रविवार, 6 जुलाई 2014

हिन्दी पत्रकारिता तथा कुछ और भी


हम हिंदुस्तानियों का अंग्रेजी-मोह अद्वितीय और तारीफे-काबिल है । आम पढ़े-लिखे हिंदुस्तानी की दिली चाहत रहती है वह इतनी अंगरेजी सीख ले कि उसमें बिला रुकावट गिटिर-पिटिर कर सके और दूसरों को प्रभावित कर सके । अंगरेजी की खातिर विरासत में मिली अपनी मातृभाषा की अनदेखी करना भी उसे मंजूर रहता है । लेकिन सब कुछ करने के बावजूद कोई न कोई कमी रह ही जाती है । यह कमी कभी-कभी उच्चारण के स्तर पर साफ नजर आ जाती है । पत्रकारिता से जुड़े लोगों के मामले में यह कमी तब नजर में आ जाती है जब उन्हें अंगरेजी में उपलब्ध समाचार की हिन्दी अनुवाद करते हुए कुछ अंगरेजी शब्दों को देवनागरी में लिखना पड़ता है । आगे के चित्र में ऐसे दो दृष्टांत पेश हैं:
Arjun puraskar & Vogue mag
गौर करें कि ऊपर दिये चित्र में अंगरेजी के दो शब्दों, ‘याचिंग’ एवं ‘वोग्यू’, को त्रुटिपूर्ण उच्चारण के अनुरूप देवनागरी में लिखा गया है । माथापच्ची करने पर मुझे एहसास हुआ कि ‘याचिंग’ वस्तुतः ‘यौटिंग (या यॉटिंग?)’ के लिए लिखा गया है जिसकी वर्तनी (स्पेलिंङ्) YACHTING होती हैं । YACHT वस्तुतः ‘पालदार या ऐसी ही शौकिया खेने के लिए बनी नाव को कहा जाता है । तदनुसार YACHTING संबंधित नौकादौड़ में भाग लेने का खेल होता है । जिस व्यक्ति ने इस शब्द का सही उच्चारण न सुना हो (रोजमर्रा की बातचीत में इसका प्रयोग ही कितना होगा भला!) और शब्दकोश की मदद न ली हो, वह इसे यदि ‘याचिंग’ उच्चारित करे तो आश्चर्य नहीं है । यह उच्चारण बड़ा स्वाभाविक लगता है । पर क्या करें, अंगरेजी कभी-कभी इस मामले में बड़ा धोखा दे जाती है
और दूसरा शब्द है ‘वोग्यू’ । समाचार से संबंधित चित्र में जो पत्रिका दृष्टिगोचर होती है उसका नाम है VOGUE नजर आता है । यह अंगरेजी शब्द है जिसका उच्चारण है ‘वोग’ और अर्थ है ‘आम प्रचलन में’, ‘व्यवहार में सामान्यतः प्रयुक्त’, ‘जिसका चलन अक्सर देखने में आता है’, इत्यादि । अपने स्वयं के अर्थ के विपरीत VOGUE प्रचलन में अधिक नहीं दिखता और कदाचित् अधिक जन इससे परिचित नहीं हैं । मैंने अपने मस्तिष्क पर जोर डालते हुए उन शब्दों का स्मरण करने का प्रयास किया जो वर्तनी के मामले में मिलते-जुलते हैं । मेरे ध्यान में ये शब्द आ रहे हैं (और भी कई होंगे):
argue, dengue, demagogue, epilogue, intrigue, league, prologue, rogue, synagogue, The Hague (नीदरलैंड का एक नगर), tongue.
