मंगलवार, 14 अक्तूबर 2014

पत्र-पत्रिकाओं का इतिवृत्त और विकास





प्रो॰ रमेश गौतम अध्यक्ष, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली-110007 
 
 
प्रस्तुति-- गुड्डू यादव कृष्णा यादव
वर्धा 
 
 
पत्र-पत्रिकाएँ मानव समाज की दिशा-निर्देशिका मानी जाती हैं। समाज के भीतर घटती घटनाओं से लेकर परिवेश की समझ उत्पन्न करने का कार्य पत्रकारिता का प्रथम व महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्य है। राजनीतिक-सामाजिकचिंतन की समझ पैदा करने के साथ विचार की सामर्थ्य पत्रकारिता के माध्यम से ही उत्पन्न होती है। पत्रकारिता ने युगों से अपने इस दायित्व का निर्वाह किया तथा दायित्व-निर्वहन की समस्त कसौटियों को पूर्ण करते हुए समय-समय पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की। यह अध्ययन करना अपने-आप में अत्यंत रोचक है कि पत्रकारिता की यह यात्रा कब और कैसे आरंभ हुई और किन पड़ावों से गुजरकर राष्ट्रीयता के मिशन से व्यावसायिकता तक की यात्रा को उसने संपन्न किया।
आशादी से पूर्व का युग राष्ट्रीयता औरराष्ट्रीय चेतना की अनुभूति के विकास का युग था। इस युग का मिशन और जीवनका उद्देश्य एक ही था : स्वाधीनता की चाह और प्राप्ति का प्रयास। इस प्रयास के तहत् ही हिंदीपत्र-पत्रिकाओं का आरंभ हुआ। इस संदर्भ में इस तथ्य को भी ध्यान में रखना होगा कि हिंदी क्षेत्रों के बाहर भी विशेषकर हिंदीतर भाषी क्षेत्रों में भाषाको राष्ट्रीय अस्मिता का वाहक मानकर सभी पत्रकारों ने हिंदी को ही अपनी ‘भाषा’ के रूप में चुना और हिंदी भाषा के पत्र-पत्रिकाओं के संवर्धन में अपना योगदान दिया।
भारतेंदु के आगमन से पूर्व ही पत्रकारिता का आरंभ हो चुका था। हिंदी भाषा का प्रथम समाचार-पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ 30 मई, 1826 को कानपुर निवासी पं॰ युगल किशोर शुक्ल ने निकाला। सुखद आश्चर्य की बात यह थी कि यह पत्र बंगाल से निकला और बंगाल में ही हिंदी पत्रकारिता के बीज प्रस्पुफटित हुए। ‘उदन्त मार्तण्ड’ का मुख्य उद्देश्य भारतीयों को जागृत करना तथा भारतीयों के हितों की रक्षा करना था। यह बात इसके मुख पृष्ठ पर छपी पंक्ति से ही ज्ञात होती है:
यह उदन्त मार्तण्ड अब पहले पहल हिंदुस्तानियों के हित के हेतु जो आज तक किसी ने नहीं चलाया .....।
समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं का मूल उद्देश्य सदैव जनता की जागृति और जनता तक विचारों का सही संप्रेषण करना रहा है। महात्मा गांधी की पंक्तियाँ हैं : समाचार पत्र का पहला उद्देश्य जनता की इच्छाओं, विचारों को समझना और उन्हें व्यक्त करना है। दूसरा उद्देश्य जनता में वांछनीय भावनाओं को जागृत करना है। तीसरा उद्देश्य सार्वजनिक दोषों को निर्भयतापूर्वक प्रकट करना है।
समाचार-पत्र और पत्रिकाओं ने इन उद्देश्यों को अपनाते हुए आरंभ से ही भारतीयों के हित के लिए विचार को जागृत करने का कार्य किया। बंगाल से निकलने वाला ‘उदन्त मार्तण्ड’ जहाँ हिंदी भाषी शब्दावली का प्रयोग करके भाषा-निर्माण का प्रयास कर रहा था वहीं काशी से निकलने वाला प्रथम साप्ताहिक पत्र ‘बनारस अखबार’ पूर्णतया उर्दू और फारसीनिष्ठ रहा। भारतेंदु युग से पूर्व ही हिंदी काप्रथम समाचार-पत्र (दैनिक) ‘समाचार सुधावर्षण’ और आगरा से ‘प्रजाहितैषी’ का प्रकाशन हो चुका था। अर्जुन तिवारी पत्रकारिता के विकास को निम्नलिखित कालखण्डों में बाँटते हैं:
1. उद्भव काल (उद्बोधन काल) - 1826-1884 ई॰
2. विकासकाल
(क) स्वातंत्रय पूर्व काल
(अ) जागरण काल - 1885-1919
(आ) क्रांति काल - 1920-1947
(ख) स्वातंत्रयोत्तर काल - नवनिर्माण काल - 1948-1974
3. वर्तमान काल (बहुउद्देशीय काल) 1975 ...
