शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

कमर वहीद नकवी क्लास--1





कमर वहीद नकवी से शुद्ध- शुद्ध हिन्दी सीखे, बोले ......


अन्तरराष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय, अन्तरराज्यीय और अन्तर्राज्यीय

इस विषय पर इधर दो जिज्ञासाएँ मेरे पास आयीं. वैसे तो आजकल ज़्यादातर लोग 'अंतर्राष्ट्रीय' ही लिख रहे हैं क्योंकि टीवी में स्लग और ब्रेकिंग न्यूज़ की पट्टियों पर यह कम जगह लेता है.
लेकिन जो लोग बिलकुल सही ही लिखना चाहते हैं, उन्हें दो या अधिक राष्ट्रों के बीच हुई बात, घटना आदि के लिए अन्तरराष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय लिखना चाहिए और राष्ट्र के भीतर के लिए अन्तर्राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय लिखना चाहिए. किसी ज़माने में डाक विभाग का एक INLAND LETTER हुआ करता था, जिसे अन्तर्देशीय पत्र कहा जाता था, क्योंकि उसे केवल देश के भीतर ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जा सकता था.
दो या अधिक राज्यों के बीच के लिए अन्तरराज्यीय और किसी एक राज्य के भीतर के लिए अन्तर्राज्यीय ही शुद्ध रूप है.
लेकिन सच यह है कि इससे लोगों में भ्रम फैलता है. अगर हमें राष्ट्र के भीतर की बात करनी है तो हम राष्ट्रीय, राष्ट्रस्तरीय, अखिल भारतीय या अन्तर्राज्यीय कह कर भी काम चला सकते हैं. जैसे राष्ट्रीय खेल, अन्तर्राज्यीय हिन्दी कार्यशाला, राष्ट्रस्तरीय निबन्ध लेखन प्रतियोगिता आदि. मुझे याद नहीं पड़ता कि इस अर्थ में 'अन्तर्राष्ट्रीय' शब्द का प्रयोग मैंने हाल के दशकों में देखा हो.
इसी प्रकार राज्य के भीतर के लिए हम राज्यस्तरीय, प्रादेशिक या अन्तरज़िला आदि लिख कर काम चला सकते हैं.
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प्रलय पुल्लिंग है.
बहुत-से लोग उत्तराखंड से सम्बन्धित ख़बरों/ टिप्पणियों में प्रलय शब्द को स्त्रीलिंग मानकर लिख रहे हैं-- प्रलय आयी.
यह ग़लत है.
प्रलय आयी नहीं, प्रलय आया.
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TAMAROD यानी तमर्रुद

मिस्र में राष्ट्रपति मुहम्मद मुरसी के विरुद्ध आज जो आन्दोलन किया जा रहा है, उसका सही उच्चारण है-- तमर्रुद.
अंगरेज़ी में इसे TAMAROD लिखा जा रहा है, इससे भ्रमित हो कर इसे टंमरोड या टामारोड न लिखें.

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रसूक नहीं रुसूख़

अभी-अभी एक चैनल पर लिखा देखा--रसूक का धौंस.
रसूक कोई शब्द नहीं. सही शब्द है रुसूख़ और सही प्रयोग होगा-- रुसूख़ की धौंस. जो लोग नुक़्ता लगा सकते हैं, वे ख के नीचे नुक़्ता भी लगायें.

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भाषा को लेकर आज बड़ी उत्तेजक चर्चा चली फेसबुक ग्रुप काफी हाउसमें.
और चूंकि इसमें मेरा ज़िक्र भी हुआ, इसलिए मुझे भी इसमें शामिल होना पड़ा.

इस चर्चा में नया, नयी, नये, नई और नए को लेकर कुछ विचार व्यक्त किये गये.
सवाल यह है कि "नया" से "नयी" और "नये" बनेगा या "नई" और "नए", जैसे कि "हुआ" से "हुई" और "हुए" बनता है.

इस विषय पर पंकज श्रीवास्तव ने "समान्तर कोश" के कोशकार अरविन्द कुमार के एक लेख का हवाला दिया है. अरविन्द जी ने लिखा है : जहाँ तक मेरी जानकारी है कई दशक पहले कुछ साहित्यकारोँ ने एक पत्रिका मेँ उपसंपादन करते समय ऐसे हिज्जोँ की विविधता और भ्रामकता से घबरा कर एक अजीब सा (लेकिन पूरी तरह ग़लत और निराधार) नियम बना लिया कि यदि किसी शब्द के अंत मेँ 'या ' है तो उस के स्त्रीलिंग और बहुवचन रूपोँ मेँ 'यी ' और 'ये ' का प्रयोग किया जाए. यानी 'जायेगा, जायेंगे' लिखे जाएँगे.

अरविन्द जी, आप नयीऔर नयेलिखने के तर्क से असहमत हो सकते हैं, बहुत से लोग असहमत हैं बल्कि बहुमत असहमति रखने वालों का है, लेकिन इस तरह की बात लिखना शोभा नहीं देता कि उन लोगों ने अपने हिन्दी के अज्ञान के कारण ऐसा किया था. मेरा मानना है कि यह उनका बहुत तार्किक सोच था. (मैं सोच को "था" ही लिख रहा हूं क्योंकि यही शुद्ध है).

उन तथाकथित "अज्ञानी" लोगों ने "जाय" और "जाये" तक में अन्तर रखा था. जैसे: मोहन स्कूल जायेगा. यहाँ "जायेगा" GO के लिए है. अब दूसरा वाक्य देखिए: समय आने पर उचित फैसला लिया जायगा. यहाँ "जायगा" का अर्थ GO नहीं है, इसलिए "जाये" के बजाय "जाय" लिखा गया.

आजकल जो "नए" स्कूल वाले हैं, वे दोनों वाक्यों में लिखेंगे-- जाएगा. तो घालमेल किसने किया? लिखने में कम झंझट रहे, इसीलिए "जाय" और "जाये" को "जाए" बना दिया गया! सारी मुश्किल ख़त्म!

कहा जा रहा है कि उच्चारण प्रक्रिया के अनुरूप "गाया" का बहुवचन "गाए" और स्त्रीलिंग "गाई" होना चाहिए. तो फिर "गाय" (COW) को "गाए" क्यों न लिखा जाय?

अरविन्द जी ने लिखा है : जहाँ '' शब्द का ही मूल तत्व हो, वहाँ स्वरात्मक परिवर्तन की आवश्यकता नहीँ है. जैसे - स्थायी, अव्ययीभाव, दायित्व आदि. इन्हेँ स्थाई, अव्यईभाव, दाइत्व नहीँ लिखा जाएगा.
इस तर्क से "गाय" को "गाए" नहीं लिखेंगे, मान लिया. लेकिन "साया" को क्या लिखेंगे--- "साये" या "साए"?
"
स्थायी" की तरह "साया" भी मूल रूप से "य" पर समाप्त होता है. और अगर "साया" को "साये" लिखेंगे तो "खाया" को "खाए" क्यों लिखेंगे? "खाये" क्यों नहीं लिखेंगे?

"
बायाँ" और "दायाँ" को "बाएँ" और "बाईं", "दाएं" और "दाईं" लिखेंगे तो "दायी" से बननेवाले शब्दों का क्या होगा? "कष्टदायी" या "कष्टदाई", “सुखदायीया "सुखदाई"? अभी तक तो हम "कष्टदायी" और "सुखदायी" ही जानते थे.
इसी तरह जय से बनता है "जयी" और विजय से "विजयी". आजकल काफी लोग "विजई" लिख रहे हैं, कुछ दिन बीतने दीजिए, "कालजयी" को "कालजई" लिखा जाने लगेगा.

इसी तरह "मय" से बनने वाले शब्दों में भ्रम होने लग गया है. "रहस्यमय" से "रहस्यमयी" बनेगा या "रहस्यमई", "दयामयी" या "दयामई"? ज़ाहिर है कि "नए" और "नई" का पाठ पढ़नेवाले "रहस्यमयी" और "दयामयी" को "रहस्यमई" और "दयामई" ही लिखेंगे.

