शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

हिंदी और पत्रकारिता की भाषा




रवीन्द्र त्रिपाठी
वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार
इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदी के विकास में हिंदी पत्रकारिता का विशेष योगदान रहा है। लेकिन हिंदी पत्रकारिता की भाषा एक बहस और विवाद का मसला है। आधुनिक हिंदी के पुरोधा भारतेंदु हरिश्चंद द्वारा निकलने वाली पत्रिकाएं हो या फिर महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में निकली `सरस्वती’ का युगांतकारी मह्त्त्व, इसके बारे हम सब थोड़ा बहुत निश्चित रूप से जानते हैं, लेकिन अब ये सब इतिहास। वर्तमान का यक्ष प्रश्न है कि आज की पत्रकारिता की हिंदी कैसी है?
यही मुद्दा आज बीच बहस में है। जिसे प्रिंट मीडिया कहते हैं, यानी अखबारों और पत्रिकाओं में जिस तरह की अंग्रेजीदां हिंदी या यूं कहें कि हिंग्लिश का चलन बढ़ा है इससे भाषा पर सोचने विचारने वालों की चिंता बढ़ी है। पहले कुछ अखबारों के परिशिष्टों में हिंग्लिश का चलन शुरू हुआ लेकिन अब तो कई अखबारों के मुख्यपृष्ठों पर हिंग्लिश हावी हो रही है। ये हिंग्लिश क्या है। दरअसल हिंदी के वाक्यों में अंग्रेजी के शब्दों की बहुतायत को हिंग्लिश के नाम पर परोसा जा रहा है। ये ठीक है कि रेल, बस या बस जैसे अंग्रेजी शब्दों की हिंदी ढूंढना बोझिलता का आवरण बढाना है, लेकिन अब तो कई अखबार खबरों में इस तरह की हिंदी लिखने लगे है- `डीयू के इयरली एक्जाम लेट होंगे’, `पार्लियामेंट में  अपोजीशन का वाकआउट’, `कई कैंडीडेट्स् के नोमिनेशन  पेपर कैंसिल’। इस तरह के कई उदाहरण पेश किया जा सकते हैं।
खबरिया चैनलों में मोटे तौर पर इस तरह की हिंदी नहीं दिखती। वहां अमूमन आम बोलचाल की हिंदी का प्रयोग होता है। यही नहीं, ज्यादातर हिंदी चैनलों में अब नुक्ता का प्रयोग होने लगा है जो काम हिंदी के अखबार भी नहीं कर पाए। इस तरह हिंदी के खबरिया चैनलों ने हिंदी भाषा के मिजाज को उस तरह क्षति नहीं पहुंचाई है जिस तरह आज के कुछ अखबार कर रहे हैं। हालांकि इसके पीछे एक कारण हिंदी फिल्मों की नई खेप भी है। आजकल ज्यादातर हिंदी फिल्मों के नाम अंग्रेजी में होते हैं और उनके गानों में भी अंग्रेजी के शब्दों का ही नहीं वाक्यों का भी इस्तेमाल बढ़ा है। फिल्म `बंटी और बबली’ का मशहूर गीत `कजरारे कजरारे…’ , जिसे गुलजार ने लिखा है, में एक पंक्ति आती है- `आंखें भी कमाल करती है पर्सेनल से सवाल करती हैं।‘ इसमे सिर्फ एक शब्द `पर्सनल’ अंग्रेजी का है। लेकिन अब तो हिंदी फिल्मों के कई गानों के कई-कई वाक्य अंग्रेजी के होने लगे हैं। इन सबका असर हिंदी पत्रकारिता की भाषा पर पड़ा है।
 शायद इसकी एक वजह ये है कि कुछ संस्थानों में हिंदी पत्रकारिता अब पत्रकारों के हाथों में नहीं बल्कि मैनेजरों के हाथों में है जो खुद अच्छी भाषा क्या है ये नहीं जानते हैं और भाषा को सरल बनाने का उनका नुस्खा होता है –उनमें अंग्रेजी को शब्दों का ज्यादा प्रयोग करना। ये ठीक है कि भाषा सरल होनी चाहिए, लेकिन क्या उसका कोई व्यक्तित्व नहीं होना चाहिए?अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं से शब्दों  को लेना गलत नहीं है। लेकिन वो किस अनुपात में हो ये जरूर सोचने की बात है। खिचड़ी भाषा या हिंग्लिश कई बार सरल भी नहीं होती। बल्कि कई दफे वो हास्यास्पद होती है। इसलिए भाषा के मसले पर हिंदी पत्रकारिता को गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

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