रविवार, 21 सितंबर 2014

बीबीसी : कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म





 प्रस्तुति-- राकेश, समिधा, राहुल

रिपोर्ट के लिए आइडिया देना
किसी रिपोर्ट पर काम शुरू करने से पहले उस बारे में अपने संपादकीय प्रभारी के सामने आइडिया रखना होता है और इस बारे में सहमति के बाद ही रिपोर्टिंग का काम शुरू होता है. अपनी रिपोर्ट के आइडिया के बारे में संपादकीय प्रभारी के साथ मीटिंग करना और उसमें आइडिया को पेश करना एक हुनर है.
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अँगरेज़ी में इसेपिचिंगकहते हैं जिसका मतलब है स्टोरी आइडिया को सामने रखना. हर अच्छी स्टोरी की शुरूआत इसी तरह होती है, आप फ्रीलांसर हों या फिर स्टाफ रिपोर्टर आपको स्टोरी आइडिया को मंज़ूर कराना होता है.
कई बार अच्छे स्टोरी आइडिया नामंज़ूर कर दिए जाते हैं, दो बातें बहुत अहम होती हैं, एक तो आपकी मीटिंग और दूसरे स्टोरी आइडिया को पेश करने की आपकी तैयारी.
मीटिंग पर आपका बहुत नियंत्रण नहीं होता मगर आप अपनी तैयारी अच्छी तरह ज़रूर कर सकते हैं. मीटिंग से पहले एडिटर से समय तय कर लेना चाहिए, और बताना चाहिए कि आपको अपनी बात कहने में कितना समय लगेगा.
आपके दिमाग़ में तीन बातें साफ़ होनी चाहिएस्टोरी क्या है, उसे लोगों तक पहुँचाने का सबसे अच्छा तरीक़ा क्या होगा, और आप इसे कैसे पूरा करेंगे.
ख़ुद से सवाल पूछें कि आपका आइडिया अच्छा क्यों है, क्या आप स्टोरी आइडिया को जिस तरह पेश कर रहे हैं उसमें यह खूबी सामने आ रही है?
बीबीसी के एक वरिष्ठ संपादक पीटर रिपन कहते हैं, “जब आप स्टोरी आइडिया लेकर जाएँ तो इतना बताने से काम नहीं चलेगा कि स्टोरी क्या है, यह भी बताएँ कि उसमें आप क्या करने वाले हैं.
रेडियो फ़ोर की प्रोड्यूसर सीरिन बैंस कहती हैं, “आप जिन्हें सच समझते हैं उनका उलझा हुआ प्रजेंटेशन आपके आइडिया की हवा निकाल सकता है और आपकी विश्वसनीयता भी ख़तरे में पड़ सकती है, अगर आपके पास पक्के डिटेल्स नहीं हैं लेकिन आपको लगता है कि आइडिया अच्छा है तो यह बात साफ़ कहिए, न उलझिए और न उलझाइए.
मीटिंग
स्टोरी आइडिया पर आगे काम होगा या नहीं, यह मीटिंग से ही तय होता है इसलिए स्टोरी आइडिया मीटिंग को गंभीरता से लेना चाहिए.
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के एक वरिष्ठ एडिटर एलेस्टर एल्फ़िक कहते हैं, “दूसरों के साथ मिलकर काम करने, लोगों को सोचने का मौक़ा देने, उन्हें अपने विचारों को ही चुनौती देने के लिए उकसाने से, स्टोरी के ट्रीटमेंट पर घुमावदार तरीक़े से सोचने से बात बनती है.
वे कहते हैं, “इसके बाद स्टोरी के एडिटोरियल और प्रोडक्शन से जुड़े सवालों पर गौर करना चाहिए, लोगों को प्रेरित करना चाहिए वे मुश्किल सवाल पूछें और उनके हल तलाश किए जाएँ. अपने साथ काम करने वाले लोग जब सवाल पूछें तो झल्लाए बग़ैर उन सवालों के बारे में सोचें जिससे आपकी स्टोरी और निखरेगी ही, और कुछ नहीं तो आपकी समझ साफ़ होगी.