"
नए" स्कूल के तर्क से "पाया" (प्राप्त होना) का बहुवचन "पाए" और स्त्रीलिंग "पाई" होगा. तो जो शब्द "पायी" से बनते हैं, जैसे "स्तनपायी", उन्हें क्यों नहीं लोग "स्तनपाई" लिखने लगें.

तो इतना कन्फ्यूज़न फैलाने की क्या ज़रुरत है?
सीधा सरल सा एक नियम अपनाने में क्या परेशानी है कि जो शब्द "आ" पर समाप्त होते हैं उनका स्त्रीलिंग "ई" पर और बहुवचन "ए" पर बनेगा, जैसे "हुआ" से "हुई" और "हुए".
और जो शब्द "या" पर ख़त्म होते हैं, उनका स्त्रीलिंग "यी" और बहुवचन "ये" पर बनेगा, जैसे "गया" से "गयी" और "गये", "नया" से "नयी" और "नये".
इससे आसान और कुछ हो नहीं सकता और इसमें ग़लतियाँ होने या किसी तरह की दुविधा की कोई गुंजाइश नहीं है.


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हाडी नहीं, हादी

उर्दू भाषा में वैसे तो '' का उच्चारण है, लेकिन मुसलमानों के नामों में आमतौर पर '' उच्चारण नहीं आता.
अभी एक चैनल पर अभिनेता प्राण के बारे में रामपुर से किसी की बाइट चल रही थी और उनका नाम बताया गया-- ख़ालिद हसन हाडी.
यहाँ हाडी नहीं, बल्कि हादी लिखा जाना चाहिए.

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उबरना" और "उभरना"

इस रविवार को 'लाइफ़ ओके' पर शेखर सुमन को बोलते सुना---"अभी तो हम आपके पिछले परफ़ार्मेन्स के नशे से उभर भी नहीं पाये थे....."
शेखर सुमन काफ़ी अच्छी हिन्दी जानते हैं, इसलिए उन्हें "उबर" के बजाय "उभर" बोलते सुन कर थोड़ी हैरानी हुई.

29 जुलाई को 'सत्यमेव जयते' के आख़िरी एपिसोड में एक वाक्य था--- भूकम्प की विपदा से उभर कर...." इस ओर मेरा ध्यान निखिल आनन्द गिरि ने दिलाया और बताया कि इस एपिसोड में यह ग़लती कई बार दोहराई गयी. उन्होंने लिखा कि कई और टी. वी चैनलों के स्क्रिप्ट राइटर अकसर यही ग़लती करते हैं.

"उबरना" और "उभरना"

 दो अलग-अलग शब्द हैं और उनके बिल्कुल अलग-अलग अर्थ हैं.
"उबरना" का अर्थ है--- बचना, मुक्त होना, छुटकारा पाना, उद्धार होना, बाक़ी बचना, छूटना.
उबरना" के कुछ प्रयोग--- (1) " भूकम्प की विपदा से उबरने के बाद" यानी भूकम्प की विपदा से बच जाने के बाद...." (2) "संकट से उबरना" यानी संकट से बच जाना, (3) "नशे से उबरना" यानी नशे से छुटकारा पा लेना, (4) "आर्थिक परेशानी से उबरना" यानी आर्थिक परेशानी से मुक्त हो जाना."उभरना" का अर्थ है--- ऊपर आना, खुलना, ज़ाहिर होना, किसी दबी हुई चीज़ का प्रकट होना, ऊँचा उठना, बढ़ना, किसी सतह से ऊपर निकल कर दिखाई देने लगना, जवानी पर आना आदि.
"उभरना" के कुछ प्रयोग--- (1) किसी रहस्य या छिपे हुए तथ्य का खुलना: "अब यह बात उभर कर सामने आ रही है कि दंगा एक सोची-समझी साज़िश के तहत कराया गया." (2) किसी सतह से निकल कर सामने आना: " इस पेड़ के तने पर उभरी हुई गाँठें होती हैं." (3) किसी चीज़ का सामने आना: "बीमारी फिर उभर आयी है."

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इंजीनियरों या इंजीनियर्स

समीर वाजपेयी ने पूछा है कि "इंजीनियरों" लिखना चाहिए या "इंजीनियर्स?"
समीर जी, आपने बहुत सही सवाल किया. अंग्रेजी के शब्दों को अगर हिन्दी में लिया जाय तो उनके बहुवचन बनाने में हिन्दी व्याकरण के नियम लिए जायें या अंग्रेजी के--- इस बारे में अच्छा- ख़ासा मतभेद है और आजकल कई अख़बार और टी वी चैनल "इंजीनियर्स" और "स्टुडेंट्स" आदि लिख रहे हैं. मेरे विचार से यह बिलकुल ग़लत है. कोई भी भाषा संसार की किसी भी भाषा से शब्द ले सकती है और लेती है, लेकिन उन्हें अपने व्याकरण में ही ढालती है. उदहारण के तौर पर "पंडित" और "बाज़ार" जैसे शब्द अंग्रेजी में आज धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं, लेकिन क्या आप यह कल्पना कर सकते हैं कि अंग्रेजी में “PUNDITS” के बजाय “PUNDITON” लिखा जाय. इसी तरह "रोटी", "जुगाड़" और "क़मीज़" जैसे शब्द भी हाल में अंग्रेजी में शामिल हुए हैं. रोटी और जुगाड़ तो हिन्दी के शब्द हैं और क़मीज़ शब्द (मूल अरबी क़मीस) हिन्दी से होते हुए अंग्रेजी में शामिल हुआ है, लेकिन अंग्रेजी में तो इन्हें अंग्रेजी व्याकरण के हिसाब से ही इस्तेमाल किया जायेगा न कि हिन्दी या अरबी व्याकरण के अनुसार. क़मीज़ शब्द हिन्दी में आया भले अरबी से होगा, लेकिन हिन्दी में तो उस पर हिन्दी का ही व्याकरण लागू होगा. इसलिए मेरा मानना है कि शब्द कहीं से आये, हिन्दी में उसे हिन्दी व्याकरण के अनुसार चलना चाहिए.

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सिंहावलोकन :

शरद सिंह जी ने पूछा है कि सिंहावलोकन का अर्थ क्या है और इसका कहाँ और कैसे प्रयोग होता है. जवाब है:
सिंहावलोकन का अर्थ होता है सिंह का दृष्टिपात. यानी जैसे सिंह पहले पीछे देख कर फिर आगे देखता है और फिर आगे चलता है, उसी तरह पीछे का जायज़ा लेकर फिर आगे की ओर देखनायही सिंहावलोकन है. किसी विषय की पृष्ठभूमि पर दृष्टि डाल कर फिर आगे अवलोकन करना--- यही सिंहावलोकन है.
सिवा या सिवाय :
विनीत कुमार जी का सवाल है कि सिवा सही है या सिवाय? सही है सिवा.
लाश और शव :