भारतेंदु ने अपने युग धर्म को पहचाना और युग को दिशा प्रदान की। भारतेंदु ने पत्र-पत्रिकाओं को पूर्णतया जागरण और स्वाधीनता की चेतना से जोड़ते हुए 1867 में ‘कवि वचन सुधा’ का प्रकाशन किया जिसका मूल वाक्य था : 'अपधर्म छूटै, सत्व निज भारत गहै' भारत द्वारा सत्व ग्रहण करने के उद्देश्य को लेकर भारतेंदु ने हिंदी पत्रकारिता का विकास किया और आने वालेपत्रकारों के लिए दिशा-निर्माण किया। भारतेंदु ने कवि वचन सुधा,हरिश्चंद्र मैगशीन, बाला बोधिनी नामक पत्र निकाले। ‘कवि वचन सुधा’ को 1875 में साप्ताहिक किया गया जबकि अनेकानेक समस्याओं के कारण 1885 ई॰ में इसे बंद कर दिया गया। 1873 में भारतेंदु ने ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ का प्रकाशन किया जिसका नाम 1874 में बदलकर ‘हरिश्चंद्र चन्द्रिका’ कर दिया गया। देश के प्रति सजगता, समाज सुधार, राष्ट्रीय चेतना, मानवीयता, स्वाधीन होने की चाह इनके पत्रों की मूल विषयवस्तु थी। स्त्रियों को गृहस्थ धर्म और जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए भारतेंदु ने ‘बाला बोधिनी’ पत्रिका निकाली जिसका उद्देश्य महिलाओं के हित की बात करना था।
भारतेंदु से प्रेरणा पाकर भारतेंदु मण्डल के अन्य पत्रकारों ने भी पत्रों का प्रकाशन किया। पं॰ बालकृष्ण भट्ट का ‘हिंदी प्रदीप’ इस दिशा में अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रयास था। इस पत्र की शैली व्यंग्य और विनोद का सम्मिश्रण थी और व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग करते हुए जन जागृति का प्रयास करना इनका उद्देश्य था। इस पत्र का उद्घाटन करते हुए भारतेंदु ने लिखा :
सूझे विवेक विचार उन्नति, कुमति सब यामैं जरै।
हिन्दी प्रदीप प्रकाशि मुरखतादि भारत तम हरै।
1857 के संग्राम से प्रेरणा लेकर भारतवासियों की जागृति का यह प्रयास चल ही रहा था कि 14 मार्च 1878 को 'वर्नाकुलर प्रेस एक्ट' लागू कर दिया गया। लार्ड लिटन द्वारा लागू इस कानून का उद्देश्य पत्र-पत्रिकाओं की अभिव्यक्ति को दबाना और उनके स्वातंत्रय का हनन करना था। ‘हिंदी प्रदीप’ ने इस एक्ट की न केवल भर्त्सना की बल्कि उद्बोधनपरक लेख भी लिखे।
1881 में पं॰ बद्रीनारायण उपाध्याय ने ‘आनन्द कादम्बिनी’ नामक पत्र निकाला और पं॰ प्रतापनारायण मिश्र ने कानपुर से ‘ब्राह्मण’ का प्रकाशन किया। ‘आनन्द- कादम्बिनी’ ने जहाँ साहित्यिक पत्रकारिता में योगदान दिया वहीं ‘ब्राह्मण’ ने अत्यंत धनाभाव में भी सर्वसाधारण तक जानकारी पहुँचाने का कार्य पूर्ण किया। ‘ब्राह्मण’ का योगदान साधारण व सरल गद्य के संदर्भ में भी महत्त्वपूर्ण है।
1890 में ‘हिंदी बंगवासी’ ने कांग्रेस परव्यंग्य की बौछार की वहीं 1891 में ‘बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन’ ने ‘नागरी नीरद’ का प्रकाशन किया। राष्ट्र को चैतन्य करना व अंग्रेशों की काली करतूतों का पर्दाफाश करना इस पत्र का उद्देश्य था। भारतेंदु युग से निकलने वाले पत्रों की मूल विषयवस्तु भारतीयों को जागृत करना तथा सत्य, न्याय और कर्त्तव्यनिष्ठा का प्रसार करना तथा जनता को एकता की भावना का पाठ पढ़ाना था।
यह युग राष्ट्रीय चेतना के प्रसार का युग था। पत्रकारों का उद्देश्य किसी भी प्रकार की व्यावसायिक पत्रकारिता को प्रश्रय देना नहीं था। वह पत्रकारिता का सही दिशा में सदुपयोग करते हुए आम जन के भीतर वह जोश एवं उमंग भरना चाहते थे जिसके द्वारा वह स्वयं खड़े होने का साहसकर सके। इसी राष्ट्रीयता का विस्तार था - सरकार की नीतियों का पर्दाफाश करना। ब्रिटिश सरकार की अनीतियों पर चढ़े नीतिगत मुलम्में को उतार कर उनके वास्तविक चेहरे का उद्घाटन करना इस काल के पत्रकारों का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था। बालमुकुन्द गुप्त ने ‘शिवशम्भु के चिट्ठे’ में ब्राह्मण शिवशम्भु शर्मा के छद्म नाम सेलॉर्ड कर्जन की नीतियों पर व्यंग्य किया।
इस समय की दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ थीं : 1. 1878 का वर्नाकुलर प्रेस एक्ट, 2. 1905 का बंग विभाजन। 1878के इस एक्ट द्वारा प्रेस कीआशादी पर पाबंदी लगाने का प्रयास किया गया। ब्रिटिश सरकार अपने खिलाफ स्वतंत्रता के स्वर उठाने वाले पत्रों का दमन करना चाहती थी और इसीलिए उन्होंने 1878 में प्रेस एक्ट लागू किया। 1879 में ‘सारसुधानिधि’ पत्र निकला। इसने न केवल इस एक्ट का विरोध किया बल्कि अपनी ‘भाषा’ हिंदी की समृद्धि के लिए व्याख्यान भी लिखे। अपने प्रयोजन की ओर संकेत करते हुए इन्होंने लिखा - ...यथार्थ हिंदी भाषा का प्रचार करना और हिंदी लिखने वालों की संख्या में वृद्धि करना सार सुधानिधि का दूसरा प्रयोजन है। राष्ट्रीय चेतना के साथ-साथ भाषा की महत्ता स्थापित करने का प्रयास इस युग के सभी पत्रकारों का उद्देश्य था। यदि कहा जाए कि भाषा का प्रश्न राष्ट्रीयता का ही प्रश्न थाऋ तो गलत नहीं होगा। सर्वसाधारण की जन-भाषा और हृदय को छू लेने वाली हिंदी का प्रयोग करना और करने के लिए तैयार करना इनका प्रमुख उद्देश्य था। सबसे बड़ी बात यह थी कि इन्होंने कहीं भी भाषा को प्रबुद्धजन से ही जोड़ने का आग्रह नहीं दिखाया, सामान्य जन की ही शब्दावली काप्रयोग करते हुए उन्हें सचेतन करने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए सारसुधानिधि में ‘हिंदी भाषा’ नाम से छपे लेख की भाषा द्रष्टव्य है :
