रविवार, 27 जुलाई 2014

झूठ बोलने की व्‍यवस्‍थागत मजबूरी

 
 
 

1/25/2011

झूठ बोलने की व्‍यवस्‍थागत मजबूरी

पी. साइनाथ ने यह व्‍याख्‍यान दिल्‍ली के कांस्टिट़यूशन क्‍लब में पिछले साल दिया था। उसके संपादित अंश प्रस्‍तुत हैं।

A Structural Compulsion  To Lie


जिस तरह किसी जंग को जनरलों के जिम्मे पूरी तरह नहीं छोड़ा जा सकता, उसी तरह हम यह मानते हैं कि मीडिया को भी सिर्फ पत्रकारों के हाथ में नहीं छोड़ा जाना चाहिए क्योंकि मीडिया जो कुछ करता है उसका असर समूचे समाज पर, हम पर, आप पर पड़ता है, फिर आपको यह पसंद आए या न आए।

मीडिया हर साल ताकतवर लोगों की एक सूची निकालता है। उसे आप देखें। ऐसी तमाम सूचियों में मेरी दिलचस्पी एक ही में है, हालांकि यह वह नहीं जो मैं चाहता हूं। यह देश की सबसे ताकतवर 50 कंपनियों की सूची है। इसमें ऐसी तमाम कंपनियां हैं जिन्हें हम मीडिया कंपनियों के रूप में जानते हैं, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इसमें ढेर सारी ऐसी कंपनियां हैं जो घोषित तौर पर तो मीडिया कंपनी नहीं हैं, लेकिन जो मीडिया के क्षेत्र में बड़े खिलाड़ी हैं। दरअसल, कई तो वास्तव में घोषित मीडिया कंपनियों से भी ज्यादा बड़ी हैं। हम इस पर वापस आएंगे क्योंकि अगर मैं आपको मीडिया कंपनियों के मीडिया से बाहर के हितों की सूची गिनाना शुरू करूं तो बता दूं कि पिछली रात मैंने ऐसा किया भी था और 108 तक तो पहुंच गया। लेकिन हमारे पास इतना समय नहीं है। मीडिया की ताकत का एक बड़ा अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि 2008 के सितंबर से मीडिया में जो कुछ भी हो रहा है उस पर कैसे चुप्पी साधे रखी गई है। सितंबर 2008 में 3000  पत्रकारों को नौकरी से निकाला गया। इसके अलावा कैमरामैन, सहयोगी और मीडिया की अन्य कुल 3000 नौकरियां खत्म हो गईं। और यह सब मुट्ठी भर मीडिया समूहों में हुआ। अकेले महाराष्ट्र में तीन टीवी चैनलों और एक अखबार से 2009 में 450 नौकरियां गईं। ये आंकड़े मोटे है क्योंकि बदकिस्मती से हमारे यहां उस किस्म की यूनियनें अब नहीं रह गई हैं जैसी अस्‍सी के दशक में हुआ करती थीं जब हम आसानी से खत्म हुई नौकरियों की संख्या गिन लेते थे। एक संस्थान ने तो नए कैरियर का वादा करके 180 पत्रकारों को तीन महीने पहले उनकी लगी-लगाई नौकरियों से तोड़ लिया था। वह बंद हो गया और अब ये सभी लोग सड़क पर हैं। महाराष्ट्र में एक मीडिया समूह ने एक झटके में 249 पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया। इस पूरे मामले में विडंबना देखिए कि ये पत्रकार उन्हीं अखबारों और चैनलों से निकाले जा रहे हैं जो रोज आपके सामने मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी, चिदंबरम और कुछ दूसरों के वित्तीय प्रबंधन का राग अलापते रहते हैं कि कैसे इसके चलते भारत मंदी से बच गया, यहां मंदी कभी आई ही नहीं और मीडिया जबरदस्त बहाली कर रहा है। वही अखबार जो नौकरियां खा रहे हैं आपको बताते हैं कि सब कुछ ठीक है। जब मंदी अपने चरम पर थी, तब एक दिन के टाइम्स ऑफ इंडिया की हेडिंग देखिए- 'वॉट रिसेशन'। वह बताता है कि शहरी इलाकों के मुकाबले गांवों में कारों की बिक्री बेहतर है। इसकी भी वजह है, लेकिन अगर आप पत्रकारिता नहीं करते तो नहीं जान पाएंगे। बहरहाल, दुनिया भर में जो कुछ चल रहा है यह उसका एक हिस्सा भी है।

