुसंधान और विकास कार्य में संलग्न शोधार्थियों के लिए आवश्यक है कि उन्हें विश्व के किसी भी कोनों में होनेवाली गतिविधियों की जानकारी आवश्यक ब्यौरों के साथ पल भर में उपलब्ध हो जाए। आज किसी राष्ट्र की क्षमता का आकलन उसके सैन्यबल या अर्थबल से नहीं, बल्कि सूचना बल से किया जाता है। वही देश आज विकसित कहला सकता है जो सूचनाओं का आदान-प्रदान अधिकतम तीव्रता और शुद्धता के साथ कर सके। व्यापार हो या युद्ध, सभी कार्यों में सूचनाओं के आदान-प्रदान की महती आवश्यकता है। आज राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सूचना नेटवर्क को 'सूचना सुपर हाइवे' कहा जाने लगा है। 'सूचना सुपर हाइवे' के माध्यम से आज विचारों, आँकड़ों और चित्रों को दुनिया भर में सरलता से फ्लैश या संप्रेषित किया जा सकता है। विंड़ोज-95 की व्यापारिक सफलता का मुख्य कारण ही इंटरनेट रहा है।

पिछले दशक में कंप्यूटर नेटवर्क और दूरसंचार का महत्व बहुत तेज़ी से बढ़ा है। इससे नेटवर्कों पर संप्रेषित सूचनाओं की मात्रा और गुणवत्ता में भी वृद्धि हुई है। स्थान और समय दोनों का अंतराल समाप्त हो गया है। भौगोलिक दूरियाँ मिट गई हैं और सारा विश्व एक गाँव बनकर रह गया है। वस्तुत: दूरसंचार क्षेत्र में आई महान क्रांति का श्रेय भी कंप्यूटर को है। परंपरागत रूप में आज तक दूरसंचार का संबंध टेलीफ़ोन और टेलेक्स तक सीमित रहा है, लेकिन आज कंप्यूटर की मदद से ध्वनि, पाठ, चित्र और डाटा के रूप में उपलब्ध सूचनाओं के भंडारण, पुन: प्राप्ति, संसाधन और वितरण का कार्य भी दूरसंचार नेटवर्क के ज़रिए किया जाने लगा है। वस्तुत: आधुनिक दूरसंचार नेटवर्क का मुख्य आधार है, इलेक्ट्रॉनिक डिजिटल स्विच, ये स्विच ऐसे सॉफ्टवेयर को नियंत्रित करते हैं, जिसके अंतर्गत अनेक प्रोग्राम होते हैं और प्रत्येक प्रोग्राम में सैकड़ों अनुदेश रहते हैं। प्रयोक्ता द्वारा मात्र एक बार फ़ोन उठाने पर ही जो डायल टोन बजती है, उसमें लगभग 1,00,000 अनुदेशों का पालन होता है और प्रत्येक कॉल के लिए 6,00,000 कुल कनेक्शन होते हैं। अस्सी के दशक में व्यस्त समय में एक स्विच के अंतर्गत लगभग 2,00,000 कॉल समाहित होती थीं और आज के प्रत्येक स्विच में प्रति घंटे 10 लाख अर्थात एक मिलियन कॉल समाहित हो सकती हैं।
सामान्य स्विचन के आलावा इस नेटवर्क के अंतर्गत बिल बनाने, यातायात का आकलन करने, उपकरणों को ठीक बनाये रखने, मरम्मत या बदलाव की आवश्यकताओं की सूचना देने, यातायात प्रबंधन और ग्राहक सेवा विकल्प की सुविधा उपलब्ध कराने का कार्य भी इन्हीं डिज़टल स्विचों के माध्यम से संपन्न होता है। इन कार्यों में लगभग 15 लाख अर्थात 1.5 मिलियन अनुदेश समाहित रहते हैं। इस प्रकार आधुनिक स्विच में 2 मिलियन अर्थात 20 लाख अनुदेशों के भंडारण की क्षमता होती है। नई पीढ़ी के इन स्विचों को बनाने की लागत पश्चिमी देशों में लगभग १ बिलियन अर्थात 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर पड़ती है।