‘ .... जब हम सोचते हैं तो पृथम दृष्टी हमारी भाषा पर पड़ती है, क्योंकि जब तक निष्कपट विशुद्ध भाषा की उन्नति नहीं होयगी जब तक निष्कपटसभ्यता और देश की उन्नति भी नहीं होयगी।’
इस दिशा में सबसे बड़ा योगदान ‘भारतेंदु’ का है। भारतेंदु ने 1873 में कहा : ‘हिंदी नयी चाल में ढली’ - यह नयी चाल भाषा की राह को सुगम बनाने का प्रयास थी जिसके लिए भारतेंदु ने सर्वाधिक प्रयास किया।
इस युग की पत्रकारिता के उद्देश्य बहुआयामी थे। एक ओर राष्ट्रीयता की चेतना के साथ-साथ राजनीति की कलई खोलना तो दूसरी ओरसामाजिक चेतना को जागृत करना, सामाजिक कुरीतियों और दुष्प्रभावों का परिणाम दर्शाना, स्त्रियों की दीन-हीन दशा में सुधार और स्त्री-शिक्षा को बढ़ावा देनाऋ पत्रकारों के प्रमुख उद्देश्य थे। भारतेंदु इस कार्य के लिए युग द्रष्टा और युग स्रष्टा के रूप में आए। उनके योगदान के लिए ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल उन्हें विशेष स्थान प्रदान करते हैं। हिंदी साहित्य का दिशा-निर्देश करने वाली पत्रिका ‘सरस्वती’ का प्रकाशन जनवरी 1900 को हुआ जिसके संपादक मण्डल में जगन्नाथदास रत्नाकर, राधाकृष्णदास, श्यामसुंदर दास जैसे सुप्रसिद्ध विद्वज्जन थे। 1903 में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसका कार्यभार संभाला। एक ओर भाषा के स्तर पर और दूसरी ओर प्रेरक बनकर मार्गदर्शन का कार्य संभालकर द्विवेदी जी ने साहित्यिकऔर राष्ट्रीय चेतना को स्वर प्रदान किया। द्विवेदी जी ने भाषा की समृद्धि करके नवीन साहित्यकारों को राह दिखाई। उनका वक्तव्य है : हमारी भाषा हिंदी है। उसके प्रचार के लिए गवर्नमेंट जो कुछ कर रही है, सो तो कर ही रही है, हमें चाहिए कि हम अपने घरों का अज्ञान तिमिर दूर करने और अपना ज्ञानबल बढ़ाने के लिए इस पुण्यकार्य में लग जाएं। महावीरप्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से ज्ञानवर्धन करने के साथ-साथ नए रचनाकारों को भाषा का महत्त्व समझाया व गद्य और पद्य के लिए राह निर्मित की। महावीर प्रसाद द्विवेदी की यह पत्रिका मूलतः साहित्यिक थी और हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त से लेकर कहीं-न-कहीं निराला के निर्माण में इसी पत्रिका का योगदान था परंतु साहित्य के निर्माण के साथ राष्ट्रीयता का प्रसार करना भी इनका उद्देश्य था। भाषा का निर्माण करना साथ ही गद्य-पद्य के लिए खड़ी बोली को ही प्रोत्साहन देना इनका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य था।
1901 में प्रकाशित होने वाले पत्रों में चंद्रधर शर्मा गुलेरी का ‘समालोचक’ महत्त्वपूर्ण है। इस पत्र का दृष्टिकोण आलोचनात्मक था और इसी दृष्टिकोण के कारण यह पत्र चर्चित भी रहा।
1905 में काशी से ‘भारतेंदु’ पत्र का प्रकाशन हुआ। यह पत्र भारतेंदु हरिश्चंद्र की स्मृति में निकाला गया। ‘जगमंगल करै’ के उद्घोष के साथ इस पत्र ने संसार की भलाई करने का महत् उद्देश्य अपने सामने रखा परंतु लंबे समय तक इसका प्रकाशन नहीं हो सका।
1907 का वर्ष समाचार पत्रों की दृष्टि सेमहत्त्वपूर्ण रहा। महामना मालवीय ने ‘अभ्युदय’ का प्रकाशन किया वहीं बाल गंगाधर तिलक के ‘केसरी’ की तर्ज पर माधवराव सप्रे ने ‘हिंदी केसरी’ का प्रकाशन किया। ‘मराठी केसरी’ के महत्त्वपूर्ण अंशों और राष्ट्रीय चेतना का उद्बोधन करने वालेअवतरणों का हिंदी अनुवाद करके ‘हिंदी केसरी’ ने उसे जन-साधारण तक पहुँचाया।महावीर प्रसाद द्विवेदी ने बाल गंगाधर तिलक की प्रशंसा करते हुए और माधवराव सप्रे के भाषा संबंधी प्रयास को सराहते हुए लिखा : .... आशा है इससे वही काम होगा जो तिलक महाशय के केसरी से हो रहा है। इसके निकालने का पूरा श्रेय पं॰ माधवरावसप्रे बी.ए. को है। महाराष्ट्री होकर हिंदी भाषा पर आपके अखण्ड और अकृत्रिम प्रेम को देखकर उन लोगों को लज्जित होना चाहिए जिनकी जन्मभाषा हिंदी है पर जो हिंदी में एक सतर भी लिख नहीं सकते या लिखना नहीं चाहते।
1910 में गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ का प्रकाशन किया। यह पत्र उग्र एवं क्रांतिकारी विचारधारा का पोषक था। उग्र नीतियों के समर्थक इस पत्र ने उत्साह एवं क्रांति के पोषण में अपनामहत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
इन पत्रों का मूल उद्देश्य राष्ट्रीय चेतना एवं भाषा नीति का प्रसार करना था। उग्र एवं क्रांतिकारी विचारधारा के पोषण पत्र स्वाधीनता के प्रसार के लिए प्रयास कर ही रहे थे, साथ ही साथ साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं ने अनेक लेख लिखकर जनता की सुप्त भावनाओं का दिशा-निर्देशन किया।