इनमें से पहला, argue (बहस करना), एवं अंतिम, tongue (जीभ), सर्वाधिक परिचित शब्द हैं ऐसा मेरा अनुमान है । और दोनों के उच्चारण में पर्याप्त असमानता है । पहला ‘आर्ग्यू’ है तो दूसरा ‘टङ्’ । अतः बहुत संभव है कि मिलते-जुलते वर्तनी वाले अपरिचित नये शब्द का उच्चारण कोई पहले तो कोई अन्य दूसरे के अनुसार करे । उक्त उदाहरण में संभव है कि संवाददाता ‘आर्ग्यू’ से प्रेरित हुआ हो । समता के आधार पर उच्चारण का अनुमान अंगरेजी में अ संयोग से स्वीकार्य हो सकता है । सच कहूं तो argue की तरह का कोई शब्द मेरी स्मृति में नहीं आ रहा है । ध्यान दें कि सूची में दिये गये शब्द dengue (मच्छरों द्वारा फैलने वाला एक संक्रमण) का भी उच्चारण शब्दकोश ‘डेंगे’ बताते हैं, न कि ‘डेंग्यू’ या ‘डेंङ्’ । सूची के अन्य सभी के उच्चारण में परस्पर समानता है और वे इन दो शब्दों से भिन्न हैं ।
‘याचिंग’ तथा ‘वोग्यू’ टाइपिंग जैसी किसी त्रुटि के कारण गलती से लिख गये हों ऐसा मैं नहीं मानता । वास्तव में इस प्रकार के कई वाकये मेरे नजर में आते रहे हैं । हिंदी अखबारों में मैंने आर्चीव (archive आर्काइव के लिए), च्यू (chew चो), कूप (coup कू), डेब्रिस (debris डेब्री), घोस्ट (ghost गोस्ट), हैप्पी (happy हैपी), हेल्दी (healthy हेल्थी), आइरन (iron आयर्न), जिओपार्डाइज (jeopardize ज्येपार्डाइज ), ज्वैल (jewel ज्यूल), लाइसेस्टर (Leicester लेस्टर शहर), लियोपार्ड (leopard लेपर्ड), ओवन (oven अवन), सैलिस्बरी (Salisbury सॉल्सबरी शहर), सीजोफ्रीनिआ (schizophrenia स्कित्सफ्रीनिअ), आदि ।
दोषपूर्ण उच्चारण के अनुसार देवनागरी में लिखित शब्दों के पीछे क्या कारण हैं इस पर विचार किया जााना चाहिए । मेरा अनुमान है कि हिंदी पत्रकारिता में कार्यरत लोगों की हिंदी तथा अंगरेजी, दोनों ही, अव्वल दर्जे की हो ऐसा कम ही होता है । अपने देश में बहुत से समाचार तथा उन्नत दर्जे की अन्य जानकारी मूल रूप में अंगरेजी में ही उपलब्ध रहते हैं । मौखिक तौर पर बातें भले ही हिंदी में भी कही जाती हों, किंतु दस्तावेजी तौर पर तो प्रायः सभी कुछ अंगरेजी में रहता है । ऐसे में हिंदी पत्रकार अनुवाद के माध्यम से ही संबंधित जानकारी हिंदी माध्यमों पर उपलब्ध कराते हैं । व्याकरण के स्तर पर अच्छी अंगरेजी जानने वाले का उच्चारण ज्ञान भी अच्छा हो यह आवश्यक नहीं है, क्योंकि अंगरेजी में उच्चारण सीखना अपने आप में अतिरिक्त प्रयास की बात होती है । अतः समुचित अध्ययन के अभाव में त्रुटि की संभावना अंगरेजी में कम नहीं होती । तब अंगरेजी शब्द VOGUE एवं YACHTING का देवनागरी में क्रमशः ‘वोग्यू’ तथा ‘याचिंग’ लिखा जाना असामान्य बात नहीं रह जाती है ।
मेरी बातें किस हद तक सही हैं यह तो हिंदी पत्रकारिता में संलग्न जन ही ठीक-ठीक बता सकते हैं, अगर इस प्रयोजन से उन्होंने कभी अपने व्यवसाय पर दृष्टि डाली हो तो । अंगरेजी में उच्चारण सीखना कठिन कार्य है इसकी चर्चा मुझे करनी है । इस बात पर मैं जोर डालना चाहता हूं कि वर्तनी-साम्य देखकर उच्चारण का अनुमान लगाना अंगरेजी में असफल हो सकता है । अपने मत की सोदाहरण चर्चा अगली पोस्टों में मैं जारी रखूंगा । – योगेन्द्र
विगत पोस्ट (२ जनवरी, २००९) के आगे । इस ब्लॉग पर प्रस्तुत मेरे लेख-शृंखला का उद्येश्य रहा है उन कुछ शब्दों की चर्चा करना, जिन्हें हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में सुनते और प्रयोग में लेते रहते हैं । चयनित शब्द केवल उदाहरण मात्र हैं । ऐसे अनेकों शब्द गिने जा सकते हैं जिनके अर्थ इतने स्पष्ट या असंदिग्ध नहीं होते हैं जितने हवा-पानी, देश-विदेश, मीठा-खट्टा या अंधकार-प्रकाश जैसे शब्दों के । मैं उन शब्दों की बात कर रहा हूं जिनके अर्थ श्रोता ठीक वही नहीं समझ रहा होता है जो वक्ता के मन में अपनी बात कहते समय रहती हैं । यह लेख शृंखला की अंतिम किश्त है । मैं स्वयं आश्वस्त नहीं हूं कि मेरी बातें पाठकगण ठीक वैसे ही समझ पा रहे होंगे जैसा कि मेरे मन में हैं । संभव है कि मैं कुछ कह रहा हूं और वे कुछ अलग ही समझ रहे हों ! आगे पढ़ने के लिए >>यहां क्लिक करें
