बुधवार, 15 अक्तूबर 2014






प्रस्तुति-- स्वामी शरण दीपा शरण


मुंशी प्रेमचंद की कहानियों ने भारत की समस्याओं को उकेरा था। आम भारमीय के दर्द के मर्म को समझाने का प्रयास किया था। प्रेमचंद ने छूआछूत सांप्रदायिकता एवं किसानों की बदहाल स्थिति के बारे में लोगों को समझाने का काम किया था। क्या उन्होंने इन मुद्दों को साहित्य के माध्यम से ही उठाया था प्रायः हमारे मन में कहानीकार प्रेमचंद के लिए ही स्थान बनता है। पत्रकार प्रेमचंद के लिए नहीं। शायद प्रेमचंद की पत्रकारिता के पहलू हमारे सामने नहीं आ पाए हैं। यही कारण है कि हम उनको पत्रकार के रूप में जान-समझ भी नहीं पाए।
प्रेमचंद की मृत्यु 1936 में हुई थी, किंतु आजादी के सात दशक बीतने के बाद भी प्रेमचंद ने जिन समस्याओं के प्रति हमारा ध्यान आकृष्ट किया था वे समस्याएं आज भी यथावत जान पड़ती हैं। ऐसे समय में प्रेमचंद का स्मरण और भी प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने स्वदेश की जिन समस्याओं पर उपन्यास एवं कहानियां लिखीं थीं, उन्हीं मुददों पर उन्होंने पत्रकार की हैसियत से भी कलम चलाई थी। प्रेमचंद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को पूर्णतया समझने के लिए उनकी पत्रकारिता के बारे में जानना भी आवश्यक प्रतीत होता है।
मुंशी जी ने हंस, माधुरी और जागरण का संपादन कर राष्ट्रचेतना से संबंधित अपने विचारों को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। सामाजिक समरसता एवं स्वदेशी के भाव को उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से लोगों को समझाने का कार्य किया। साहित्य की तुलना में पत्रकारिता आम आदमी की समस्याओं को अधिक स्फूर्त रूप से समझ सकती है यही कारण था कि प्रेमचंद ने साहित्य सर्जन के साथ ही पत्रकारिता के माध्यम से भी जनजागरण की ज्योति प्रचण्ड की।
मुंशी प्रेमचंद ने अपने निजी जीवन में जिन झंझावतों को झेला एवं महसूस किया था। वह संवेदनाएं उनके लेखन में भी दिखाई पड़ती हैं। प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गांव में हुआ था। माता का नाम आनंदी देवी एवं पिता मुंषी अजायबराय डाकमुंशी थे। 7 वर्ष की अवस्था में मां एवं 14 वर्ष की आयु में पिता उन्हें कभी पूरी न होने वाली कमी देकर चले गए। उनका विवाह पंद्रह वर्ष की अपरिपक्व आयु में हुआ जो सफल साबित नहीं हुआ। वे विधवा विवाह के समर्थक थे। जिसे उन्होंने बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह कर साबित भी किया। जीवनयापन के लिए उन्होंने मैट्रिक पास होने के बाद अध्यापन भी किया। गोरखपुर, कानपुर, बनारस आदि में रहकर उन्होंने अध्यापन किया।
वाराणसी के महात्मा गांधी विद्यापीठ में अध्यापन का अवसर भी उन्हें प्राप्त हुआ। प्रेमचंद ने औसत विद्यार्थी एवं औसत गरीब अध्यापक दोनों के ही जीवन को जिया था। अपने विद्यार्थी जीवन के अभावपूर्ण जीवन की एक घटना का वर्णन उन्होंने इन मार्मिक शब्दों में किया-
जाड़ों के दिन थे। पास एक कौड़ी न थी। दो दिन एक-एक पैसे का खाकर काटे थे। मेरे महाजन ने उधार देने से इंकार कर दिया था। संकोचवश मैं उससे मांग न सका था। चिराग जल चुके थे। मैं एक बुकसेलर की दुकान पर एक किताब बेचने लगा। एक चक्रवर्ती-गणित-कुंजी दो साल हुए खरीदी थी, अब तक उसे बड़े जतन से रखे हुए था पर चारों ओर से निराश होकर मैंने उसे बेचने का निश्चय किया। किताब दो रूपये की थी, लेकिन एक रूपये पर सौदा ठीक हुआ। (जीवन सार)
विद्यार्थी जीवन में उन्होंने स्वयं अभावों को सहा था। इसलिए वे विद्यार्थियों की समस्याओं से सदैव सरोकार रखते थे। विद्यार्थी उनसे विशेष स्नेह रखते थे उनकी सादगी विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का कार्य करती थी।
अध्यापकी के दौरान ही उन्होंने पत्रकारिता एवं साहित्य साधना का कार्य आरंभ कर दिया था। अध्यापन तो उनकी तत्काल की आर्थिक समस्याओं से निजात दिलाने का एक माध्यम भर था। उनका ध्येय तो साहित्य एवं पत्रकारिता ही थी। सन 1905 में‘जमाना‘ में भेजे लेख से उन्होंने पत्रकारिता की शुरूआत की थी। ‘जमाना‘ उर्दू पत्र था। जल्द ही प्रेमचंद ने हिंदी की ओर रूख किया और ‘माधुरी‘ एवं ‘हंस‘ का संपादन किया। सन् 1930 के दौरान वे ‘माधुरी‘ का संपादन करते थे। ‘माधुरी‘ के माध्यम से उन्होंने हिंदी भाषा की अपूर्व सेवा की। किंतु]‘माधुरी‘ पत्रिका में वह विषय समाहित न हो सके थे जो उसे हिंदी की राष्ट्रीय पत्रिका के रूप में पहचान दिला सके।