सैयद उम्र ने पूछा है कि लाश और शव में क्या अन्तर है और इनमें से क्या लिखना बेहतर है? जवाब है:
अपने वाक्य में आप "लाश और शव"---इन शब्दों के निकट क्या शब्द लिख रहे हैं, इस पर निर्भर करेगा कि आप इनमें से कौन-सा शब्द चुनेंगे. सामान्य नियम है कि दो निकटतम शब्दों में भाषागत तालमेल रखा जाये. जैसे क्षत-विक्षत लाश के बजाय क्षत-विक्षत शव लिखना ज़्यादा बेहतर होगा क्योंकि पहले नमूने में क्षत-विक्षत (हिन्दी) और लाश (उर्दू, मूलतः फ़ारसी) का अटपटा मेल हो रहा है, जबकि दूसरे नमूने यानी क्षत-विक्षत शव में सभी शब्द हिन्दी के हैं.
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हर्ष रंजन ने पूछा था कि "अच्छा" और "बढ़िया" में क्या फ़र्क़ होता है. उन्हें तो जवाब लिख दिया लेकिन मुझे लगा कि इस जवाब को अलग से पोस्ट करना चाहिए. तो लीजिए, पेश है:
अच्छा का अर्थ है रंग-रूप, रचना, गुण, योग्यता में अन्यों से तुलनात्मक रूप से बेहतर. बढ़िया निकला है बढ़ना से और उसे भी उत्तम और अच्छा के अर्थ में काफ़ी प्रयोग किया जाता है. लेकिन "अच्छा" का जहाँ बहुत व्यापक प्रयोग है, वहीं कुछ जगहों पर "बढ़िया" का प्रयोग नहीं कर सकते हैं.
जैसे "आप अच्छे लग रहे हो" के स्थान पर "आप बढ़िया लग रहे हो" नहीं कह सकते हैं.
इसी तरह से, "वह अच्छी लड़की है" के स्थान पर " वह बढ़िया लड़की है" नहीं कहा जा सकता है.
"
अच्छा" के कुछ और भी प्रयोग हैं. जैसे "आप से मिलकर अच्छा लगा", "अच्छा हुआ आप यहाँ आ गये", "आपने उसकी मदद कर अच्छा किया", "यह मुहल्ला अच्छा है" आदि वाक्यों में "अच्छा" की जगह "बढ़िया" कहना प्रायः ठीक नहीं होगा. लेकिन जब हमें ज़ोर डाल कर बताना हो कि कोई चीज़ बहुत अच्छी हुई है तो बढ़िया का इस्तेमाल हो सकता है. जैसे ऊपर के उदाहरण में "आपने उसकी मदद कर अच्छा किया" में यदि इस बात पर ज़ोर हो कि यह बहुत अच्छा हुआ तो कह सकते हैं कि "आपने उसकी मदद कर बढ़िया काम किया". यहाँ "अच्छा" के बजाय "बढ़िया काम" पर बल दिया गया है.
इसी तरह, अच्छा के कुछ और प्रयोग हैं. जैसे, "उसके साथ यह अच्छा नहीं हुआ." यहाँ "अच्छा" की जगह "बढ़िया" नहीं लिख सकते.
या जैसे, "अच्छा-अच्छा अब झगड़ा बन्द करो." यहाँ "अच्छा" बिल्कुल ही अलग अर्थ में आया है. कभी-कभी "अच्छा" व्यंगात्मक लहजे में आता है. जैसे, "तुमने अच्छी दोस्ती निभायी मेरे साथ!"
कभी क्रोध में भी "अच्छा" कहते हैं, जैसे: "अच्छा, तुम मेरी शिकायत करोगे?"
या फिर, "अच्छा तो कल मिलते हैं" या "अच्छा, मैं जा रहा हूँ."
लेकिन सामान्य प्रयोग में बहुत जगहों पर "अच्छा" और "बढ़िया" में से कोई भी शब्द प्रयोग कर सकते हैं, जैसे: अच्छा भोजन या बढ़िया भोजन, धन्धा अच्छा चल रहा है या धन्धा बढ़िया चल रहा है, अच्छी कमाई है या बढ़िया कमाई है, स्वास्थ्य बढ़िया है आदि. मेरे ख़याल से जहाँ अच्छा होने के साथ-साथ बढ़त पर ज़ोर हो, वहाँ बढ़िया का इस्तेमाल होना चाहिए

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कैसे बोलें गिनतियाँ


अकसर मैंने देखा है कि हिन्दी की कुछ गिनतियों को लेकर भ्रम की स्थिति रहती है. जैसे 39 को कैसे बोला जाय? कुछ लोग इसे "उनचालीस" बोलते हैं, जो बिल्कुल ग़लत है.

इसी तरह मैंने कुछ लोगों को 49 को "उननचास" बोलते सुना है. अभी हाल में ही छपे हिन्दी के एक कोश ने " एक से सौ तक संख्यावाचक शब्दों का मानक रूप" दिया है. मुझे लगा कि यह जानकारी बहुत-से लोगों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है और अगर ज़्यादातर लोग इन उच्चारणों को स्वीकार कर लें तो विभिन्न क्षेत्रीय प्रभावों के कारण गिनतियों के उच्चारण में आये विचलन से तो छुटकारा मिलेगा ही, साथ ही एक मानक उच्चारण भी प्रचलित होगा.

जिस कोश से मैं ये उच्चारण उद्धृत कर रहा हूँ, उसका नाम है : प्रभात बृहत् हिन्दी शब्दकोश. यह कोश दो खण्डों में है और इसे प्रभात प्रकाशन दिल्ली ने 2010 में छापा है. मैं यहाँ एक से सौ तक की सारी गिनतियों का उच्चारण नहीं दूँगा, बल्कि केवल उन गिनतियों को लूँगा, जिनके उच्चारण में प्रायः दोष देखने में आता है. कोश के अनुसार मानक उच्चारण नीचे दिये जा रहे हैं.

18 :
अठारह
23 :
तेईस
25 :
पच्चीस
26 :
छब्बीस
27 :
सत्ताईस
28 :
अट्ठाईस
29 :
उनतीस
39 :
उनतालीस
43 :
तैंतालीस
44 :
चवालीस
49 :
उनचास
53 :
तिरपन
58 :
अठावन
63 :
तिरसठ
66 :
छियासठ
69 :
उनहत्तर
76 :
छिहत्तर
77 :
सतहत्तर
78 :
अठहत्तर
79 :
उनासी
87 :
सतासी
88 :
अठासी
92 :
बानवे
93 :
तिरानवे
97 :
सतानवे
98 :
अठानवे
99 :
निन्यानवे
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12

कहाँ लगेगा नुक़्ता?


ये समस्या बहुत लोगों की है कि उर्दू और अंग्रेज़ी के शब्दों में कहाँ नुक़्ता लगता है और कहाँ नहीं. अकसर ऐसा होता है कि जहाँ नुक़्ता लगना चाहिए, वहाँ तो लोग लगाते नहीं और जहाँ नुक़्ते की ज़रूरत नहीं, वहाँ इसे लगा दिया जाता है. आइए आज इसी पर बात करते हैं.

सबसे पहले तो यह बात नोट करें कि नुक़्ता संस्कृत या हिन्दी के मूल शब्दों में नहीं लगता क्योंकि संस्कृत या हिन्दी में वैसी ध्वनियाँ हैं ही नहीं. कृपया इसमें हिन्दी के "ड़" और "ढ़" को मत गिन लीजिएगा. ये दोनों स्वतंत्र अक्षर हैं और इनके नीचे लगनेवाली बिन्दी के बिना इनका अस्तित्व सम्भव नहीं. इनके नीचे बिन्दी ऐसे ही लगेगी, जैसे यहाँ दिखायी गयी है.

इसलिए पहला सूत्र यह है कि सबसे पहले यह निश्चित करें कि शब्द मूल रूप से हिन्दी का है क्या? अगर उत्तर हाँ है, तो नुक़्ता लगना ही नहीं है. मैंने बहुत बार "सफल" के "फ" के नीचे लोगों को नुक़्ता लगाते देखा है, जो सरासर ग़लत है. सफल का मतलब है स+फल यानी फल सहित. फल में कैसे नुक़्ता लगेगा? अब मुझे यह नहीं मालूम कि ZUTSHI सरनेम का मूल क्या है. इसमें नुक़्ता लगेगा और इसे "ज़ुत्शी" लिखा जायेगा.

अब अंग्रेज़ी शब्दों की बात. ध्यान दें कि केवल उन्हीं अंग्रेज़ी शब्दों में नुक़्ता लगने की सम्भावना हो सकती है, जिनमें F, PH या Z आते हों. F और PH के लिए फ के नीचे और Z के लिए ज के नीचे नुक़्ता लगा दीजिए. ध्यान रखें कि अंग्रेज़ी में "फ" का उच्चारण है ही नहीं, इसलिए वहाँ जब भी आयेगा "फ़" ही आयेगा. जिन अंग्रेज़ी शब्दों में Z हो, वहाँ "ज" के नीचे नुक़्ता लगा कर "ज़" लिखें. बस.