छायावाद काल में पत्रिकाओं का प्रकाशन अधिक हुआ। इस काल की प्रमुख पत्रिकाओं में इन्दु, प्रभा, चाँद, माधुरी एवं शारदा, मतवाला थी। सभी साहित्यकारों : जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, निराला, महादेवी वर्मा ने पत्रिकाएँ निकालीं। इन साहित्यकारों ने अपने लेखों के माध्यम से जनजागृति का कार्य किया। 1909 में जयशंकर प्रसाद ने ‘इन्दु’ पत्रिका का प्रकाशन किया। हिंदी काव्यधारा में छायावाद का आरंभ इसी पत्रिका से ही हुआ।
‘प्रभा’ का प्रकाशन सन् 1913 में हुआ। इसके संपादक कालूराम गंगराडे थे। इस पत्रिका ने ही माखनलाल चतुर्वेदी जैसे राष्ट्रीय चेतना के कवि को जगत् के समक्ष प्रस्तुत एवं स्थापित किया। माखनलाल चतुर्वेदी ने इस पत्र को उग्र एवं सशक्त स्वर जागरण का माध्यम बनाया। उनके शब्दों में : "हमारा अनुरोध है कि तुम अन्यायों, अत्याचारों और भूलों के संबंध में जो कुछ लिखना हो, वहदबकर नहीं, खुलकर लिखो। तुम्हारे पत्रों के संपादकों का विद्वता का ज्वर तभी शायद उतरेगा।" ‘चाँद’ का प्रकाशन सन् 1920में हुआ। आरंभ में यह साप्ताहिक पत्र था बाद में मासिक हो गया। इस पत्रिका में अनेक सामाजिक, धाख्रमक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर लेख प्रकाशित किए जाते थे।
‘माधुरी’ का प्रकाशन 1921 से हुआ। यहछायावाद की प्रमुख पत्रिका थी परंतु अनेक अस्थिर नीतियों का इसे भी सामना करना पड़ा तथापि यह छायावाद की सबसे लोकप्रिय पत्रिका रही। श्री विष्णुनारायण भार्गव इस पत्रिका के संस्थापक थे। ‘माधुरी’ के मुख पृष्ठ पर दुलारे लाल भार्गव का लिखा दोहा प्रकाशित होता था :
सिता, मधुर मधु, सुधा तिय अधर माधुरी धन्य।
पै नव रस साहित्य की यह माधुरी अनन्य।
1922 में रामकृष्ण मिशन से जुड़े स्वामी माधवानन्द के संपादनमें ‘समन्वय’ का प्रकाशन हुआ। यह मासिक पत्र था। निरालाकी सूझ-बूझ और उनके पाण्डित्य का उत्कृष्ट उदाहरण यह पत्र है। आचार्य शिवपूजनसहाय और निरालाने विभिन्न उत्कृष्ट सामाजिक धाख्रमक लेखों द्वारा इस पत्र के माध्यम से सर्वसाधारण तक अपना स्थान बनाया।
निराला ने हिंदी भाषा सीखने के लिए ‘सरस्वती’ पत्रिका को आधार बनाया। वह इस पत्रिका के प्रति अपना धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहते हैं : "जिसकी हिंदी के प्रकाश के परिचय के समक्ष मैं आँख नहीं मिला सका, लजाकर हिंदीशिक्षा के संकल्प से कुछ दिनों बाद देश से विदेश, पिता के पास चला गया था और उस हिंदी हीन प्रांत में बिना शिक्षक के ‘सरस्वती’ की प्रतियांलेकर पदसाधना की और हिंदी सीखी।" 1923 में निकलने वाला ‘मतवाला’ निराला के गुणों से प्रदीप्त, अपने स्वरूप में भी निराला ही था। यद्यपि इसके संस्थापक महादेव प्रसाद सेठ थे तथापि इस पत्र की पूर्ण जिम्मेदारी शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ व पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की ही थी। हास्य, व्यंग्य एवं विनोद का प्रयोग करके नई चेतना जगाने वाले इस पत्र के मुखपृष्ठ पर छपने वाली पंक्तियाँ थी। :
अमिय गरल, शशि सीकर रविकर
राग विराग भरा प्याला
पीते हैं जो साधक उनका
प्यारा है यह ‘मतवाला’।
मतवाले अंदाज के लिए मशहूर पत्र ‘निराला’ के निराले अंदाज का सूचक था। ‘निराला’ को यह उपनाम इसी पत्र द्वारा ही प्राप्त हुआ था। ‘मतवाला’ साहित्यिक योजनाओं को शीर्ष पर पहुँचाने का उत्कृष्ट माध्यम था। अपने युग के प्रति जागरूक रहने के साथ-साथ साहित्य की नवीन शैली का प्रादुर्भाव करने का श्रेय इस पत्र को है।
‘सुधा’ का संपादन 1927 में श्री दुलारे लाल भार्गव व पं॰ रूपनारायण पाण्डेय ने किया। इस पत्रिका का मूल उद्देश्य बेहतर साहित्य उत्पन्न करना, नए लेखकों को प्रोत्साहन देना, कृतियों को पुरस्कृत करना व विविध विषयों पर लेख छापना था। ‘निराला’ के आगमन से ‘सुधा’ को एक नई दिशा मिली। इस पत्रिका के प्रमुख विषयों में समाज सुधार, विज्ञान से लेकर साहित्य औरगृहविज्ञान की सामग्री भी प्रकाशित होती थी।
छायावाद की पत्रकारिता इस दृष्टिकोण से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थी कि भाषा का एक नया संस्कार और भाषा में कोमलता-प्रांजलता लाने का श्रेय इस युग की पत्रिकाओं को था।
एक ओर इन पत्रिकाओं के माध्यम से स्वच्छंदतावाद की स्थापना हुई वहीं सामाजिक, राजनीतिक घटनाओं को स्वर मिला। अनेक सुंदर कविताओं का प्रकाशन इस युग की पत्रिकाओं में हुआ। ‘जूही की कली’, ‘सरोज स्मृति’ , ‘बादल राग’ जैसी निराला की उत्कृष्ट कविताएँ ‘मतवाला’ में प्रकाशित हुईं। ‘जूही की कली’ को मुक्त छंद के प्रवर्तन का श्रेय दिया जाता है।
‘चाँद’ पत्रिका में ही महादेवी वर्मा का अधिकांश साहित्य छपा। ‘छायावाद’ के प्रसिद्ध रचनाकारों में से सुमित्रानंदन पंत जी ने ‘रूपाभ’ का प्रकाशन किया।
