शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

भारतीय डाक : सदियों का सफरनामा







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पुस्तक लेखक-अरविंद कुमार सिंह प्रकाशक-नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया मूल्य-125 रूपए पृष्ठï-416 दुनिया में सबसे उन्नत मानी जानेवाली भारतीय डाक व्यवस्था का संगठित स्वरूप भी 500 साल पुराना है। एकीकृत व्यवस्था के तहत ही भारतीय डाक डेढ़ सदी से ज्यादा लंबा सफर तय कर चुकी है। कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद आज भी डाकघर ही ग्रामीण भारत की धडक़न बने हैं। आजादी के समय भारत में महज 23334 डाकघर थे, पर उनकी संख्या 1.55 लाख पार कर चुकी है। डाकघरों की भूमिकाएं भी समय के साथ बदल रही हैं। इसी नाते भारतीय डाक प्रणाली दुनिया के तमाम विकसित देशों से कहींं अधिक विश्वसनीय और बेहतर बन चुकी है। आजादी मिलने के बाद स्व.रफी अहमद किदवई के संचार मंत्री काल में भारतीय डाक तंत्र के मजबूत विकास की रूपरेखा बनी और लगातार समर्थन ने इसे बहुत मजबूत बनाया। इसी नाते भारत के दूर देहात में डाकघरोंं की सुगम पहुंच बन सकी। हमारे 89 फीसदी डाकघर देहातों में ही स्थित हैं। इसी तरह सेना डाकघरों का भी अपना विशेष महत्व है क्योंकि इनकी गति दुनिया में सबसे तेज है। पुस्तक में डाक प्रणाली के साथ परिवहन प्रणाली का भी रोचक व्यौरा है। जानेमाने लेखक एवं पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने भारतीय डाक प्रणाली का आकलन मौर्य काल से आधुनिक इंटरनेट युग तक किया है। नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक भारतीय डाक: सदियों का सफरनामा तमाम रोचक और अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डालती है। करीब डेढ़ दशक तक अनुसंधान के बाद श्री सिंह ने यह पुस्तक लिखी और इसे उन हजारों डाकियो को समर्पित किया है जिनके नन्हे पांव सदियों से संचार का सबसे बड़ा साधन रहे हैं।
किसी भी देश के आर्थिक सामाजिक और संास्कृतिक विकास में डाक विभाग की भी अपनी अहम भूमिका होती है। यही कारण है कि इसे भी सडक़, रेल और फोन की तरह आधारभूत ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। भारत में 1995 के आसपास मोबाइल के चलते संचार क्रांति का जो नया दौर शुरू हुआ, उसका विस्तार बहुत तेजी से हुआ। उसके बाद खास तौर पर शहरी इलाकों मेें यह आम मान्यता हो गयी कि अब डाक सेवाओं और विशेष कर चि_िïयों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। पर वास्तविकता यह है कि संचार क्रांति मुख्य रूप से शहरी इलाकों तक ही सीमित है। देश के 70 फीसदी लोग आज भी ग्रामीण इलाकों में रहते हैं और यहां आज भी लोगों के लिए आपसी संपर्क का साधन चि_िïयां हैं। तमाम नयी प्रौद्योगिकी के आने के बावजूद डाक ही देहात का सबसे प्रभावी और विश्वसनीय संचार