उर्दू में नुक़्ता वाले उच्चारण सिर्फ़ ये पाँच हैं: क़, ख़, ग़, ज़, और फ़. इसलिए आपको केवल इन पाँचों पर ध्यान केन्द्रित करना है और काॅपी में इन पाँच कैरेक्टरों से बने उर्दू शब्दों को तौलना है कि यहाँ नुक़्ता लगेगा या नहीं. अब अगर ऐसे शब्द व्यक्तियों या स्थानों के नाम हैं और आपके पास समाचार की मूल काॅपी अंग्रेज़ी में (जैसे PTI आदि के समाचार) आयी है तो काम थोड़ा आसान हो जाता है. इसलामी देशों के जिन नामों में अंग्रेज़ी का Q अक्षर आता हो, वहाँ Q के स्थान पर नुक़्ते वाला "क़" लगायें. जैसे : QAZI क़ाज़ी, QAIDA क़ायदा, QAISER क़ैसर, TARIQ तारिक़, SAQLAIN सक़लैन, QUTUB क़ुतुब, IRAQ इराक़. लेकिन इसके एकाध अपवाद भी हैं, जैसे पाकिस्तान का QUETTA शहर, जिसका उच्चारण है क्वेटा और इसमें "क" के नीचे नुक़्ता नहीं लगता.
दूसरा उच्चारण है "ख़" का. अंग्रेज़ी में प्रायः इस उच्चारण को KH से व्यक्त करते हैं. जैसे KHAN ख़ान, AKHTAR अख़्तर, BAKHT बख़्त, KHUSHBU ख़ुशबू, KHADIM ख़ादिम. इसका अपवाद है KHAR. पाकिस्तानी विदेश मंत्री बिना रब्बानी का सरनेम है खर, जिसे अंग्रेज़ी में KHAR ही लिखा जायेगा. लेकिन उर्दू में एक और शब्द है ख़ार, इसे भी अंग्रेज़ी में KHAR ही लिखेंगे. इसी तरह, एक नाम है निकहत. अंग्रेज़ी में इसे NIKHAT ही लिखेंगे, इसलिए इसे "निख़त" या "निखत" न लिखें.
तीसरा उच्चारण है "ग़" का, जिसे अंग्रेज़ी में GH से व्यक्त करते हैं: जैसे GHULAM ग़ुलाम, GHAZANFAR ग़ज़नफ़र, GHAUS ग़ौस, GHALIB ग़ालिब, GHAZALA ग़ज़ाला, GHAZAL ग़ज़ल, SAGHIR/ SAGHEER सग़ीर, ASGHAR असग़र. ध्यान रखें कि GH के लिए "ग़" केवल नामों के लिए ही लिखा जायेगा.
चौथा उच्चारण है "ज़" का, जिसके लिए अंग्रेज़ी के Z अक्षर का प्रयोग होता है. जैसे ZAIN ज़ैन, ZOHRA ज़ोहरा, ZULFIQAR ज़ुल्फ़िक़ार, HAZRAT हज़रत, AZHAR अज़हर, MUZAFFAR मुज़फ़्फ़र.
पाँचवाँ और अन्तिम उच्चारण है "फ़" का. ध्यान रखें कि उर्दू नामों में केवल F ही "फ़" का उच्चारण देता है. PH से उर्दू में "फ" का उच्चारण ही होगा और नुक़्ता नहीं लगेगा. इसलिए AFROZ अफ़रोज़, FIRDAUS फ़िरदौस, FASIH/FASEEH फ़सीह, FAISAL फ़ैसल, FAIZAL फ़ैज़ल, TUFAIL तुफ़ैल लिखा जायेगा.
उम्मीद है कि इससे उर्दू नामों में नुक़्ते की समस्या सुलझ जायेगी.

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सम्भावना या संभावना, सम्बन्ध या संबंध, हिन्दी या हिंदी?


बहुत से लोगों ने इस विषय में कई बार सवाल पूछे हैं कि सम्भावना सही है या संभावना? सम्बन्ध लिखना ठीक है या संबंध? हिन्दी या हिंदी, उत्तराखण्ड या उत्तराखंड?
दरअसल, यह सवाल काफ़ी पुराना है. और सच कहें तो यह सवाल भी हिन्दी को "आधुनिक", सरल (यानी Less Complicated) व "टेक्नाॅलाॅजी फ़्रेण्डली" (वैसे मैं फ़्रेंडली भी लिख सकता था) बनाने के दौर में ही शुरू हुआ. यह भी तर्क दिया गया कि "आधा म" या "आधा न" के मुकाबले अनुस्वार कम स्थान लेता है, इसलिए शीर्षक लगाने, कैप्शन लिखने में तो आसानी होगी ही, साथ ही "बाॅडी काॅपी" में भी कुछ जगह बचेगी, जिससे उसी स्थान में अपेक्षाकृत ज़्यादा सामग्री दी जा सकेगी. इसी स्कूल के लोगों ने उस समय उर्दू शब्दों में नुक़्ता न लगाने की पुरज़ोर वकालत भी की और अपने प्रयास में सफल भी हुए. इसी तरह, टाइपराइटर के की बोर्ड में "बटनों" की संख्या को सीमित रखने के इरादे से "हाॅकी" को "हाकी", "डाॅक्टर" को "डाक्टर", "आँटी" को "आंटी", "पाँव" को "पांव", "अँधेरा" को "अंधेरा" और "अन्धेर" को "अंधेर" लिखे जाने की शुरुआत हुई. "हँस" (Laugh) और "हंस" (पक्षी) का भेद समाप्त हो गया और यह पाठक की बुिद्ध पर छोड़ दिया गया कि वह सन्दर्भ के अनुसार तय करे कि बात हँसने के बारे में हो रही है या हंस पक्षी की. इसी तरह, उर्दू शब्द "राज़" (RAAZ) और हिन्दी शब्द "राज" (RAAJ) में नुक़्ते की अनुपस्थिति में अन्तर कर पाना असम्भव हो गया.
 
हिन्दी भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है, जो अपने आप में अत्यन्त वैज्ञानिक लिपि है.
"कवर्ग" (यानी क ख ग घ ङ के अन्त में "ङ"), "चवर्ग" (यानी च छ ज झ ञ के अन्त में "ञ"), "टवर्ग" (यानी ट ठ ड ढ ण के अन्त में "ण"), "तवर्ग" (यानी त थ द ध न के अन्त में "न") और "पवर्ग" (यानी प फ ब भ म के अन्त में "म") से ही परम्परागत देवनागरी में अनुनासिक ध्वनि को व्यक्त किया जाता है.
जैसे यदि हमें घण्टा लिखना हो तो "आधा ण" से अनुनासिक ध्वनि आयेगी, क्योंकि "घण्टा" में "ट" अक्षर "टवर्ग" का है. इसी तरह, इस वर्ग के बाक़ी अक्षरों से बनने वाले शब्दों में भी अनुनासिक ध्वनि के लिए आधा "ण" आयेगा. जैसे: डण्डा, खण्ड, कण्ठ, पण्ढरपुर आदि.
इसी तरह "तवर्ग" के शब्दों में आधा "न" से अनुनासिक ध्वनि आयेगी. जैसे: अन्त, चिन्ता, मन्थर, कन्द, मन्द, अन्धड़, बन्धन, सन्देह आदि.
"पवर्ग" से बनने वाले शब्दों में आधा "म" से अनुनासिक ध्वनि आयेगी. जैसे कम्पन, चम्बल, कम्बल, दम्भ, चम्पा, खम्भा आदि.
अब "सम्बन्ध" शब्द को लें. इसे अगर रोमन स्क्रिप्ट में लिखें तो लिखेंगे: SAMBANDH. लेकिन जब हम इसी शब्द को "संबंध" लिखते हैं, तो निस्सन्देह "सम्बन्ध" के मुकाबले यह कम स्थान घेरता है, लेकिन "संबंध" में हम M और N दोनों ध्वनियाँ अनुस्वार से ही व्यक्त करते हैं जो तकनीकी रूप से ग़लत है.
चूँकि अब "ङ" और "ञ" प्रायः सभी "की बोर्ड" से बाहर हैं और इनकी अनुनासिक ध्वनि अनुस्वार से काफ़ी निकटतम रूप से व्यक्त हो सकती है, इसलिए "कवर्ग" और "चवर्ग" के शब्दों जैसे गंगा, पंजाब, चंचल आदि शब्दों का सही उच्चारण अनुस्वार से निकल सकता है. इसलिए मेरे विचार से यहाँ अनुस्वार से काम चल सकता है.
लेकिन मैं इस मत का हूँ कि "टवर्ग", "तवर्ग" और "पवर्ग" के लिए क्रमशः "ण", "न" और "म" के प्रयोग को वापस लाया जाना चाहिए. क्योंकि इन वर्गों में अनुस्वार के प्रयोग से हम बहुत मामूली जगह बचाते हैं, पर बड़े उच्चारण दोष का ख़तरा उठाते हैं.
दूसरी बात यह कि इन वर्गों में अनुस्वार के प्रयोग से हम "की बोर्ड" के बटनों की संख्या भी नहीं घटा पाये क्योंकि आधा ण, आधा न और आधा म को "की बोर्ड" से हटाया ही नहीं जा सकता. हिन्दी के बहुत से शब्द इनके बिना लिखे ही नहीं जा सकते. जैसे: उम्मीद, निकम्मा, पुण्य, अरण्य, उन्नीस, उन्हें, पन्ना, संन्यासी आदि.
और अब टेक्नाॅलाॅजी ने भी यह सम्भव कर दिया है कि हम चन्द्र बिन्दु, नुक़्ता आदि का इस्तेमाल आसानी से कर सकते हैं तो अपनी समृद्ध उच्चारण क्षमता के लिए जानी जाने वाली हिन्दी को उसकी पुरानी गरिमा और शान-शौकत लौटाने की कोशिश क्यों न की जाय. देर आयद, दुरुस्त आयद.
अनुस्वार से जगह बच सकती है, इस तर्क से मैं क़तई सहमत नहीं हूँ. अगर आप अच्छे सम्पादक हैं तो अपने कुशल सम्पादन से आप कहीं ज़्यादा जगह बचा सकते हैं और काॅपी को कहीं ज़्यादा चुस्त बना सकते हैं.