प्रेमचंद ने 1932 में ‘जागरण’ और 1936 में ‘हंस’ का प्रकाशन किया। ‘हंस’ का उद्देश्य समाज का आह्नान करना था। ‘हंस’ साहित्यिक पत्रिका थी जिसमें साहित्य की विविध विधाओं का प्रकाशन किया जाता था। महात्मा गांधी की अहिंसा को साहित्य के माध्यम से स्थापित करने वाले प्रेमचंद ने‘हंस’ में भी इसी आदर्श को स्वर दिया। स्वतंत्रता के प्रति महात्मा गांधी के निरंतर प्रयास को महसूस करते हुए ‘हंस’ ने लिखा : भारत के कर्णधार महात्मा गांधी ने इस विचार की सृष्टि कर दी। अब वह बढ़ेगा, फूले फलेगा। ... हमारा यह धर्म है कि उस दिन को जल्द से जल्द लाने के लिए तपस्या करते रहें। यही हंस का ध्येय होगा और इसी ध्येय के अनुवूफल उसकी नीति होगी।
गांधी की नीतियों का समर्थन, स्वराज्य स्थापना के लिए जागरण का प्रयास और साहित्यिक विधाओं का विकास ही ‘हंस’ कालक्ष्य था। प्रेमचंद के पश्चात् शिवरानी देवी, विष्णुराव पराड़कर, जैनेन्द्र, शिवदान सिंह चौहान, अमृतराय ने इस पत्रिका का संपादन किया। ‘हंस’ अब एक नए रूप में और नए आदर्श-यथार्थ को समन्वित करके नए ज्वलंत प्रश्नों को उभारते हुए राजेन्द्र यादव द्वारा निकाली जारही है। अब इसका प्रमुख स्वर -किसान और स्त्री एवं दलित पीड़ा का है। इन तीनों वर्गों की सशक्त उपस्थिति इसमें देखी जा सकती है। शोषित वर्ग की आवाश ‘हंस’ में प्रमुखता से स्थान प्राप्त कर रही है।
स्वतंत्रता से पूर्व अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं ने दोहरे कार्य को लेकर उसे पूर्ण करने का प्रयास किया :
1. राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार
2. साहित्य की विविध विधाओं का विकास
इसी के साथ भाषा के विविधवर्णी रंगों की खोज और साहित्यके दोनों पक्षों : गद्य एवं पद्य की स्थापना करनाभी इनका लक्ष्य था जिसे कवि-हृदय पत्रकारों ने पूर्ण किया।
1947 में मिली स्वतंत्रता के पश्चात् भारत को लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने और इसकी संप्रभुता की रक्षा करने का संकल्प प्रत्येक भारतवासी ने किया। अपनी भाषा की समृद्धि और उसका विकास करने की चाह सभी के हृदय में विद्यमान थी परंतु धीरे-धीरे राजभाषा विधेयकों के माध्यम सेहिंदी की उपेक्षा करके अंग्रेजी को उसके माथे पर बिठाने की तैयारी की योजनाएँबनने लगीं। 12 मई, 1963 को ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में बांके बिहारी भटनागर ने हिंदी के समर्थन में लिखा : "भारत के सुदर्शनधारियों आँखें खोलकर देखो, अंग्रेजी का दुःशासन आज राष्ट्रभाषा का चीर हरने की हठधर्मी ठाने खड़ा है। सब भाषाओं को मिलकर राष्ट्रभाषा का चीर बढ़ाना होगा।" स्वतंत्रता के पश्चात् पत्रकारिता के समक्षअनेक आदर्श थे। उन्हें आशादी की सौंधी सुगंध से लेकर आने वाली पंचवर्षीय योजनाओं के स्वरूप से जनता को परिचित कराना था, विकास-काल की स्वर्णिम योजनाओं पर प्रकाश डालना था और साथ ही युगीन शमीनी सच्चाइयों को भी अनावृत्त करना था। इसी के साथ-साथ पाठक की चेतना में प्रवेश करके उसकी रुचि को संस्कारित करना भी पत्रकारिता का ही दायित्व था।
स्वतंत्रता के साथ ही भारत के विभाजन का दंश सभी को पीड़ित कर गया। 1951 में होने वाले आम चुनाव में पंचशील के सिद्धान्तों को भारतीय नीति का प्रमुख तत्त्व माना गया पर 1962 के चीनी आक्रमण ने इन सिद्धान्तों पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। 1962 के आक्रमण के समय पत्र-पत्रिकाओं ने निरंतर बलिदान का आह्नान करके अपनी सशक्त भूमिका का निर्वाह किया। ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में छपी टिप्पणियाँ किसी भी सुप्त हृदय को भी जगाने में सक्षम थीं ....
देशवासियो आओ, आज हम अपने छोटे-छोटे मतभेदों को भुलाकर वृहतर राष्ट्र की रक्षा के लिए पूर्णरूप से संगठित हो जाएँ और अपनी एकता की दहाड़ से शत्रु का कलेजा दहला दें ....।
सन् 64 में नेहरू की मृत्यु 1965 में पाकिस्तान से युद्ध ताशवंफद समझौते के बाद लालबहादुर शास्त्री जी की मृत्यु, 71 में पाकिस्तान से पुनः युद्ध आदि घटनाओं के समय पत्र-पत्रिकाएँ अपनी जिम्मेदारी पूर्ण निष्ठा के साथ निभाती रहीं।
समाचार-पत्रों के लिए सबसे अधिक संकट की घड़ी आपात्काल की थी जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन किया गया और सृजन पर रोक लगा दी गई। यह पत्रकारों के लिए अंधेरी सुरंग में से गुज़रने जैसा कठोर यातनादायक अनुभव था। धीरे-धीरे पत्रों पर भी व्यावसायिकता हावीहोने लगी। पत्रों को स्थापित होने के लिए अर्थ की आवश्यकता हुई और अर्थ की सत्ता उद्योगपतियों के हाथों में होने के कारण इनके द्वारा ही पत्रों को प्रश्रय प्राप्त हुआ। ऐसे में उद्योगपतियों के हितों को ध्यान में रखना पत्रों का कर्त्तव्य हो गया। पूंजीपतियों के हाथ में होने वाले पत्रों में बौद्धिकता का स्तर गिरने लगा और वह मुक्तिबोध के शब्दों में : ‘बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास’ बन कर रह गया। अर्जुन तिवारी अपनी पुस्तक ‘हिंदी पत्रकारिता का वृहद इतिहास’ में बालेश्वर अग्रवाल के शब्दों को उद्धृत करते हैं, उनके ये वाक्य आज की व्यावसायिकता को सही रूप में व्यक्त करने में समर्थ हैं : यह बात बिल्कुल सही है कि अब पत्रकारिता स्पष्टतः एक व्यापार बन गई है जो पाठकों को सही जानकारी देने तथा जनता की आवाश बनने के बजाय आख्रथक लाभ-हानि को ज्यादा महत्त्व देती है। जिस तरह दूसरे व्यापारों में लागत और लाभांश का महत्त्व और हिसाब होता है। उसी तरह पत्रकारिता में भी होने लगा है जिससे यह स्वाभाविक है कि अलग-अलग स्तरों के दबाव से बहुत से समझौते करने पड़ते हैं जो प्रायः पाठक को सही खोजपूर्ण जानकारी देने के उद्देश्य को पूरा करने नहीं देते।