माध्यम बना हुआ है। जब भारत को आजादी मिली थी तो यहां कुल टेलीफोनों की संंख्या 80 हजार थी और 34 सालों में 20.5 लाख टेलीफोन लग पाए थे। पर अब दूरसंचार नेटवर्क के तहत हर माह लाखों नए फोन लग रहे है। फिर भी संचार के नए साधनो के तेजी से विस्तार के बावजूद चि_िïयां अपनी जगह महत्व की बनी हुई हैं। आज भी हर साल करीब 900 करोड़ चि_िïयां भारतीय डाक विभाग दरवाजे-दरवाजे तक पहुंचा रहा है। कूरियर और ईमेल से जानेमानी चि_िïयां अलग हैं। 1985 में जब डाक और तार विभाग अलग किया गया था तब सालाना 1198 करोड़ पत्रों की आवाजाही थी। आज भी वैकल्पिक साधनों के विकास के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में पत्रों का आना -जाना भारतीय डाक प्रणाली के महत्व और उसकी सामाजिक उपादेयता को दर्शाने के लिए काफी है। पर चुनौतियों से जुड़ा दूसरा पहलू भी गौर करनेवाला है। दुनिया भर में डाकघरों की भूमिका में बदलाव आ रहे हैं। इलेक्ट्रानिक मेल और नयी प्रौद्योगिकी परंपरागत डाक कार्यकलापों का पूरक बन रही है। मोबाइल और स्थिर फोन, यातायात के तेज साधन, इंटरनेट और तमाम माध्यमों से चि_ïी प्रभावित हुई है। पर दुनिया में चि_िïयों पर सर्वाधिक प्रभाव टेलीफोनो ने डाला। लेकिन भारत में यह प्रभाव खास तौर पर महानगरों में ही देखने को मिल रहा है। पर यह गौर करने की बात है कि शहरी इलाकों में व्यावसायिक डाक लगातार बढ़ रही है। इसका खास वजह यह है कि टेलीमार्केटिंग की तुलना में चि_िïयां व्यवसाय बढ़ाने में अधिक विश्वसनीय तथा मददगार साबित हो रही हैंं।
भारतीय डाक प्रणाली पर अगर बारीकी से गौर किया जाये तो पता चलता है कि आजादी के बाद ही डाक नेटवर्र्क का असली विस्तार हुआ। हमारी डाक प्रणाली का विस्तार सात गुना से ज्यादा हुआ है। डाक विभाग की ओर से  कुल 38 सेवाऐं प्रदान की जा रही हैं, जिनमें से ज्यादातर घाटे में हैं। फिर भी यह  विभाग एक विराट सामाजिक भूमिका निभा रहा है। यही नहीं भारतीय डाक प्रणाली आज दुनिया की सबसे विश्वसनीय और अमेरिका, चीन, बेल्जियम और ब्रिटेन से भी बेहतर प्रणाली साबित हो चुकी है। 
अरविंद कुमार सिंह ने अपनी पुस्तक में मौर्य काल की पुरानी डाक व्यवस्था से लेकर रजवाड़ों की डाक प्रणाली, पैदल, घोड़ा -गाड़ी, नाव और पालकी से लेकर ऊंटों तक का उपयोग करके डाक ढ़ोने की व्यवस्था जैसे तमाम रोचक और प्रामाणिक तथ्य हमें अतीत में ले जाते हैं। 1 अक्टूबर 1854 को डाक महानिदेशक के नियंत्रण में डाक विभाग के गठन की ऐतिहासिक पृष्ठïभूमि, डाक अधिनियम, ब्रिटिश डाक प्रणाली के विकास और विस्तार के पीछे के कारण और अन्य तथ्यों को शामिल करके इसे काफी रोचक पुस्तक बना दिया गया है। 