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"कि" और "की"

प्रियंवदा
(हालाँकि वह अपना नाम प्रियंबदा लिखती हैं) रस्तोगी ने लिखा है कि उन्हें यह समझ में नहीं आता कि कहाँ "कि" लगेगा और कहाँ "की"?
प्रियंवदा जी अकेली नहीं हैं, जिन्हें यह समस्या आती है. बहुत से लोगों को यह समझ में नहीं आता कि उन्हें कहाँ "कि" लगाना चाहिए और कहाँ "की" लिखना चाहिए.
बस एक छोटी-सी बात याद रखिए और आपकी समस्या ख़त्म.
"कि" एक Conjunct की तरह इस्तेमाल होता है, जो दो वाक्यों/ वाक्यांशों को जोड़ता है. अंग्रेज़ी में जो काम Conjunct के रूप में THAT का है, हिन्दी में वही काम "कि" का है.
अब कुछ उदाहरण देखें:
मैं जानता हूँ कि आप अच्छे आदमी हैं.
यहाँ "मैं जानता हूँ" एक वाक्य है और "आप अच्छे आदमी हैं" दूसरा वाक्य है. इन दोनों को जोड़ने के लिए बीच में लाया गया "कि" और इस प्रकार बना यह वाक्य: "मैं जानता हूँ कि आप अच्छे आदमी हैं".
कुछ और उदाहरण:
"मौसम विभाग का अनुमान है कि मानसून कुछ देर से आयेगा".
यहाँ " मौसम विभाग का अनुमान है" एक वाक्य है और "मानसून कुछ देर से आयेगा" दूसरा, जिसे "कि" लगा कर जोड़ा गया है.
"मुझे गर्व है कि मैं एक भारतीय हूँ".
यहाँ "मुझे गर्व है" और "मैं एक भारतीय हूँ" को जोड़ने के लिए बीच में "कि" लगाया गया है.
"विपक्ष ने इस बात के लिए सरकार को आड़े हाथों लिया कि वह महँगाई रोकने के लिए ठोस क़दम नहीं उठा रही है".
यहाँ "विपक्ष ने इस बात के लिए सरकार को आड़े हाथों लिया" और "वह महँगाई रोकने के लिए ठोस क़दम नहीं उठा रही है"--- इन दो वाक्यों को "कि" लगा कर जोड़ा गया है.
"की" का प्रयोग वहाँ किया जाता है, जहाँ किसी संज्ञा या सर्वनाम का किसी से सम्बन्ध बताना, दिखाना या जोड़ना हो.
जैसे:
मोहन की किताब, फ़िल्म की कहानी, रोगी की हालत, स्कूल की यूनीफ़ार्म, चेहरे की चमक, जनता की आकांक्षा,

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भाइयो और भाइयों; दोस्तो और दोस्तों

दो मित्रों ने कई दिनों पहले दो प्रश्न किये थे: भाइयो सही है या भाइयों? दोस्तो सही है या दोस्तों. इन दोनों मित्रों को जवाब तबसे टलता रहा. एक कारण तो यह कि इन दिनों मैं लम्बी घुमक्कड़ी पर हूँ और आमतौर पर मैं घुमक्कड़ी के दौरान कुछ भी और करना पसन्द नहीं करता. फिर भी आपके सवालों का जवाब किसी प्रकार देने की कोिशश की. पर सारे सवालों के जवाब नहीं हो पाये. दूसरा कारण यह कि मैं प्राय: एक दिन में कोई एक पोस्ट ही डालना चाहता हूँ ताकि आपका ध्यान न बँटे. इसलिए भी कुछ प्रश्न आगे खिसक जाते हैं.
बहरहाल, अब काम की बात पर. भाइयो और भाइयों व दोस्तो और दोस्तों -- दोनों सही हैं, बस उनका इस्तेमाल अलग-अलग है. जहाँ आप भाइयों व दोस्तों को सीधे सम्बोधित कर रहे होंगे, वहाँ अनुस्वार नहीं लगेगा. बाक़ी सभी जगह अनुस्वार लगाया जायेगा.
जैसे: अंग्रेज़ो, भारत छोड़ो. (यहाँ अंग्रेज़ो में अनुस्वार नहीं लगाया गया है).
लेकिन अगर हमें लिखना हो: अंग्रेज़ों ने स्वतंत्रता सेनननियों पर बहुत ज़ुल्म किये. (यहाँ अनुस्वार लगाया गया, क्योंकि यहाँ अंग्रेज़ों को सम्बोधित नहीं किया जा रहा है).
दूसरा उदाहरण:
दोस्तो, हमें एकजुट हो कर संघर्ष करना पड़ेगा. (यहाँ वक्ता अपने मित्रों को सम्बोधित कर रहा है, इसलिए लिखा और बोला जायेगा-- दोस्तो).
लेकिन जब हम लिखेंगे: मैं अपने दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने गया ( तो अनुस्वार लगेगा).
जब नेता भाषण शुरू करते समय या कभी भी भीड़ को सीधे सम्बोधित करता है, तो कहेगा: भाइयो और बहनो.
लेकिन जब इन्हीं शब्दों को सीधे सम्बोधन के अलावा अन्यत्र कहीं भी इस्तेमाल किया जायेगा, तो कहा जायेगा: भाइयों और बहनों. जैसे: पुलिस ने हमारे भाइयों और हमारी बहनों के साथ जो बुरा सलूक किया, हम उसकी ंघोर निन्दा करते हैं.
बस एक सीधा नियम याद रखिए: जहाँ आप बहुवचन को सम्बोधित कर रहे हैं, वहाँ उसके अन्त में अनुस्वार नहीं लगेगा़.
आशा है, मैं आपको यह कठिन बात ठीक से समझा सका.


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"इनाम" और "ईमान"; "इराक़" और "ईरान"

सर्वेश जी ने पूछा है कि "इनाम" सही है या "ईनाम" और "इनामी" सही है या "ईनामी"?
मैंने देखा है कि अकसर लोगों को यह दुविधा होती है कि "इनाम" में छोटी "इ" लगेगी या बड़ी.
"
इनाम" और "इनामी" में छोटी "इ" लगेगी.
"
ईमान" और "ईमानदार" में बड़ी "ई" लगती है.
इसी तरह, अकसर लोग "इराक़" और "ईरान" को लेकर दुविधाग्रस्त होते हैं कि इनमें छोटी "इ" लगेगी या ब ड़ी? कारण यह है कि अंग्रेज़ी में ये दोनों नाम लगभग एक ही तरीक़े से लिखे जाते हैं: IRAQ और IRAN. अंग्रेज़ी के कारण ऐसी दिक़्क़तें बहुत जगह आती हैं और इनका कोई समाधान भी नहीं है.
आप तो बस इतना याद रखें कि "इराक" में छोटी "इ" और "ईरान" में बड़ी "ई" लगेगी.



