सोमवार, 28 जुलाई 2014

मीडिया हिन्दी और नव मध्यमवर्ग-- राम शरण जोशी




प्रस्तुति-- राकेश गांधी ,दक्षम द्विवेदी

धर्मवीर स्मृति हिन्दी महिमा व्याख्यानमाला के अंतर्गत बुधवार, 30 दिसंबर, 2009 को सातवां व्याख्यान 'मीडिया, हिन्दी और नवमध्यवर्ग' विषय पर सुपरिचित पत्रकार प्रो0 रामशरण जोशी ने दिया। इसकी अध्यक्षता की इग्नू के प्रोफेसर और मीडिया विशेषज्ञ डॉ0 जवरीमल्ल पारख ने तथा समारोह के मुख्य अतिथि थे कर्नाटक के पूर्व राज्यपाल एवं हिन्दी भवन के अध्यक्ष श्री त्रिलोकीनाथजी चतुर्वेदी। यह व्याख्यान वरिष्ठ आलोचक डॉ0 निर्मला जैन के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ। प्रो0 रामशरण जोशी के व्याख्यान का अविकल आलेख आपके लिए प्रस्तुत है-
"हिंदी दुनिया की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है, जबकि भारत में बमुश्किल से पांच फीसदी लोग अंगे्रजी समझते हैं। यही पांच फीसदी लोग बाकी भाषा-भाषियों पर अपना प्रभुत्व जमाए हुए हैं। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं पर अंगे्रजी के इस दबदबे का कारण गुलाम मानसिकता तो है ही, उससे भी ज्यादा भारतीय विचार को लगातार दबाना और चंद कुलीनों के आधिपत्य को बरकरार रखना है।''
(मार्क टूली, बी.बी.सी. के भारत स्थित पूर्व प्रतिनिधि; प्रभात खबर, 26 अपै्रल, 2009)
I
मैं अपनी बात टीवी के एक लोकप्रिय विज्ञापन से करना चाहूंगा। आजकल सभी चैनलों पर एक विज्ञापन दिखाया जा रहा है। यह विज्ञापन चार-पांच वर्ष के बालक और उसके पिता से संबंधित है। विज्ञापन में एक निजी बीमा कंपनी का संदेश है। यह मासूम बच्चा अपने पिता से पूछता है, "पापा, आपने मेरे फ्यूचर के बारे में क्या सोचा?'' इसके उत्तर में बीमा कंपनी का विज्ञापन दर्शकों को परोस दिया जाता है।
यह एक सामान्य वाक्य है। इसमें आपत्तिजनक या विवादास्पद जैसी कोई बात नहीं है। एक दृष्टि से इसमें बच्चे की चिंता गुंजित हुई है। अभिभावकों को अपने बच्चों के भविष्य के प्रति सजग, चिंतित और सक्रिय होना चाहिए, इसका यह सार्विक संदेश है। इस प्रकार के एक नहीं, अनेक विज्ञापन हैं जिसमें बच्चे, माता-पिता, भविष्य, कॅरियर, बैंक, बचत, पूंजी नियोजन, कार, आवासीय फ्लेट्स, अन्य औद्योगिक उत्पादन आदि से संबंधित लुभावनी भाषाशैली में संभावी ग्राहकों को तैयार किया जाता है। भारत एक विकासशील राष्ट्र है, और वैश्वीकरण के ध्वजावाहकों में से एक हैं। अतः मीडिया पर इस प्रकार की विज्ञापन प्रवृतियों का प्रदर्शन एक स्वाभाविक परिघटना है।
अब आइए, इस मासूम वाक्य 'पापा, आपने मेरे फ्यूचर के बारे में क्या सोचा?' की अंतर्वस्तु का विश्लेषण किया जाए। सर्वप्रथम भाषा को लेते हैं। क्या चार-पांच वर्ष का बच्चा अपने स्वाभाविक वाक्य विन्यास से ऐसा बोल सकता है? जब वह इसमें 'भविष्य' के स्थान पर अंगे्रजी की शब्द 'फ्यूचर' का प्रयोग करता है तो इससे उसके परिवार के परिवेश का संकेत मिलता है। इसका आभास मिलता है कि यह बालक एक ऐसे परिवार का सदस्य है जो कि नव अर्जित क्षमता व संपन्नता से लैस है। इस नवक्षमता व संपन्नता का प्रथम प्रभाव जीवनशैली व भाषाशैली पर पड़ता है। परिवार में ऐसे शब्द, ऐसी भाषा का प्रवेश होने लगता है जो उसे विशिष्टता प्रदान करते हैं; सामाजिक व आर्थिक व्यवहार में उसके सदस्यों का विशिष्टता बोध कुलांचे भरने लगता है। इस बोध की स्रोत बनती है अंगे्रजी। यह विशिष्टता बोध प्रकारांतर से एक प्रकार की सत्ता में परिवर्तित हो जाता है।
इस वाक्य का दूसरा अंतर्निहित तत्व यह है कि क्या इतना छोटा बच्चा अपने भविष्य को लेकर इतना चिंतित हो सकता है? क्या यह 'प्लान' और इंश्योरेंस के संबंध में सोच सकता है? क्या सामान्य परिवार का बच्चा अपनी शिक्षा के बजाय 'फ्यूचर प्लान' को केंद्र में रख सकता है? वह अपने स्कूल, ड्रैस, कार्टून, ट्राईसिकॅल या बाइसिकॅल, पिकनिक आदि के संबंध में तो सोच सकता है और प्राप्ति के लिए माता-पिता से आग्रह कर सकता है या मचल सकता है। लेकिन भविष्य के प्रति इतनी चिंता व सजगता कृत्रिमबोध आरोपण को ही संचारित करती है।
तीसरा पक्ष यह है कि इस संदेश का संचारण इस यथार्थ की उद्घोषणा भी करता है कि भारत में एक ऐसा शक्तिशाली वर्ग अस्तित्व में आ चुका है या उभर रहा है जिसके पास अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य के भविष्य को सुरक्षित रखने की क्षमता है। इस वर्ग की अपनी आकांक्षाएं हैं; अपनी विशिष्ट जीवनशैली है; अपनी आवश्यकताएं हैं; अपनी क्षमताएं हैं; इसका अपना एक बाजार है व संसार है; और संचार व सत्ता के माध्यमों के अनुकूलन का अपना एजेंडा है।