1857 की क्रांति और उसके बाद के आजादी के आंदोलनो में डाक कर्मचारियों की ऐतिहासिक भूमिका को भी इस पुस्तक के एक खंड में विशेष तौर पर दर्शाया गया है। डाक कर्मचारी भी आजादी के आंदोलन में अग्रणी भूमिका में थे और स्वतंत्रता सेनानियों के संदेशोंं के आदान प्रदान में भी कई ने बहुत जोखिम लिया। मगर दुर्भाग्य से इस तथ्य का अनदेखी की सभी ने की। डाक विभाग ने केवल चि_िïयां ही नहीं पहुंचायी। मलेरिया नियंत्रण तथा प्लेग की महामारीे रोकने मेें भी डाक विभाग की ऐतिहासिक भूमिका रही है। ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह के दौरान देहात तक नमक पहुंचाने में डाक विभाग की भूमिका काफी दिलचस्प तरीके से दर्शायी गयी है। शुरू से ही भारतीय डाक बहुआयामी भूमिका में रहा है तथा बहुत कम लोग जानते हैं कि डाक बंगलों, सरायों तथा सडक़ों पर के रख रखाव का काम लंबे समय तक डाक विभाग ही करता था। इन पर लंबे समय तक डाक विभाग का ही नियंत्रण था। डाकघरों से पहले कोई भी मुसाफिर डाक ले जानेवाली गाड़ी, पालकी या घोड़ा गाड़ी आदि में अग्रिम सूचना देकर अपनी जगह बुक करा सकता था। इसी तरह रास्ते में पडऩेवाली डाक चौकियों में (जो बाद में डाक बंगला कहलायीं) वह रात्रि विश्राम भी कर सकता था। यानि यह विभाग यात्राओं में भी सहायक बनता था। पुस्तक में भारतीय डाक प्रणाली के प्राण पोस्टमैन यानि डाकिये पर बहुत ही रोचक अध्याय है। डाकिया की भूमिका भले ही समय के साथ बदलती रही हो पर उसकी प्रतिष्ठïा तथा समाज में अलग हैसियत बरकरार है। इसी नाते वे भारतीय जनमानस में रच- बस गए हैं। डाकियों पर तमाम गीत-लोकगीत और फिल्में बनी हैं। भारतीय डाक प्रणाली की जो गुडविल है, उसमें डाकियों का ही सबसे बड़ा योगदान है। आज भी वे साइकिलों पर या पैदल सफर करते हैं। एक जमाने मेें तो वे खतरनाक जंगली रास्तों से गुजरते थे और अपने जीवन की आहूति भी देते थे। कई बार डाकियों या हरकारों को कर्तव्यपालन के दौरान शेर या अन्य जंगली जानवरों ने खा लिया, तमाम खतरनाक जहरीले सांपों की चपेट में आकर मर गए। तमाम डाकिए प्राकृतिक आपदाओं और दुर्गम भौगोलिक क्षेत्रों में शिकार बने तो तमाम चोरों और डकैतों का मुकाबला करते हुए लोककथाओं का हिस्सा बन गए। पुस्तक में पोस्टकार्र्ड, मनीआर्र्डर, स्पीड पोस्ट सेवा, डाक जीवन बीमा जैसी लोकप्रिय सेवाओं पर विशेष अध्याय हैं। इसके साथ ही डाकघर बचत बैक की बेहद अहम भूमिका पर भी एक खास खंड है। डाकघर बचत बैंक भारत का सबसे पुराना, भरोसेमंद और सबसे बड़ा बैंक है। इसी तरह पुस्तक में डाक टिकटो की प्रेरक, शिक्षाप्रद और मनोहारी दुनिया पर भी विस्तार से रोशनी डाली गयी है। विदेशी डाक तथा दुनिया के साथ भारतीय डाक तंत्र के रिश्तो पर भी अलग से रोशनी डाली गयी है। इसी तरह भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए डाक विभाग द्वारा शुरू की गयी नयी सेवाओं, आधुनिकीकरण के प्रयास, डाक विभाग को नयी दिशा देने की कोशिश समेत सभी प्रमुख पहलुओं को इस पुस्तक में शामिल कर काफी उपयोगी बना दिया गया है। भारतीय डाक विभाग ने खास तौर पर