शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

कौन लड़ रहा है महिलाओं के लिए फेसबुक और ट्विटर पर ?





 गुरुवार, 11 अप्रैल, 2013
gotstaredat
गुनीत नरूला, ध्रुव अरोड़ा और सारांश दुआ 'गॉटस्टेअर्ड.ऐट' चलानेवाली कोर टीम हैं.
क्या किसी ने आपको घूरकर देखा है? दिल्ली के ध्रुव अरोड़ा ने सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक पर जब ये सवाल पूछा, तो वो नहीं जानते थे कि ये सवाल हज़ारों लोगों को जोड़ेगा और एक आंदोलन की शक्ल ले लेगा. जानना चाहेंगे ये कैसे हुआ?
दरअसल ‘गॉटस्टेरड.ऐट’ ( क्लिक करें gotstared.at) नाम से शुरू हुए इस फेसबुक पन्ने के ज़रिए उन कई धारणाओं पर उंगली उठाई गई जिन्हें आम तौर पर सही माना जाता है.
मसलन, 'छेड़छाड़ लड़कियों के पहनावे की वजह से होती है', 'अगर किसी लड़की का बॉयफ्रेंड है तो वो हर तरह की शारीरिक नज़दीकी पसंद करती है', 'अगर वो किसी लड़के के ख़िलाफ शिकायत कर रही है तो ज़रूर उसे पैसे चाहिए होंगे' और 'वो महिलावादी (फेमिनिस्ट) है तो लड़कों के अधिकार छीनने में विश्वास रखती है'.
बातें बिना लाग-लपेट के कहीं गई थीं तो टिप्पणियां भी तल्ख आईं. पर धीरे-धीरे, दोस्तों की तस्वीरें देखने और स्टेटस अपडेट लिखने के लिए फेसबुक पर आनेवाले युवा, इस पन्ने के ज़रिए संजीदा बातचीत करने लगे.
अब इस पन्ने को ध्रुव और उनके दो दोस्त गुनीत और सारांश चलाते हैं. गुनीत नरूला ने बीबीसी को बताया, “हमारे पन्ने के 16,000 से ज़्यादा सबस्क्राइबर हैं, पन्ने पर नियमित तरीके से डाले जाने वाले पोस्टर काफी लोकप्रिय हैं, कुछ ही दिन पहले हमने ‘गॉटस्टेरड.ऐट’ नाम से क्लिक करें वेबसाइट भी शुरू की है और जल्द ही इंटरनेट पर शुरू हुई इस बातचीत को दिल्ली के स्कूल-कॉलेजों के कैम्पस पर ले जाने की तैयारी है.”

‘नज़र तेरी बुरी और बुर्क़ा मैं पहनूं’

gotstaredat
एक पोस्टर में अपनी बात कम शब्दों में कहने की सीमा को तोड़ने के लिए 'गॉटस्टेरडऐट' ने वेबसाइट शुरू की जिसपर लंबे लेख पोस्ट किए गए हैं.
ध्रुव एक मानवाधिकार संस्था के साथ काम करते हैं, गुनीत एक वेब डेवलपर हैं और सारांश शिक्षा के क्षेत्र में कनसलटेंट हैं. फेसबुक के अपने पन्ने पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा के अलग-अलग पहलू सामने लाने के लिए इन लोगों ने पोस्टर्स का सहारा लिया.
काम की शुरुआत के कुछ पहले पोस्टर्स में इन्होंने लिखा, "मैं महिलाओं की इज़्ज़त करता हूं, लेकिन कुछ मर्दों के इंसानों की तरह बर्ताव ना करने की वजह से अंधेरा होने के बाद महिलाएं मुझसे भी डरती हैं और पीछे मुड़-मुड़कर देखने को मजबूर हो जाती है, मैं इससे थक गया हूं."
अब इन तीनों की इस कोर टीम के साथ अब 15 और लोग काम करने लगे हैं. इनके पोस्टर्स में ‘नज़र तेरी बुरी और बुर्क़ा मैं पहनूं’, ‘कपड़े नहीं सोच को बदलो’, ‘तू करे तो स्टड, मैं करूं तो स्लट’, जैसे कई नारे लिखे गए जिनपर कई टिप्पणियां आई.
स्टेटस में सिर्फ शब्दों के ज़रिए सवाल पूछने की जगह उन्हें कलात्मक तरीके से रंगीन पोस्टर्स पर लिखकर पोस्ट करना काफी कारगर साबित हुआ.
गुनीत कहते हैं, “सोच बदलने का एक ही तरीका है – बातचीत – जब तक हम एक दूसरे को नहीं समझेंगे तब तक नए विचारों को नहीं अपना सकते, हमारे नारों का विरोध होता था तो और पाठक समर्थन में भी आते थे, बस यही बातचीत हमारा मक़सद है.”
गुनीत बताते हैं कि दिसंबर में एक क्लिक करें छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद मीडिया में इन्हीं मुद्दों पर बढ़ी चर्चा से उनके पन्ने से जुड़ने वालों की तादाद भी बढ़ी, “हालांकि ये दुखद भी था, क्योंकि यौन हिंसा और बद्तमीज़ी के मुद्दों पर इतना काम हो रहा है पर आम लोगों का ध्यान इस ओर तभी आया जब इतनी बर्बर वारदात हुई.”