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नियति, नियत और नीयत

हम हिन्दी वाले अकसर इस बात को कोई महत्व नहीं देते कि मात्राओं की समझ कितनी ज़रूरी है और ग़लत मात्राएं लगाने या ग़लत जगह मात्राएं लगा देने से शब्द का अर्थ कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है. एक उदाहरण देखिए:
ये तीन शब्द हैं: "नियति", "नियत" और "नीयत".
ये तीनों ही शब्द एक नज़र में एक-दूसरे से काफ़ी मिलते-जुलते से दिखते हैं, लेकिन इनके अर्थ बिल्कुल अलग-अलग हैं और मात्राएं लगाने में हुई ज़रा-सी असावधानी किसी वाक्य में इन शब्दों की उपस्थिति को विचित्र बना सकती है.
"नियति" का अर्थ है DESTINY, नियत का अर्थ है निर्धारित या तय या SCHEDULED या FIXED और "नीयत" का मतलब है INTENT. अब इन शब्दों के प्रयोग का एक उदाहरण देखें:
1. दिन-रात आँसू बहाते जीवन बिताना ही शायद उस अभागिन की "नियति" है.
2. कार्यक्रम "नियत" समय पर शुरू होगा.
3. उसकी "नीयत" में अचानक खोट आ गया.
ऐसे सैंकड़ों शब्द हो सकते हैं, जहाँ मात्रा के हेर-फेर से मामला बिगड़ सकता है. जैसे: "चूकना" और "चुकना".
"चुक जाना" का अर्थ है समाप्त हो जाना, अन्त हो जाना, जबकि "चूक जाना" का अर्थ है मौका खो देना.
क्या हम हिन्दी वाले इस ओर थोड़ी गम्भीरता से सोचेंगे क्योंकि आजकल हिन्दी के ज़्यादातर चैनलों ( चाहे न्यूज़ चैनल हों या मनोरंजन ), और हिन्दी के विज्ञापनों में मात्राओं की ग़लतियाँ आम हैंं.

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अभिषेक गर्ग ने पूछा है कि पानी "पिएँ", "पियें' और "पीयें" में कौन-सा सही है. इस पर विनय सिंह ने लिखा कि "पीयें" सही है. विनय जी "पीयें" बिलकुल सही नहीं है. दरअसल, मैं इस विषय पर लिखने ही वाला था कि यह मुद्दा उठ गया.
हिन्दी में जब दीर्घ "ई" का "य" से संयोग होता है तो आमतौर पर "ई" का उच्चारण लघु यानी "इ" हो जाता है. जैसे निम्नलिखित कुछ बहुवचन देखिए.
मेहरबानी से मेहरबानियाँ, मेहरबानियों,
सावधानी से सावधानियां, सावधानियों,
सीढ़ी से सीढ़ियाँ, सीढ़ियों,
शादी से शादियाँ, शादियों,
दवाई से दवाइयां, दवाइयों,
खाई से खाइयाँ, खाइयों,
भाई से भाइयों आदि.
इसी तरह पानी पीना से "पिया", "पिये", "पियें" और "पियेंगे" बनेगा. जैसे, कृपया पानी पियें, या क्या आप पानी पियेंगे?
दी (देना के अर्थ में) से दिया, दिये बनेगा जैसे : मैंने उसको पानी दिया, या क्या आपने उसे रुपये दे दिये?
लेकिन इस नियम के कुछ अपवाद भी हैं, जैसे दीया (दीपक), घीया (कद्दू). ध्यान रहे कि यहाँ "दीया" का अर्थ दीपक से है, देने की क्रिया से उसका कोई लेना-देना नहीं है.


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पिछले दिनों एक अभिनेत्री का नाम एक चैनल पर लिखा देखा: "दरक्षाँ". जिन लोगों को नहीं मालूम, उनको बता दें कि उर्दू में "क्ष" का इस्तेमाल नहीं होता. इसलिए उर्दू शब्दों में "क्ष" न लगायें. सही नाम है : "दरख्शाँ". अंग्रेज़ी स्पेलिंग है : darakhshaan.
दरअसल, कई मुस्लिम नामों में ऐसी ग़लतियाँ होती हैं. जैसे "निकहत" को अकसर "निखत" और "अतहर" को प्रायः "अथर" लिख दिया जाता है. ध्यान रखें कि उर्दू नामों में हमेशा "KH" से "ख" और "TH" से "थ" नहीं बनता.


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कई लोगों ने कई अलग-अलग शब्दों के बारे में पूछा है. उनमें से प्रायः सभी को जवाब लिख चुका हूँ, लेकिन सोचा कि सभी सवालों को एक जगह इकठ्ठा करके पोस्ट कर दूँ ताकि ज़्यादा लोग इसका फ़ायदा उठा सकें.
गौरव अग्रवाल ने पूछा कि "संन्यासी" सही है या "सन्यासी"? जवाब है, "संन्यासी" सही है और "स" पर अनुस्वार भी लगेगा और उसके बाद आधा "न" भी लिखा जायेगा. संस्कृत में मूल शब्द है "सन्न्यास" जिससे बनता है "संन्यासी". उम्मीद है भ्रम दूर हो गया होगा.
वरुण कुमार ने पूछा है "क्यूंकि" सही है या "क्योंकि". जवाब है "क्योंकि" सही है, वैसे कई इलाकों में लोग "क्यूंकि" भी बोलते हैं.
विधानचंद्र राणा ने पूछा है "सच्चाई" सही है या "सचाई" क्योंकि कई न्यूज़ चैनलों पर "सचाई" लिखा जा रहा है. जवाब है "सच्चाई" सही है लेकिन आजकल "सचाई" भी चल रहा है जो स्वीकार्य है.
मुकेश पंजेता जी ने पूछा कि "कुआं" और "धुंआ" में अनुस्वार कहाँ लगेगा? जवाब है कि दोनों शब्दों में अनुस्वार "आ" पर लगेगा, वैसे अच्छा हो कि अनुस्वार के स्थान पर चंद्रबिंदु लगायें और "कुआँ" व "धुआँ" लिखें.
राजन प्रकाश जी ने पूछा है कि "सांवैधानिक" सही है या "संवैधानिक". जवाब है, "संवैधानिक" सही है.
मनोज उपाध्याय जी ने लिखा है कि कुछ चैनलों पर उन्होंने रिपोर्टरों को सुबह तड़के के लिए कहते सुना है, "यह घटना अहले सुबह हुई." मनोज जी ने लिखा है कि यहाँ "अहले सुबह" कहना ग़लत है और इसके लिए या तो "अलस्सुबह" कहा जाय या "तड़के" बोला जाय. मनोज जी ने बिलकुल सही कहा. मेरे विचार में "अलस्सुबह" हालाँकि सही है लेकिन यह उर्दू का काफी कठिन शब्द है और बहुत से लोगों को इसे समझने में परेशानी हो सकती है, इसलिए इसे न इस्तेमाल करना ही बेहतर होगा.
इसी से मिलता-जुलता सवाल पूछा है पुनीत बाला जी ने कि "अहल" लफ़्ज़ का प्रयोग कहाँ होता है और क्या यह उपसर्ग है? जवाब है कि "अहल" उपसर्ग नहीं है. यह अरबी भाषा का शब्द है और इसका अर्थ है, वाले, मानने वाले, किसी स्थान में रहनेवाले, किसी विचार आदि के अनुयायी. जैसे: "अहले वतन" यानी वतन के लोग, वतन में रहने वाले, "अहले हिन्द" यानी हिन्दुस्तान में रहनेवाले, "अहले दीन" यानी दीन (धर्म) को मानने वाले. इसे बिलकुल सही लिखना चाहें तो "अहल-ए- वतन", "अहल-ए-हिन्द", "अहल-ए-दीन" लिखें. वैसे, "अहले वतन", "अहले हिन्द" आदि भी सही है.