आज इस वर्ग की उपभोग और क्रय-विक्रय गत्यात्मकता की उपेक्षा करना किसी भी प्रतिष्ठानी मीडिया की शाखा-मुद्रण मीडिया, टीवी मीडिया और इंटरनेट मीडिया - के लिए आसानी से संभव नहीं है। संक्षेप व स्पष्ट शब्दों में, मीडिया स्वयं भी ऐसा नहीं चाहेगा। क्योंकि वैश्वीकरण के काल में यह वर्ग मीडिया की 'जीवन रेखा' (लाइफ लाइन) है।
अब इस विज्ञापन कथा पर मैं यहीं विराम लगाता हूं। लेकिन इस कथा की पृष्ठभूमि में चर्चा को आगे बढ़ाया जाता है।
II
मेरे मन में मीडिया कभी भी एक स्वतंत्र परिघटना नहीं रही है; चाहे मुद्रण माध्यम का काल रहा हो या आधुनिक इलैक्ट्रोनिक माध्यम का, समकालीन सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था और विमर्शों ने मीडिया को कम-अधिक प्रभावित किया है। समकालीन बहुआयामी यथार्थ ने इसके चरित्र को गढ़ा है। इसे विविध आयामी गतिशीलता एवं भूमिका प्रदान की है। यह एक सार्विक, ऐतिहासिक प्रक्रिया रही है, और भारत भी इसका अपवाद नहीं है।
मैंने हिंदी पत्रकारिता को मुख्यरूप से तीन कालों में विभाजित किया है। पहला काल मिशनरी या आत्मोत्सर्ग पत्रकारिता से शुरू होता है। उन्नीसवीं सदी से आरंभ होने वाला यह काल बीसवीं सदी के मध्य या स्वतंत्रता प्राप्ति तक चलता है। जब हम मिशनरी पत्रकारिता की बात करते हैं तो इसका सीधा अर्थ यह है कि इस चरित्र के पत्रकार का संपूर्ण जीवन समाज, राष्ट्र और मानवता के प्रति समर्पित होता है। वह समाज में गुणात्मक या रैडिकल परिवर्तन के लिए सदैव हस्तक्षेप करने या स्वयं को फना करने के लिए तत्पर रहता है। उसे अपनी पत्रकारिता से भौतिक अपेक्षाएं नहीं रहती हैं। वह एक प्रकार से कबीराई बाना धारण करके जागरण, मुक्ति और मानव गरिमा का अलख जगाने के लिए निकल पड़ता है। इस श्रेणी में राजा राममोहन राय, पयामे आजादी के संपादक अजीमुल्ला खां, भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट, बाल गंगाधर तिलक, मोहनदास करमचंद गांधी, अरविंद घोष, लाला लाजपत राय, भगत सिंह, जवाहरलाल नेहरू, मौ. अब्दुल कलाम आजाद, गणेश शंकर विद्यार्थी, डॉ. अम्बेडकर, राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिंद', महावीर प्रसाद गुप्त, शिव पूजन सहाय, पे्रमचंद, माधवराव सप्रे, निराला, पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', रामरख सिंह सहगल, बनारसी दास चतुर्वेदी, आचार्य नरेन्द्र देव, झाबरमल शर्मा, रामबृक्ष बेनीपुरी, जयनारायण व्यास जैसे अनेक ज्ञात-अज्ञात सामाजिक सुधारक, राजनीतिक परिवर्तनकामी और साहित्यकर्मी संचारकों या पत्रकारों को रखा जा सकता है।
वास्तव में पत्रकारिता के मूल चरित्र को ध्यान में रखकर ही पे्रस को राज्य का चौथा स्तंभ कहा गया था। फ्रांसीसी क्रांति रही हो या रूस की अक्तूबर क्रांति या - 1949 की चीनी क्रांति, या भारत का स्वाधीनता आंदोलन, मुद्रण माध्यम या पे्रस ने मिशनरी भूमिका निभाई थी। लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रेस को कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के पश्चात अनौपचारिक रूप से चौथा स्थान दिया गया था। यह माना गया था कि यह राज्य और जन के बीच विवेकशील व हस्तक्षेपधर्मी सेतु की भूमिका निभाता रहेगा।
19वीं सदी से लेकर 20वीं सदी के मध्य तक राष्ट्र की मुख्यधारा की पत्रकारिता का एजेंडा था समाज सुधार, राष्ट्रोत्थान और स्वाधीनता। इस दौर में भी दो धाराएं थीं; एक मिशनरी और दूसरी थी मिश्रित व्यावसायिक पत्रकारिता। इस पत्रकारिता के भी कुछ आदर्श थे। यह स्वाधीनता आंदोलन की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थक थी। इस श्रेणी में द हिंदु, इंडियन एक्सपे्रस, द ट्रिब्यून, हिंदुस्तान टाइम्स, अमृत बाजार पत्रिका, आज, सैनिक, नवयुग, लोकवाणी, नवज्योति, हिंदुस्तान, विशाल भारत, पंजाब केसरी, भारत मित्र आदि को रखा जा सकता है। ऐसे भी पत्र थे जो अंगे्रजी शासन के समर्थक थे, जिसमें टाइम्स ऑफ इंडिया, स्टेट्स मैन जैसे दैनिकों का उल्लेख किया जा सकता है। फिर भी सारांश में यह कहा जा सकता है कि मूलतः मिशनरी पत्रकारिता और मिशन पे्ररित प्रोफेशनल पत्रकारिता ही भारतीय पत्रकारिता की 'प्राण वायु' रही हैं।