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विगत पोस्ट (२२ दिसंबर, २००८) के आगे ।
भ्रष्टाचार - भ्रष्टाचार भी उन तमाम शब्दों में से एक है जिसे हम आम जिंदगी में सुनते हैं । इस शब्द का सर्वाधिक प्रयोग राजनैतिक, शासकीय, प्रशासनिक एवं न्यायिक संदर्भों में किया जाता है । इस शब्द को जोर-शोर से इस्तेमाल करते हुए सत्तासीन राजनैतिक दलों का विरोध किया जाता है और उन्हें सत्ताच्युत करने के प्रयास किये जाते रहे हैं । किंतु भ्रष्टाचार क्या है इसकी समझ सब की अपनी अलग-अलग है । प्रायः सभी लोग इसकी परिभाषा करते समय इस बात के लिए सचेत रहते हैं कि कहीं कही जा रही बात उनके स्वयं के विरुद्ध तो नहीं निकल पड़ेगी । वे कोई न कोई तर्क खोज ही लेते हैं जिसके आधार पर वे खुद साफ-सुथरे नजर आयें । सैद्धांतिक स्तर पर भ्रष्टाचार की असंदिग्ध तथा स्पष्ट व्याख्या करना कदाचित् संभव है, परंतु व्यवहार में कम ही लोग उसे स्वीकारेंगे । परिभाषा को थोड़ा-बहुत लचीला बनाने की आवश्यकता सभी मानते हैं और इस लचीलेपन के साथ ही शब्द के अर्थ अक्सर बेमानी हो जाते हैं । शेष के लिए क्लिक करें >>
विगत पोस्ट (११ दिसंबर, २००८) के आगे ।
धर्मनिरपेक्षता – राजनीति के क्षेत्र में यह शब्द बहुधा सुनने को मिलता है और उसी के परिप्रेक्ष में बुद्धिजीवी वर्ग भी इस पर चर्चाएं करता आया है । मैं समझता हूं कि अपने देश में इस शब्द की महत्ता हाल के वर्षों में बहुत बढ़ गयी है, और राजनेताओं के लिए यह जनसामान्य को भ्रमित करके अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करने का एक अच्छा हथियार बन चुका है । मेरी समझ में हर कोई इस शब्द की व्याख्या सुविधानुसार और मनमाने तरीके से कर रहा है ।
क्या है धर्मनिरपेक्षता ? अपने देश में यह अंग्रेजी के ‘सेक्युलर’ (secular) के लिए हिन्दी का समानार्थी शब्द के तौर पर प्रयोग में लिया जा रहा है । शब्दकोष सेक्युलर के अर्थ यूं देते हैं: “1. denoting attitudes, activities, or other things that have no religious or spiritual basis; 2. not subject to or bound by religious rules; not belonging to or living in a monastic or other order.” (अभिवृत्तियां/रवैया, कर्म/कार्य, अथवा अन्य बातें जिनका आधार धार्मिक या आध्यात्मिक न हो; धार्मिक नियमों के अधीन या उनसे बंधा हुआ न हो; मठ-आवासीय या अन्य प्रकार के नियमों से असंबद्ध, अथवा तदनुरूप जीवनयापन से परे; संदर्भ: Oxford Dictionary of Difficult Words)”
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मैं दैनिक समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ (लखनऊ संस्करण) का नियमित पाठक हूं । इस समाचारपत्र के साथ सप्ताह में कुछएक दिन ‘रीमिक्स’ नामक परिशिष्ट भी पाठकों को मिलता है । इस परिशिष्ट को देखकर मुझे ऐसा लगता है कि इसकी सामग्री आज के युवा पाठकों को ध्यान में रखकर ही चुनी जाती है । इसमें बहुत कम ऐसी विषयवस्तु मिलेगी जो मुझ जैसे उम्रदराज लोगों की रुचि की हो । इस बारे में मुझे कोई आपत्ति नहीं है । किंतु जो मेरे समझ से परे और कुछ हद तक मुझे अस्वीकार्य लगता है वह है इसमें अंग्रेजी के शब्दों का खुलकर इस्तेमाल किया जाना, भले ही उनके तुल्य शब्दों का हिन्दी में कोई अकाल नहीं है । ऐसा प्रतीत होता है कि ‘रीमिक्स’ की भाषा उन युवाओं को समर्पित है जो बोलने में तो हिंग्लिश के आदी हो ही चुके हैं और अब उसे बाकायदा लिखित रूप में भी देखना चाहेंगे । मैं समझता हूं कि उक्त समाचारपत्र का संपादक-मंडल यह महसूस करना है कि आने वाला समय वर्णसंकर भाषा हिंग्लिश का है और उसे आज ही व्यवहार में लेकर सुस्थापित किया जाना चाहिए ।
