रविवार, 6 जुलाई 2014

मीडिया की भाषा से जुड़े सवाल






किंशुक पाठक,
 प्राध्यापक, बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय

पत्रकारिता ने हिंदी भाषा को नया जीवंत रूप और संस्कार देने का काम किया है। माना जाता है कि भाषा का ज्ञान पत्रकार का सबसे बड़ा गुण है। साफ है, जिस पत्रकार की भाषा जितनी पैनी होगी, वह उतना ही सफल और सक्षम होगा। किसी भी भाषा की रचना सामान्य परिस्थितियों में नहीं होती। भाषा परिवर्तनों में जन्म लेती है और परिवर्तनों के साथ ही विकसित होती है। नए समाज में विकास की नई परिस्थितियां पैदा होती हैं, नई घटनाएं जन्म लेती हैं। युद्ध, क्रांति या आंदोलन के नए रूप खड़े होते हैं, तब उन्हें अभिव्यक्त करने के लिए नई भाषा, शैली और शब्दावली की जरूरत महसूस होती है। पत्र-पत्रिकाओं का सीधा रिश्ता सामान्य जनता से होता है, इसलिए भाषा में बदलाव की यह जरूरत सबसे पहले समाचार पत्रों को ही महसूस होती है। ऐसे संक्रमण काल में पत्रों के सामने दो नए काम आ खड़े होते हैं- नई शब्दावली की रचना और उसका चलन।
भाषा की रचना में अक्सर ऐसे मोड़ आते हैं कि कुछ नए शब्द किसी खास घटनाक्रम के संदर्भ में अस्तित्व में तो आते ही हैं, किंतु जैसे ही उस घटनाक्रम की चर्चा थमती है, वे शब्द भी धीरे-धीरे लुप्त होने लगते हैं। ऐसे कई शब्द अल्पजीवी होते हैं और कई दीर्घजीवी।  कभी-कभी तो लुप्तप्राय शब्द भी अचानक अस्तित्व में आ जाते हैं। जैसे ‘महाभारत’ टेलीविजन सीरियल में ‘भ्राताश्री’, ‘माताश्री’ वगैरह।
हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार, विकास और परिमार्जन में पत्र-पत्रिकाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। न केवल साहित्यिक दृष्टि से पत्र-पत्रिकाओं का योगदान हिंदी की समृद्धि में उल्लेखनीय है, बल्कि भाषा की दृष्टि से भी वे महत्वपूर्ण हैं। भाषाशास्त्रियों की धारणा है कि प्रयोग के क्षेत्रों के अनुसार भाषा का एक विशिष्ट स्वरूप निर्धारित होता है। भाषा अपनी शब्दावली का विकास स्वयं करती है या प्रचलित शब्दावली में से ही शब्दों का चयन कर लेती है। यही कारण है कि मीडिया और समाचार पत्रों में प्रचलित भाषा साहित्यिक भाषा से कुछ अलग-सी दिखाई देती है। आधुनिक युग में पत्रकारिता पर व्यापक अनुसंधान हुए हैं, किंतु पत्रों की भाषा पर अलग से कोई ठोस काम नहीं किया जा सका है। समाचार पत्रों की भाषा विशुद्ध साहित्यिक नहीं होती, किंतु वह एकदम आमफहम भी नहीं होती। इन दोनों भाषाओं के बीच में ही कहीं पत्रों की भाषा की स्थिति होती है।
लेकिन आजकल भाषा के स्वरूप में विकृति आती जा रही है और व्याकरण के नियमों की घोर उपेक्षा हो रही है। नई परिस्थितियों का वर्णन करने के लिए मीडिया और समाचार पत्र भाषा के जिस स्वरूप को अपना रहे हैं, वह साहित्य में उससे भिन्न है। मीडिया और समाचार पत्रों की भाषा के लिए शुद्धतावादी दृष्टिकोण अपनाना बुरा नहीं है, किंतु भाषा जनसाधारण के लिए सुबोध होनी चाहिए। डेनियल डेफो का कहना था, ‘यदि कोई मुझसे पूछे कि भाषा का सर्वोत्तम रूप क्या हो, तो मैं कहूंगा कि वह भाषा, जिसे सामान्य वर्ग के भिन्न-भिन्न क्षमता वाले पांच सौ व्यक्ति (मूर्खो और पागलों को छोड़कर) अच्छी तरह से समझ सकें।’ आजकल बोलचाल के ठेठ शब्दों के साथ ही पुनरावृत्तिमूलक शब्दों का प्रयोग भी हिंदी समाचार पत्रों में होने लगा है।