कुछ याद रखने लायक बातें
  • शुरूआती स्टेज पर कोई आइडिया बहुत अच्छा या बहुत बुरा नहीं होता, जितना खुलकर सोच सकते हैं, सोचिए. एक बार आइडिया ठीक लगे तो बाकी सब ठीक किया जा सकता है.
  • दूसरों की बातों को ध्यान से सुनिए, बहस को बंद नहीं करिए बल्कि खुला रखिए, नहीं कहने के बदले हाँ कहिए फिर अपनी परेशानियाँ बताइए
  • आइडिया को आसानी से मत जाने दीजिए, मिलकर काम करिए सहयोग की भावना के साथ, खुद को दूसरे से अक्लमंद साबित करने की कोशिश में चर्चा आगे नहीं बढ़ पाएगी
  • एक छोटे ग्रुप मे अधिक रचनात्मकता चर्चा हो सकती है, एक विचार से दूसरे विचार पैदा होते हैं
  • आइडिया को रद्द करने से पहले उसे आज़माने के लिए होने वाली चर्चा अक्सर बहुत दिलचस्प होती है, वह चर्चा ज़रूर करें
यह सब अपने आप नहीं होगा इसके लिए समय और इरादा चाहिए, कोशिश करिए कि ऐसा हो.
सिर्फ़ अपने स्टोरी आइडिया तक सीमित न रहिए, दूसरों के स्टोरी आइडिया पर भी जितनी हो सके चर्चा करिए जिससे आपको कुछ न कुछ नया सीखने को ही मिलेगा.
अगर आप अपना स्टोरी आइडिया सीधे संपादक के पास ले जाने को लेकर नर्वस हैं तो टीम के किसी ऐसे सीनियर व्यक्ति से बात करिए जिसके अनुभव की आप कद्र करते हों, उनस कहिए कि आपसे आपके आइडिया पर आलोचनात्मक दृष्टि से बात करें, इससे बहुत मदद मिल सकती है.
संक्षेप में
दो-चार स्टोरी आइडिया रद्द होने के बाद अपना आत्मविश्वास मत खोइए, यह आपका रोज़मर्रा का काम है, आपके दिमाग़ में कोई आइडिया आए तो उस समय और ध्यान लगाइए, उसे अच्छी तरह अपने दिमाग़ में तैयार करिए, किसी सीनियर की मदद लीजिए, फिर पेशेवेर तरीक़े से पूरे आत्मविश्वास के साथ पेश करिए.
बीबीसी
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मौलिक पत्रकारिता से जुड़े सवाल
पत्रकारिता का उद्देश्य ही लोगों को कुछ नया, कुछ दिलचस्प और उपयोगी बताना है जो वे नहीं जानते. ज़्यादातर पत्रकार, ख़ास तौर पर वे पत्रकार जिनकी हम सभी प्रशंसा करते हैं, अक्सर चिंतित रहते हैं कि उनकी रिपोर्ट मौलिक हो, उसमें कोई नई बात हो. मौलिक पत्रकारिता एक कौशल है जिसे आप सीख सकते हैं लेकिन वह दिन-ब-दिन मुश्किल होती जा रही है.
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पत्रकारों को अब पहले के मुक़ाबले कहीं अधिक काम करना पड़ता है, अब एक ही रिपोर्टर को रेडियो, टीवी, वेबसाइट सबके लिए रिपोर्टिंग करनी पड़ती है. ऐसी स्थिति में अक्सर यही होता है कि पत्रकार ख़बरों को प्रोसेस करते रह जाते हैंनया कुछ पैदा करने के लिए जिस तरह के रिसर्च की ज़रूरत होती है उसका समय ही उन्हें नहीं मिल पाता.
इसके अलावा इंटरनेट पर दुनिया पर बेहतरीन और बदतरीन जानकारियों का अंबार लगा है लेकिन उसे करीने से लोगों के सामने पेश करने का हुनर बहुत कम लोगों के पास है.