मेरी दृष्टि में पत्रकारिता का दूसरा काल स्वाधीनता प्राप्ति यानी 15 अगस्त, 1947 के पश्चात शुरू होता है। इस पर चर्चा करने से पूर्व हमें यह जान लेना चाहिए कि इस दौर की पत्रकारिता की भाषा को मूलतः हिंदी के साहित्यकारों ने गढ़ा था। 19वीं सदी की हिंदी पत्र-पत्रिकाओं पर पद्य-शैली की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है। संपादकीय, विचार आलेख, समाचार, निबंध आदि में काव्यात्मक पुट रहा करता था। एक सर्वमान्य हिंदी ने जन्म नहीं लिया था इसलिए पत्रकारीय भाषा में आंचलिकता या जनपदीय भाषा घुली रहती थी। चूंकि अधिकांश संपादक साहित्यिक या साहित्यिक मिजाज के हुआ करते थे इसलिए वे पत्रकारिता को साहित्यिक दृष्टि से देखा करते थे। उसे साहित्यिक कसौटी पर रखा करते थे। समालोचकों की दृष्टि से यह जागरण या पुनर्जागरण या नवजागरण का दौर था। पत्र-पत्रिकाओं में इसकी अनुगूंजें सुनी जा सकती हैं। साहित्यकार पत्रकारों की एक लंबी सूची है जिन्होंने 1826 के उदंत मार्तंड से लेकर 1947 के प्रमुख दैनिकों व पत्रिकाओं के भाषा संस्कार को समृद्ध किया। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं को सृजनात्मकता से संपन्न किया। इस संदर्भ में बंगदूत, बनारस अखबार, बुद्धि प्रकाश, समाचार सुधावर्षण, कविवचन सुधा, हरिश्चन्द्र मैगजीन, हिंदी प्रदीप, भारत मित्र, हिंदोस्थान, छत्तीसगढ़ मित्र, सरस्वती, हिंदी केसरी, इंदु, कर्मयोगी, कर्मवीर, आज, चांद, हंस, माधुरी, स्वदेश, सुधा, मतवाला आदि को याद किया जा सकता है।
सार तत्व यह है कि उस काल की हिंदी पे्रस की भाषा केवल समाचार संपे्रषक ही नहीं थी, बल्कि वह सामाजिक व राष्ट्रीय उद्देश्यपरकता से पे्ररित व संचालित रहा करती थी। उसके समक्ष आज जैसा उपभोक्ता वर्ग या ग्राहक वर्ग नहीं था, बल्कि वह वर्ग था जो स्वाधीनता आंदोलन के खातिर मर-खपने के लिए हमेशा तैयार रहा करता था। जब पत्र-पत्रिकाओं के मालिक, संपादकों और बृहत पत्रकार समाज के समक्ष भारत मुक्ति और राष्ट्र निर्माण का विराट एजेंडा हो, तब संचार माध्यम, समाचार-विचार और भाषा उत्पाद या कमोडिटी नहीं होते हैं। इसके विपरीत ये ऐसे रचनात्मक व आदर्शात्मक साधन होते हैं जो कि मिशन को साध्य मुकाम तक पहुंचाते हैं। गांधी जी ने अपनी पत्रिकाओं के लिए विज्ञापन स्वीकार नहीं किए थे।
निःसंदेह इस दौर के परंपरागत मध्यवर्ग ने रचनात्मक भूमिका निभाई थी। सामंती व महाजनी पृष्ठभूमि से आने वाले इस वर्ग के प्रतिनिधियों ने हिंदी पत्रकारिता की बुनियाद रखी; विभिन्न सरकारी नियंत्रणों व दंडों का सामना करते हुए पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित की; आंदोलनकारी बने; सत्याग्रह किया; जेल गए; प्राणों का उत्सर्ग किया। मूल्य, आदर्श, विचारधारा और एक्शन इस मध्यवर्ग के अस्तित्व व अस्मिता हुआ करते थे। निःसंदेह, तिलक, महात्मा गांधी, नेहरू, भगत सिंह जैसे विराट लोक व्यक्तित्व इस वर्ग के कम-अधिक पथ-प्रदर्शक थे। इसलिए छोटी पूंजी, पिछड़ी-धीमी मुद्रण तकनोलॉजी, सीमित विज्ञापन व प्रसार संख्या के बावजूद इस वर्ग के मालिकों और संपादकों ने पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया और नाना प्रकार के संकट झेले। यह ऐसा मध्यवर्ग था जो न पूरी तौर पर सामंती था, और न ही औपनिवेशिक या पश्चिमी था। पर यह भी सही है कि इसे आधुनिक या पूंजीवादी भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह औद्योगिक क्रांति के राष्ट्र राज्य और राष्ट्रवाद की चेतना का प्रतीक अवश्य था। इसलिए इसने अपने पत्रकारीय अवदान के माध्यम से उभरती हुई प्रतिरोधी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेपकर्मी की भूमिका निभाई थी।
दूसरे काल की प्रोफेशनल या व्यावसायिक हिंदी पत्रकारिता को अपनी पूर्ववर्ती से किन्हीं अर्थों में भिन्न कहा जा सकता। यद्यपि कई मामलों में साम्यता एवं भिन्नता साथ-साथ रही हैं। लेकिन, उत्तर स्वाधीनता काल में इसके चरित्र में गुणात्मक परिवर्तन अवश्य आया। सबसे मुख्य रूपांतरण यह हुआ कि अब मिशनवादी पत्रकारिता के स्थान पर यह शुद्ध 'व्यावसायिक पत्रकारिता' बन गई। यह एक स्वाभाविक परिणाम था। राष्ट्र के नए कर्ताधर्ता अस्तित्व में आ चुके थे; राष्ट्रीय पूंजी, मेधा और तकनोलॉजी स्वाधीन क्षितिज पर उभरने लगी थीं; सामंती व औपनिवेशिक भारत को आधुनिक लोकतांत्रिक-गणतांत्रिक भारत में रूपांतरित