देहाती और दुर्गम इलाकों में साक्षरता अभियान तथा समाचारपत्रों को ऐतिहासिक मदद की पहुंचायी है। रेडियो लाइसेंस प्रणाली डाक विभाग की मदद से ही लागू हुई थी और लंबे समय तक रेडियो को राजस्व दिलाने का यही प्रमुख स्त्रोत रहा। इसी तरह रेडियो के विकास में भी डाक विभाग का अहम योगदान रहा है। एक अरसे से मुद्रित पुस्तकों, पंजीकृत समाचार पत्रों को दुर्गम देहाती इलाकों तक पहुंचा कर भारतीय डाक ने ग्रामीण विकास में बहुत योगदान दिया। वीपीपी (वैल्यू पेयेबल सिस्टम) से लोगों में किताबे मंगाने और पढऩे की आदत विकसित हुई गांव के लाखों अनपढ़ लोगों को चिट्टिïयों और पोस्टमैन ने साक्षर बनने की प्रेरणी दी.तमाम आपदाओं के मौके पर प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष और मुख्यमंत्री राहत कोषों को भेजे जानेवाले मनीआर्डर और पत्रों को बिना भुगतान के भेजने से लेकर तमाम ऐतिहासिक सेवाऐ डाकघरों ने प्रदान की हैं। इस पुस्तक में डाक प्रणाली के विस्तृत इतिहास के साथ जिला डाक और राजाओं महाराजाओं की डाक व्यवस्था, आधुनिक डाकघरों, देहाती डाकखानो, पोस्टमैन, पोस्टकार्ड, लेटरबाक्स आदि पर अलग से खंड हैं। डाक प्रणाली के विकास में परिवहन के साधनों के विकास का भी अपना महत्व रहा है। इस नाते भारतीय हरकारों, कबूतरों, हाथी -घोड़ा तथा पालकी, डाकबंगलों, रेलवे डाक सेवा, हवाई डाक सेवा पर भी अलग से खंड हैं। इसी के साथ भारतीय डाक टिकटों की मनोहारी दुनिया, पाकिस्तान पोस्ट, विदेशी डाक प्रबंधन, डाक जीवन बीमा, करोड़ो चि_िïयो का प्रबंधन, चि_ïी पत्री की अनूठी दुनिया, रेडियो लाइसेंंस, मीडिया के विकास में डाक का योगदान, डेड लेटर आफिस के कार्यकरण पर भी पुस्तक में काफी रोशनी डाली गयी है। पुस्तक में एक रोचक अध्याय उन डाक कर्मचारियों पर है जिन्होने समाज में लेखन, कला या अन्य कार्यों से अपनी खास जगह बनायी। कम ही लोग जानते हैं कि नोबुल पुरस्कार विजेता सीवी रमण, मुंशी प्रेमचंद, अक्कीलन, राजिंदर सिंह बेदी, देवानंद, नीरद सी चौधरी, महाश्वेता देवी, दीनबंधु मित्र, मशहूर डोगरी लेखक शिवनाथ से लेकर कृष्णविहारी नूर जैसी सैकड़ो हस्तियां डाक विभाग के आंगन में ही पुष्पित पल्लवित हुईं। ये सभी डाक विभाग में कर्मचारी या अधिकारी रहे हैं। संचार क्रांति की चुनौतियों से मुकाबले के लिए डाक विभाग की तैयारी भी अलग से चल रही है। इसी के तहत व्यवसाय विकास निदेशालय के कार्यकरण, स्पीड पोस्ट तथा अन्य अत्याधुनिक उत्पादों का विवरण, निजी कुरियर सेवाओं आदि पर भी पुस्तक विशेष गौर करती है। पुस्तक में भारतीय सेना डाक सेवा पर भी काफी रोचक और महत्वपूर्ण जानकारियां हैं। टेलीफोन, मोबाइल या ईमेल सैनिकों को अपने प्रियजनो के हाथ से लिखी पाती जैसा सुख- संतोष दे ही नहीं सकते। घर-परिवार से आया पत्र जवान को जो संबल देता है, वह काम कोई और नहीं कर सकता। माहौल कैसा भी हो, सैनिक को तो मोरचे पर ही तैनात रहना पड़ता है, ऐसे में पत्र उसका मनोबल बनाए रखने में सबसे ज्यादा मददगार होते हैं। इसी नाते सेना के डाकघरों का बहुत महत्व है। करीब सारे महत्वपूर्ण पक्षों और तथ्यों को समेट कर भारतीय डाक प्रणाली पर यह पुस्तक वास्तव में एक संदर्भ ग्रंथ बन गयी है।