(‘हिन्दुस्तान’ समाचारपत्र वेबसाईट http://hindustandainik.com/ पर पढ़ा जा सकता है । यह ‘ई-पेपर’ के रूप में भी उपलब्ध है ।)
मैं अपनी बातें उक्त ‘रीमिक्स’ (हिन्दुस्तान, १० नवंबर) के इस उदाहरण से आरंभ करता हूं:
‘प्रॉब्लम: ऑयली स्किन की, सॉल्यूशन: वाटरबेस्ड फाउंडेशन’
यह है ‘रीमिक्स’ के दूसरे पृष्ठ के एक लेख का शीर्षक । मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि यह वाक्यांश हिन्दी का है या अंग्रेजी का, जो देवनागरी लिपि में लिखा गया हो । हिन्दी के नाम पर इसमें मात्र एक पद है: ‘की’, शेष सभी अंग्रेजी के पद हैं । यदि देवनागरी लिपि हिन्दी की पहचान मान ली जाये तो इसे हिन्दी कहा ही जायेगा, भले ही पाठ फ्रांसीसी का हो या चीनी भाषा का । पर मुझे संदेह है कि कोई वैसा भी सोचता होगा । और अगर आप यह मानते हैं कि अंग्रेजी के सभी शब्द तो अब हिन्दी के ही मान लिए जाने चाहिए, तब मेरे पास आगे कुछ भी कहने को नहीं रह जाता है । उस स्थिति में आगे कही जा रही बातों पर नजर डालने की जरूरत भी आपको नहीं हैं । आगे की उन बातों को फिजूल कहकर अनदेखा करना होगा । आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें >>
(पिछले लेख से आगे) मैंने पिछली बार अपना मत व्यक्त किया था कि अनुवाद में भावों को महत्त्व दिया जाना चाहिए और उसके लिए संबंधित दोनों भाषाओं में शब्द के लिए शब्द वाला प्रयोग करना सदैव सार्थक हो यह आवश्यक नहीं । आवश्यक हो जाने पर नये शब्दों/पदबंधों की रचना करने अथवा अन्य भाषाओं से शब्द आयातित करना भी एक मार्ग है । कुछ भी हो यह निर्विवाद कहा जायेगा कि अनुवाद में संलग्न व्यक्ति को संबंधित भाषाओं पर अच्छी पकड़ होनी चाहिए और उसकी शब्दसंपदा दोनों में पर्याप्त होनी चाहिए । फिर भी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं । मेरे विचार से साहित्यिक रचनाओं के मामले में अनुवाद-कार्य जटिल सिद्ध हो सकता है । वस्तुतः साहित्यिक भाषा अक्सर आलंकारिक तथा मुहावरेदार होती है और बहुधा ऐसे असामान्य शब्दों से भी संपन्न रहती है जो अधिसंख्य लोगों की समझ से परे हों । वाक्य-रचनाएं भी सरल तथा संक्षिप्त हों यह आवश्यक नहीं । कभी-कभार ऐसी स्थिति भी पैदा हो सकती है कि पाठक पाठ्य के निहितार्थ भी ठीक न समझ सके, या जो वह समझे वह लेखक का मंतव्य ही न हो । साहित्यिक लेखकों की अपनी-अपनी शैली होती है और लेखन में उनकी भाषायी विद्वत्ता झलके कदाचित् यह अघोषित कामना भी उसमें छिपी रहती है ।
इसके विपरीत वैज्ञानिक तथा व्यावसायिक विषयों के क्षेत्र में लेखन, जिसका थोड़ा-बहुत अनुभव मुझे है, में सरल तथा संक्षिप्त वाक्यों के प्रयोग की अपेक्षा की जाती है । इन क्षेत्रों में लेखक से यह उम्मींद की जाती है कि उसकी अभिव्यक्ति स्पष्ट हो और लिखित सामग्री उन लोगों के लिए भी बोधगम्य हो जो भाषा का विद्वतापूर्ण ज्ञान न रखते हों । संक्षेप में भाषा वस्तुनिष्ठ होनी चाहिए न कि व्यक्तिनिष्ठ । हां, लेखों को समझने में पाठक की विषय संबंधी पृष्ठभूमि का स्वयं में महत्त्व अवश्य रहता है ।