ऐसे वक्त में प्रेमचंद को ऐसी पत्रिका की आवष्यकता महसूस हुई जो राष्ट्रवादी आंदोलनों के विचारों का प्रतिनिधित्व एवं जनमत निर्माण कर सके। सन् 1930 में अवज्ञा आंदोलन के दौरान ही उन्होंने ‘हंस‘ का प्रकाशन प्रारंभ कर दिया था।‘हंस‘ पत्रिका उनके लंबे विचार मंथन का परिणाम थी। इस प्रकार ‘हंस‘ की शुरूआत ही स्वाधीनता आंदोलनों के लिए जनमत निर्माण के उद्देश्य से हुई थी। यही कारण था कि ‘हंस‘ अंग्रेजी सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा। लेकिन प्रेमचंद ने ‘हंस‘ की लड़ाई बड़ी बहादुरी के साथ लड़ी। लेखक जैनेन्द्र को लिखे पत्र में उन्होंने बताया-
”हंस‘ पर जमानत लगी। मैंने समझा था आर्डिनेंस के साथ जमानत भी समाप्त हो जाएगी। पर नया आर्डिनेंस आया गया और जमानत भी बहाल कर दी गई। जून और जुलाई का अंक हमने शुरू कर दिया है, पर जब मैनेजर साहब अपना नया डिक्लेरेशन देने गए तो मजिस्ट्रेट ने पत्र जारी करने की आज्ञा न दी जमानत मांगी। अब मैंने गवर्नमेंट को स्टेटमेंट लिखकर भेजा है। अगर जमानत उठ गई तो पत्रिका तुरंत ही निकल जाएगी। छप] कट] सिलकर तैयार रखी है। अगर आज्ञा न दी तो समस्या टेढ़ी हो जाएगी। मेरे पास न रूपया है न प्रोमेसरी नोट न सिक्योरिटी। किसी से कर्ज लेना नहीं चाहता। यह शुरू साल है चार-पांच सौ वी. पी जाते कुछ रूपये हाथ आते। लेकिन वह नहीं होना है।” (प्रेमचंद-स्मृतिअंक, हंस, मई 1937)
प्रेमचंद ने हंस‘को स्वाधीनता आंदोलन की वैचारिक पत्रिका के रूप में स्थापित किया था। हंस‘के सिलसिले को अनवरत बनाए रखने के लिए वे सदैव प्रयासरत रहे। सन 1936 में हंस‘ से फिर जमानत मांगी गई। उस दौरान ‘हंस‘ हिंदी-साहित्य परिषद की देखरेख में निकलता था। परिषद ने जमानत देने के बदले पत्र को बंद कर देना ही उचित समझा। लेकिन प्रेमचंद को यह गवारा नहीं था कि ‘हंस‘ बंद हो। उन्होंने बीमारी की हालत में भी जमानत देने का प्रबंध कराया और पत्र को जिंदा रखा।
आर्थिक कठिनाई के दौरान प्रेमचंद ने ‘हंस‘ साहित्य परिषद को दे दिया था। किंतु, साहित्य परिषद ने उसे पचास रूपये की बचत के लिए उसे सस्ता साहित्य मंडल को दे दिया था। इससे प्रेमचंद को बहुत पीड़ा हुई थी। एक मित्र को लिखे खत में उन्होंने अपने दर्द को बयां करते हुए लिखा था-
“बनियों के साथ काम करके यह सिला मिला कि तुमने ‘हंस‘ में ज्यादा रूपया खर्च कर दिया। इसके लिए मैंने दिलोजान से काम किया। बिलकुल अकेले अपने वक्त और सेहत का कितना खून किया, इसका किसी ने लिहाज न किया। (जीवन और कृतित्व में उदधृत)
प्रेमचंद ने साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से हिंदी की अपूर्व सेवा की थी। वे अपने लेखन के लिए क्या मिलेगा इसकी परवाह न करते थे। लिखना उनका धर्म था, शब्दों के वे पुजारी थे। यही कारण था कि उन्होंने धन के लिए लिखा ही नहीं। कई बार उन्हें अपेक्षाकृत मिला ही नहीं। किंतु, वे अहोरात्र लिखते रहे। हालांकि हिंदी लेखकों की आर्थिक समस्याएं उन्हें बहुत अधिक कचोटती थीं, किंतु वे पैसे न मिले इसलिए लेखन न हो इसे उचित नहीं समझते थे। हिंदी लेखकों की आर्थिक कठिनाई के विषय में उन्होंने कहा-
“हिंदी में आज हमें न पैसे मिलते हैं, न यश मिलता है। दोनों ही नहीं। इस संसार में लेखक को चाहिए किसी की भी कामना किए बिना लिखता रहे।”
वे आजीवन हिंदी की सेवा करते रहे। बीमार होने पर भी उनकी कलम नहीं रूकी। अनवरत चलती रही। हंस का प्रकाशन बंद नहीं हुआ। यह सब प्रेमचंद के पत्रकारिता और साहित्य प्रेम का परिणाम था। वे अपनी मृत्यु से पूर्व लंबे समय तक बीमार रहे। अंततः उन्होंने 8 अक्टूबर, 1936 को शरीर त्याग दिया। साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से हिंदी की सेवा करने वाले प्रेमचंद का लेखन आज भी उनकी मौजूदगी का एहसास कराता है।

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