इसके बावजूद पत्र-पत्रिकाएँ आज भी किसी सीमा तक अपने दायित्व को पूर्ण कर रही हैं। आज मुख्य रूप से पत्र-पत्रिकाएँ तीन कार्यों को निभा रही हैं :
1. साहित्यिक अभिरुचि का विकास
2. राजनीतिक सूचनाओं में अभिवृद्धि
3. सांस्कृतिक एवं मनोरजंक सूचनाएँ
इसके अतिरिक्त खेल, शिक्षा और कैरियर संबंधी दिशाएँ सुझाने का कार्य भी पत्रों द्वारा किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त पत्रों द्वारा ‘अतिरिक्तांक’ या ‘विशेषांक’ भी निकाले जाते हैं जिनमें : साहित्य, संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान, खेल, कृषि, जनसंख्या, समसामयिकी आदि विषयों पर पूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
इसके अतिरिक्त आजकल प्रत्येक दिन पत्र के साथ कोई विशेष अंक भी आता है जिसमें अलग-अलग दिन अलग-अलग विषयों के लिए निर्धारित रहते हैं। अनेक उत्कृष्ट साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं की शुरुआत धर्मयुग, उत्कर्ष, ज्ञानोदय, नये पत्ते, पाटल, प्रतीक, निकष से हुई जो अब तक कादम्बिनी, नया ज्ञानोदय, सरिता, आलोचना, इतिहास बोध, हंस, आजकल तक विकसित हो रही है। यद्यपि अनेक पत्रिकाएँ प्रसिद्ध व स्थापित नामों को महत्त्व देती हैं पर नवीन उभरती पत्रिकाएँ नए नामों और नए विचारों को भी प्रोत्साहन दे रही हैं। कथन, कथादेश,स्त्री मुक्ति, अनभै सांचा आदि अन्य महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ हैं।
पत्र-पत्रिकाओं में नवीन विचारों और मान्यताओं को प्रश्रय मिलने के कारण भाषा व शिल्प में भी लचीलापन आयाहै। कविताओं में छंदबद्धता के प्रति आग्रह टूटा है। नित नई कहानी व कविता प्रतियोगिता आयोजित की जाती हैं और उनसे जुड़े रचनाकारों को सम्मानित भी किया जाता है।
अनेक पत्रिकाएँ तो किसी विशेष विधा को केंद्र में रखकर ही कार्य कर रही हैं। इससे उस विधा विशेष का तो विकास होता ही है साथ ही पाठकों को भी रुचि के अनुरूप चयन की सुविधा मिल जाती है यथा :
‘रंग प्रसंग’ (नेशनल स्वूफल ऑफ ड्रामा) राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा निकाली जाती है। इसके प्रत्येक नए अंक में एक नएनाटक को प्रस्तुत किया जाता है। इसके अतिरिक्त नाट्य एवं रंगकर्मियों के अनुभवों से जनता को रू-ब-रू कराया जाता है। ‘नटरंग’ भी नाट्य जगत् की सुप्रसिद्ध पत्रिका है जिसका प्रकाशन अभी तक नेमिचंद जैन जी द्वारा किया जाता रहा। नाटक के विविध रंगों की छटा उकेरती यह पत्रिका अपने आप में अनुपम है।
‘अखण्ड ज्योति’ जहाँ धर्म और अध्यात्मको स्थान देती है वहीं ‘योजना’ में उद्योग जगत् की खबरों को प्रमुखता मिलती है। पिफल्मी दुनिया, पिफल्मी कलियाँ जहाँ मनोरंजन उद्योग की तस्वीर उकेरती हैं वही गृहशोभा, मनोरमा स्त्रियों के निजी संसार में हस्तक्षेप करती है। बच्चों के लिए चन्दामामा, नन्हें सम्राट्, चंपक, नए क्षितिज खोलती हैं वही ‘विज्ञान डाइजेस्ट’ विज्ञान के नए आविष्कारों से परिचय कराती है। मनोरमा इयर बुक प्रायः सभी विषयों को वर्ष भर के घटनाक्रम से जोड़कर प्रस्तुत करती है। भाषा के स्तर पर भी इन पत्रिकाओं ने अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। आज समाचार पत्रों में ‘हाइब्रिड’ या ‘संकर’ भाषा काप्रयोग अधिक है। यूँ तो छोटे-छोटे और सरल वाक्यों का प्रचलन बढ़ा है। यही कारण है कि अधिकांश पत्र फीचर लेखन को विशेष महत्त्व देते हैं क्योंकि उनकी भाषा हास्य-व्यंग्य के चुटीले वाक्यों से भरपूर किसी स्थिति को रोचक ढंग से उकेरने में समर्थ होती है। साथ ही पत्र-पत्रिकाओं ने अनेक हिंदी अंग्रेजी शब्दों को जोड़कर नई शब्दावली का भी विकास किया है जो आम बोलचाल में भी प्रयोग की जाने लगी है।
इसके अतिरिक्त अनेक समस्याओं जैसे :
1. अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं की तुलना में बेहतर प्रदर्शन
2. अधिकांश समाचारों के अनुवाद की समस्या का भी हिंदी पत्रों को सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद पत्र-पत्रिकाएँ निरंतर प्रगति कर रही हैं और इसे देखते हुए पत्रकारिता के बेहतर भविष्य की उम्मीद की जा सकती है।
स्वतंत्रता के बाद के पत्र-पत्रिकाओं का विश्लेषण अलग-अलग करना उचित होगा।