सोच और आदतें
मौलिकता की माँग है मेहनत, समय और समझदारी. आधे-अधूरे, अनमने तरीक़े से ऑरिजनल काम नहीं हो सकता, यह कुछ दिनों का काम नहीं है बल्कि लगातार उसमें जुटे रहना पड़ता है तब जाकर बात बनती है.
इसका मतलब कि पत्रकारों को अपनी सोच बदलनी पड़ती है और अपने काम करने का तरीक़ा तो अवश्य ही बदलना पड़ता है.
जिस ढर्रे पर आप चल रहे होते हैं उसे बदले बिना ऑरिजनल या मौलिक पत्रकारिता तो नहीं हो सकती.
जिज्ञासा
मैंने ऑरिजनल जर्नलिज़्म के बारे में लिखने से पहले कई संपादकों, रिपोर्टरों और अनुभवी प्रसारकों से बात की, सबका कहना था कि सबसे ज़रूरी चीज़ है जिज्ञासा, जहाँ से किसी ऑरिजनल रिपोर्ट की शुरूआत होती है, अगर आपमें गहराई से जानने समझने की ललक नहीं है तो आप समय बर्बाद कर रहे हैं, मौलिक पत्रकारिता आपके लिए नहीं है.
आपको अपनी ऑरिजनल रिपोर्ट ढूँढने का अभ्यास करना होता है, कई सीनियर एडिटर हमेशा अपने साथियों से कहते थे कि आधा किलोमीटर लंबी सड़क पर ग़ौर से देखने का अभ्यास करना चाहिए कि वहाँ कितनी चीज़ें हैं जिन्हें रिपोर्ट किया जा सकता है, “सड़क की हालत, पार्किंग की हालत, वहाँ भटकने वाले शराबी और भिखारी, सबके बारे में सोचना चाहिए. स्टोरी वहीं से आती है.
कितनी बार आप एक नई बन रही इमारत की बगल से गुज़रे हैं और आपने सवाल किया है कि यहाँ क्या बन रहा है, क्यों बन रहा है, कौन बनवा रहा है, कब तक बन जाएगा वग़ैरह?
अगर आप ऑरिजनल जर्नलिज़्म करना चाहते हैं तो आपमें इतनी जिज्ञासा होनी चाहिए कि अगर आपको कोई ख़ाली दीवार दिखाई दे तो आप इसके बारे में सोचना शुरू कर दें यह दीवार क्यों है, क्या वहाँ पहले कुछ था?
क्यों और क्यों नहीं?
तो जिज्ञासा की कसरत कैसे की जाए?
प्रैक्टिस करें लेकिन चुपचाप, अगर आप खुलकर ऐसा करेंगे तो आप लोगों को ख़ासा परेशान करेंगे और वे आप से कतराने लगेंगे.
आपको ऐसी आदत बनानी है कि आपके लिए सवाल पूछे बिना टीवी देखना, अख़बार पढ़ना या सड़क पर चलना मुश्किल होने लगे, अपने आप पर दबाव बनाएँ कि आपको ऐसे सवाल ढूँढने हैं जिनके जवाब आपको पता नहीं हैं.
संक्षिप्त समाचार इस कसरत में मददगार हो सकते हैं जिनमें पूरी जानकारी नहीं होती, इन समाचारों को पढ़ने के बाद उन सवालों की एक फेहरिस्त बनाएँ जिनके जवाब आपको नहीं मिले.
अपनी प्रतिक्रिया को ग़ौर से सुनें
जब आपको कोई जानकारी मिलती है तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होती है?
कुछ देर के लिए निष्पक्षता, संतुलन को किनारे रखकर सोचना शुरू करिए. आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी, क्या दूसरों की भी वही प्रतिक्रिया होगी, क्या होता है जब आप उस प्रतिक्रिया को चुनौती देते हैं, क्या है जो किसी और की प्रतिक्रिया हो सकती है जो आपकी नहीं है?