सोशल मीडिया की ताकत

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दिसंबर की सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद 'ब्लैंक नाएज़' ने आम लोगों से अपने शहर को सुरक्षित बनाने की शपथ लेने की मांग की. लोगों ने अपनी शपथ के साथ तस्वीरें भेजीं.
ऐसी ही एक कोशिश करीब 10 साल पहले भी शुरू हुई. अपने परिवार से दूर एक नए शहर में कॉलेज में पढ़नेवाली छात्रा ने सोचा कि वो सड़क पर कितना सुरक्षित महसूस करती है?
इस एक सवाल ने इस बार ब्लॉग की शक्ल ली. बैंगलोर में जस्मीन पथेजा के कम्प्यूटर से शुरू हुआ क्लिक करें ‘ब्लैंक नॉएज़’.
जस्मीन ने बीबीसी को बताया, “पिछले दस सालों में कई लोग हमारे साथ जुड़े, और इनके साथ मिलकर हमने अपना काम इंटरनेट पर बातचीत से आगे ले जाने की कोशिश की, कभी बातचीत के ज़रिए, कभी प्रदर्शनों के रूप में तो कभी क़ानूनी मदद दिलाने में मदद कर, और अब जल्द ही हम एक संगठन के तौर पर और व्यवस्थित तरीके से अपना काम आगे बढ़ाएंगे.”
जस्मीन ने कहा कि वो कई तरीकों से आवाज़ उठाते रहे हैं. एक मुहिम के तहत उन्होंने महिलाओं से उनके वो कपड़े मांगे गए जो उन्होंने उस वक्त पहने थे जब उनके साथ छेड़छाड़ या बद्तमीज़ी की गई हो, मक़सद था ये जानना कि कपड़ों का छेड़छाड़ से क्या संबंध है.
ताज़ा मुहिम में देशभर से लोगों को एक सुरक्षित शहर की शपथ लेने की मांग की गई है. इसशपथ को एक पोस्टर पर लिखकर उसके साथ अपनी तस्वीर भेजनी हो. इसकी सोच दिल्ली में दिसंबर में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना से आई, जिसने शहर को सुरक्षित बनाने में हर व्यक्ति की भूमिका पर ध्यान केन्द्रित किया.

पश्चिमी देशों का असर

gotstared.at
सिर्फ नारे लिखने की जगह ये सभी संगठन अपनी बात रखने के लिए कलात्मक रास्ते चुन रहे हैं.
पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत में सोशल मीडिया नया है और उससे जुड़नेवाले लोगों की तादाद कम. ब्रिटेन में ‘एव्रीडेसेक्सिज़म’ ( क्लिक करें EverydaySexism) नाम का ये ब्लॉग लोगों में बहुत लोकप्रिय हुआ है.
26 वर्षीय महिला लौरा अपने इस ब्लॉग के ज़रिए रोज़मर्रा ज़िन्दगी में महिलाओं के ख़िलाफ भेदभाव के ज़ाहिर और छिपे अनुभवों का संकलन बना रही हैं.
अबतक 20,000 महिलाओं के अनुभवों को अपनी वेबसाइट पर डाल चुकीं लौरा के मुताबिक उनकी कोशिश है ये दिखाने की कि विकसित समाज में भी ऐसा भेदभाव बहुत प्रचलित है.
उन्ही की कोशिश से प्रभावित हो भारत में भी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर क्लिक करें @indiansexism हैंडल से ट्विटर पर बातचीत की एक कोशिश शुरू की गई है.
इसके फॉलोअर्स अभी 500 ही हैं, लेकिन सोशल मीडिया की बातचीत कब खुली बहस में बदल जाए, ये कह पाना मुश्किल है.
(खबरों, विश्लेषण और रिपोर्टों के लिए आइए हमारे क्लिक करें फेसबुक पन्ने पर और फॉलो कीजिए हमें क्लिक करें ट्विटर पर भी.)

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