डॉ. सुषमा जादौन
सहायक प्राध्यापक (हिन्दी)
शास. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भेल, भोपाल

हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावली की निर्माण प्रक्रिया


हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावली प्रयोजनमूलक हिन्दी का महत्वपूर्ण अंग है। इस शब्दावली ने हिन्दी को ज्ञान, विज्ञान प्रषासन, वाणिज्य और जनसंसार की भाषा बनने का गौरव प्रदान किया है। साहित्यिक भाषा से राजभाषा बनने की यह यात्रा अनेक सोपान पार कर यहाँ तक पहुँची है। पारिभाषिक शब्दों का निर्माण, निर्माण के आधार, शब्दावली का महत्व इस प्रक्रिया द्वारा समझा जा सकता है। यह शब्दावली हिन्दी की सम्मान वृद्धि में सहायक सिद्ध हुई है। यह हमारी गौरवशाली उपलब्धि है।

विषय परिचय

हिन्दी भाषा का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। ग्रामीण हों या शहरी, पढे लिखे हों या अनपढ़, व्यवसायी, अध्यापक, डॉक्टर या वकील हों, हिन्दी भाषा के बिना किसी का काम नहीं चलता है। यह भाषा इस देश की धडकन है। सामान्य व्यवहारों की भाषा से साहित्यिक भाषा तक हिन्दी ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। सन् 1950 में हिन्दी को राजभाषा का स्थान प्राप्त हुआ। हिन्दी अब सरकारी कामकाज की भाषा बन गई। स्वतंत्रता से पूर्व शासकीय कार्य अंग्रेजी भाषा में सम्पन्न किए जाते थे। अंग्रेजी से पूर्व राजभाषा फारसी थी। ‘‘ जैसे-जैसे राजतंत्री परम्पराएँ बिखरती गई अनेक देशों में जनतांत्रिक व्यवस्थाएँ उभरकर सामने आई तो उन्होंने अपने-अपने यहाँ बोली तथा समझी जाने वाली प्रमुख जनभाषा को राजभाषा को पद प्रदान किया।1 इसी क्रम में स्वाधीन भारत के संविधान के अनुसार केन्द्र सरकार के कामकाज के लिए देवनागरी में लिखित हिन्दी को 26 जनवरी 1950 को भारत की राजभाषा घोषित किया गया।
राजभाषा का उत्तरदायित्त्व ग्रहण करते ही हिन्दी भाषा साहित्य से इतर, न्याय, विज्ञान, वाणिज्य, प्रशासन, जनसंचार, विज्ञापन, अनुवाद एवं रोजगार की भाषा बन गई। कार्यालयीन, कामकाजी और व्यावहारिक भाषा के रूप में हिन्दी की नयी पहचान बनी। इसे हिन्दी का प्रयोजनीय पक्ष कहा गया। तब से आज तक हिन्दी की प्रयोजनीयता पर कार्य हो रहे हैं। अथक प्रयासों से हिन्दी अपने सभी पक्षों, सभी क्षेत्रों में सफल हो रही है। सबसे पहले तो उसे ऐसी शब्दावली विकसित करनी पडी जो न्याय, जनसंचार, पत्रकारिता, मीडिया, विज्ञान और विज्ञापन की आवश्यकता को पूर्ण कर सके। यही शब्दावली पारिभाषिक शब्दावली कही जाती है।