अपने रोज़मर्रा के कामकाज के दौरान इसका अभ्यास करिए, आप पाएँगे कि आप ऐसी कई बातें सोच पा रहे हैं जो दूसरों से अलग है, आप ऐसे पहलू देख पा रहे हैं जो दूसरे नहीं देख रहे, यहीं से मौलिक पत्रकारिता की शुरूआत होती है.
बीबीसी न्यूज़नाइट कार्यक्रम के राजनैतिक मामलों के पूर्व संपादक माइकल क्रिक कहते हैं, “रोज़मर्रा की बिल्कुल आम रिपोर्ट जिसे बीसियों दूसरे लोग भी कर रहे हैं, उन्हें करते समय हमेशा ये सोचना चाहिए कि मै ऐसा नया क्या दे सकता हूँ?”
इसका मज़ा ये है कि आपको पहले से कुछ भी जानने की ज़रूरत नहीं है, आपको सिर्फ़ जिज्ञासु और उत्साही होना है लेकिन अनुशासित तरीक़े से.










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प्लानिंग और कमीशनिंग
रिपोर्टरों से रिपोर्टें मँगवाना और उनकी रिपोर्ट की ख़ूबियों-कमियों के बारे में बताना एक महत्वपूर्ण काम होता है. क्या सामग्री चाहिए, क्या हो सकता है, क्या नहीं हो सकता ऐसी बातों को लेकर स्पष्टता ज़रूरी है. इसके लिए परस्पर संवाद बहुत ज़रूरी है. कमीशनिंग और प्लानिंग की प्रक्रिया के बारे में बता रही हैं बीबीसी हिन्दी की प्लानिंग संपादक रूपा झा.
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रिपोर्टरों से रिपोर्टें मँगवाना और उनकी रिपोर्ट की ख़ूबियों-कमियों के बारे में बताना एक महत्वपूर्ण काम होता है. क्या सामग्री चाहिए, क्या हो सकता है, क्या नहीं हो सकता ऐसी बातों को लेकर स्पष्टता ज़रूरी है. इसके लिए परस्पर संवाद बहुत ज़रूरी है. कमीशनिंग और प्लानिंग की प्रक्रिया के बारे में बता रही हैं बीबीसी हिन्दी की प्लानिंग संपादक रूपा झा.

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रिपोर्ट कमीशन करनाः सहमति
किसी घटना या विषय के बारे में रिपोर्ट भेजने वाले रिपोर्टर के साथ क्या सामग्री चाहिए, क्या हो सकता है या क्या नहीं हो सकता जैसी बातों को लेकर सहमति और स्पष्टता होनी चाहिए. इसके लिए परस्पर संवाद बहुत ज़रूरी है.
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जोसेफ़ वारूँगु बीबीसी फ़ोकस ऑन अफ़्रीका के पूर्व संपादक हैं. यहाँ वो बता रहे हैं कि फ़ील्ड से किसी रिपोर्टर से रिपोर्ट मँगवाने की प्रक्रिया क्या है.
सबसे पहले ये स्पष्ट करना ज़रूरी है कि रिपोर्ट किस बारे में है. उसमें क्या कोई नई बात है?
फिर, क्या संपादक और रिपोर्टर रिपोर्ट के फोकस को लेकर सहमत हैं? यदि रिपोर्टर और उसके संपादक के बीच रिपोर्ट के बुनियादी बिंदुओं को लेकर असहमति है, तो प्रक्रिया को आगे ले जाने से पहले इसे सुलझाना ज़रूरी है.
ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि दफ़्तर में मौजूद संपादक या प्रोड्यूसर को ना केवल एक रिपोर्ट की बात पता है बल्कि उसे एक कार्यक्रम में शामिल होने वाली अन्य रिपोर्टों की भी जानकारी है.