आजकल के महत्त्वपूर्ण समाचार पत्रों में ‘हिंदुस्तान’ का नाम एवं स्थान अग्रणी है। मृणाल पाण्डे के संपादनमें यह पत्र एच.टी. मीडियालिमिटेड के द्वारा कस्तूरबा गांधी मार्ग से प्रकाशित होता है। इस पत्र का प्रकाशन 1936से हो रहा है। इसके प्रथम संपादक सत्यदेव विद्यालंकार थे। इस पत्र में राजनीतिक, सामाजिक, आख्रथक सूचनाओं के साथ-साथ साहित्य संबंधी सामग्री, पुस्तक समीक्षा विशेष रूप से प्रकाशित की जाती है।
मृणाल पाण्डे साहित्य क्षेत्र से एक लंबे समय से जुड़ी रही हैं तथा बाल- पत्रिकाओं जैसे ‘नंदन’ से लेकर साहित्य जगत् की ‘कादम्बिनी’ का भी वह संपादन करती रही हैं। ऐसे में ‘हिंदुस्तान’ के संपादक के रूप में उनके आने से इसे एक नया रूप तो मिला ही है साथ ही साहित्य काभी अधिक उत्कृष्ट और नवीन रूप पत्र में दिखाई देने लगा है। भाषा में भी सरलता आई है तथा व्यंग्य और फीचर का मेल अधिक दिखाई दे रहा है।
हिंदुस्तान टाइम्स प्रकाशन द्वारा ही ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘नंदन’ और ‘कादम्बिनी’ का प्रकाशन किया गया।
‘नन्दन’ का प्रकाशन 1964 से हुआ और इसके संपादक थे - राजेन्द्र अवस्थी। ‘तेनालीराम’ की सूझ-बूझ का प्रदर्शन ज्ञान पहेली, वर्ग पहेली इसके मुख्य आकर्षण थे। बालकों के ज्ञान में वृद्धि और स्वस्थ मनोरंजन को प्रोत्साहन देना इसका लक्ष्य रहा। ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ का प्रकाशन 1950 सेहुआ। इस पत्र ने हिंदी भाषा की स्थापना के लिए चल रहे प्रयासों को अत्यंत उत्कृष्टता से स्वर प्रदान किया साथ ही युद्ध के समय जनता को बलिदान के लिए प्रेरित भी किया।
‘बेनेट कोलमेन’ कम्पनी लिमिटेड द्वारा1947 में आरंभ किए गए ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रथम संपादक हरिशंकर द्विवेदी थे। आगे चलकर‘अज्ञेय’ ने भी इस पत्र का संपादन किया। इस पत्र का प्रकाशन बहादुरशाह जफर मार्ग से होता है। ‘नवभारत टाइम्स’ का ही सांध्य संस्करण ‘सांध्य टाइम्स’ के नाम से निकलता है। देश-विदेश के समाचारों के साथ संस्कृति, खेल, पिफल्म और महानगर की गतिविधियाँ इसमें विशेष रूप से शामिल की जाती हैं। यह पत्र भाषाके स्तर पर नए-नए शब्दों के प्रयोग के लिए विशेष प्रसिद्ध है। नए विषयों औरसाज-सज्जा में परिवर्तन भी इसकी प्रमुख विशेषता है।
धर्मयुग, दिनमान, पराग व सारिका जैसी उत्कृष्ट पत्रिकाओं का प्रकाशन भी बेनेट कोलमेन एण्ड कम्पनी लिमिटेड द्वारा हुआ। ‘धर्मयुग’ एक उत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिका थी जिसे निकालने में इलाचंद्र जोशी, सत्यदेव विद्यालंकार और सबसे बढ़कर डॉ॰ धर्मवीर भारती की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। इसमें जनता की रुचि को परिष्कृत रूप देने के लिए उच्चकोटि का साहित्य प्रकाशित किया जाता था।
‘राष्ट्रीय सहारा’ के नाम से इसकी भूमिका का ज्ञान हो जाता है। राष्ट्रीय चेतना, अखण्डता को आधार बनाकर 15 अगस्त, 1991 से प्रकाशित होने वाला यह पत्र सहारा इण्डिया समूह द्वारा प्रकाशित किया जाता है। उत्तर प्रदेश में यह पत्र विशेष रूप से पठनीय है। इसका लखनउफ संस्करण अत्यंत उत्कृष्ट व लोकप्रिय है। इसका परिशिष्ट ‘हस्तक्षेप’ नाम से प्रकाशित होता है।
दैनिक समाचार-पत्रों में ‘अमर उजाला’ का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह पत्र 1948 से प्रकाशित हो रहा है। यह पत्र भी उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से लोकप्रिय है। इसके लोकप्रिय स्तंभों में -संपादकीय पत्र, आपका भविष्य, आज का आयोजन, स्वास्थ्य चर्चा तथा बच्चों का कोना प्रमुख है।
‘वीर अर्जुन’ का प्रकाशन 1954 से आरंभहुआ। राष्ट्रीयता, कर्त्तव्य परायणता व ओजस्विता को आधार बनाकर चलने वाले इसपत्र में गंभीर साहित्यिक पत्रकारिता के भी दर्शन होते हैं। इस पत्र का प्रकाशन नई दिल्ली से किया जाता है। सहारा ग्रुप द्वारा प्रकाशित सप्ताह में एक बार आने वाला पत्र ‘सहारा समय’ विविध विषयों से पूर्ण है। साहित्यिक, राजनीतिक, पिफल्मी मनोरंजन, व्यापार आदि अनेकानेक विषयों पर प्रचुर सामग्री प्रस्तुत करने के साथ-साथ बेहतर स्तर के विषय व शिल्प की विविधता इस पत्र की प्रमुख विशेषता है। यह पत्र सप्ताह में एक बार आकर भी पूरे सप्ताह के लिए सामग्रीप्रस्तुत करने में सक्षम है।
आज के प्रतियोगी माहौल में विविध अवसरों की खोज और उनके विषय में जानने की इच्छा प्रत्येक युवा में पाई जातीहै। एक ही साथ अनेक अवसरों, अनेक नवीन विषयों, प्रतियोगी परीक्षाओं, परीक्षा की तिथियों की जानकारी के साथ नवीन अवसरों और दिशाओं की जानकारी ‘रोजगारसमाचार’ के माध्यम सेप्राप्त होती है। यह पत्र कुल 64 पृष्ठों में ‘सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय’ से प्रकाशित किया जाता है। आजकल इसके संपादक राजेन्द्र चौधरी हैं।
कुछ महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ इस प्रकार हैं -