पारिभाषिक शब्दावली : आशय

शब्द से आशय वर्गों के सार्थक समूह से है। ‘‘मनुष्य जगत के व्यवहार, चिन्तन-मनन और भावन की सभी स्थूल-सूक्ष्म अभिव्यक्तियाँ शब्द के अर्थाभाव से चरितार्थ होती है। तत्त्वत : शब्द और अर्थ अभिन्न है। इसलिए महाकवि तुलसीदास कहते हैं- गिरा अरथ जल बीच सम कहियत भिन्न न भिन्न।’2 परम्परा, परिस्थिति और प्रयोग से शब्द और उनका अर्थ जीवित रहता है। शास्त्र, विशिष्ट विषय अथवा सिद्धान्त के सम्प्रेषण के लिए सामान्य शब्दों के स्थान पर विषिष्ट शब्दावली की आवश्यकता होती है। यही शब्दावली पारिभाषिक शब्दावली कहलाती है। कुछ विद्वान इसे तकनीकी शब्दावली कहते हैं।
डॉ. माधव सोनटक्के इसे ‘ज्ञान विज्ञान की असीम परिधि को व्यक्त करने वाली शब्दावली’3 कहते हैं वहीं डॉ. सत्यव्रत दैनिक जीवन में नए विचार और वस्तुओं के लिए नए शब्दों के आगमन को पारिभाषिक शब्द मानते हैं। पारिभाषिक शब्द का अर्थ है- जिसकी परिभाषा दी जा सके। परिभाषा किसी विषय, वस्तु या विचार को एक निश्चित स्वरूप में बाँधती है। सामान्य शब्द दैनिक व्यवहार में, बोलचाल में प्रयुक्त होते है। जैसे दाल, चावल, कमरा, घर, यात्रा, नदी पहाड़ आदि। पारिभाषिक शब्द विषय विषेष में प्रयुक्त होते हैं। जैसे- खाता, लेखाकर्म, वाणिज्य, प्रबन्ध, लिपिक, वेतन, सचिव, गोपनीय आदि। ये शब्द वाणिज्य और प्रशासन के पारिभाषिक शब्द हैं। प्रशासन शब्दकोश में लिखा है- ‘‘पारिभाषिक शब्द का एक सुनिश्चित और स्पष्ट अर्थ होता है। किसी विषेष संकल्पना या वस्तु के लिए एक ही शब्द होता है, विषय विषेष या संदर्भ में उससे हटकर उसका कोई भिन्न अर्थ नहीं होता।’’4
डॉ. भोलानाथ तिवारी ने लिखा है-‘‘ पारिभाषिक शब्द ऐसे शब्दों को कहते हैं जो रसायन, भौतिक, दर्शन, राजनीति आदि विभिन्न विज्ञानों या शास्त्रों के शब्द होते हैं तथा जो अपने अपने क्षेत्र में विशिष्ट अर्थ में सुनिश्चित रूप से परिभाषित होते हैं। अर्थ और प्रयोग की दृष्टि से निश्चित रूप से पारिभाषित होने के कारण ही ये शब्द पारिभाषिक कहे जाते है।’’5 कमलकुमार बोस ने पारिभाषिक शब्द को इस प्रकार समझाया है-‘‘ पारिभाषिक शब्द से तात्पर्य उन सारी शब्दाभिव्यक्तियों से है जो नव्य शास्त्र, प्रशासन, विज्ञान और व्यवहार में विशिष्ट अर्थ के लिए प्रयुक्त होती है।’’6 इस प्रकार विषय विशेष में प्रयुक्त होने वाला विशिष्ट शब्द पारिभाषिक शब्द कहलाता है।

पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण

पारिभाषिक शब्दावली पारिभाषिक शब्दों का समूह है। ये पारिभाषिक शब्द-विद्वान मंडली द्वारा बनाए जाते हैं। हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावली हिन्दी शब्दों का संकलन नहीं है। यह अंग्रेजी शब्दों के पर्याय के रूप में निर्मित की गई है क्योंकि जब कोई भाषा-समाज स्वयं ज्ञान विकसित करने के बजाय किसी भाषा-समाज से तकनीकी ज्ञान ग्रहण करता है तो उसे उस भाषा-समाज की शब्दावली भी ग्रहण करनी पड़ती है। इस शब्दावली के आधार पर फिर वह अपनी भाषा में पर्यायों का निर्माण करता है। इस प्रकार पर्याय निर्माण की संकल्पना में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अनुवाद प्रक्रिया निहित है क्योंकि मौलिक विषेषज्ञ ज्ञान और अनुवाद पर्याय के बीच एक मध्यस्थ शब्दावली की स्थिति रहती है, जैसे भारत के संदर्भ में अंग्र्रेजी शब्दावली मध्यस्थ शब्दावली की भूमिका निभा रही है।’’7 इस प्रकार शब्दावली का निर्माण सरल-प्रक्रिया नहीं है। अनेक मत, सिद्धान्त, प्रयोग और उपयोगिता का आधार लेकर पारिभाषिक शब्दावली निर्मित की गई। दो अलग-अलग संस्कृति में शब्दों के पर्याय निश्चित करना अत्यंत कठिन कार्य रहा है किन्तु आधुनिक ज्ञान और विज्ञान के संप्रेषण के लिए सांस्कृतिक परम्परा का त्याग भी करना पड़ता है। भारतीय संविधान में राजभाषा के रूप में हिन्दी की स्वीकृति के पश्चात् यह तय किया गया कि अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी की ज्ञान विज्ञान तथा प्रषासन की शब्दावली तैयार की जाए जिससे प्रशासनिक कार्यों, शिक्षा तथा न्याय के लिए विदशी भाषा के स्थान पर हिन्दी का प्रयोग किया जा सके।
पारिभाषिक शब्दों का निर्माण सृजन, ग्रहण, संचयन एवं अनुकूलन जैसी चार प्रक्रियाओं से गुजर कर हुआ है। डॉ. रघुवीर ने प्रत्येक अंग्रेजी शब्द के लिए संस्कृत व्याकरण के अनुसार शब्द गढ़े। उन्होंने अरबी, फारसी, देशज शब्दों के स्थान पर संस्कृत का आधार लेकर नए शब्दों का निर्माण किया। उन्होंने समनुमोदन, वज्रचूर्ण,कठोराकिनी, समरूपण, जैसे शब्द बनाए।8 अफीम के लिए अहिफेन और सीमेंट के लिए वज्रधातु जैसे शब्द प्रचलन में नहीं आ पाए। डॉ. माई दयाल जैन ने डॉ. रघुवीर द्वारा बनाए शब्दों के सम्बन्ध में लिखा है-
  • (१) हमें कम से कम संख्या में अत्यंत आवश्यक अन्तर्राष्ट्रीय पारिभाषिक शब्दों को अपनाना चाहिए।
  • (२) उनमें ध्वनि आदि का हेर फेर हमारी भाषा के अनुसार होना चाहिए।
  • (३) उनसे नए शब्द हिन्दी या दूसरी प्रादेषिक भाषाओं के व्याकरण के अनुसार ही बनाने चाहिए।9

ग्रहण

पारिभाषिक शब्द बनाते समय यह भी स्मरण रखा गया कि यदि तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी शब्द पहले से किसी धारणा का व्यक्त करने में सक्षम हों तो नया शब्द गढ़ने के स्थान पर उस शब्द को ही स्वीकार कर लिया जाए। अंग्रेजी के मोटर, स्टेशन, टिकट, सल्फर, पोटेशियम, नाइट्रोजन, मीटर, ग्राम, टेलीफोन, इंजेक्शन, ब्यूरो, कमीशन, ट्रेक्टर, प्रोटीन, रेफरी, हॉकी, कैरम, क्रिकेट, आउट, फॉलोआन, कम्प्यूटर, माउस, कीबोर्ड, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर जैसे अनेक शब्दों को स्वीकार कर लिया गया।
अरबी, फारसी शब्दों को भी प्रचलन, संप्रेषण और प्रयोग की सुविधा के आधार पर स्वीकार किया गया। फरार, गालीगलौज, हिसाब, हवाई-सर्वेक्षण करारनामा, हमलावर, मकान-किराया, वकालत, गैर जमानती वारंट जैसे शब्द प्रशासनिक शब्दावली में स्वीकृत हुए। पारिभाषिक शब्दावली में निर्माण के साथ-साथ ‘ग्रहण’ की प्रक्रिया को भी पूरा महत्त्व दिया गया। ‘ग्रहण’ करते समय अंग्रेजी का प्रत्येक शब्द स्वीकार नहीं किया गया। कम्प्यूटर शब्द यथावत ले लिया गया। किन्तु कम्प्यूटराइजेशन नहीं। इसके लिए कम्प्यूटरीकरण शब्द गढ़ा गया। इस तरह हिन्दी और भारतीय भाषाओं की पारिभाषिक शब्दावली को दो स्रोतों से शब्द ग्रहण करने पडे़ है। विज्ञान-तकनीकी क्षेत्र में अंग्रेजी से लेकिन कानून, प्रशासन, राजनीति से संबंधित कई शब्द अब हिन्दी के ही बन गए हैं।10