मेरी दृष्टि में पत्रकारिता की स्थिति काफी हद तक वैज्ञानिक आदि के क्षेत्रों की जैसी होनी चाहिए । मैं समझता हूं कि साहित्यक रचनाओं का पाठकवर्ग अपेक्षया छोटा होता है और उसकी साहित्य में विशिष्ट रुचि होती है । इसके विरुद्ध पत्रकारिता से संबद्ध पाठकवर्ग बहुत विस्तृत रहता है और पाठकों की भाषायी क्षमता अतिसामान्य से लेकर उच्च कोटि तक का हो सकता है । पत्रकार को तो उस व्यक्ति को भी ध्यान में रखना चाहिए जो लेखों को समझने में अपने दिमाग पर अधिक जोर नहीं डाल सकता है । इसलिए मैं तो यही राय रखता हूं कि पत्रकार सरल तथा स्पष्ट लेखन करे । यदि अन्य भाषा का मूल लेख इस श्रेणी का हो अनुवाद करना भी सरल ही होना चाहिए । कुछ भी हो यह तो तब भी आवश्यक ही माना जायेगा कि पत्रकार का संबंधित भाषाओं का ज्ञान अच्छा हो और तदनुकूल वह अपने भाषाज्ञान में उत्तरोत्तर सुधार करे ।
परंतु हिन्दी पत्रकारिता में लगे लोगों में क्या हिन्दी के प्रति इतना सम्मान रह गया है कि वे उस पर अपनी पकड़ को मजबूत करें । देश में इस समय जो स्थिति चल रही है उसमें पढ़े-लिखे लोगों के बीच हिंग्लिश का प्रचलन बढ़ता जा रहा है । मैं समझता हूं कि हिंग्लिश से प्रायः सभी परिचित होंगे । हिंग्लिश, जिसे कुछ लोग हिंग्रेजी कहना अधिक पसंद करेंगे, एक नयी वर्णसंकर भाषा है, जिसका व्याकरणीय ढांचा तो हिंदी का है किंतु जिसकी शब्दसंपदा पारंपरिक न होकर अंग्रेजी से उधार ली गयी है । वस्तुतः हिंग्लिश का हिन्दी से कुछ वैसा ही संबंध है जो उर्दू का है । पढ़े-लिखे लोगों की यह दलील है कि हमें मुक्त हृदय से अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करना चाहिए । इन ‘अन्य भाषाओं’ में कोई और नहीं केवल अंग्रेजी है । उनसे पूछा जाये कि उन्होंने बांग्ला-मराठी और थोड़ा आगे बढ़कर तेलुगू-कन्नड़ के कितने शब्द आयातित किये हैं तो वे निरुत्तर मिलेंगे । इस तर्क को मैं निहायत बेतुका मानता हूं और यह कहने में मुझे बिल्कुल भी हिचक नहीं होती कि यह ‘कुतर्क’ वे अपनी हिन्दी-संबंधी भाषायी अक्षमता को छिपाने के लिए देते हैं । उनका हिन्दी शब्द-भंडार इस कदर कमजोर हो चुका है कि वे हिन्दी में किसी विषय पर बोल ही नहीं सकते । लेकिन यही वे लोग हैं जो अंग्रेजी की शुद्धता के प्रति अतिसचेत मिलेंगें । भूले से भी वे कभी अंग्रेजी में हिन्दी अथवा अन्य देसी भाषाओं के शब्दों का प्रयोग करते हुए नहीं मिलेंगे । मुझे तो तब हंसी आती है जब इस प्रकार का कुतर्क स्वयं हिन्दी रचनाकारों के मुख से भी सुनता हूं ।
मैं दूरदर्शन पर प्रसारित समाचारों में थोड़ा-बहुत साफ-सुथरी हिन्दी सुन लेता हूं । समाचारों की यह गुणवत्ता निजी चैनलों पर कुछ कम मिलती है । समाचार कक्ष से प्रसारित समाचार कुछ हद तक सावधानी से लिखे रहते हैं । किंतु बाहर घटनास्थल से जीवंत वार्ता (लाइव न्यूज) पेश करने वाले संवाददाता के मुख से अंग्रेजी-मिश्रित हिन्दी ही सुनने को मिलती है । संवाददाता अपनी बात कुछ यूं कहता है (एक बानगी):-
“रशियन प्रेजिडेंट दमित्री मेद्वेदेव ने कहा है कि रूस अगले दो सालों में एअरक्राफ्ट कैरियर का लार्ज-स्केल कंस्ट्रक्शन लांच करेगा …”
आपत्ति की जा सकती है कि इस उदारण में कुछ अधिक ही अंग्रेजी शब्द हैं । मान लेता हूं, किंतु क्या कोई उक्त बात को कुछ यूं पेश करेगा ? -
“रूसी राष्ट्रपति दमित्री मेद्वेदेव ने कहा है कि रूस अगले दो सालों में वायुयान वाहकों का वृहत्तर स्तर पर निर्माण-कार्य आरंभ करेगा …”
