गुरुवार, 16 अक्तूबर 2014

वैकल्पिक मीडिया की बहस में इंटरनेट का भ्रम / पंकज बिष्ट



  
डायरी अंश
(समयांतर में पूर्व प्रकाशित)
-पंकज बिष्ट



पटना में हुए प्रैक्सिस के कार्यक्रम में बोलते पंकज बिष्ट 

टना इतिहास से ज्यादा अपने वर्तमान के कारण आकर्षित करता है। उसकी जीवंतता राजनीतिक ही नहीं है, बौद्धिक भी है। हिंदी के पाठक सबसे ज्यादा बिहार में ही बतलाए जाते हैं। सबसे ज्यादा पत्र-पत्रिकाएं कहा जाता है कि यहीं बिकती हैं। (गोकि समयांतर का अनुभव कुछ दूसरा ही है।) पटना का पुस्तक मेला हिंदी प्रकाशकों के लिए विशेष महत्त्व रखता है। यहां जब भी आने का मौका मिला है किसी न किसी साहित्यिक काम से ही आना हुआ। 1977 में रेणु जी के देहांत के बाद उन पर आजकल के विशेषांक की सामग्री की तलाश में आया था। उसके बाद पुस्तक मेलों में आना हुआ। 

इस बार का आगमन युवा पत्रकारों के एक समूह 'पत्रकार प्रेक्सिस' के निमंत्रण पर हुआ था। इस अनौपचारिक मंडली में ऐसे पत्रकार हैं जिन्होंने वर्ष 2011 में ही भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की थी। ये लोग नौकरी के चलते देश के कई शहरों में फैल गए  हैं। पर इस आयोजन के लिए पटना में जुटे थे। इसे आप पत्रकारिता को लेकर उनके सरोकार और चिंताओं को समझ सकते हैं।  सीमेज नाम की संस्था के सहयोग से आयोजित इस गोष्ठी में जितने लोग इकट्ठा हुए थे वह सुखद आश्चर्य था। 

श्रोताओं में प्रसिद्ध कवि आलोक धन्वा और कथाकार प्रेमकुमार मणि भी थे।  मुझे और आनंदस्वरूप वर्मा को 'समकालीन मीडिया की चुनौतियां और वैकल्पिक रास्ते' पर बोलना था। हम लोगों ने मूलत: यह बतलाने की कोशिश की कि पत्रकारिता और मीडिया में बड़ी पूंजी का विस्तार हुआ है। पूंजी के साथ यह लाजमी है  कि वह जितनी बड़ी होगी उस पर लाभ कमाने के दबाव उतने ही ज्यादा होंगे। इसलिए इन अखबारों के लिए विज्ञापन सर्वोपरि है। इसके लिए वह सब कुछ कर सकते हैं और करते हैं। पेड न्यूज इसी का परिणाम है। एक और उदाहरण वैश्विक स्तर पर मुर्डाख हैं जिनके कदम भारतीय मीडिया क्षेत्र में पड़ चुके हैं। आज वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तो बड़े पैमाने पर आ ही चुके हैं उनका अखबार वॉल स्ट्रीट जनरल भी भारत से छपने लगा है। गत वर्ष न्यूज ऑफ द वर्ल्ड नाम के साप्ताहिक को लेकर ब्रिटेन में जो खुलासे हुए वह बतलाते हैं कि बिक्री बढ़ाने के लिए क्या नहीं किया जा सकता। इस अखबार की जेब में शासक पक्ष के लोग ही नहीं विपक्ष के लोग भी थे।

हमारे देश में आजादी के बाद यह ध्यान रखा गया था कि समाचारपत्र उद्योग स्वतंत्र रहे। इस कारण उसमें विदेशी निवेश की इजाजत नहीं थी। यही नहीं पहले और दूसरे प्रेस कमीशनों ने यह सुझाया था कि अखबारों में समाचार और विज्ञापन का अधिकतम प्रतिशत 60 और 40 रहे तथा प्राइस पेज शिड्यूल हो यानी अखबारों की कीमत उनकी पृष्ठ संख्या के हिसाब से निर्धारित हो। पर इन बातों को ठीक से कभी लागू नहीं किया गया। सबसे खराब बात यह हुई कि बहुसंस्करणीय अखबारों की इजाजत दी गई जिसने बड़े पैमाने पर एकाधिकार को बढ़ाया। आज हालत यह है कि कई अखबारों के संस्करणों की संख्या 60 को पार कर गई है।  सच यह है कि दुनिया के और किसी देश में इस तरह से अखबारों को बहुसंस्करण निकालने की इजाजत नहीं है। उदाहरण के लिए अमेरिका को लिया जा सकता है। वहां न्यूयार्क  टाइम्स या वाशिंगटन पोस्ट सिर्फ एक ही जगह से निकलते हैं। बहुसंस्करणों ने कई तरह की खराबियां पैदा की हैं। पहली बात तो यह है कि इसने प्रादेशिक अखबारों को खत्म कर दिया है। कुछ दशक पहले तक ही स्वयं पटना से ही आर्यावर्त, प्रदीप और सर्चलाइट जैसे अखबार निकलते थे, वे सब बंद हो गए हैं। बहुसंस्करणीय अखबार अपनी दृष्टि में बहुत संकीर्ण होते हैं जबकि स्थानीय अखबार विश्व को अपनी जरूरत की नजर से देखते हैं। बहुसंस्करणों ने पत्रकारों के पद भी कम किए हैं क्योंकि विशेष संवाददाता, लीड राइटर आदि सब इन अखबारों के मुख्य संस्करण में ही काम करते हैं या वहीं रिपोर्ट करते हैं, शेष संस्करण उन्हें सिर्फ इस्तेमाल करते हैं।  