संचयन

संचयन से आशय उस प्रक्रिया से है जिसके अन्तर्गत भारतीय भाषाओं उपभाषाओं तथा बोलियों के उपयुक्त शब्दों का संचय पारिभाषिक शब्द के रूप में किया जाता है। इसमें चयन, निश्चयन तथा प्रयोग द्वारा संकलन की प्रक्रिया अपेक्षित है। अपनी भाषा की बोली, उपभाषा तथा प्रान्तीय भाषाओं में प्रचलित शब्दों में से आवश्यकतानुरूप शब्दों का चयन किया जा सकता है। ....’’विद्वानों ने संचयन के माध्यम से अनेक शब्दों में से एक सही शब्द चुनकर पारिभाषिक शब्दावली को समृद्ध किया है। डॉ. रघुवीर के बाद शब्दावली आयोग, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, राजभाषा आयोग और राज्यों के हिन्दी मंडल ने पारिभाषिक शब्द निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। इन्होंने समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाया और हिन्दी भाषा को गति प्रदान की इन सबने माना कि ‘‘हमारी पूरी शब्दावली अन्तर्मुखी होनी चाहिए न कि वह हिन्दी के नाम से हो या विदशी शब्दावली हो। भाषा-विज्ञान की दृष्टि से भी यह आवश्यक है कि भारत की प्राचीन, मध्यकालीन आधुनिक भाषाओं और विदेशी भाषाओं के शब्द आवश्यकतानुसार अपनाती हुई हिन्दी अपनी ही भीतर से विकसित हो। हिन्दी की वही वृद्धि और उन्नति स्थायी प्राकृतिक और स्वाभाविक होगी दूसरी सभी प्रकार की वृद्धि और उन्नति अप्राकृतिक और बनावटी होगी।11 संचयन की प्रक्रिया समाज-विज्ञान की पारिभाषिक शब्दावली के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण मानी गई है।

अनुकूलन

पारिभाषिक शब्द निर्माण में ग्रहण, संचयन के साथ-साथ अनुकूलन भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। अनुकूलन से आषय है पूर्व प्रचलित शब्दों को पारिभाषिक शब्द के रूप में अनुकूलन। नए, किलिष्ट, संस्कृतनिष्ठ शब्दों के स्थान पर पूर्व प्रचलित शब्द को पारिभाषिक शब्द के रूप में शब्दानुकूलन भी एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। जैसे एंजिन, लैन्टर्न, एकेडमी, ट्रेजेडी क्रमशः इंजन, लालटैन, अकादमी, त्रासदी में बदल गए। दो भाषाओं के मध्य संधि अथवा समासीकरण भी अनुकूलन ही है। कम्प्यूटरीकरण, अपीलीय, कलैंडर वर्ष आदि शब्द इसी अनुकूलन की प्रक्रिया के अर्न्तगत बने है। हिन्दी और अंग्रेजी में संस्कृति और जीवन में साम्य नहीं है किन्तु हिन्दी ने अनेक अंग्रेजी शब्दों को समाहित कर लिया है उन्हें परिवर्तन, सशोधन के पश्चात् स्वीकार करना व्यावहारिक होगा। कॉलेज, पुलिस, सुनामी शब्द का स्वीकार्य इसी अनुकूलन प्रक्रिया का परिणाम है।