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अहं और अहम

मैंने पाया है कि "अहं" और "अहम" को लेकर लोगों में काफी भ्रम है. "अहं" का अर्थ होता है EGO और "अहम" का मतलब होता है महत्वपूर्ण यानी IMPORTANT . "अहं" से बनता है अहंकार. "अहं" को लिखते समय हमेशा "ह" पर अनुस्वार लगायें. लेकिन जब महत्वपूर्ण के अर्थ को व्यक्त करना हो तो लिखें "अहम".
इसके दो उदाहरण देखें:
१. किसी के अहंको ठेस पहुंचाना अच्छा नहीं है.
२. सरकार ने अहमफ़ैसला किया है. (यानी सरकार ने महत्वपूर्ण फ़ैसला किया है).


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किसी ने पूछा था कि "हालांकि" सही है या "हांलाकि". जवाब है, "हालांकि" सही है. मनीष झा ने पूछा है कि "शुद्ध" और "विशुद्ध" का अर्थ क्या एक-दूसरे से भिन्न है और क्या दोनों शब्द संस्कृत से आये हैं. जवाब है कि ये दोनों ही शब्द संस्कृत के हैं और एक ही अर्थ व्यक्त करते हैं. वरुण कुमार ने पूछा है कि सेमी फ़ाइनल अलग-अलग लिखा जाय या जोड़ कर. मेरे ख्याल से "सेमी फ़ाइनल" या " सेमीफ़ाइनल" लिखने में कोई बुराई नहीं है. बहुत शुद्ध लिखना चाहते हैं तो "सेमी-फ़ाइनल" लिखें. लेकिन "सेमि फ़ाइनल" या "सेमिफ़ाइनल" ग़लत है.

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परसों एक हिन्दी चैनल पर महाराष्ट्र के शहर DHULIYA का नाम चल रहा था---"धुलिया". सही नाम "धुलै" है. ज़्यादातर हिन्दी चैनलों और अखबारों में "धुलै" को "धुलिया" या "धूलिया" लिखा जाता है, जो ग़लत है. इसी तरह महाराष्ट्र के दो और शहरों के नाम अकसर ग़लत लिखे जाते हैं. "सातारा" को प्रायः "सतारा" और "सोलापुर" को "शोलापुर" लिखा जाता है, जो ग़लत है. इनके सही नाम हैं --- "सातारा" और "सोलापुर". यही नहीं, "आम्बेडकर", "गावसकर" और "तेंडुलकर" भी हिन्दी में ग़लत ढंग से क्रमशः "अम्बेडकर", "गावस्कर" और "तेन्दुलकर" लिखे जाते हैं. हमारे यहाँ अखबारों और टीवी चैनलों के न्यूज़ रूम की विडम्बना यह है कि जिन नामों के सही उच्चारण लोगों को पता नहीं हैं, उनके बारे में सही जानकारी हासिल करने का कष्ट कोई करता ही नहीं है. और अगर बता भी दिया जाय तो ग़लती सुधारने की तकलीफ़ भी कोई उठाना नहीं चाहता. और यह बात सिर्फ हिन्दी के पत्रकारों पर ही लागू नहीं होती. मैं आज से बत्तीस साल पहले जब १९८० में ट्रेनी हो कर नवभारत टाइम्स, मुंबई पहुंचा, तो कुछ महीनों बाद मेरी नज़र एक मराठी अखबार पर पड़ी, जिसमें एक शहर का नाम "मीरत" लिखा हुआ था. (अंग्रेजी में स्पेलिंग होती है: MEERUT). मुझे बड़ी हैरानी हुई. मैंने उनके एक वरिष्ठ सम्पादक से कहा कि यह खबर तो यू. पी. के मेरठ शहर की है लेकिन आप के अखबार में "मीरत" छपा है. इस ग़लती को सुधारा जाना चाहिए. मुझे जवाब मिला कि हम जानते हैं कि सही नाम मेरठ है लेकिन बरसों से हम इसे "मीरत" लिखते आ रहे हैं, इसलिए अब इसे नहीं बदला जा सकता. अजीब तर्क था. ग़लती का जब पता चल जाय, उसे सुधार लेने में क्या हर्ज है?
वैसे ऐसी ज़्यादातर ग़लतियों का बड़ा कारण उनकी अंग्रेजी स्पेलिंग भी हैं. अंग्रेजी के टीवी चैनलों में होनेवाले ग़लत उच्चारण को प्रायः हिन्दीवाले आँख मूँद कर उठा लेते हैं. अब जैसे "कसाब" (KASAB) को ही लें. अंग्रेजी के लोग उसे "कसब" ही कह कर पुकारते हैं, जबकि सबको मालूम है कि सही उच्चारण "कसाब" है.

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बात सिर्फ "असरहीन" की ही नहीं, एक और प्रयोग है जो अकसर दीखता है : "नाज़ुकता". कई बार अखबारों में देखा है, "स्थिति की नाज़ुकता देखते हुए प्रशासन ने कर्फ्यू लगा दिया है." ऐसी ग़लतियाँ इधर काफ़ी बढ़ गयी हैं.
असर शब्द के बारे में तो एक बार कहा जा सकता है की यह हिन्दी में इस तरह रच-बस गया है कि लगता ही नहीं है कि उर्दू या अरबी का है. लेकिन "नाज़ुक" में तो कोई कन्फ्यूज़न की गुंजाइश नहीं.


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बेअसर, प्रभावहीन और "असरहीन" और "हैवीपन से भारीनेस" तक:
१९९०-९१ में जब मैं नवभारत टाइम्स, लखनऊ में था, एक दिन एक सहयोगी ने शीर्षक लगाया, "अमुक का असरहीन अभिनय." मैंने पूछा, भई, यह "असरहीन" क्या होता है? "असर" अरबी का और "हीन" हिन्दी का. आप इसकी जगह प्रभावहीन या बेअसर नहीं लिख सकते थे. जवाब था ज़रूर लिख सकते थे, लेकिन दिमाग़ में ऐसा कुछ खटका ही नहीं कि इसमें कुछ गड़बड़ है. अभी पिछले दिनों एक अखबार के शीर्षक में फिर "असरहीन" दिख गया. ज़ाहिर है कि बीस-बाईस साल पहले शुरू हुई "असरहीन" की यात्रा काफी प्रभावशाली तरीक़े से जारी है. दरअसल, हिन्दी लिखने में ज़्यादातर ग़लतियाँ ऐसी ही होती हैं जो बस बे-ध्यानी में हो जाती हैं. थोड़ा-सा ठहर कर सोचें तो ऐसी बहुत-सी ग़लतियों से बचा जा सकता है. दुनिया की तमाम भाषाओं के शब्दों का आप हिन्दी में बेहिचक इस्तेमाल करें, लेकिन बेहतर होगा कि दो भाषाओं के शब्दों का आधा-आधा हिस्सा जोड़ कर एक शब्द न बनायें. वर्ना तो हम एक दिन ऐसे भी प्रयोग देखेंगे : आज बहुत "हैवीपन" महसूस हो रहा है या सिर में "भारीनेस" लग रही है.


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हिन्दी में हजारों शब्दों को लेकर विवाद कई दशकों से चल रहा है कि वे पुल्लिंग हैं या स्त्रीलिंग. "सोच" और "आत्मा" दो ऐसे शब्द हैं जो मूल संस्कृत में पुल्लिंग हैं, लेकिन हिन्दी में जनसामान्य वर्ग इन्हें प्रायः स्त्रीलिंग के तौर पर इस्तेमाल करता है.