लगभग एक दशक पूर्व एक स्थल के दूसरे स्थल तक संवाद स्थापित करने के लिए बेतार अर्थात वायरलेस प्रणाली का प्रयोग किया जाता था, किंतु आज सेल्युलर मोबाइल रेडियो टेलीफ़ोन (CMRT) के आविष्कार से गाड़ी में सफ़र करते हुए भी विश्व के किसी भी कोने में टेलीफ़ोन पर बातचीत की जा सकती है। इसके अलावा पेजर पर संदेश लिखित रूप में संप्रेषित किया जा सकता है। संदेश मिलने पर आप वांछित पार्टी से टेलीफ़ोन पर संपर्क कर सकते हैं। आज पेजर की सुविधा भारत के अधिकांश शहरों में उपलब्ध हो गई है, लेकिन मोबाइल फ़ोन की सुविधा फिलहाल बड़े महानगरों तक ही सीमित है।
दूरसंचार नेटवर्क को अधिकाधिक सूचनाएँ ले जाने में सक्षम बनाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (Information Technology) की भूमिका सर्वोपरि है। इससे दूरसंचार की लागत दिनोंदिन कम होती जा रही है। फ़ोन का आकार और वज़न भी घटता जा रहा है। साथ ही अब ये उपकरण बहुत नाजुक नहीं रह गए हैं। मज़बूत और टिकाऊ होने के कारण उनके नियमित रख-रखाव की ज़रूरत कम होने लगी है, किंतु भारत में दूरसंचार जगत की यह विडंबना है कि जहाँ एक ओर सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग इतना विकसित हो गया है, वहीं ग्राहक इसके लाभ से पूरी तरह वंचित हैं। टेलीफ़ोन स्विच इतने विश्वसनीय होते हैं कि टेलीफ़ोन ग़लत मिल ही नहीं सकता, बशर्ते कि ग़लत नंबर डायल न किया गया हो। उदाहरण के लिए टेलीफ़ोन निर्देशिका को देखें, इसे कंप्यूटरीकृत कर दिया गया है। डाटाबेस में ग्राहक संबंधी सभी विवरण (पता, टेलीफ़ोन आदि) मौजूद हैं। ऑपरेटर पल भर में अपेक्षित जानकारी प्राप्त करके ग्राहक को दे सकते हैं। लेकिन कर्मचारी महीनों तक नए कंप्यूटरों के विवरण कंप्यूटर में नहीं भरते। इस प्रकार कंप्यूटरीकरण के बावजूद ऑपरेटर आपको सही सूचना देने में असमर्थ हैं। यह क्यों आवश्यक है कि 197 के सभी ऑपरेटर केंद्रिय कार्यालय के भवन में एक साथ बैठें। क्यों नहीं यह सुविधा सभी टेलीफ़ोन एक्सचेंजों में टर्मिनल लगाकर मुहैया की जा सकती। इसी प्रकार 198 का भी कंप्यूटरीकरण किया गया है, लेकिन ऑन लाइन परीक्षण की सुविधा न होने के कारण यहाँ भी वही समस्या है। ग्राहक शिकायतों को दोहराते रहते हैं, लेकिन ऑपरेटर मरम्मत की अद्यतन गति-प्रगति की सही जानकारी न होने के कारण ढुल-मुल जवाब देती रहती हैं। यही हाल बिलिंग और लेखा संबंधी सूचनाओं का रहता है।
4. इंटरनेट क्या है? :