इससे रिपोर्ट के बारे में उसकी सोच फ़ील्ड में काम कर रहे उस रिपोर्टर से अलग होगी जो केवल अपनी रिपोर्ट को लेकर व्यस्त है और उसे अन्य रिपोर्टों की अधिक जानकारी नहीं.
तरीक़ा
रिपोर्टर के साथ सहमति बनाएँ, जो कई बार हज़ारों किलोमीटर दूर बैठा होता है, कि आप उस रिपोर्ट को कैसे करना चाहते हैं.
संपादक या प्रोड्यूसर को इस बात की एक समझ होगी कि वो कैसी रिपोर्ट चाहते हैं जो कि उनके कार्यक्रम में कैसे इस्तेमाल होगी.
हो सकता है कि वो फोन पर बात करना चाहते हों जिसे फोनो या टूवे कहा जाता है, या एक इलेस्ट्रेटेड रिपोर्ट चाहते हों यानी ऐसी रिपोर्ट जिसमें घटनास्थल से अधिक आवाज़ें सुनाई दे रही हों.
रिपोर्ट जैसे भी की जाए, रिपोर्टर को ये पता होना ज़रूरी है कि संपादक क्यों उसी ख़ास तरीक़े से रिपोर्ट करवाने पर ज़ोर दे रहा है. रिपोर्टर इस बारे में अपने तरीक़े और सुझाव भी दे सकते हैं.
चाहे जैसे भी हो, कामयाबी बातचीत और सहमति पर निर्भर करती है.
अवधि
रिपोर्ट कितनी लंबी होनी चाहिए? ये ध्यान रखते हुए कि रिपोर्ट एक कार्यक्रम का हिस्सा है, इसकी अवधि निश्चित होनी चाहिए.
जैसे यदि रिपोर्ट दो मिनट लंबी होनी है तो रिपोर्टर का दस मिनट की रिपोर्ट भेजने का कोई मतलब नहीं.
रिपोर्ट जानी कब है? अगले हफ़्ते अगले सप्ताहांत? और कार्यक्रम में कहाँ जानी है?
क्या ये लीड है? क्या ये कोई हल्की-फ़ुल्की रिपोर्ट है? रिपोर्टर के लिए ये जानना ज़रूरी है क्योंकि इससे तय होगा कि वो उस रिपोर्ट को कैसे करना चाहता है.
क्या ये एक अकेली रिपोर्ट है या एक लंबी श्रृंखला का हिस्सा है जैसे, किसी खेल आयोजन में हिस्सा ले रहे किसी ख़ास देश की रिपोर्ट.
ये सारी बातें पहले से तय होनी और इस पर रिपोर्टर तथा संपादक के बीच सहमति होनी ज़रूरी है. 
रिपोर्टरः स्पष्ट रहें
यदि संपादक या प्रोड्यूसर को पता है कि वो क्या चाहते हैं, तो रिपोर्टर को भी पता होना चाहिए कि रिपोर्ट किस बारे में है.
ये रिपोर्टर का काम है कि वो अपनी रिपोर्ट की हर बात को जाने. इससे वो इन बातों को संदर्भ में रख सकेगा और किसी ख़ास घटनाक्रम के महत्व को समझा सकेगा.
आप ये अपेक्षा नहीं कर सकते कि आपके संपादक या प्रोड्यूसर को आपकी रिपोर्ट के बारे में आपसे अधिक जानकारी होगी. हो सकता है कि यदि वे किसी स्थिति की गंभीरता को ना समझ पा रहे हों तो आपको उनके साथ तर्क करना पड़ेगा.
कमीशनिंग की प्रक्रिया एक साझेदारी की तरह होनी चाहिए. रिपोर्टरों की राय को नज़रअंदाज़ करनेवाले हठी प्रोड्यूसर या संपादक अक्सर असली कहानियाँ को नहीं कवर कर पाते.
तरीकाः रिपोर्टर की राय
प्रोड्यूसर या संपादक की किसी रिपोर्ट के बारे में एक सोच हो सकती है कि वो कैसी रिपोर्ट चाहते हैं, मगर रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में रिपोर्टर की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.