डाकिया बीमार है…कबूतर जा… अजित वडनेरकर लेखक- अरविंदकुमार सिंह/
प्रकाशक-नेशनल बुक ट्रस्ट/ पृष्ठ-406/ मूल्य-125 रु./ 
सेलफोन, सेटेलाईट फोन और इंटरनेट जैसे संवाद के सुपरफास्ट साधनों के     इस युग में भी चिट्ठी का महत्व बरक़रार है। आज डाकिये की राह चाहे कोई नहीं देखता, पर दरवाज़े पर डाकिये की आमद एक रोमांच पैदा करती है। कुछ अनजाना सा सुसंवाद जानने की उत्कंठा ने इस सरकारी कारिंदे के प्रति जनमानस में हमेशा से लगाव का भाव बनाए रखा है, जो आज भी उतना की पक्का है। सूचना और संवाद क्रांति के इस दौर में वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने भारतीय डाक सेवा पर एक समग्र और शोधपूर्ण पुस्तक लिखी हैः भारतीय डाक-सदियों का सफ़रनामा, जिसमें सैकड़ों साल से देश के अलग-अलग भागों में प्रचलित संवाद प्रेषण प्रणाली के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया गया है। 
करीब साढ़े तीन सौ साल पहले अंग्रेजों 1688 में अंग्रेजों ने मुंबई में पहला डाकघर खोला। ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने राजनीतिक एजेंडा को पूरा करना था। डाक विभाग के जरिये सैन्य और खुफिया सेवाओं की मदद का मक़सद भी खास था। आज जब इस किताब की चर्चा हो रही है, तब आदिमकाल से चली आ रही और अब एक संगठन, संस्कृति का रूप ले चुकी संवाद प्रेषण की इस परिपाटी के सामने सूचना क्रांति की चुनौती है। इसके बावजूद दुनियाभर में डाक सेवाएं अपना रूप बदल चुकी हैं और कभी न कभी पश्चिमी देशों के उपनिवेश रहे, दक्षिण एशियाई देशों में भी यह चुनौती देर-सबेर आनी ही थी। किसी ज़माने सर्वाधिक सरकारी कर्मचारियों वाला महक़मा डाकतार विभाग होता था। उसके बाद यह रुतबा भारतीय रेलवे को मिला। डाकतार विभाग का शुमार आज भी संभवतः शुरुआती पांच स्थानों में किसी क्रम पर होगा, ऐसा अनुमान है। पूरी किताब दिलचस्प, रोमांचक तथ्यों से भरी है। गौरतलब है कि पुराने ज़माने में ऊंटों, घोड़ों और धावकों के जरिये चिट्ठियां पहुंचाई जाती थीं। राह में आराम और बदली के लिए सराय या पड़ाव बनाए जाते थे। बाद में उस राह से गुज़रनेवाले अन्य मुसाफिरों के लिए भी वे विश्राम-स्थल बनते रहे और फिर धीरे-धीरे वे आबाद होते चले गए। चीन में घोड़ों के जरिये चौबीस घंटों में पांच सौ किलोमीटर फासला तय करने के संदर्भ मिलते हैं, इसका उल्लेख शब्दों का सफर में डाकिया डाक लाया श्रंखला में किया जा चुका है। अरविंदकुमार सिंह की किताब बताती है कि मुहम्मद बिन तुगलक ने भी संवाद प्रेषण के लिए चीन जैसी ही व्यवस्था बनाई थी। गंगाजल के भारी भरकम कलशों से भरा कारवां हरिद्वार से दौलताबाद तक आज से करीब सात सदी पहले अगर चालीस दिनों में पहुंच जाता था, तो यह अचरज से भरा कुशल प्रबंधन था। ये कारवां लगातार चलते थे जिससे पानी की कमी नहीं रहती थी। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि तुगलक पीने के लिए गंगाजल का प्रयोग करता था। मेघों को हरकारा बनाने की सूझ ने तो कालिदास से मेघदूत जैसी कालजयी काव्यकृति लिखवा ली। मगर कबूतरों को हरकारा बनाने की परम्परा तो कालिदास से भी बहुत प्राचीन है। चंद्रगुप्त मौर्य के वक्त यानी ईसा पूर्व तीसरी – चौथी सदी में कबूतर खास हरकारे थे। कबूतर एकबार देखा हुआ रास्ता कभी नहीं भूलता। इसी गुण के चलते उन्हें संदेशवाहक बनाया गया। लोकगीतों में जितना गुणगान हरकारों, डाकियों का हुआ है उनमें कबूतरों का जिक्र भी काबिले-गौर है। इंटरनेट पर खुलनेवाली नई नई ईमेल सेवाओं और आईटी कंपनियों के ज़माने में यह जानकर ताज्जुब हो सकता है कि करीब ढाई सदी पहले जब वाटरलू की लड़ाई लड़ी जा रही थी, तब ब्रिटिश सरकार लगातार मित्र राष्टों को परवाने लिखती थी और गाती थी-कबूतर, जा...जा ..जा. ब्रिटेन में एक ग्रेट बैरियर पिजनग्राम कंपनी थी जिसने पैसठ मील की कबूतर संदेश सेवा स्थापित की थी। बाद में इसे आयरलैंड तक विस्तारित कर दिया गया था। बिना किसी वैज्ञानिक खोज हुए, यह निकट भूतकाल का एक आश्चर्य है। भारत में कई राज्यों में कबूतर डाक सेवा थी। उड़ीसा पुलिस ने सन् 1946 में कटक मुख्यालय में कबूतर-सेवा शुरू की थी। इसमें चालीस कबूतर थे। भारतीय डाकसेवा में कब कब विस्तार हुआ, कैसे प्रगति हुई, कब इसकी जिम्मेदारियां बढ़ाई गई और कब यह बीमा और बचत जैसे अभियानों से जुड़ा, यह सब लेखक ने बेहद दिलचस्प ब्यौरों के साथ विस्तार से पुस्तक में बताया है। डाक वितरण की प्रणालियां और उनमें नयापन लाने की तरकीबें, नवाचार के दौर से गुजरती डाक-प्रेषण और संवाद-प्रेषण से जुडी मशीनों का उल्लेख भी दिलचस्प है। डेडलेटर आफिस यानी बैरंग चिट्ठियों की दुनिया पर भी किताब में एक समूचा अध्याय है। एक आदर्श संदर्भ ग्रंथ में जो कुछ होना चाहिए, यह पुस्तक उस पैमाने पर खरी उतरती है। इस पुस्तक से यह जानकारी भी मिलती है कि भारत की कितनी नामी हस्तियां जो अन्यान्य क्षेत्रों में कामयाब रही, डाक विभाग से जुड़ी रहीं। ऐसे कुछ नाम हैं नोबल सम्मान प्राप्त प्रो॰ सीवी रमन, प्रख्यात उर्दू लेखक-फिल्मकार राजेन्द्रसिंह बेदी, शायर कृष्णबिहारी नूर, महाश्वेता देवी, अब्राहम लिंकन आदि। पत्रकारिता से जुडे़ लोगों के लिए यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण है। वैसे यह पुस्तक संदर्भ में होनी चाहिए। मेरी सलाह है कि अवसर मिलने पर आप इसे ज़रूर खरीदें, आपके संग्रह के लिए यह किताब उपयोगी होगी। रचनाकार अरविंद कुमार सिंह