शायद कोई इस प्रकार से समाचार लिख भी ले, परंतु बोलते वक्त तो स्वाभाविक तौर पर अंग्रेजी शब्द ही वार्ताप्रेषकों के मुख से निकलेंगे । लेकिन कोई भी अंग्रेजी पत्रकार भूले से हिन्दी शब्दों का प्रयोग करता हुआ नहीं पाया जायेगा, भले ही किसी उपयुक्त शब्द की तलाश में वह कुछ क्षण रुक जाये । इस सबके पीछे हमारी यह मानसिकता है कि हिन्दी में तो कुछ भी ठूंस दें चलेगा, परंतु अंग्रेजी में तो शुद्धता रखनी ही पड़ेगी । शुद्ध अंग्रेजी हमारी प्रतिष्ठा के लिए अनिवार्य है, और अंग्रेजीमिश्रित हिन्दी पर हम लज्जित होने की भला क्यों सोचे ? (हिंग्लिश पर अपने विचार बाद में अलग से कभी पेश करूंगा ।)
जब स्थिति यह हो कि पत्रकार अपनी बातें हिन्दी में प्रस्तुत करने में बेझिझक अंग्रेजी शब्द प्रयोग करें और कभी पूरा वाक्य ही अंग्रेजी का बोल जायें तो फिर अनुवाद की गुणवत्ता का प्रश्न कहां उठता है ? किसको चिंता होगी तब हिन्दी शब्दों की ? – योगेन्द्र
(पिछले लेख से आगे) मैंने इस बात की चर्चा की थी कि एनडीटीवी के प्रियदर्शनजी ने तीन शब्दों (वस्तुतः पदबंधों या फ्रेजेज), ‘फैबुलस फोर’, ‘यूजर फेंडली’ तथा ‘पोलिटिकली करेक्ट’, का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया था कि क्या अनुवाद हेतु इनके लिए हिन्दी में कोई उपयुक्त शब्द नहीं हैं ? मेरा अनुमान है कि उनका सवाल वस्तुतः अपनी ही न्यूज मीडिया (समाचार माध्यम) की बिरादरी के प्रति संबोधित है । ये सवाल क्यों उठा है ? शायद इसलिए कि आजकल मीडिया के लोग या तो सही-सही शब्द अपने अनुवाद में इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, या बिलाझिझक धड़ल्ले से अंग्रेजी के ही शब्द यथावत् प्रयोग में ले रहे हैं ।
क्या वाकई में हिन्दी इतनी कंगाल है कि उसमें समुचित अभिव्यक्ति के लिए शब्द ही नहीं हैं ? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए सर्वप्रथम मैंने उक्त तीनों पदबंधों के लिए हिंदी में समुचित तथा तुल्य पदों/पदबंधों को खोजने की कोशिश की । मेरी कठिनाई शुरू हुयी ‘फैबुलस फोर’ से । मेरे शब्दकोशों में ‘फैबुलस’ के अर्थ अवश्य मिलते हैं और वे भी कुछ हद तक परस्पर भिन्न-भिन्न (जैसे मिथकीय, पौराणिक, अद्वितीय, चामत्कारिक, असाधारण आदि) । परंतु ‘फैबुलस फोर’ एक सुस्थापित पदबंध के रूप में उन शब्दकोशांं में स्थान नहीं पा सका है । अंतरजाल (इंटरनेट) की शरण में जाने पर मुझे पता चला कि यह तो अलग-अलग प्रसंगों में परस्पर भिन्न अर्थों में प्रयुक्त हुआ है, यथा स्वेडन के एक गायकदल के उन चार गीतों के लिए समीक्षकों ने ‘फैबुलस फोर’ नाम दिया जो कई माह तक शीर्षस्थ 10 गीतों में शामिल रहे (1966-67) । यानी वे असाधारण चार या अद्वितीय चार गीत कहलाने लगे । इसके अलावा साठ के दशक में ‘बीटल’ कहे जाने वाले चार गायकों के दल को भी ‘फैबुलस फोर’ का नाम दिया गया था । इसी प्रकार 1991 में प्रदर्शित एक अमेरिकी चलचित्र का नाम भी ‘फैबुलस फोर’ रखा गया था, क्योंकि यह चार असाधारण श्रेणी के कुश्तीबाजों की कहानी पर आधारित थी । और भी कई दृष्टांत देखने को मिले हैं । अभी कल-परसों जब मैं अपने हिन्दी तथा अंग्रेजी अखबार पढ़ रहा था तो उसमें चार क्रिकेटरों (सचिन, द्रविण, लक्ष्मण तथा गांगुली) को ‘फैबुलस फोर’ और संक्षेप में ‘फैब फोर’ कहा गया था । अब आप ही निष्कर्ष निकालिए कि उक्त पदबंध के लिए हिन्दी में क्या लिखा जाये । जाहिर है कि यह पदबंध प्रसंगभेद के अनुरूप लीक से हटकर कुछ अद्वितीय-से लगने वाले चार जनों/वस्तुओं को इंगित करता है, और तदनुसार उसे चामत्कारिक/असाधारण/अद्वितीय या कुछ इसी प्रकार की चौकड़ी अथवा चौगड्डा कहा जा सकता है । तात्पर्य यह है कि क्या उचित होगा इसे प्रसंग को ठीक-से समझ कर ही तय किया जा सकता है और स्वयं सार्थक शब्द/पदबंध खोजे/रचे जा सकते हैं ।