फ़ील्ड में मौजूद पत्रकार के अपने विचार हो सकते हैं कि किन बातों से रिपोर्ट मे जान आ सकती है.
बाधाएँ
आप रिपोर्ट कैसे कवर करने वाले हैं इसे लेकर आपको स्पष्ट और व्यावहारिक होना पड़ेगा. इसमें कितना समय लगेगा, और इसमें क्या किसी तरह की कोई सुरक्षा की भी चिंताएँ हैं जिन पर ध्यान देना चाहिए.
और ऐसा अक्सर होता है, कि तकनीकी कारणों से रिपोर्टर को रिपोर्ट भेजने में देर हो जाती है और इससे रिपोर्ट की प्रतीक्षा कर रहे प्रोड्यूसर परेशान होते हैं.
  • प्रोड्यूसर और संपादक धैर्य रखें
  • रिपोर्टर वैकल्पिक योजना रखें
यदि सैटेलाइट डिश काम न करे, तो हमें तय करना होगा कि हम क्या करेंगे. हो सकता है कि क्वालिटी ख़राब हो. इसलिए प्रोड्यूसर के लिए ये समझना ज़रूरी है ताकि वो अंत में आकर ये ना चीखें – ‘आप कहाँ हैं? आपका कोई पता नहीं?’”
प्लान बी’: विकल्प
अच्छे से अच्छी बनाई गई योजना बिखर सकती है. तब आपको ज़रूरत पड़ेगी विकल्प कीः प्लान बी’.
जैसे, यदि रिपोर्टर घटनास्थल पर नहीं पहुँच सका, तो ऐसे में क्या वो अपने मोबाइल फ़ोन पर टू-वे कर सकेगा? कुछ न होने से कुछ भी हो जाना बेहतर है. जैसे बाढ़ की ख़बर देते समय कम-से-कम यही बता दें कि पुल टूट गया है, लोग फँसे हुए हैं.
ख़बर दे देने के बाद आपके पास बेशक समय होगा कि आप उस रिपोर्ट के बारे में और सामग्री जुटा सकें, जैसे विस्थापित लोगों से या बचावकर्मियों से बात कर एक विस्तृत रिपोर्ट बना सकें.
ब्यूरो
बीबीसी के दुनिया भर में ब्यूरो हैं. ये क्षेत्रीय कार्यालय रिपोर्टें कमीशन करवाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण होते हैं जहाँ स्थित कोर कमिश्नर या प्रोड्यूसर लंदन के संपादकों की ओर से रिपोर्टें कमीशन करते हैं.
क्षेत्रीय ब्यूरो को ये सुनिश्चित करना होता है कि रिपोर्टर इस बात को समझता है कि लंदन क्या चाहता है. वो साथ ही संपादक को रिपोर्टर की सीमाओं के बारे में अवगत कराता है.
संपादक और रिपोर्टर के बीच बिचौलिएके शामिल होने के कारण संवाद में स्पष्टता और ज़रूरी हो जाती है.
कोर कमिश्नर
कोर कमिश्नरों के लिए ज़रूरी है कि वो लंदन की प्रोडक्शन टीम की ही तरह व्यवस्थित रहे.
जैसे, यदि आप दिल्ली, नैरोबी या मयामी में बैठे हैं तो आपके लिए ज़रूरी है कि जब आप शिफ़्ट ख़त्म करने से पहले ढंग से काम को अगले व्यक्ति को सौंपें.
कमीशन करने की प्रक्रिया की सफलता या नाकामी इस बात पर निर्भर कर सकती है कि किसी कोर कमिश्नर ने संपादक, रिपोर्टर या क्षेत्रीय ब्यूरो में अगला दायित्व निभाने वाले व्यक्ति के साथ कितनी अच्छी तरह से बातचीत की है.
आप बातचीत की श्रृंखला में एक कमज़ोर कड़ी को स्वीकार नहीं कर सकते इसलिए ठीक से नोट्स लेना और वैकल्पिक योजना तैयार रखना आवश्यक है.