हिंदी अखबारों में अनुवाद की जो भाषा घुस रही है, वह चिंता की बात है। यदि बंगाल में कोई घटना घटती है और उसका समाचार बांग्ला में छपता है, तो अंग्रेजी की समाचार एजेंसियां उसे अंग्रेजी में अनूदित कर हिंदी पत्रों को भेजती हैं। हिंदी समाचार पत्र उसका हिंदी में अनुवाद कर छापते हैं, जिससे अक्सर घटना की प्रस्तुति की मूल भावना ही समाप्त हो जाती है। एक तो हिंदी समाचार पत्रों में प्रयुक्त होने वाली हिंदी अंग्रेजी की अनुचर बनकर कांतिहीन और अवरुद्ध गति वाली हो गई है। दूसरे अनुवाद की जूठन और अंग्रेजी की प्रवृत्ति से तैयार किए गए समाचारों से पत्रकारिता का प्रभाव जनमानस पर सीमित हो रहा है। साथ ही भाषा की दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता अपने मौलिक स्वरूप की स्थापना नहीं कर पा रही है।
आधुनिक हिंदी समाचार पत्रों में इस प्रकार की दोषपूर्ण भाषा के अनेक उदाहरण खोजे जा सकते हैं। अनुवाद में सरल, तद्भव और प्रचलित शब्दों के स्थान पर तत्सम शब्दावली के प्रति आग्रह के कारण अखबारों की भाषा कठिन और बोझिल हो गई है। पाना, लेना, देना की जगह प्राप्त करना, ग्रहण करना और दान करना जैसे प्रयोगों की क्या आवश्यकता है? हिंदी समाचार पत्रों में भाषा का विन्यास भी कर्मवाच्य में होता है। यह हिंदी की प्रकृति के अनुकूल नहीं है। इसीलिए ‘द्वारा’ शब्द से बार-बार कवायद कराई जाती है और किए जाने, लिए जाने और दिए जाने जैसे प्रयोग करने पड़ते हैं।
मौजूदा हिंदी अखबारों की भाषा में एकरूपता का अभाव दिखाई देता है। कभी-कभी तो किसी समाचार पत्र के एक ही पृष्ठ पर, यहां तक कि एक ही खबर में एक शब्द को भिन्न-भिन्न रूपों में प्रयोग किया जाता है। इस बहुरूपता से समाचार पत्र की मर्यादा को कितनी ठेस पहुंचती है, इसका ध्यान अक्सर नहीं दिया जाता है। हिंदी में हम जैसा बोलते हैं, वैसा ही लिखते हैं, अन्य भाषाओं में ऐसा नहीं होता। पहले हिंदी के अखबार ‘बंद’ को ‘बन्ध’ लिखा करते थे, जैसे ‘बंगाल बन्ध’ लिखा करते थे। यह अंग्रेजी के भाव के कारण ही हुआ है। कुछ लोग एक पूर्व केंद्रीय मंत्री के उपनाम को ‘छागला’ लिखते रहे हैं, कुछ लोग ‘चागला।’ अब शुद्ध किसे माना जाए?
आज का पत्रकार भाषा को गंभीर दृष्टि से नहीं देखता और न ही शब्दों को लेकर कहीं बहस होती है। भाषा में ‘शब्दों’ का जंजाल खड़ा करके शाब्दिक सम्मोहन की स्थिति पैदा करना ठीक नहीं। एक ही भाव को व्यक्त करने के लिए अनेक शब्दों और उनके पर्यायों से परेड करवाना ठीक नहीं। लेकिन पाठकों से सस्ती सराहना हासिल करने के लिए लोग ऐसा ही करने लगे हैं, जैसे कदाचार, दुराचार, अनाचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचार, अत्याचार से मुक्त होने के लिए। इन शब्दों में बड़ा सूक्ष्म भेद है। जब तक यह भेद पाठकों के सामने स्पष्ट नहीं किया जा सकता, बात पूरी तरह उसके पल्ले नहीं पड़ सकती।
आज प्रचार-प्रसार तथा संवाद स्थापित करने का सबसे सशक्त माध्यम मीडिया ही है। जिससे अनेक तरह की सूचनाएं और ज्ञानवर्धक सामग्री आसानी से उपलब्ध हो जाती है। लोग पत्र-पत्रिकाओं के शब्दों को प्रामाणिक मानकर ग्रहण करते हैं, चाहे वे अशुद्ध ही क्यों न हों। किंतु समाचार पत्र-पत्रिकाओं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भ्रामक शब्दों का प्रयोग धड़ल्ले से होता रहा है। इसीलिए अखबारों को अपनी भाषा पर खास ध्यान देना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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