शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

भारती ने धर्मयुग को स्कूल ऑफ जर्नलिज्म बना दिया था







प्रस्तुति-- रूही जूही सिन्हा


डॉ धर्मवीर भारती. एक अनुशासन प्रिय पत्रकार. उनुशासनहीनता उन्हें बर्दाश्त न थी. उनका मानना था कि अनुशासन पत्रकारिता का सबसे अहम हिस्सा है. उनके साथ जिन -जिन पत्रकारों को भी काम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, वे सभी आज पत्रकारिता जगत के स्थापित स्तंभ बन चुके हैं. तभी तो आज भी धर्मयुग को धर्मयुग स्कूल ऑफ जर्नलिज्म की उपाधि भी नवाजा जाता है. कन्हैया, रवींद्र कालिया, प्रमोद शंकर, योगेंद्र कुमार, सुरेंद्र प्रताप सिंह कुछ ऐसे ही नाम है. धर्मवीरजी की मृत्यु के बाद जितने भी संपादकों ने धर्मयुग की कुरसी संभाली, धर्मवीर के असितत्व व उमकी परंपरा व मर्यादा को बरकरार रखा. इसी वर्ष उनकी कालजयी कृति कनुप्रिया भी 50 वर्ष की हो जायेगी.25 दिसंबर डॉ धर्मवीर भारती के जन्मदिवस पर भारती के व्यक्तित्व व हिंदी पत्रकारिता में उनके योगदान पर प्रकाश डाल रहे हैं धर्मवीर के साथ पत्रकारिता कर चुके व वर्तमान में नवनीत के संपादक विश्वनाथ सचदेव

पत्रकारिता चाहे किसी भी दौर की हो, वह वक्त से आगे की सोच रखती है. उसे हर वक्त चौंकन्ना रहना पड़ता है. तभी वह आम लोगों को प्रभावित कर पाती है. कुछ ऐसा ही नजरिया रखते थे डॉ धर्मवीर भारती. उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को न सिर्फ एक नयी परिभाषा में पिरोया, बल्कि एक नये अध्याय की भी शुरुआत की. पत्रकारिता में साहित्य को महत्वपूर्ण सिरे से जोड़ कर उन्होंने इस मिथ को दूर किया कि साहित्य सामान्य व्यक्ति का विषय नहीं हो सकता. उनके विषय वस्तु का चयन कुछ ऐसा होता था कि वह सामान्य व्यक्ति की समझ में भी आ जाये व साहित्यकार भी उनकी रचना से पूरी तरह संतुष्ट हो पायें. दरअसल, उन्होंने पत्रकारिता में एक नयी परंपरा की भी शुरुआत की. देश के सर्वश्रेष्ठ लेखकों को जोड़ने की परंपरा. उनके लिए कभी व्यक्ति नहीं बल्कि रचनाएं अहम होती थीं. चाहे कितने भी बड़े-बड़े लेखकों की रचनाएं आ जायें, वे स्तरीय न हो तो उसके लौटाने में जरा भी न झिझकते. उन्होंने कभी बड़े नाम को तवज्जो नहीं दी.अगर सामान्य व्यक्ति की रचना भी स्तरीय हैं, तो वे उसे स्थान देते थे. उस दौर में धर्मयुग की इतनी प्रतिष्ठा थी कि उसमें प्रकाशित होने के बाद उन लेखकों, कहानीकारों व कवियों की गिनती देश के श्रेष्ठ साहित्यकारों में होने लगती थी. वे अनुशासन प्रिय संपादक थे. वे कभी दफ्तर देर से नहीं पहुंचे. जल्दी आते. देर से जाते. बार-बार आलेखों को पढ़ते. मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी किसी रचना को बस सरसरी निगाह से पढ़ कर प्रकाशित होने के लिए भेज दिया हो. शायद उनके संपादन के इसी नायाब तरीके ने धर्मयुग को माइलस्टोन बनाया.

लेखकों को अपना बनाने की कला में माहिर थे धर्मवीर
पत्रकारिता को कमिटमेंट व मिशन मानते थे डॉ भारती
पुष्पा भारती
धर्मयुग का एक-एक शब्द धर्र्मवीर जी की नजरों से होकर गुजरता था. वे रात-दिन उसकी तैयारी में जुटे रहते थे. किसी साधना की तरह. वे अपना धर्म-कर्म सबकुछ पत्रकारिता को ही मानते थे. मैं तो मान बैठी थी कि धर्मयुग मेरी सौत बन गयी है. दिन-रात की उन्हें चिंता ही नहीं थी. पर धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि उनके लिए पत्रकारिता एक मिशन है न कि जीविकोपार्जन का साधन. वे पत्रों के माध्यम से संपर्क बनाने में माहिर थे. लेखकों को अपना बनाना उन्हें अच्छी तरह आता था. एक लेखक से आलेख मंगवाने के लिए वे कई-कई चिट्ठियां लिखा करते थे . सबसे पहले उन्हें विषय वस्तु बताने के लिए, दूसरी बार उन्हें यह सूचित करते कि हम इसे किस अंक में लेंगे. अगले पत्र में उन्हें यह सूचित करते कि आपका आलेख हम तक पहुंच गया है. फिर अंततः हमने उस आलेख को इस अंक में संग्रहित किया है. उन्होंने अपनी इस कला से देश के प्रतिष्ठित लेखकों को व्यक्तिगत तौर पर भी अपना बना लिया था.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें