रविवार, 6 जुलाई 2014

हिन्दी पत्रकारिता में अनुवाद: शब्दानुवाद




 

 

(पिछले लेख से आगे) मैंने इस बात की चर्चा की थी कि एनडीटीवी के प्रियदर्शनजी ने तीन शब्दों (वस्तुतः पदबंधों या फ्रेजेज), ‘फैबुलस फोर’, ‘यूजर फेंडली’ तथा ‘पोलिटिकली करेक्ट’, का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया था कि क्या अनुवाद हेतु इनके लिए हिन्दी में कोई उपयुक्त शब्द नहीं हैं ? मेरा अनुमान है कि उनका सवाल वस्तुतः अपनी ही न्यूज मीडिया (समाचार माध्यम) की बिरादरी के प्रति संबोधित है । ये सवाल क्यों उठा है ? शायद इसलिए कि आजकल मीडिया के लोग या तो सही-सही शब्द अपने अनुवाद में इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, या बिलाझिझक धड़ल्ले से अंग्रेजी के ही शब्द यथावत् प्रयोग में ले रहे हैं ।
क्या वाकई में हिन्दी इतनी कंगाल है कि उसमें समुचित अभिव्यक्ति के लिए शब्द ही नहीं हैं ? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए सर्वप्रथम मैंने उक्त तीनों पदबंधों के लिए हिंदी में समुचित तथा तुल्य पदों/पदबंधों को खोजने की कोशिश की । मेरी कठिनाई शुरू हुयी ‘फैबुलस फोर’ से । मेरे शब्दकोशों में ‘फैबुलस’ के अर्थ अवश्य मिलते हैं और वे भी कुछ हद तक परस्पर भिन्न-भिन्न (जैसे मिथकीय, पौराणिक, अद्वितीय, चामत्कारिक, असाधारण आदि) । परंतु ‘फैबुलस फोर’ एक सुस्थापित पदबंध के रूप में उन शब्दकोशांं में स्थान नहीं पा सका है । अंतरजाल (इंटरनेट) की शरण में जाने पर मुझे पता चला कि यह तो अलग-अलग प्रसंगों में परस्पर भिन्न अर्थों में प्रयुक्त हुआ है, यथा स्वेडन के एक गायकदल के उन चार गीतों के लिए समीक्षकों ने ‘फैबुलस फोर’ नाम दिया जो कई माह तक शीर्षस्थ 10 गीतों में शामिल रहे (1966-67) । यानी वे असाधारण चार या अद्वितीय चार गीत कहलाने लगे । इसके अलावा साठ के दशक में ‘बीटल’ कहे जाने वाले चार गायकों के दल को भी ‘फैबुलस फोर’ का नाम दिया गया था । इसी प्रकार 1991 में प्रदर्शित एक अमेरिकी चलचित्र का नाम भी ‘फैबुलस फोर’ रखा गया था, क्योंकि यह चार असाधारण श्रेणी के कुश्तीबाजों की कहानी पर आधारित थी । और भी कई दृष्टांत देखने को मिले हैं । अभी कल-परसों जब मैं अपने हिन्दी तथा अंग्रेजी अखबार पढ़ रहा था तो उसमें चार क्रिकेटरों (सचिन, द्रविण, लक्ष्मण तथा गांगुली) को ‘फैबुलस फोर’ और संक्षेप में ‘फैब फोर’ कहा गया था । अब आप ही निष्कर्ष निकालिए कि उक्त पदबंध के लिए हिन्दी में क्या लिखा जाये । जाहिर है कि यह पदबंध प्रसंगभेद के अनुरूप लीक से हटकर कुछ अद्वितीय-से लगने वाले चार जनों/वस्तुओं को इंगित करता है, और तदनुसार उसे चामत्कारिक/असाधारण/अद्वितीय या कुछ इसी प्रकार की चौकड़ी अथवा चौगड्डा कहा जा सकता है । तात्पर्य यह है कि क्या उचित होगा इसे प्रसंग को ठीक-से समझ कर ही तय किया जा सकता है और स्वयं सार्थक शब्द/पदबंध खोजे/रचे जा सकते हैं ।