अब आइये अगले पदबंध ‘यूजर फेंडली’ पर । इस पदबंध से मेरा परिचय सर्वप्रथम तब हुआ जब मुझे भौतिकी के साथ-साथ कंप्यूटर विज्ञान पढ़ाने का अवसर अपनी शिक्षण संस्था में मिला था । मेरी जानकारी में यह वस्तुतः कंप्यूटरों के संदर्भ में ही सबसे पहले इस्तेमाल हुआ है, और ये बात मेरी अंग्रेजी डिक्शनरी भी कहती है । अदि आप कंप्यूटरों के विकास पर नजर डालें तो पायेंगे कि आरंभ में उनको प्रयोग में लेना हर किसी के बस में नहीं होता था । उनके प्रयोग की विधि के लिए समुचित प्रशिक्षण की आवश्यकता होती थी । समय के साथ उनकी कार्यप्रणाली में परिवर्तन एवं सुधार होता गया और उनके प्रयोग के लिए अंग्रेजी शब्दों पर आधारित निदेशात्मक भाषाओं का विकास हुआ । इस प्रगति के बाद भी हर किसी के लिए उन्हें प्रयोग में लेना संभव नहीं था । समुचित जानकारी, प्रशिक्षण तथा अध्यास की तब भी आवश्यकता रहती थी । पर आज स्थिति एकदम बदल गयी है । उन्हें प्रयोग में लेना कितना सरल या कठिन है इस भाव को व्यक्त करने के लिए ही इस पदबंध का प्रयोग किया जाने लगा । और आज इसने कई अन्य क्षेत्रों में भी अपनी पैठ बना ली है । वास्तव में ‘यूजर फेंडली’ यह स्पष्ट करता है कि किसी युक्ति, उपकरण, क्रियाप्रणाली अथवा साफ्टवेयर को प्रयोग में लेना कितना सरल है । अब सोचा जा सकता है कि इस भाव को कैसे व्यक्त किया जाये ।
भारत सरकार के वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग ने ‘यूजर फेंडली’ के लिए ‘उपयोक्ता मैत्रीपूर्ण’ सुझाया है । मुझे यह पदबंध संतोषप्रद नहीं लगता है । ऐसा प्रतीत होता है कि आयोग का जोर शाब्दिक अनुवाद पर रहता है न कि भावाभिव्यक्ति पर । इस प्रकार शब्द के लिए शब्द के सिद्धांत पर आधारित अनुवाद कभी-कभी बेहूदा और निरर्थक हो सकता है, जैसा कि ‘गूगल’ पर उपलब्ध अभी विकसित हो रहे ‘अनुवादक’ साफ्टवेयर के माध्यम से प्राप्त अनुवाद के साथ देखा जा सकता है । मेरी राय में ‘यूजर फेंडली’ के लिए सीधे तौर पर ‘सुविधाजनक’ शब्द प्रयोग में लेना पर्याप्त है । और यदि थोड़ा बेहतरी चाहें तो ‘सुविधाप्रदायक’ ठीक होगा । मुझे लगता है कि अंग्रेजी के सामने हम हिंदुस्तानी इस कदर नतमस्तक रहते हैं कि अनुवाद के समय उसके वाक्यों/वाक्यांशों के निहितार्थ को समझकर उसे अपने तरीके से व्यक्त करने की भी हिम्मत नहीं कर पाते हैं । हमारा जोर तो इस पर होना चाहिए कि कही-लिखी गयी बात को अपनी भाषा में अपने शब्दों में हम बिना अर्थ खोये कह पा रहे कि नहीं ।
आइये अब आरंभ में उल्लिखित तीसरे पदबंध ‘पोलिटिकली करेक्ट’ की बात करें । मैं नहीं समझ पाया कि यह उदाहरण संबंधित लेखक ने क्या सोचकर दिया । क्या इसके अर्थ ‘राजनैतिक दृष्टि से उचित/मान्य/स्वीकार्य’ नहीं हैं ? अथवा इसके बदले ‘सियासी तौर पर सही’ कहना ठीक नहीं होगा ? तब समस्या क्या है ? इन वाक्यांशों को सोचने या समझने में कौन सी खास मेहनत करनी पड़ रही है । हां, समस्या तब अवश्य होगी जब शब्द के लिए शब्द वाले सिद्धांत पर हमारा जोर रहेगा । पर किसी भी भाषा में वैसा अनुवाद न तो सदैव संभव हो सकता है और न ही वह अनिवार्यतः वांछित होगा ।
अभी बहुत कुछ इस विषय पर कहना है, अतः चर्चा जारी रहेगी । – योगेन्द्र
कल के दैनिक समाचार-पत्र ‘हिन्दुस्तान’ में एनडीटीवी टीवी चैनल से संबद्ध प्रियदर्शनजी का लिखा एक आलेख पढ़ने को मिला । लेखक इन शब्दों के साथ अपने विचार रखते हैः- “‘फैबुलस फोर’ को हिन्दी में क्या लिखेंगे ? ‘यूजर फ्रेंडली’ के लिए क्या शब्द इस्तेमाल करना चाहिए ?’ क्या ‘पोलिटिकली करेक्ट’ के लिए कोई कायदे का अनुवाद नहीं है? ऐसे कई सवालों से हिन्दी पत्रकारिता जूझ रही है । …” (हिन्दुस्तान में छपा आलेख देखें)