इस दौरान एकाधिकार तो बढ़ा ही क्रास मीडिया निवेश के साथ ही समाचारपत्र उद्योग में विदेशी पूंजी के निवेश को भी खोल दिया गया। समाचारपत्रों में अभी वह सिर्फ 26 प्रतिशत है कहा नहीं जा सकता कि कब बढ़कर पचास को पार कर जाए।  कीमत का संघर्ष भी मुर्डाख ने ही चलाया जिसके कारण इंग्लैंड और अमेरिका के कई बड़े अखबारों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया। इसे भारत में बैनेट कोलमैन ने शुरू किया। उसने अपने 40-50 पृष्ठों के अखबारों को एक रुपये में बेचना शुरू किया। इसने छोटे अखबारों के अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया।   नवपूंजीवाद के दौर में मीडिया उपभोक्तावाद का सबसे बड़ा हथियार है। वह लगातार बहुत ही सघन तरीके से उपभोक्तावाद को बढ़ावा दे रहा है। इसका नतीजा यह हुआ है कि उसने सामान्य जनता के दुख-दर्द को अभिव्यक्त करना ही बंद कर दिया है। उसका लक्ष्य सिर्फ वह वर्ग रह गया है जिसके पास खरीद सकने की ताकत है। ऐसे में वैकल्पिक मीडिया की बात का उठना लाजमी है। मेरा कहना यह था कि यह एक मायने में लिटिल मैगजीन या छोटी पत्रिका आंदोलन भर है जो अपनी तरह से सत्ता और संस्थान का विरोध करता है और प्रतिपक्षी विचारों को सामने रखने की कोशिश करता है। लघुपत्रिका एक खास अर्थ में प्रयोग होता है। यह सत्ता और संस्थान विरोधी होने के साथ ही स्थापित फार्म और विषयवस्तु दोनों को चुनौती देता है। पर लघुपत्रिका आंदोलन या वैकल्पिक मीडिया भी तभी पनप सकता है जब कि समाज में आंदोलन हों और उसका इस तरह के प्रकाशनों को समर्थन हो। उदाहरण के लिए हम स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान के नेशनल हेराल्ड और सातवें दशक के जब वामपंथी आंदोलन चरम पर था पैट्रिऑट को ले सकते हैं। इसलिए मेरा मानना रहा है कि हमें इस लघुपत्रिका आंदोलन को तो बढ़ाना ही चाहिए पर इससे ही सारी अपेक्षाएं नहीं करनी चाहिए। जरूरी यह है कि बड़े मीडिया संस्थानों के लिए कड़े नियम बनाए जाने और उन्हें लागू करवाने की कोशिश तेज होनी चाहिए।      

आनंदस्वरूप वर्मा का मानना यह रहा है कि हमें संगठित होकर समानांतर मीडिया का निर्माण करना चाहिए। यह विचार अपने आप में महत्त्वपूर्ण है पर यह कठिन काम है। हमारा समाज भी इतना बड़ा है कि इसे सब जगह स्थापित कर पाना भी मुश्किल है। मीडिया आज बड़ी पूंजी का खेल है और बाजार पर वितरण सहित बड़े संस्थानों का एकाधिकार है जिसे छोटे प्रयत्नों से तोड़ पाना असंभव है।  