शब्द-संग्रह

हिन्दी भाषा जनभाषा है। साहित्यिक भाषा के पूर्व ही यह दैनिक व्यवहार और बोलचाल की भाषा बन चुकी थी। पारिभाषिक शब्द निर्माण में शब्द-संग्रह भी महत्त्वपूर्ण हैं नए शब्द बनाने में अनावश्यक धन, श्रम और समय नष्ट करने के स्थान पर जन-सामान्य के बीच में प्रचलित शब्दों का संग्रह किया जाना भी महत्त्वपूर्ण है। ’’हमारी शब्दावली न तो लोह-जाकट के समान कस देने वाली होनी चाहिए और न उसमें इतनी स्थिरता होनी चाहिए कि वह भविष्य में ठहरे हुए पानी के समान सड़ जाए या सूखकर मर जाए। किसी एक दृष्टिकोण के आधार पर बनी शब्दावली अधूरी और लंगड़ी होगी।12
इस दिशा में भी बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ है। भरपाई, भुगतान, भूलचूक जोड़ना, वसूली, पतालेखी, दाखिला, लाभ, फायदा, हवाई अड्डा, जोत, भत्ता, छूट, कहासुनी, शौकिया, गोला-बारूद, चिढ़, खीज, अनाम, गुमनाम, अर्जी, मनमाना, बकाया, आमद, तोपखाना, पारखी, बट्टे पर, कुर्की, नीलामी, पिछड़ा वर्ग, बिल्ला, सौदा, तहखाना, धमाका, झाँसा, छाप, ठप, टूटफूट ब्यौरा, पताका, हथकड़ी, पक्के नियम, बटोरन जैसे अनेक शब्द जनभाषा से संग्रह कर पारिभाषिक बनाए हैं। ‘‘इस जन-भाषा में उत्तर भारत में पुराने काल से चले आनेवाले सभी उद्योगों और व्यवसायों के पारिभाषिक शब्द न केवल भरे पडे़े हैं, वरन् उनमें समय-समय पर नयी-नयी परिस्थितियों और प्रभावों के कारण नए-नए शब्द भी बनते रहे हैं। ..... भाषा विज्ञान की दृष्टि से उनमें कोई दोष नहीं है। इन शब्दों का स्थान न तो अन्तर्राष्ट्रीय शब्द ले सकते हैं और न संस्कृत निष्ठ शब्द। ये शब्द देश की अनमोल सम्पत्ति हैं और किसी भी कारण से इनकी उपेक्षा करना अपनी भाषा को हानि पहुँचाना है।’13

निष्कर्ष

नए शब्दों के प्रयोग से हिन्दी के व्यावहारिक, कामकाजी और प्रशासनिक क्षेत्र में प्रगति हुई है। हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने में पारिभाषिक शब्दावली का महत्व पूर्ण योगदान है। इसी शब्दावली की सहायता से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हिन्दी में कार्य करना संभव बनाया है। ये शब्द एकार्थी सुनिश्चित, सरल और प्रभावी होते है।
कृत्रिम निर्माण, अनुकूलन, एकरूपता स्पष्ट अर्थवत्ता तथा स्वीकरण के द्वारा ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं के लिए लगभग 08 लाख शब्द गढ़े गए हैं। विधि शब्दावली, मीडियाशब्दावली, प्रशासनिक शब्दावली, अन्तरिक्ष शब्दावली, मानविकी एवं समाज विज्ञान की पारिभाषिक, शब्दावली प्रकाशित एवं प्रचलित हो चुकी हैं। आयोग द्वारा कृषि, पशु-चिकित्सा कम्प्यूटर-विज्ञान, धातु-कर्म, नृ-विज्ञान, ऊर्जा, खनन, इंजीनियरी, मुद्रण-इंजीनियरी, रसायन इंजीनियरी, इलेक्ट्रानिकी, वानिकी, लोक-प्रशासन, अर्थ-शास्त्र, डाक-तार, रेलवे, गृह-विज्ञान आदि विषयों के शब्द भी बनाए हैं। निरन्तर प्रयोग से इनकी अर्थवत्ता सिद्ध हो चुकी है। पारिभाषिक शब्दावली हिन्दी के प्रयोजनीय पक्ष के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

संदर्भ

1. प्रयोजनमूलक हिन्दी : रघुनंदन प्रसाद शर्मा, भूमिका से उद्धृत
2. प्रयोजनमूलक हिन्दी : कमल कुमार बोस, पृ.05.
3. प्रयोजन मूलक हिन्दी : माधव सोनटके पृ.01.
4. प्रशासन शब्दकोष : म.प्र. का प्रकाशन 1986 पृष्ठ भूमिका से उद्धृत
5. प्रयोजन मूलक हिन्दी : डॉ. माधव सोनटके पृ.02.
6. वही पृष्ठ 2 से उद्धृत
7. वृहत् प्रशासन शब्दावली 2001 पृष्ठ-VI
8. प्रशासनिक शब्दावली 2002 भूमिका से उद्धृत
9. हिन्दी शब्द-रचना : माईदयाल जैन पृष्ठ-216
10. वाणिज्य शब्दाकोष, उद्धृत हिन्दी शब्द रचना पृष्ठ-221
11. प्रयोजन मूलक हिन्दी : माधव सोनटक्के पृष्ठ-12
12. हिन्दी शब्द रचनाः माईदयाल जैन पृष्ठ 244
13. प्रयोजन मूलक हिन्दी डॉ. देवेन्द्र नाथ शर्मा के विचार पृ. 13