करने का चुनौतीपूर्ण एजेंडा नव राष्ट्र के समक्ष था। क्षेत्रीय पूंजी भी सामने आने लगी थी। छोटी पूंजी के साथ अखबार निकलने लगे थे। इस व्यावसायिक काल में नवभारत टाइम्स को छोड़ दें तो अधिकतर क्षेत्रीय दैनिक निम्न पूंजीपति वर्ग द्वारा मुद्रित व प्रकाशित किए जाते थे। इन क्षेत्रीय दैनिकों में नई दुनिया, प्रदीप, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण, सन्मार्ग, देशबंधु, नवभारत, राष्ट्रदूत, नवयुग, अमर ज्योति, वीर प्रताप, युगधर्म, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, भास्कर आदि को शामिल किया जा सकता है। चूंकि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात नई राजनीतिक शक्तियों का उदय हुआ था और 1952 से देश में प्रतिस्पर्धात्मक लोकतांत्रिक प्रणाली अस्तित्व में आ चुकी थी इसलिए क्षेत्रीय पे्रस का रोल स्वतः महत्वपूर्ण हो गया।
पे्रस के स्वामित्व-चरित्र की दृष्टि से यह भी जानना महत्वपूर्ण है कि ऐसे भी पे्रस मालिक थे जिनकी पृष्ठभूमि स्वाधीनता आंदोलन रह चुकी थी। वे जेल यात्राएं कर चुके थे। इस तरह के पे्रसपति मूलतः गांधीवादी व प्रगतिशील थे और अपने व्यावसायिक क्षेत्र में भी आचार संहिता का पालन किया करते थे।
यहां यह समझ लेना जरूरी है कि 'व्यावसायिकता' को निम्न दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। मिशनवादी पत्रकारिता और मूल्य आधारिता व्यावसायिक पत्रकारिता के मध्य मुख्य अंतर यह होता है कि पहली निःस्वार्थता, त्याग और वैचारिक प्रतिबद्धता पर आधारित होती है जबकि दूसरी वांछित भौतिक अपेक्षाओं, लाभ-हानि और व्यावसायिक नैतिक मूल्यों तथा उत्तरदायित्वों से नियंत्रित व निर्देशित होती है। इस दृष्टि से सातवें दशक के मध्य तक स्वस्थ व्यावसायिक पत्रकारिता का दौर चलता रहा। यह नेहरूवादी समाजवाद का समय था। पत्रकारिता में जमींदारी जागीरदारी उन्मूलन, भूमि-सुधार, भू-दान आंदोलन, सहकारिता आंदोलन, अस्पृश्यता विरोधी कानून, पंचवर्षीय योजना जैसे मुद्दों से संबंधित विमर्श पे्रस में छाए रहते थे। तब आज जैसी राजनीतिक फिसलन नहीं थी। लोकवृत्त में सक्रिय सामाजिक व राजनीतिककर्मी और बुद्धिजीवी मुद्दों पर 'स्टैंड' लिया करते थे; सहमति या असहमति और प्रतिरोध को सम्मान व आदर की दृष्टि से देखा जाना था। इन तमाम विमर्शों का प्रतिबिंबन हिंदी पे्रस में हुआ करता था। तब की पत्र-पत्रिकाएं संपादकों की वैचारिक स्थिति से चर्चित हुआ करती थी। उस प्रोफेशन काल में संपादक संस्था जीवंत व सशक्त हुआ करती थी। इस संस्था पर प्रेसपतियों और सत्तापतियों का आज जैसा दबाव नहीं हुआ करता था। एक अघोषित 'लक्ष्मण रेखा' थी, जिसका उल्लंघन सभी के लिए 'सीता हरण' के समान था।
इस काल का मध्यवर्ग मूलतः संघर्षशील था। अवसर सीमित थे। विकल्प व चयन का विस्फोट नहीं हुआ था। सरकारी क्षेत्र जीविका और सामाजिक हैसियत का मुख्य आधार था। पूंजी निर्माण व पूंजी निवेश की गति आज जैसी नहीं थी। सार यह है कि मध्यवर्ग की जीवनशैली औपनिवेशिक कालीन मध्यवर्ग के संस्कारों से नियंत्रित होती थी; संयुक्त परिवार व सामुदायिकता; धर्मपरायणता व संयमी व सादगीपूर्ण जीवन। गैर-महानगरीय मध्यवर्ग की सामाजिक व आर्थिक गतिशीलता अत्यंत धीमी और सिमटी हुआ करती थी। वह ऐसी पत्र-पत्रिकाएं पसंद करता था जो उसके जीवन को विकृत न करे। उसकी संवेदनाओं का आदर करे। पत्रकारिता उसका दिशासूचक बने। निःसंदेह हिंदी पे्रस ने कुतुबनुमा का रोल अदा भी किया। छठे व सातवें दशक में राजनीतिक चक्रवात आए; कांग्रेस के एकछत्र राज का तिलिस्म टूटा; गैर-कांगे्रसवाद शुरू हुआ; कांगे्रस विभाजित हुई; युवा व श्रमिक आंदोलन हुए; नक्सलबाड़ी आंदोलन और जे.पी. की संपूर्ण क्रांति ने देश के तत्कालीन राजनीतिक प्रबंधकों को गहराई तक झकझोर कर रख दिया। भारत के मध्यवर्ग और पे्रस के समक्ष नए मुद्दे, नई चुनौतियां और नए रिसपांस थे। और इस दौर की प्रवृतियों के अनुकूल हिंदी की नई पत्रकारिता-भाषा भी अस्तित्व में आई।
इस दौर में पत्रकारिता की भाषा छायावादी प्रभावों से लगभग मुक्त हो चुकी थी। साफ-सुथरा गद्य पत्रकारिता में अपना स्थायी स्थान बना चुका था। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में अक्षय कुमार जैन, बांके बिहारी भटनागर, राहुल बारपूते जैसे पूर्णकालिक पेशेवर संपादक और अन्य श्रेणी के पत्रकार विधिवत नियुक्तियों पर आने लगे थे। लेकिन यह भी सही है कि इस काल में हिंदी पत्रकारिता को ऊर्जा साहित्यकार संपादकों से ही प्राप्त हुई; सत्यकाल विद्यालंकार, हरिभाऊ उपाध्याय, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मुकुट बिहारी वर्मा, रामानंद दोषी, रतनलाल जोशी, कमलेश्वर, मोहन राकेश, मनोहर श्याम जोशी, शिवसिंह 'सरोज', गोपाल प्रसाद व्यास जैसे साहित्यकर्मियों ने विभिन्न स्तरों पर पत्रकारिता की भाषा को संस्कारित किया। हिंदी पत्रकारिता को साहित्य से विलग नहीं होने दिया। अज्ञेय जी व रघुवीर सहाय जी ने दिनमान के माध्यम से हिंदी पत्रकारिता को नया मुहावरा प्रदान किया। इसे चिंतनपरक व विश्लेषणपरक बनाया। इसके साथ ही अंतर अनुशासन दृष्टि के आयाम से पत्रकारिता को समृद्ध किया। लेकिन राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, गणेश मंत्री जैसे संपादक व्यावसायिक पत्रकारिता की भाषा को उसके पैरों पर खड़ा करते हैं। उसे स्वतंत्र पहचान देते हैं। वे पत्रकारिता के माध्यम से साहित्य तक पहुंचाते हैं। वे पत्रकारिता पर साहित्य की भाषा के आधिपत्य को अस्वीकारते हैं, लेकिन सहचर की भूमिका में उसका प्रयोग करते हैं। सारांश में ये लोग आंचलिकता के पुट के साथ पत्रकारिता को टकसाली हिंदी से लैस करते हैं। हिंदी समाज का पुराना व नया मध्यवर्ग उनकी हिंदी का स्वागत करता है।
III
सातवें दशक की सामाप्ति के साथ हिंदी पत्रकारिता नया मोड़ लेती है। राजनीतिक मूल्यों के स्खलन का दौर शुरू होता है। दूसरी आजादी के नाम पर किया गया 'जनता पार्टी सरकार' का प्रयोग असफल रहता है। यह अकाल मृत्यु का ग्रास बन जाता है। पत्रकारिता में भी मूल्य-पतन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस दौर में हिंदी पत्रकारिता में उछाल आता है। पूंजी निवेश बढ़ता है। मुद्रण में सुधार होता है। राष्ट्रीय हिंदी पे्रस के समकक्ष प्रादेशिक पे्रस भी उभरने लगता है। उसकी शक्ति का वृत्त स्थापित होता है। राजस्थान पत्रिका, नई दुनिया, भास्कर, अमर उजाला, जागरण, पंजाब केसरी, नवभारत जैसे समाचार पत्र समूह उभरती सत्ता के प्रतीक बनते हैं। ये राज्यों के सत्ता प्रबंधकों और नीति निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने की शक्ति अर्जित कर लेते हैं। इनका प्रेस व्यवसाय से इतर अन्य उद्योग-धंधों में विस्तार होता है। राज्य सरकारों के साथ गाढ़े संबंधों के बल पर क्षेत्रीय पे्रस पूंजीपति वर्ग विभिन्न प्रकार के लाभ प्राप्त करता है। मामूली कीमत पर उसे भूमियां दी जाती हैं। यह बिल्डर बन जाता है। वह शराब व फोरेस्ट्री के धंधे में घुस जाता है। इस वर्ग के सदस्य विभिन्न प्रकार के ट्रस्ट स्थापित करते हैं। प्रादेशिक स्तर की सांस्कृतिक व क्रीड़ा गतिविधियों को यह वर्ग नियंत्रित करने लगता है।
इस नए परिदृश्य में पत्रकारिता का चरित्र तेजी से बदलने लगता है। यह तीसरे चरण में पहुंच जाती है। मिशन से आरंभ होने वाली हिंदी पत्रकारिता-यात्रा व्यावसायिकता के गलियारे से गुजरती हुई व्यापारीकरण के शॉपिंग मॉल में पहुंच जाती है। व्यवसायीकरण और व्यापारीकरण में मूलभूत अंतर यह होता है कि व्यवसायीकृत पत्रकारिता व्यवसाय के नैतिक मूल्यों का पालन करती है, जबकि व्यापारीकृत पत्रकारिता का प्रथम व अंतिम लक्ष्य 'मुनाफाखोरी' होता है। इसके लिए यह साधन और साध्य में फरक करने से परहेज करती है। यह पे्रस या मीडिया या संचार माध्यमों को केवल 'प्रॉडक्ट' या 'उत्पाद' के रूप में देखती है। इसका ज्वलंत उदाहरण है 'कैश फॉर न्यूज विवाद'। अर्थात 'नगदी दो, खबर छपवाओ'। 2009 के आम चुनावों में कतिपय समाचार पत्रों और चैनलों ने प्रत्याशियों से काली नगदी वसूली और उनकी खबरों को उजली करके प्रकाशित व प्रसारित किया। मीडिया के इस व्यापारीकृत चरित्र ने पाठक एवं दर्शक को ही नहीं, संपूर्ण राष्ट्र को भी ठगा है। संपादकों की शिखर संस्था - 'एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया' ने 22 दिसंबर की अपनी वार्षिक बैठक में इस 'कुकृत्य' की भर्त्सना भी की। इस घटना से मीडिया के व्यापारीकरण से उत्पन्न गंभीर व्यावसायिक संकट का अंदाज लगाया जा सकता है। संक्षिप्त व स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो अब 'मिशन इतिहास बन चुका है; व्यावसायिकता सघन चिकित्सा कक्ष अर्थात आई.सी.यू. में पहुंच चुकी है और उत्तराधिकारी के रूप में व्यापारीकरण सत्तारूढ़ हो चुका है।
इसके लिए अकेले मीडिया को ही दोषी घोषित नहीं किया जा सकता। जैसा कि मैंने प्रारंभ में कहा है कि पे्रस या मीडिया, को एकांगी दृष्टि से नहीं समझा जा सकता। इसके परिवर्तनशील चरित्र को समकालीन सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिपे्रक्ष्य में ही रखकर समझा जा सकता है। तीसरे चरण में 'प्रेस शब्द' इतिहास बन चुका है, 'मीडिया शब्द' ने इसे प्रतिस्थापित कर दिया है। वास्तव में पत्रकारिता के इस चरण में मीडिया शक्तिशाली क्षेत्रीय पूंजी, एकाधिकारवादी राष्ट्रीय पूंजी व बहुराष्ट्रीय पूंजी, उच्च तकनोलॉजी, तीव्र गति, विराट ग्राहक संसार और उपभोक्तावाद का प्रतिनिधित्व करता है। हिंदी का मीडिया भी इस बहुआयामी प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है। इस काल सापेक्षता ने हिंदी मीडिया की भाषा, विषय वस्तु और प्रस्तुतिकरण को सतह से लेकर तल तक प्रभावित किया है, बल्कि बदलकर रख दिया है।
आइए, हिंदी मीडिया के भाषा संसार पर दृष्टि डालें। प्रिंट मीडिया रहे या इलैक्ट्रॉनिक चैनल, सरोगेट-बेबी, कॉमर्शियल सरोगेसी, सैक्सी, अफोर्डेबल फीस, डिनर पार्टी, लंच पार्टी, किट्टी पार्टी, लेडिज स्पेशल, ब्लैक लिस्टिेड, फोबिया, टिप्स फॉर हैल्थ, पसर्नेलिटी मैनेजमैंट, मैंटल हैल्थ, सॉफ्ट योग्यता, पीपुल स्किल, स्टाइल मैनेरिज्म, बॉडी लैंग्वेज, फिटनैस क्रेज, बाइकर्स, इवनिंग स्नैक्स, रैम्प, एड्मिशन अलर्ट, टाइम मैनेजमैंट, बिजी लाइफ, देसी वूमन, मल्टीप्लैक्स, न्यू इयर गिफ्ट, इंडिया शाइन, फील गुड फैक्टर, नो लिमिट, शॉपिंग मेनिया, पहला अफेयर, चार्मिंग, ब्यूटी-कॉम्पटिशन, फैशन परेड, सिलेब्‌रिटी, हैलो जिंदगी, फेयर हैंडसम, टॉप टैन, चक दे इंडिया, डिपे्रशन, टैंशन, रिस्क, विजिट इंडिया इयर, हाईजैक, किडनैप, ब्यूटी पॉर्लर, ट्रेडिंग टाइम, रीमिक्स, सिटी प्लस, पोल एनालिस्ट, क्वालिटी, कॉमनवेल्थ गेम्स, अस्सेट जैसे सैकड़ों अंगे्रजी के शब्द हैं जो कि आज के मीडिया की हिंदी को गढ़ रहे हैं।
अब मीडिया में - 'दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाना है', 'स्मार्ट रहे, फिट रहे', 'सिर को रखो - हैप्पी-हैप्पी', 'लाइफ को इन्जॉय करो', 'मेरी टीन एज की लाइफ', 'गांव एक डिफरेंट सब्जैक्ट है', 'डायरेक्ट गांव से', 'स्मार्ट बनें, सेफ रहें', 'यूं करें शाइन', 'तुम्हारी फोरकास्ट क्या है', 'मेरी एडजेस्टमैंट की प्रॉब्लम है', 'उसका फिगर ब्यूटीफुल बनाना है', 'वह सिलेब्‌रिटी है', 'लॉक कर दिया जाए', 'दिल मांगे मोर' जैसे हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित वाक्यों का प्रयोग अब कोई घटना नहीं है, बल्कि सामान्य बात है। एक प्रकार से मीडिया 'हिंग्लिश को प्रचारित कर रहा है, क्योंकि व्यापारीकरण और वैश्वीकरण उसके व्यावसायिक धर्म बन चुके हैं।
अब इस पर विचार की आवश्यकता है कि आखिर मीडिया ने ऐसी हिंदी को संपे्रषण का माध्यम क्यों बनाया है? दो-ढाई दशक पहले की मीडिया भाषा का अध्ययन कर लीजिए, ऐसी हिंदी नहीं मिलेगी। हिंदी के समाचार पत्रों में 'विश्व श्रेणी या स्तर का शहर या नगर', 'अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला', 'जीवन-शैली', 'चुस्त-दुरुस्त', 'सुंदर जीवन', 'पहला पे्रम', 'व्यस्त जीवन या दिनचर्या', 'जोखिम', 'देसी महिला या स्त्री', 'महिला विशेष ट्रेन', 'काली सूची', 'सेहत के गुर या उपाय', 'व्यक्तित्व निखार', 'भारत दर्शन वर्ष या पर्यटन वर्ष', 'आपकी भविष्यवाणी क्या है?', 'नव वर्ष उपहार या बधाई' जैसे वाक्यों का प्रयोग होता रहा है। स्वतंत्रतापूर्व की पे्रस भाषा इससे नितांत भिन्न रही है।
यहां मेरा हिंदी के संस्कृतकरण और शुद्धता का आग्रह कतई नहीं है। कोई भी भाषा स्थिर या जड़ नहीं रह सकती। यह परिवर्तनीय व अनुकूलनीय रही है। अतः अमीर खुसरो, कबीर, सूर, तुलसी, मीरा, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, अज्ञेय, धर्मवीर भारती जैसे मध्ययुगीन हिंदी और आधुनिक हिंदी महारथियों की दृष्टि से 21वीं सदी की हिंदी के साथ न्याय नहीं किया जा सकता क्योंकि सबके अपने-अपने संदर्भ काल हैं। सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक संरचनाएं और तकनोलॉजी विकास अवस्थाएं भी समाज में भाषा-प्रयोग की स्थिति को प्रभावित करती आई हैं। जब भाषा सत्ता, समृद्धि और हैसियत का प्रतीक बन जाती है तब उसका परिपे्रक्ष्य भी बदल जाता है। उसकी संपे्रषण की मूलभूमिका पृष्ठभूमि में चली जाती है। उसके साथ विनिमय का मूल्य जुड़ जाता है। जब उसमें यह विनिमय मूल्य शक्ति पैदा कर दी जाती है तब भाषा भाषा न रहकर, एक क्रय-विक्रय की वस्तु और सत्ता का हथियार बन जाती है। इस हथियार या वस्तु का प्रयोग वही व्यक्ति या वर्ग कर सकता है जो कि बहुआयामी सामर्थ्य संपन्न है। इस डायनमिक्स को समझने की जरूरत है।
भारत में वैश्वीकरण का आरंभ जुलाई, 1991 से माना जाता है। आज यह अपने दूसरे चरण में है। विगत 18 वर्षों में वैश्वीकरण की बहुआयामी प्रक्रिया ने हिंदी समेत सभी भाषा समाजों में 'नव मध्य वर्ग' को जन्म दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने देश में 20 से 25 करोड़ के मध्यवर्ग की मौजूदगी का दावा किया है। विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए विदेशों में भी उभरते भारतीय मध्यवर्ग को प्रचारित किया गया है। इस वर्ग को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। आज इसके कारण उपभोक्ता वर्ग का एक विशाल बाजार अस्तित्व में आ चुका है। इस बाजार में महानगरों, उपमहानगरों व नगरों के शॉपिंग मॉल, आई.टी. सेक्टर, मैनेजमेंट इंस्टीच्यूट, सौंदर्य प्रतियोगिता, फैशन परैड, पांच सितारा होटल व रैस्तरां, फास्ट फूड स्टॉल, नाइट क्लब, बैनक्विट हॉल, ब्यूटी पॉरलर, मसाज क्लब, मल्टीप्लैक्स, गगनचुम्बी इमारतें, लग्जरी कार, मोटर बाइक, अंग्रेजी माध्यम स्कूल, रैपिड इंग्लिश टीचिंग कोर्स, किटी पार्टीज, दूल्हा-दुलहन श्रृंगारशाला, मौज-मस्ती क्लब, म्यूजिक-डॉस सेंटर, एफ.एम. रेडियो, मनोरंजनी चैनल व उत्तेजक कार्यक्रम, भव्य सेट व बाजारू धारावाहिक, लॉफ्टर आयटम व द्विअर्थी भाषा, रियलिटी शो, इकोनोमी विमान यात्राएं जैसी चीजें समायी हुई हैं। इन चीजों के प्रयोग व उपभोग समाज में आपकी पहचान को निर्धारित करते हैं। आपको वर्ग की सामूहिक शक्ति से लैस करते हैं। आप 'विकल्प व चयन' संपन्न बनते हैं। यह वर्ग आपको नई भाषा, नई अभिव्यक्ति, नई जीवनशैली देता है। यह परिवर्तित परिपे्रक्ष्य व वर्ग बोध आपके और राज्य के बीच संबंधों का निर्धारण करते हैं। यह अकारण नहीं है कि आज राज्य स्वयं को 'सुविधा उपलब्धकर्ता' (ंिबपसपजंजवत) घोषित करता है। वह अब हस्तक्षेपकर्ता की भूमिका से मुक्त होना चाहता है। वह ऐतिहासिक जन-कल्याणकारी चरित्र से पिंड छुड़ाकर 'छव थ्तमम स्नदबी' एवं 'भ्पतम ंदक थ्पतम' चरित्र से उसका प्रतिस्थापन करना चाहता है, क्योंकि वैश्वीकरण द्वारा जनित वर्ग ने उसके समक्ष नया एजेंडा प्रस्तुत कर दिया है।
विख्यात समाजशास्त्री डॉ. पी.सी. जोशी ने सातवें दशक के आरंभ में तब के मध्यवर्ग को 'परजीवी मध्यवर्ग' से परिभाषित किया था। लेकिन इस सदी में मध्यवर्ग की नई पीढ़ी अस्तित्व में आ चुकी है। इस पीढ़ी का कृषि-महाजनी-भारत, औपनिवेशिक भारत या गांधीकालीन भारत और स्वातंत्र्‌योत्तर भारत की नेहरू-शास्त्री-इंदिराकालीन पीढ़ी के साथ न कोई सरोकार है, और न ही उसका कोई 'हैंगओवर' है। चाल, चलन और चरित्र की दृष्टि से मध्यवर्ग के तीन संस्करणों को इस प्रकार चित्रित किया जा सकता है : प्रथम, स्वतंत्रतापूर्व भारत का मध्यवर्ग बृहत्तर हितों के प्रति समर्पित व संघर्षरत था; द्वितीय, राष्ट्र निर्माण के प्रति संवेदनशील व सक्रिय रहा; और तृतीय लघु व निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए आक्रामक है।

यह संस्कार व मूल्य मुक्त नववर्ग है। यह अपनी नई पहचान, नई संस्कृति, नए मूल्य, नए संस्कार और जेट रफ्तार चाहता है। यह राज्य और संचार माध्यमों से भी यही अपेक्षा रखता है। इसे सुविधा की दृष्टि से इसे हिंदी भारत में उत्तर मंडल-कमंडल नवमध्यवर्ग से परिभाषित किया जा सकता है। यह वर्ग मंदिर-मस्जिद सिंड्रोम से उभरकर 'कॉरपोरेट राज्य' का नागरिक बनने के लिए व्यग्र व संघर्षरत है। अतः यह वर्ग राज्य और संचार माध्यमों से भी यही अपेक्षा रखता है कि वे 'कॉरपोरेट नागरिकता उपलब्धकर्ता' का रोल निभाएं।
देश की चोटी के दस समाचार पत्रों में प्रथम चार दैनिक हिंदी के हैं। सबसे अधिक खबरिया और मनोरंजन चैनल हिंदी में हैं। आने वाले वर्षों में हिंदी पाठकों व दर्शकों के ग्राहक बाजार का कई गुना विस्तार होगा। अब इस यथार्थ को ध्यान में रखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि मीडिया में हिंदी का भावी स्वरूप क्या होगा? मीडिया को कैसी और किसकी हिंदी चाहिए?