इसी तरह संस्कृत में "गरिमा", "लघिमा", "अग्नि" आदि शब्दों को पुल्लिंग माना गया है, लेकिन हिन्दी में ये सभी शब्द स्त्रीलिंग में ही प्रयोग में लाये जाते हैं. फिर कुछ ऐसे हिन्दी के शब्द हैं, जिन्हें लेकर खुद हिन्दी के बड़े कोशकार एकमत नहीं हो पाये हैं, जैसे "झंझट" शब्द को नागरी प्रचारिणी सभा के कोशकार स्त्रीलिंग मानते हैं, तो अन्य बहुत से कोशकार इसे पुल्लिंग मानते हैं. (स्रोत: ज्ञानमंडल कोश की भूमिका)

और फिर हिन्दी और उर्दू में आपस में इतना घालमेल है कि कई बार भ्रम पैदा होता है. जैसे प्याज़. बात १९८४ की है. उन दिनों मैं नवभारत टाइम्स, लखनऊ में उप-सम्पादक था. एक दिन एक खबर बनाते हुए मैंने शीर्षक लगाया, "प्याज़ महँगी हुई", तभी हमारे स्थानीय सम्पादक श्री रामपाल सिंह की नज़र उस पर पड़ गयी. वह बोले, "पंडित जी, प्याज़ महँगी नहीं, महंगा होता है." मुझे आश्चर्य हुआ. बचपन से मैं प्याज़ को स्त्रीलिंग मानता आ रहा था. मैंने फ़ौरन उर्दू-हिन्दी कोश (उन दिनों प्रायः सभी अच्छे अख़बारों के न्यूज़ रूम में उर्दू-हिन्दी, अंग्रेजी-हिन्दी और एक अच्छा हिन्दी कोश ज़रूर होता था) उठाया और रामपाल जी को दिखाया कि इसमें तो प्याज़ को स्त्रीलिंग लिखा गया है. उनहोंने कहा कि उर्दू में होता होगा, हिन्दी में तो यह पुल्लिंग ही है. फिर हिन्दी कोश देखा गया. उसमें प्याज़ को पुल्लिंग लिखा गया था.

इसलिए, यह विवाद इतना आसान नहीं कि हम-आप इसे चुटकियों में सुलझा लें. जब तक भाषा रहेगी, इस तरह के विवाद चलते रहेंगे और इन्हीं के बीच से समाधान भी निकलता रहेगा.


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त्रिवेणी प्रसाद पाण्डेय ने पूछा है: "उंगली" सही है या "अँगुली?" जवाब है: मूल संस्कृत शब्द है "अंगुलि", जिससे बिगड़ कर "अँगुली" बना. ये दोनों ही सही हैं लेकिन हिन्दी के आम इस्तेमाल में "उंगली" लिखना ही उचित रहेगा. क्योंकि अब "उंगली" ही सब जगह प्रचलन में है.

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संसार की हर भाषा उन सभी भाषाओं से शब्द लेती है, जो उसके संपर्क में आती हैं. और जो भाषाएँ अपने दरवाज़े बंद रखती हैं और किसी दूसरी भाषा के शब्दों को अन्दर नहीं आने देती हैं, वह धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं. अपने विकास क्रम में भाषाएँ कई प्रकार से पनपती, बिगड़ती, बदलती, एक-दूसरे से घुलती- मिलती, एक- दूसरे के शब्दों को ग्रहण करती हुई आगे बढती हैं. उदाहरण के तौर पर हिन्दी में तुर्की भाषा के करीब सात हज़ार से ज्यादा शब्द हैं. अरबी- फ़ारसी के भी हज़ारों शब्द हैं. अंग्रेजी शब्द तो ख़ैर बहुत ही ज्यादा हैं और नित नये-नये शब्द जुड़ते जा रहे हैं. इस प्रक्रिया में भाषा समृद्ध होती है और भाषा के विकास की यह एक स्वाभाविक, महत्वपूर्ण और आवश्यक प्रकिया है.
उदाहरण के तौर पर किताब तुर्की भाषा का शब्द है, अचार फ़ारसी का और अबीर अरबी भाषा का. इसी तरह अंग्रेजी में GURU जैसे शब्द हिन्दी से गये हैं.

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राजीव मिश्र ने पूछा है कि "दंपति" और "दंपती" में क्या सही है. मूल संस्कृत शब्द है "दम्पती". चूंकि अब ज़्यादातर लोग आधा '', आधा '' आदि के स्थान पर अनुस्वार लगाते हैं, इसलिए हम कह सकते हैं कि "दंपती" ही पूरी तरह सही है, लेकिन शायद "दंपति" अधिक प्रचलित है. "दंपति" शब्द जब आप कोश में देखेंगे तो कोश आपको निर्देशित करेगा कि "देखिए: दंपती". मतलब "दंपती" (बिलकुल शुद्ध दम्पती है) मूल और शुद्ध शब्द है लेकिन "दंपति" भी प्रचलित है.

30

राजनेता (राज+नेता) और राजनीतिज्ञ (राज+नीतिज्ञ) पर ध्यान दें. नेता का अर्थ है नेतृत्व करनेवाला, अगुआ, नायक आदि. चार-पांच लोगों के समूह का नेतृत्व करनेवाला भी उस समूह का नेता कहलायेगा. नेता ट्रेड यूनियन का भी हो सकता है, नेता किसी मुहल्ला कमिटी का हो सकता है, नेता किसी सदन का हो सकता है, देश का हो सकता है. नीतिज्ञ का अर्थ है नीति का पंडित, नीति में निष्णात.
नेता के लिए आवश्यक नहीं कि वह नीति का पंडित हो. इसलिए सामान्य POLITICIAN को राजनेता कहना ही उचित होगा. STATESMAN उसे कहते हैं जो राजनीति के कौशल में सिद्ध हो, राजनीति का पंडित हो, राजनीति का मर्मज्ञ हो. इसी राजनीतिक कौशल के लिए अंग्रेजी में शब्द है STATESMANSHIP. हर POLITICIAN को STATESMAN नहीं कहा जा सकता, वर्ना फिर इन दोनों शब्दों में क्या अन्तर रह जायगा. केवल उसी POLITICIAN को STATESMAN कहा जायगा जो राजनीतिक कौशल में सिद्ध हो.
और STATESMAN का मतलब राजपुरुष नहीं होता. राजपुरुष का अर्थ है राज्य का मंत्री या प्रधान अधिकारी या राज्य का कर्मचारी.
जहाँ तक राजनीतिक और राजनैतिक की बात है, इन दोनों शब्दों में कोई विशेष अन्तर नहीं है, लेकिन अगर हम दो शब्दों का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो उसके लिए उनमें कोई तो फ़र्क करना पड़ेगा. ऐसा तो नहीं हो सकता कि जब चाहा "राजनीतिक" लिख दिया और जब चाहा "राजनैतिक" लिख दिया. अगर इन दोनों में अन्तर कर पाना मुश्किल हो तो बेहतर है कि हर जगह "राजनीतिक" ही लिखा जाय और "राजनैतिक" को पूरी तरह छोड़ दिया जाय.

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राजनीतिक, राजनैतिक और राजनीतिज्ञ
आलोक जोशी ने पिछले दिनों कहा था कि राजनीतिक, राजनैतिक और राजनीतिज्ञ पर भी मुझे कुछ लिखना चाहिए. किसी और मित्र ने अंग्रेजी के शब्द के बारे में कुछ पूछा था. आज की टिपण्णी उसी पर:

POLITICS: राजनीति
POLITICIAN: राजनेता
POLITICAL: राजनीतिक (जैसे राजनीतिक दल, राजनीतिक विचार, राजनीतिक समीकरण, राजनीतिक उठा-पटक,राजनीतिक जोड़-तोड़, राजनीतिक इच्छाशक्ति, राजनीतिक स्थिति आदि).
POLITICAL (IN TERMS OF VALUES, ETHICS): राजनैतिक (जैसे राजनैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, राजनैतिक आदर्शों में गिरावट पर चिंता व्यक्त की गयी आदि). यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि राजनीति के "नैतिक" पक्ष को व्यक्त करने के लिए "राजनैतिक" लिखा जाना चाहिए.
STATESMAN: राजनीतिज्ञ, ऐसा व्यक्ति जिसे वर्षों का राजनीतिक कौशल हासिल हो, राजनीतिक विशेषज्ञता के लिए जाना जाता हो.
DIPLOMACY: कूटनीति
DIPLOMATIC: कूटनीतिक
DIPLOMAT: राजनयिक, (कूटनीतिज्ञ: जिसे कूटनीति में विशेष दक्षता हो)


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