‘हंस’ : प्रेमचंद द्वारा आरंभ एवं स्थापित की गई यह पत्रिका अब राजेन्द्र यादव द्वारा निकाली जा रही है। स्त्री एवं दलित वर्ग की अभिव्यक्ति को आधार देती यह पत्रिका विविध लेखों और कहानियों के साथ अपने विवादास्पद मुद्दों को नए सिरे से उठाती संपादकीय लेखनी के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
हिंदुस्तान टाइम्स समूह द्वारा प्रकाशित एक महत्त्वपूर्ण पत्रिका है : कादम्बिनी। इसका प्रकाशन 1960 से आरंभ हुआ। इसके प्रथम संपादक बालकृष्ण राव थे। आजकल यह पत्रिका मृणाल पाण्डे, राजेन्द्र अवस्थी के संपादन में प्रकाशित होती है। विविध उत्कृष्ट विषयों से युक्त यह पत्रिका प्रत्येक बार किसी विशेष विषय को आधार बनाकर अपना मत प्रकट करती है। कभी तो यह विषय पूर्णतया साहित्यिक होता है जैसे कमलेश्वर विशेषांक तो कभी विज्ञान, आयुर्वेद पर आधारित जैसे वैकल्पिक चिकित्सा। इसके स्थायी स्तंभ हैं : लोकमत, यांत्रिक, दृष्टिकोण, उपभोक्ता सरोकार, ग्रह नक्षत्र, कला दीर्घा, कसौटी, क्लब समाचार, विधि, सांस्कृतिक डायरी, हंसते-हंसाते आदि। इन स्तंभों के नाम से ही ज्ञात हो जाता है कि पत्रिका विविध विषयों को लेकर समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान बना चुकी है।
पहले ज्ञानोदय के नाम से निकलने वाली प्रसिद्ध पत्रिका अब ‘नया ज्ञानोदय’ के नाम से प्रभाकर श्रोत्रिय के संपादन में प्रकाशित होती है। विविध कथाओं के अनुवाद करने और भाषाओं को समानांतर स्तर पर लाने के संदर्भ में इस पत्रिका का विशिष्ट योगदान है। इसके स्थायी स्तंभों में हस्तक्षेप, कहानी, भाषांतर, कविता, साक्षात्कार, यात्रा वृत्तांत, पुस्तक समीक्षा हैं। नई पुस्तकों से परिचित कराने व भाषाओं को जोड़ने में इनका विशेष योगदान है।
भारतीय-अमरीकी मित्रों के सहयोग से आरंभ की गई पत्रिका ‘अन्यथा’ कृष्ण किशोर के संपादन में संयुक्तराज्य अमरीका से निकाली जाती है। स्त्री की पीड़ा को आधार बनाती यह पत्रिका प्रवासी भारतीयों को जोड़ने का प्रयास है। समाज, संस्कृति, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिनेमा, समीक्षा, सामयिकी और परिवेश को आधार बनाती यह पत्रिका भारत और अमरीका में लोकप्रिय हो रही है।
‘कसौटी’ के कुल 15 अंक ही प्रकाशित हुए। वित्तीय कारणों से इस पत्रिका को बंद करना पड़ा अन्यथा यह भी सत्य है कि नंदकिशोर नवल ने इस पत्रिका के अत्यंत उच्च साहित्यिक स्तर को सदैव बनाए रखा। कविता, उपन्यास, नाटक, इतिहास, आलोचना को बेहतर तरीके सेप्रकाशित करते हुए इस पत्रिका ने सभी अंकों को बेहतर रूप से प्रदख्रशत किया।
साहित्य के क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती पत्रिका ‘वागर्थ’ आज की समस्याओं : विशेषकर महानगरीय उपभोक्ता संस्कृति को दर्शाती इस पत्रिका ने अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया है। बाशारवाद, उपभोक्तावाद और विश्ववाद से लेकर कहानी, यात्रा, संवाद व मीडिया के क्षेत्र में अत्यंत उत्कृष्ट लेख इसमें प्रकाशित हो रहे हैं। इसके प्रकाशक हैं : परमानन्द चूड़ीवाल।
वित्तीय संकटों के बावजूद बेहतर पत्रिका का नमूना प्रस्तुत करती पत्रिका ‘इतिहास बोध’ लाल बहादुर वर्मा के संपादनमें इलाहाबाद से प्रकाशित की जाती है। साहित्य के साथ-साथ मीडिया, इतिहास, विश्व, संस्कृति और समसामयिकी को केंद्र बनाती यह पत्रिका धीरे-धीरे बाशार में अपना स्थान बना रही है।
दैनिक भास्कर समूह द्वाराप्रकाशित पत्रिका ‘अहा! जिन्दगी’ साहित्य के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों के विशिष्ट व्यक्तियों के जीवन को जानने का प्रयास करती है। भविष्य की दुनिया के कयास लगाती इस पत्रिका के संपादक यशवंतव्यास हैं। भाषा व विषय के स्तर पर यह पत्रिका अत्यंत सरल पर उत्कृष्ट है।
‘भाषा’ पत्रिका भारतीय भाषाओं एवं साहित्य की महत्त्वपूर्ण पत्रिका है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय, माध्यमिक शिक्षा और उच्चतर शिक्षा विभाग मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रकाशित यह पत्रिका डॉ॰ शशि भारद्वाज के संपादन में प्रकाशित की जाती है। भाषा और अनुवाद, भाषा और कम्प्यूटरीकरण, भाषा और भाषा प्रौद्योगिकी, सूचना और साहित्य, साहित्य एवं विज्ञान जैसे मुद्दों पर विचार करना इनका महत्त्वपूर्ण कार्य है।
‘योजना’ विकास योजनाओं को समख्रपत पत्रिका है। कुल 72 पृष्ठों में सजी इस पत्रिका का प्रकाशन विश्वनाथ त्रिपाठी के संपादन में योजनाभवन, नई दिल्ली से होता है। यह पत्रिका हिंदी के साथ -असमिया, बंगाली, गुजराती, अंग्रेजी, कन्नड़, मलयालम, मराठी, तमिल, उड़िया, पंजाबी, तेलुगू, उर्दू में भी प्रकाशित की जाती है। भारत के एशिया के साथ आख्रथक संबंध, भूमंडलीकरण के विविध रूप, स्वास्थ्य, चिकित्सा, विकास योजनाएँ इसकी प्रमुख चिंता के विषय हैं।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हिंदी पत्र-पत्रिकाओं ने अनेक उतार-चढ़ाव का सामना करते हुए भाषा और विषय को परिपक्व किया है व अपनी सशक्त उपस्थितिदर्ज की है।

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