वास्तव में, नव मध्यवर्ग को ऐसी हिंदी चाहिए जिसे आवश्यकतानुसार तोड़ा-मरोड़ा जा सके ताकि शब्द साइबर तरंगों के साथ अपना कदम ताल मिला सकें। उसे साइबर मीडिया की भाषा चाहिए। उसे इंटरनेट पर चैटिंग व सर्फिंग चाहिए। वह 'ब्लोगिंग' करना चाहता है। वह अंग्रेजी भाषा की गति के साथ हिंदी भाषा गति की तुलना करता है। नव मध्यवर्गीय परिवारों में परंपरागत संबोधनों को तीव्रगतिवान अंगे्रजी संबोधनों से लगभग अपदस्थ किया जा चुका है। वे मीडिया में इसका प्रतिबिंबन देखना चाहते हैं। इसीलिए मीडियापति अपने इस तर्क को अलापते रहते हैं कि 'ग्राहकों को जैसा चाहिए, वैसा ही प्रसारित किया जाता है।' हालांकि यह तर्क पूरी तरह सही नहीं है। मैं इसे व्यापारीकृत मीडिया द्वारा संचालित 'बहुस्तरीय अनुकूलन कारोबार' मानता हूं। आज इस कारोबार की निर्बाध रूप से जारी रहने की एक वजह यह भी है कि मीडिया में जहां मूल्य आधारित व्यावसायिकता आई.सी.यू. में है वहीं संपादक संस्था भी 'कोमा' में जा चुकी है। संपादक से तात्पर्य मीडिया का वैचारिक नेतृत्व। लेकिन विगत डेढ़-दो दशकों में ब्रांड प्रबंधक संस्था यानी ब्रांड मैनेजर ने इसका स्थान ले लिया है। आज ब्रांड मैनेजर तय करता है कि अमुक घटना, अमुक समाचार को मीडिया में कितना व कैसा स्थान दिया जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, मीडिया पर 'पेज-थ्री संस्कृति' छाई हुई है। जाहिर है, पेज-थ्री संस्कृति और नव मध्यवर्ग परस्परपूरक व पर्याय हैं। जब मीडिया विचार व हस्तक्षेपविहीन होगा तो इस शून्य या स्पेस को कोई शक्ति तो भरेगी, और वह शक्ति है 'नव मध्यवर्ग की पेज-थ्री संस्कृति'।

मीडिया चिंतक मार्शल मैक्‌लुहान अपनी बहुचर्चित पुस्तक 'न्दकमतेजंदकपदह डमकपं' में एक विचारणीय बात कहते हैं। वे मीडिया को मनुष्य की इंद्रियों अनुभूतियों, अनुभवों, चेतना आदि के विस्तार या प्रसार के रूप में देखते हैं। अतः मीडिया चीजों के नए रूपांतरण, नई दृष्टि, नई चेतना आदि का उत्पादक व आपूर्तिकर्ता बन जाता है। मैं यहां अपनी यह बात जरूर जोड़ना चाहूंगा कि मनुष्य की ज्ञानेंद्रियां भी स्थिति सापेक्ष होती हैं। जब मनुष्य बाह्‌य जगत में विभिन्न भौतिक शक्तियों के साथ 'इंटर्‌ऐक्ट' करता है तब यह प्रक्रिया उसके विचारों, भावना, कल्पना, रुचि, दृष्टि आदि सभी को प्रभावित करती है। तब नव मध्यवर्ग इसका अपवाद कैसे हो सकता है? मैक्‌लुहान यहीं नहीं रुकते हैं। संपूर्ण प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए वे आगे यह भी कहते हैं कि जब हम एक दफा अपनी ज्ञानेंद्रियों और नर्वस सिस्टम को निजी कॉरपोरेशनों के हवाले कर देते हैं तब हम अपनी आंखों और कानों पर अपना अधिकार खो देते हैं। ये प्राईवेट कॉरपोरेशन अपने व्यापारिक हितों को ध्यान में रखकर मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। मेरे मन में पेज-थ्री संस्कृति और नव मध्यवर्ग की जीवनशैली इसी प्रक्रिया की 'बाई-प्रॉडेक्ट' हैं। समकालीन सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक तंत्र ऐसी प्रॉडेक्ट की जमीन तैयार करता है। विचारक सी. राइट मिल्स ने आधुनिक मानव जीवन के संबंध में सटीक ही कहा है कि "किसी काल में जो राजनीतिक व्यवस्था प्रभुत्व में होती है वही सांस्कृतिक उपादानों का निर्धारण और उनका प्रयोग करती है।'' अतः मीडिया, भाषा, विषय वस्तु, चयन प्रक्रिया, प्रस्तुतिकरण, तकनोलॉजी और पूंजी को इस संदर्भ-पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। और अंत में।
आज की व्यवस्था व नव मध्यवर्ग को एक ऐसा मीडिया चाहिए जो सिर्फ शो रूम के पुतले (डंददमुनपद) की भूमिका तक सीमित रहे। याद रहे, इस पुतले का काम ऋतु व वर्ग अनुकूल परिधानों का प्रदर्शन भर होता है। अतः जो मीडियाकर्मी इस शो रूम की सीमा को लांघ उस पार जाने की दुस्साहसिकता का प्रदर्शन करेगा, उसे नाना संकटों को आमंत्रण देने के लिए तैयार भी रहना चाहिए।
धन्यवाद !''
प्रो0 जोशी के व्याख्यान देने के उपरांत वरिष्ठ आलोचक डॉ0 निर्मला जैन ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज का मीडिया पूरी तरह बाजारू हो गया है। आज नैतिकता दिखाने वाले संपादकों को मालिक कान पकड़कर बाहर कर देते हैं। आज की पत्रकारिता पर 'सेंशेसनलिज्म' हावी है।
समारोह के अध्यक्ष और मीडिया विशेषज्ञ प्रो0 जवरीमल्ल पारख ने अपने वक्तव्य में कहा कि मीडिया के मालिकों का नज़रिया व्यावसायिक और मुनाफा केन्द्रित है। अखबारों को मुनाफा पाठकों की खरीद से नहीं, विज्ञापनदाताओं से होता है। प्रो0 पारख का यह भी कहना था कि आज अखबारों में जो 'हिंगलिश' का चलन हो गया है, यह इतनी चिंता की बात नहीं है। चिंता तो इस बात की है कि अखबारों की भाषा निरंतर विचारहीन होती जा रही है।

मुख्य अतिथि श्री त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी ने प्रो0 जोशी के विचारों की सराहना करते हुए कहा कि इस विषय पर और अधिक विचार-विमर्श की आवश्यकता है।
समारोह के प्रारंभ में अतिथियों ने स्व0 धर्मवीर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की और संचालिका डॉ0 सुषमा यादव ने धर्मवीरजी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला तथा व्याख्याता प्रो0 रामशरण जोशी का विस्तृत परिचय दिया।
प्रो0 जोशी का व्याख्यान सुनने के लिए सर्वश्री अमर गोस्वामी, अजय भल्ला, रमाशंकर सिंह, संतोष माटा, रामनिवास लखोटिया, रत्ना कौशिक आदि के साथ-साथ राजधानी के अनेक साहित्यकार, पत्रकार, बुद्धिजीवी और राज-समाजसेवी उपस्थित थे।

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