प्रश्नकाल के दौरान मुख्यधारा के मीडिया - अखबार से लेकर समाचार चैनलों तक - में काम कर चुके, ब्लॉग चलानेवाले पत्रकार अविनाश का कहना था कि वैकल्पिक मीडिया की बात करते हुए इंटरनेट और सोशल वेबसाइटों की बात न करना आश्चर्यजनक है।  मैंने इंटरनेट की सीमा बतलाते हुए कहा कि भारत जैसे देश में जहां लोगों को रोटी खाना मुश्किल हो रहा हो कंप्यूटर खरीदना मुश्किल काम है। भारतीय संदर्भ में यह महत्त्वपूर्ण घटक है। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि पश्चिम में जहां अखबार संकट में हैं वहां हमारे देश में वह बढ़ रहे हैं। इसका एकमात्र कारण हमारे देश में कंप्यूटर खरीदने की क्षमता के अलावा अन्य संरचनात्मक सुविधाओं का उपलब्ध न होना ही है।  इंटरनेट एक निजी उपकरण के माध्यम से ही सीमित रहता है जबकि पत्र-पत्रिकाओं का सामूहिक - मिल-बांट कर - उपयोग एक परंपरा है। फिर जहां न बिजली हो, न टेलीफोन हो वहां इंटरनेट की सीमा स्पष्ट है। पत्रिकाएं जब चाहे पढ़ी ही नहीं बल्कि सहेजी भी जा सकती हैं पर वेबसाइटों और ब्लॉगों को जब चाहे मिटाया जा सकता है और फिर आप उनका कोई रिकार्ड नहीं पा सकते। इसका इधर का एक उदाहरण फेस बुक का है। इस पर एक पत्रकार का एकाउंट था। उसने इसे एक बड़े संस्थान से जुडऩे के साथ ही उसे पूरी तरह मिटा कर नया खोल दिया।  गोकि मैंने ऊपर वाला उदाहरण दिया नहीं पर इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए यह जरूर कहा कि सोशल नेटवर्किंग का स्पेस चाहे ब्लॉगों का हो या फेसबुक का, है अराजक। 

इंटरनेट की सबसे बड़ी भूमिका असल में सूचना देना और तथ्यों को उपलब्ध करवाना है। यह काम वह बखूबी करता है। पर ध्यान रखनेवाली बात यह है कि इंटरनेट को कभी भी सेंसर किया जा सकता है। गूगल इसी समस्या का चीन में सामना कर रहा है। उसी दिन दुर्भाग्य से अखबरों में छपा था कि केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने इंटरनेट को सेंसर करने की बात कही है। इधर दिल्ली की एक अदालत के आदेश के बाद तो इस मसले ने और भी गंभीर रूप ले लिया है। निश्चय ही अगर इंटरनेट को सेंसर किया गया तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा। पर यह उस खतरे की संभावना, चाहे आपात काल जैसे समय में ही क्यों न हो, को तो रेखांकित करता ही है।  

मजेदार बात यह थी कि गोष्ठी में कई ऐसे पत्रकार उपस्थित थे जो इंटरनेट के समर्थक थे और लगता था उसका जमकर उपयोग करने वाले थे। इंटरनेट और सोशल वेब साइटों को अराजक कहना उन्हें अखरा। एक श्रोता का कहना था कि वह समयांतर को नेट पर 45 मिनट में पढ़ सकता है और इसके लिए उसे सिर्फ साइबर कैफे में दस रुपये देने होंगे। मैंने उसकी बात का प्रतिवाद न कर इतना कहा कि अगर आपको कोई लेख अलग निकालना पड़ा तो वह कितना महंगा पड़ेगा। इस पर प्रश्नकर्ता का तर्क था कि इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी।  यह मानते हुए भी कि यह एक कुतर्क है मैंने प्रतिवाद नहीं किया। पर सच यह है कि किसी भी गंभीर पत्रिका को आप पूरी की पूरी एक सिरे से दूसरे सिरे तक एक ही बार में नहीं पढ़ पाते हैं। हां गॉसिप की पत्रिका को अवश्य पढ़ सकते हैं। यह एक और तरह से इंटरनेट की सीमा को दर्शाता है कि यह आप को, तब तक जब तक कि आप इसकी ऊंची कीमत देने की स्थिति में नहीं हैं, सुविधानुसार उपलब्ध नहीं हो सकता। पर सबसे बड़ी बात यह है कि जो लोग यह कहते थे कि कंप्यूटर और इंटरनेट से कागज की खपत में कमी होगी वे भी अब मानते हैं कि ऐसा नहीं हुआ है। यानी इसके बावजूद आप को प्रिंट आउटों की जरूरत पड़ती है। इससे जुड़ा प्रिंटरों और काट्र्रिजों का बखेड़ा है।  