इंटरनेट नेटवर्कों का नेटवर्क है। 160 से अधिक देश इसके सदस्य हैं। 40 मिलियन से अधिक इसके उपयोक्ता हैं। यही कारण है कि इसे विश्व का नेटवर्क माना जाता है। यह विश्व भर के शैक्षणिक, औद्योगिक, सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं और व्यक्तियों को आपस में जोड़ता है। यह विश्व भर के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर काम करने वाली नेटवर्क प्रणालियों को एक मानक प्रोटोकोल के माध्यम से जोड़ने में सक्षम हैं। इसका कोई केंद्रीय प्राधिकरण नहीं है। मात्र विभिन्न नेटवर्कों के बीच परस्पर सहमति के आधार पर इसकी परिकल्पना की गई है। यह सहमति इस बात पर है कि सभी प्रयोक्ता संस्थाएँ इस पर संदेश के आदान-प्रदान के लिए एक ही पारेषण (
Transmission) भाषा या प्रोटोकोल का प्रयोग करेंगी। सन 1969 में विंटर सर्फ़ ने इंटरनेट सोसायटी का गठन किया था और कुछ मेनफ्रेम कंप्यूटरों को परस्पर जोड़ दिया था। इंटरनेट सोसायटी मात्र स्वैच्छिक संस्थाओं का संगठन है, इंटरनेट के मानकों का निर्धारण करती है और उसके माध्यम से तकनीकी विकास पर नज़र रखती है।
5. कंप्यूटर नेटवर्क क्या है? :
कंप्यूटर नेटवर्क स्वतंत्र और स्वायत्त कंप्यूटरों का संकलन है। इन्हें कई तरीकों से आपस में जोड़ा जा सकता है। 1 से 2 कि.मी. की परिधि में विभिन्न कंप्यूटरों को परस्पर जोड़ने के नेटवर्क को
Metropolitan Area Network ³MAN´ कहा जाता है। लगभग 40 से 50 कि.मी. (सामान्यत: एक नगर या महानगर के भीतर) की परिधि में फैले कंप्यूटर नेटवर्क को Wide Area Network³ WAN´ कहा जाता है। विभिन्न नगरों या महाद्वीपों को परस्पर जोड़ने वाले कंप्यूटर नेटवर्क को Wide Area Network³ WAN´  कहा जाता है। विभिन्न नगरों या महाद्वीपों को परस्पर जोड़ने वाले कंप्युटर नेटवर्क को Wide Area Network³ WAN´  कहा जाता है। इंटरनेट वस्तुत: 160 देशों में फैला बड़ा WAN ही है, जो अपने प्रोटोकोल के रूप में TCP/IP  का प्रयोग करता है। सामान्यत: LSMs नेटवर्क पर लैंटास्टिक, बन्यान वाइन्स, पीसी-टीसीपी/आईपी आदि पर काम करते हैं। फाइबर या माइक्रोवेव लिंक पर काम करते हैं और MANs फाइबर या उपग्रह लिंक का प्रयोग करते हैं।
इंटरनेट के प्रयोग कंप्यूटर को होस्ट कहा जाता है और उसे एक विशिष्ट नाम दिया जाता है। इस विशिष्ट नाम में होस्ट का नाम और प्रयोग क्षेत्र (Domain Name) का उल्लेख होता है। प्रयोग क्षेत्र के भी कई भाग होते हैं, जिनसे होस्ट के संगठन की जानकारी मिलती है।
अमेरिका की एक संस्था एन.आई.सी. द्वारा होस्ट का नामकरण किया जाता है। प्रत्येक कंप्यूटर वस्तुत: दूसरे कंप्यूटर को विशिष्ट अंकों से पहचानता है, किंतु मनुष्य के लिए शाब्दिक नाम की पहचान ज़्यादा सहज है, इसलिए प्रत्येक कंप्यूटर या होस्ट को प्रयोक्ताओं की सुविधा के लिए शाब्दिक नाम से ही पुकारा जाता है। वस्तुत: आंतरिक प्रोटोकोल एक ऐसी विशिष्ट संख्या है, जिससे इंटरनेट पर होस्ट को पहचाना जा सकता है।

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