अब आइये अगले पदबंध ‘यूजर फेंडली’ पर । इस पदबंध से मेरा परिचय सर्वप्रथम तब हुआ जब मुझे भौतिकी के साथ-साथ कंप्यूटर विज्ञान पढ़ाने का अवसर अपनी शिक्षण संस्था में मिला था । मेरी जानकारी में यह वस्तुतः कंप्यूटरों के संदर्भ में ही सबसे पहले इस्तेमाल हुआ है, और ये बात मेरी अंग्रेजी डिक्शनरी भी कहती है । अदि आप कंप्यूटरों के विकास पर नजर डालें तो पायेंगे कि आरंभ में उनको प्रयोग में लेना हर किसी के बस में नहीं होता था । उनके प्रयोग की विधि के लिए समुचित प्रशिक्षण की आवश्यकता होती थी । समय के साथ उनकी कार्यप्रणाली में परिवर्तन एवं सुधार होता गया और उनके प्रयोग के लिए अंग्रेजी शब्दों पर आधारित निदेशात्मक भाषाओं का विकास हुआ । इस प्रगति के बाद भी हर किसी के लिए उन्हें प्रयोग में लेना संभव नहीं था । समुचित जानकारी, प्रशिक्षण तथा अध्यास की तब भी आवश्यकता रहती थी । पर आज स्थिति एकदम बदल गयी है । उन्हें प्रयोग में लेना कितना सरल या कठिन है इस भाव को व्यक्त करने के लिए ही इस पदबंध का प्रयोग किया जाने लगा । और आज इसने कई अन्य क्षेत्रों में भी अपनी पैठ बना ली है । वास्तव में ‘यूजर फेंडली’ यह स्पष्ट करता है कि किसी युक्ति, उपकरण, क्रियाप्रणाली अथवा साफ्टवेयर को प्रयोग में लेना कितना सरल है । अब सोचा जा सकता है कि इस भाव को कैसे व्यक्त किया जाये ।
भारत सरकार के वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग ने ‘यूजर फेंडली’ के लिए ‘उपयोक्ता मैत्रीपूर्ण’ सुझाया है । मुझे यह पदबंध संतोषप्रद नहीं लगता है । ऐसा प्रतीत होता है कि आयोग का जोर शाब्दिक अनुवाद पर रहता है न कि भावाभिव्यक्ति पर । इस प्रकार शब्द के लिए शब्द के सिद्धांत पर आधारित अनुवाद कभी-कभी बेहूदा और निरर्थक हो सकता है, जैसा कि ‘गूगल’ पर उपलब्ध अभी विकसित हो रहे ‘अनुवादक’ साफ्टवेयर के माध्यम से प्राप्त अनुवाद के साथ देखा जा सकता है । मेरी राय में ‘यूजर फेंडली’ के लिए सीधे तौर पर ‘सुविधाजनक’ शब्द प्रयोग में लेना पर्याप्त है । और यदि थोड़ा बेहतरी चाहें तो ‘सुविधाप्रदायक’ ठीक होगा । मुझे लगता है कि अंग्रेजी के सामने हम हिंदुस्तानी इस कदर नतमस्तक रहते हैं कि अनुवाद के समय उसके वाक्यों/वाक्यांशों के निहितार्थ को समझकर उसे अपने तरीके से व्यक्त करने की भी हिम्मत नहीं कर पाते हैं । हमारा जोर तो इस पर होना चाहिए कि कही-लिखी गयी बात को अपनी भाषा में अपने शब्दों में हम बिना अर्थ खोये कह पा रहे कि नहीं ।
आइये अब आरंभ में उल्लिखित तीसरे पदबंध ‘पोलिटिकली करेक्ट’ की बात करें । मैं नहीं समझ पाया कि यह उदाहरण संबंधित लेखक ने क्या सोचकर दिया । क्या इसके अर्थ ‘राजनैतिक दृष्टि से उचित/मान्य/स्वीकार्य’ नहीं हैं ? अथवा इसके बदले ‘सियासी तौर पर सही’ कहना ठीक नहीं होगा ? तब समस्या क्या है ? इन वाक्यांशों को सोचने या समझने में कौन सी खास मेहनत करनी पड़ रही है । हां, समस्या तब अवश्य होगी जब शब्द के लिए शब्द वाले सिद्धांत पर हमारा जोर रहेगा । पर किसी भी भाषा में वैसा अनुवाद न तो सदैव संभव हो सकता है और न ही वह अनिवार्यतः वांछित होगा ।
अभी बहुत कुछ इस विषय पर कहना है, अतः चर्चा जारी रहेगी । – योगेन्द्र
Posted by योगेन्द्र जोशी
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