बदलाव की गुंजाइश रखें
याद रखें, आप उस जगह से दूर हैं जहाँ से रिपोर्ट आ रही है.
उस जगह रिपोर्टर है और मैं वहाँ नहीं हूँ. मैं अपनी ओर से सुझाव दे रहा हूँ और सामग्री रिपोर्टर दे रहा है.
अंततः, इस कार्यक्रम के लिए ज़िम्मेदार मैं हूँ, इसलिए स्वाभाविक है कि मुझे कुछ फ़ैसले करने होंगे, मगर इसमें मुझे ये ध्यान रखना होगा कि रिपोर्टर क्या कह रहा है.
कभी-कभी काम को लेकर मतभेद और तनाव हो सकते हैं, मगर रिपोर्टर और संपादक, दोनों का लक्ष्य समान है अपने पाठकों और श्रोताओं के लिए यथासंभव अच्छी रिपोर्टें देना.
इसे ठीक से करने की कुंजी है संवाद.

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भाषा से दिख जाती है निष्पक्षता

पत्रकारिता में निष्पक्षता एक आवश्यक शर्त मानी जाती है. और कोई कितना निष्पक्ष है और कितना नहीं, इसका पता सबसे पहले भाषा से चलता है. शब्दों के चुनाव, और भाषा के तेवर में छिपे पक्षपात को आसानी से भांपा जा सकता है.

वक़्त के साथ बदलती है भाषा
भाषा हमेशा स्थायी नहीं रहती, वो वक़्त की ज़रूरतों के हिसाब से बदलती रहती है, इस बदलाव के साथ संघर्ष करने की जगह उसे समझने का प्रयास ज़रूरी है.
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राजेश प्रियदर्शी, डिजिटल एडिटर, बीबीसी हिन्दी
भाषा जैसी दस साल पहले थीअब नहीं हैन ही आने वाले दिनों में वैसी रहेगी जैसी अब है.
मनोरंजनखेलखानपानहर क्षेत्र से नए नए शब्द आते हैंलाखों लोग जिन शब्दों को पसंद करते हैं वे टिकते हैंबाक़ी ख़त्म हो जाते हैं.
पहले हर नई पीढ़ी, पिछली पीढ़ी से अलग तरह की भाषा लिखती-बोलती थीअब यह बदलाव कहीं तेज़ी से हो रहा है.
सोशल मीडियामोबाइल फ़ोन और इंटरनेट की वजह से भाषा बदली है. इस बदलाव को समझना चाहिए और उसके साथ चलना चाहिएइस बदलाव से संघर्ष करने की जगह उसे समझना चाहिए.
मसलन, कंप्यूटर और इंटरनेट से जुड़े सारे शब्द अँगरेज़ी के ही हैंउनका अनुवाद करने की ज़रूरत नहीं समझी गईकंप्यूटर के लिए संगणक और इंटरनेट के लिए अंतर्जाल जैसे शब्द कुछ लोगों ने चलाने की कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी.
अब बारीक़ बात, संतुलन और सावधानी की. परदे पर विद्यमान कुंजीपटल का प्रयोग करके इच्छित भाषा में टंकण करेंजैसे वाक्य लिखने से बेहतर होगा—‘ऑनस्क्रीन कीबोर्ड से मनचाही भाषा में टाइप करें.
मगर साथ ही ध्यान रखें कि ज़्यादा कूलहोने की कोशिश में ऐसी भाषा लिखने से बचें जो इन दिनों कई लोग एसएमएस में लिख रहे हैं, मसलन, ‘ठीक हैकी जगह tk या ग्रेटकी जगह ग्रे8.
संक्षेप में, पत्रकार को भाषा के बारे में खूब सोचना चाहिएहमेशा अपना दिमाग़ खुला रखना चाहिएऔर याद रखना चाहिए भाषा ज़रिया है, मक़सद नहीं, मक़सद तो है अधिक से अधिक लोगों तक अपनी बात पहुँचाना


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