प्रकाशक नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया नेहरू भवन, ५ इंस्टीटयूशनल एरिया नई दिल्ली. ११००१६
पृष्ठ - ४१२
मूल्य: १०.९५ डॉलर*
'भारतीय डाक: सदियों का सफरनामा' (डाक व्यवस्था पर शोध) पत्रकारिता के क्षेत्र में हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा सम्मानित प्रसिध्द पत्रकार, अन्वेषक एवं लेखक अरविन्द कुमार सिंह द्वारा रचित एवं नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया द्वारा प्रकाशित 'भारतीय डाक: सदियों का सफरनामा' विश्व डाक साहित्य को एक कीमती तोहफा है। यह भारतीय डाक व्यवस्था पर एक अत्यन्त महत्वपूर्ण शोध ग्रन्थ है। यह अंग्रेजी, उर्दू सहित अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रकाशित की जा रही है। इस पुस्तक में जहां हमें संसार की सब से विशाल, विकसित एवं अनूठी भारतीय डाक व्यवस्था के उद्भव, उतार-चढ़ाव एवं विकास के दिग्दर्शन होते हैं वहीं इसे दरपेश परेशानियों, चुनौतियों एवं सरोकारों से भी रू-ब-रू होने का सुअवसर मिलता है। आज भी आम आदमी का डाक विभाग से गहरा नाता है और उस पर अगाध विश्वास है।
इसी अनूठे विश्वास और जनसेवा के प्रति समर्पित भावना को रेखांकित करते अरविन्द कदम-कदम पर हरकारों के अदम्य साहस, वीरता और बलिदान की गाथा बयान करते हैं। उनके उत्पीड़न, दु:ख-दर्द, शोषण एवं मजबूरियों का मार्मिक चित्रण करते हुए, उन्हीं की आवाज की प्रतिगूंज बन जाते हैं। अरविन्द का सरोकार न केवल भारतीय हरकारों (मेहनतकशों) की नियति से है बल्कि संसार के समस्त हरकारों की नियति से है। इसी अहसास से ओत-प्रोत उनकी कलम बड़े ही सरल, सुन्दर, सहज एवं सबल ढंग से जहां-तहां व्याप्त कुत्सित व्यवस्थाओं, विकृतियों एवं विसंगतियों की ओर ध्यान आकर्षित करती है और उन्हें दूर करने के लिए हमें लगातार संघर्षशील होने का आह्वान भी देती है।
इंटरनेट के दौर में आज विश्व डाक व्यवस्था एक बहुत ही संकटमय स्थिति से गुजर रही है और भारतीय डाक व्यवस्था भी उससे अछूती नहीं रह पाई। डॉक्टर मुल्कराज आनन्द की लिखी पुस्तक भारतीय डाकघर की गाथा के बाद 'भारतीय डाक: सदियों का सफरनामा' एक ऐसी पुस्तक है जो समग्र भारतीय डाक व्यवस्था पर बिना किसी पूर्वाग्रह व दुराग्रह के तटस्थ भाव से सच्चाई का विवेकपूर्ण वर्णन करती है। इसीलिए इसकी सार्थकता एवं उपयोगिता वर्तमान संदर्भ में और भी बढ़ जाती है। डाक जीवन के कटु और स्थूल यथार्थों से दृढ़ता से जूझना और ईमानदारी से उनका मुकाबला करना सभी डाक कर्मियों का परम कर्तव्य है और यह सफर वेदना, त्रासदी व अवसाद से भरा है। अरविन्द की पुस्तक उन्हें इसी त्रासदी से जूझने और अवसाद से उबरने का संदेश देती है ताकि डाक जीवन हरा-भरा रह सके। यह रचना प्रेरणा और सृजन का अनूठा संगम है जो पाठक को प्रबल चुम्बकीय शक्ति से अपनी ओर खींचती है और अपने आप में समाहित कर लेती है। लेखन ने विभिन्न स्रोतों से प्राप्त सामग्री व सहयोग का संतुलित प्रयोग कर के इस पुस्तक को यथा-संभव कमियों से मुक्त रखने का प्रयास किया गया है।