इसके पश्चात् हिन्दी पत्रकारिता से संबंधित कुछेक प्रश्नों को लेकर लेखक ने अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत की हैं । जहां तक उपर्युक्त तथा ऐसे ही अनेक अन्य अंग्रेजी शब्दों का प्रश्न है, उनके लिए समुचित तुल्य हिन्दी शब्दों का अभाव है ऐसा कहना गलत होगा । अवश्य ही कुछ स्थलों पर नयी आवश्यकताओं के अनुरूप नितांत नवीन शब्दों की आवश्यकता किसी भी भाषा में पड़ सकती है । अतः हिन्दी में कभी उचित शब्द किसी को न सूझ पा रहा हो तो आश्चर्य नहीं होगा । ऐसे अवसरों पर नितांत नये शब्दों की रचना की आवश्यकता पड़ सकती है । हिन्दी के मामले में तब संस्कृत सहायतार्थ उपलब्ध है । या फिर अन्य भाषाओं से वांछित शब्द स्वीकारा और अपने शब्दसंग्रह में शामिल किया जा सकता है ।
इस मामले में अंग्रेजी कोई अपवाद नहीं है और उसने विगत काल में सदा ग्रीक तथा लैटिन का सहारा लिया है, या फिर अन्य भाषाओं, विशेषतः अन्य यूरोपीय भाषाओं, से शब्द उधार लिए हैं । कुछेक शब्द तो स्वयं संस्कृत से भी अंग्रेजी में पहुंचे हैं, जैसे अहिंसा, आत्मा, मोक्ष आदि । भारतीय दार्शनिक चिंतन से जुड़े इन शब्दों के सही-सही तुल्य शब्दों की उम्मींद वहां नहीं की जा सकती थी । अंग्रेजी में तो विज्ञान जैसे विषयों के लिए नये तकनीकी शब्दों की रचना अपारंपरिक तरीके से भी यदा-कदा की गयी है, जैसे laser (light amplification by stimulated emission of radiation) जिससे to lase, lasing, lased जैसे क्रिया/क्रियापदों की रचना की गयी है । और ऐसे ही है पदार्थ-जगत् के मूलकण के लिए सुझाया गया नाम ुनंता है । रोजमर्रा का शब्द बन चुका robot वस्तुतः चेक लेखक Karel Capek के नाटक Rossum’s Universal Robots में मशीन की तरह के मानव-पात्रों के लिए प्रयुक्त हुआ है । कंप्यूटर विज्ञान में bit, pixel, alphameric आदि नयी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए रचे गये शब्द हैं । ये सब प्रयास विज्ञान तक ही सीमित नहीं हैं । हालिया वर्षों में हिन्दी के कुछ शब्द अंग्रेजी में इसलिए पहुंचे, क्योंकि वे एक नयी सामाजिक परिस्थिति के लिए उपयुक्त पाये गये, जैसे dharna, gherao आदि । —
लेकिन नये शब्दों की रचना की आवश्यकता विरले मौकों पर ही पड़ती है । आम तौर पर एक भाषा के किसी शब्द के अर्थ के तुल्य अर्थ वाला शब्द अन्य उन्नत भाषा में भी मिल ही जाता है । किंतु इस सब के लिए अपना शब्द-सामर्थ्य बढ़ाने की आवश्यकता होती है । मैं न तो हिन्दी का विद्वान रहा हूं और न ही पत्रकारिता मेरा व्यवसाय रहा है । व्यावसायिक तौर पर जीवन भर विज्ञान का अध्येता, अनुसंधानकर्ता और अध्यापक होने के बावजूद मैं भाषाओं के प्रति सचेत रहा हूं । मेरी राय में किसी भी भाषा की पत्रकारिता में संलग्न व्यक्ति के लिए उस भाषा की समुचित जानकारी होनी ही चाहिए और उसका भाषा पर अधिकार सामान्य जन की तुलना में कहीं अधिक होना चाहिए । और अगर वह व्यक्ति अंग्रेजी से अनुवाद पर निर्भर हो तो उसे दोनों ही भाषाओं पर अधिकार होना चाहिए । वास्तव में पत्रकारिता का क्षेत्र ऐसा है जिसमें एकाधिक भाषाओं की जानकारी उपयोगी और कभी-कभी निहायत जरूरी हो सकती है ।
पर दुर्भाग्य से स्थिति इतनी सरल नहीं है । अपने देश में अपनी भाषाएं इस हाल तक तिरस्कृत हो चली हैं कि उनको चलते-चलाते जितना हम सीख गये हों उससे एक कदम आगे बढ़ने का विचार हम लोगों में नहीं रहता । मुझे विज्ञान जैसे क्षेत्र में ऐसे विशेषज्ञ ढूढ़े नहीं दीखते जो देसी भाषाओं में जनसामान्य के अपर्याप्त अंग्रेजी-ज्ञान को ध्यान में रखते हुए अपने विचारों को स्पष्ट अभिव्यक्ति दे सकें । कदाचित् पत्रकारिता भी इस कमजोरी से ग्रस्त है । (यह चर्चा अभी जारी रहेगी ।) – योगेन्द्र
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