इंटरनेट को एक स्वतंत्र, मुक्त और क्रांतिकारी मीडिया माननेवाले इस भ्रम में रहते हैं कि वे इस पर जो चाहे कह सकते हैं और इससे जो चाहे कर सकते हैं। पर ऐसा है नहीं। एक जमाने के मीडिया गुरू मार्शल मैक्लुहान ने कहा था ''मीडियम इज द मैसेज''। दूसरे शब्दों में मीडिया का स्वभाव मीडिया की विषय वस्तु को निर्धारित कर देता है। अगर इस बात को ध्यान में रखते हुए देखें तो नेट पर एक खास तरह की सनसनी का बोलबाला है।  किसी वेश्या की आत्मकथा, किसी अभिनेत्री का अपने नग्न चित्रों को लगा देना, किसी प्रेमी का प्रेमिका को बदनाम करने के लिए उसके निजी चित्रों को सार्वजनिक कर देना आदि। नेट के साथ एक और समस्या यह है कि उस में लिखनेवाले अक्सर आत्ममुग्धता के शिकार रहते हैं। वे अपने चित्रों को लगाते ही हैं उसका प्रचार करते हैं। अपनी निजी  घुटन व फ्रस्ट्रेशन को सार्वजनिक करते हैं। ये ऐसी बातें हैं जो पत्रकारिता की गंभीरता को खत्म करती हैं।  

दूसरी बात यह है कि एक सीमा से आगे आप कंप्यूटर के स्क्रीन या  टेलीफोन के स्क्रीन पर आंखें नहीं गड़ाए रख सकते। नेट के समर्थकों का कहना था कि अब सस्ते टेलीफोन आ रहे हैं उनसे नेट जुड़ता है। जहां तक मैं जानता हूं ऐसे फोन एक तो महंगे हैं दूसरा उन पर ज्यादा लिखना और पढ़पाना भी आरामदायक नहीं है। यहां तक कि कैंडल और आईपैड जैसे साधन भी अभी किताब का विकल्प नहीं हो पाए हैं।  एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अगर कोई पत्रिका नेट पर उपलब्ध ही न हो तो आप उसे कैसे पढ़ेंगे? फिर अच्छी पत्रिकाएं नेट पर मुफ्त में उपलब्ध भी नहीं हैं। उदाहरण के लिए आप न्यूयार्क टाइम्स या इकोनॉमिस्ट या फिर अपने इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली को नेट पर मुफ्त नहीं पढ़ सकते। यानी उसके लिए आप को अलग से पैसा देना होगा। यह प्रचलन बढ़ रहा है और वह दिन दूर नहीं जब कि आप को नेट पर मिलने वाली हर सुविधा जिसमें ईमेल भी है, के लिए पैसे देने होंगे।  नेट का एक बड़ा खतरा उसकी असीमितता है। अक्सर उसमें काम की बातें ढंूढते हुए गैरजरूरी चीजों में उलझ जाने का खतरा बना रहता है। किसी ने यों ही नहीं कहा कि आज नेट एक विशाल पोर्नोग्राफी का भंडार हो गया है जो सबसे आसानी से उपलब्ध रहता है। पोर्नोग्राफी यों ही नहीं है। इसका कारण गूगल और याहू जैसी कंपनियों को इससे होनेवाली आय है। 

सबसे बड़ी बात यह है कि पत्रिकाएं, विशेष कर प्रतिबद्ध पत्रिकाएं, एक नियोजित तरीके से निकलती हैं। वे भड़ास नहीं होतीं। दूसरे अर्थों में छोटी पत्रिकाओं के लिए एक निश्चित दृष्टि और प्रतिबद्धता की जरूरत होती है, अन्यथा उसका कोई मतलब नहीं है। वह बेरोजगारी का विकल्प नहीं हैं। सिर्फ भड़ास निकालना कोई मायने नहीं रखता, इसके बावजूद कि सोशल मीडिया ने मिस्र और हमारे देश में भी तथाकथित सिविल सोसाइटी को मोबिलाइज करने में बड़ी भूमिका निभाई। पर यह भूमिका कुल मिला कर सूचनात्मक ही थी और है। यह इन आंदोलनों के बारे में कोई वृहत्तर राजनीतिक चेतना नहीं पैदा कर पाया। ये आंदोलन आधारभूत बदलाव या राजनीतिक बदलाव लाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने में किस तरह असमर्थ रहे हैं इसे इन आंदोलनों की सीमा से समझा जा सकता है। असली आधार इस आंदोलन को भी कारपोरेट घरानों के समाचारपत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के 24><7 टीवी चैनलों ने ही दिया था। अगर वह आधार न होता तो सोशल वेबसाइटों की भूमिका हाशिये से ज्यादा कुछ नहीं होती। 

पंकज बिष्ट, वरिष्ठ उपन्यासकार और पत्रकार हैं. लेकिन दरवाज़ा और उस चिड़िया का नाम जैसे इनके उपन्यास अपने  कथ्य और शिल्प की वजह से भारतीय साहित्य में विशिष्ट स्थान रखते हैं. फिलहाल समकालीन विमर्श की महत्वपूर्ण पत्रिका समयांतर के संपादक  हैं. इनसे samayantar@yahoo.com पर संपंर्क किया जा सकता है ) 

प्रस्तुति-- राहुल मानव, रजनीश कुमार

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