यह पुस्तक डाक नीति निर्धारकों, अधिकारियों एवं डाक कर्मियों के लिए एक प्रकाश स्तंभ का कार्य करेगी। सूचना क्रान्ति के युग में इस किताब का सभी दफ्तरों, स्कूलों, कालेजों, पुस्तकालयों एवं विश्वविद्यालयों में होना बहुत जरूरी है। कहते हैं कि जो लोग अपना इतिहास नहीं जानते वे कभी अपनी आजादी और स्वाभिमान को कायम नहीं रख सकते।
इस पुस्तक में डाक प्रणाली के विस्तृत इतिहास के साथ जिला डाक और राजाओं महाराजाओं की डाक व्यवस्था, आधुनिक डाकघरों, देहाती डाकखानों, पोस्टमैन, पोस्टकार्ड, लेटरबॉक्स आदि पर अलग से खंड है। डाक प्रण्ााली के विकास में परिवहन के साधनों के विकास का भी अपना महत्व रहा है। इस नाते भारतीय हरकारों, कबूतरों, हाथी-घोड़ा तथा पालकी, डाकबंगलों, रेलवे डाक सेवा, हवाई डाक सेवा पर भी अलग से खंड हैं।
इसी के साथ भारतीय डाक टिकटों की मनोहारी दुनिया, पाकिस्तान पोस्ट, विदेशी डाक प्रबंधन, डाक जीवन बीमा, करोड़ों चिट्ठियों का प्रबंधन, चिट्ठी पत्री की अनूठी दुनिया, रेडियो लाइसेंस, मीडिया के विकास में डाक का योगदान, डेड लेटर आफिस के कार्यकरण पर भी पुस्तक में काफी रोशनी डाली गई है। इस पुस्तक में एक रोचक अध्याय उन भारतीय डाक कर्मचारियों पर है जिन्होंने समाज में लेखन, कला या अन्य कार्यों से अपनी खासी जगह बनाई। कम ही लोग जानते हैं कि नोबल पुरस्कार विजेता सीवी रमण, मुंशी प्रेमचंद, अक्कलीन, राजिंदर सिंह बेदी, देवानंद, नीरद सी चौधरी, महाश्वेता देवी, दीनबंधु मित्र, मशहूर डोगरी लेखक शिवनाथ से लेकर कृष्णबिहारी नूर जैसी सैकड़ों हस्तियां डाक विभाग में कर्मचारी या अधिकारी रही हैं।
संचार क्रान्ति की चुनौतियों से मुकाबले के लिए व्यवसाय विकास निदेशालय के कार्यकरण, स्पीड पोस्ट तथा अन्य अत्याधुनिक उत्पादों का विवरण, निजी कूरियर सेवाओं आदि पर भी पुस्तक विशेष गौर करती है। पुस्तक में भारतीय सेना डाक सेवा पर भी काफी रोचक और महत्वपूर्ण जानकारियां हैं। यह बात कम ही लोग जानते हैं कि टेलीफोन, मोबाइल या ईमेल सैनिकों को अपने प्रियजनों के हाथ से लिखी पाती जैसा सुख-संतोष दे ही नहीं सकते।
घर-परिवार से आया पत्र जवान को जो संबल देता है वह काम कोई और नहीं कर सकता। इसी नाते सेना के डाकघरों का बहुत महत्व है। करीब सारे महत्वपूर्ण पक्षों और तथ्यों को समेट कर भारतीय डाक प्रणाली पर यह पुस्तक वास्तव में एक संदर्भ ग्रन्थ बन गई है। पुस्तक के लेखक अरविंद कुमार सिंह संचार तथा परिवहन मामलों के जानकार हैं। अमर उजाला, जनसत्ता जैसे अखबारों में काम कर चुके श्री सिंह इस भारतीय रेल के परामर्शदाता हैं।
कर्नल तिलकराज पूर्व चीफ पोस्टमास्टर जनरल, पंजाब १८ जनवरी २००९

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