अमेरिका में एक साल में 35885 नौकरियां मीडिया में चली गईं जिसकी शुरुआत सितंबर 2008 में हुई थी। यह अध्ययन वहां की एक पत्रिका ने छापा था जिसे अमेरिकी व्यापार जगत की बाइबल कहा जाता है। यह 108 साल पुरानी पत्रिका है। आपको पता है कि जब संपादक और प्रकाशक ने इस स्टोरी को छापा तो क्या हुआ। अगले ही अंक में संपादक, प्रकाशक और इसके सभी कर्मचारियों को अपना बोरिया-बिस्तर समेट लेना पड़ा। अब यह सिर्फ ऑनलाइन दिखती है। प्रिंट में इसका कोई संस्करण नहीं। खैर, मैंने जब यह विषय सुझाया था तो मैं जरा सा चिंतित था कि आखिर झूठ बोलने की व्यवस्थागत मजबूरी को मैं समझाऊंगा कैसे। आज आपके सामने जो बुनियादी बात मैं रखना चाह रहा हूं वह कोई अच्छे लोगों या बुरे लोगों, खराब पत्रकारों और खराब प्रशिक्षण या फिर अच्छे पत्रकारों या अच्छे प्रशिक्षण के बारे में नहीं है। मैं यह कहना चाह रहा हूं कि आर्थिक नीतियों और गतिविधियों के साथ इतने गहरे तरीके से जुड़े हुए, शेयर बाजार से इतना करीबी रिश्ता रखे हुए इस मीडिया में झूठ बोलना दरअसल उसकी ढांचागत मजबूरी है, बाध्यता है क्योंकि सच बोलना वे अफोर्ड ही नहीं कर सकते। आइए एक उदाहरण देते हैं। प्राइवेट ट्रीटी को लें- ऐसा नहीं है कि अकेले टाइम्स ऑफ इंडिया ही प्राइवेट ट्रीटी के धंधे में है। दूसरे भी ऐसा ही करते हैं, लेकिन अलग-अलग नामों से। ये प्राइवेट ट्रीटी है क्या बला!

मान लें कि एक मध्यम आकार का रीटेलर दुनिया के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार के साथ ट्रीटी में आता है। आखिर वह ऐसा क्‍यों करता है, इसलिए क्योंकि वह बड़े रीटेलरों की जमात में शामिल होना चाहता है। पैंटालून के किशोर बियानी की बिलकुल यही कहानी है जो एक लघु-मध्यम आकार का रीटेलर था और जिसने 2002 में टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ प्राइवेट ट्रीटी की। टाइम्स ऑफ इंडिया या अन्य कोई भी अखबार जब किसी कंपनी के साथ प्राइवेट ट्रीटी का समझौता करता है तो वह उसकी सात से दस फीसदी हिस्सेदारी को खरीद लेता है और उसके बदले में यह गारंटी देता है कि उसकी निगेटिव कवरेज नहीं की जाएगी और उसका विज्ञापन सुनिश्चित किया जाएगा। ऐसे में अखबार के पत्रकारों के लिए दिक्कत खड़ी हो जाती है, खासकर तब जब उसके 240 कंपनियों के साथ प्राइवेट ट्रीटी के समझौते हों। यहां यह सवाल भी खड़ा होता है कि जब एक अखबार 240 कंपनियों का आंशिक हिस्सेदार बन चुका हो, तो क्या वह अखबार रह भी जाता है या फिर एक इक्विटी फर्म में तब्दील हो जाता है। 240 कंपनियों में शेयर मामूली बात नहीं, ऐसा तो गैर-मीडिया कंपनियों के मालिकाने का भी पैटर्न नहीं होता। यह संयोग नहीं है कि अगर आप भारतीय मीडिया कंपनियों में स्वामित्व और हिस्सेदारी के पैटर्न को तलाशने चलें तो निश्चित तौर पर आप पागल हो जाएंगे। इसे बेन बैगडिकियन ने अपनी प्रसिद्ध किताब 'मीडिया मोनोपोली' में कहा है 'कॉरपोरेट व्यभिचार के भीतर कॉरपोरेट व्यभिचार'। भारतीय मीडिया के निगमीकरण का यह तरीका ही तय करता है कि आपको झूठ बोलना ही है। मान लीजिए कि मेरे पास 240 प्राइवेट ट्रीटी हैं और इन शेयरों के रिटर्न की कीमत अरबों में है। अचानक मंदी आती है और मेरे शेयर कौड़ियों के मोल रह जाते हैं। एक ही तरीका है जिससे मैं बच सकता हूं, कि लोगों को यह बताऊं कि बाजार उछाल पर है। भले ही बाजार की हालत सड़े हुए अंडे की हो, यहां सवाल सिर्फ मेरे शेयरों का नहीं है पूरे बाजार का है। मुझे पाठकों को बताना ही है कि बाजार तेजी से बहाली कर रहा है, जबरदस्त वापसी हो रही है, नहीं तो मैं मर जाऊंगा। यानी झूठ बोलना आपकी ढांचागत बाध्यता है। इसका कोई विकल्प नहीं। इसीलिए देश के दो सबसे बड़े अखबारों ने अपने डेस्क पर फतवा जारी कर दिया कि 'मंदी' शब्द का इस्तेमाल ही नहीं करना है। डेस्क को बताया गया कि भारत में तो मंदी है ही नहीं, अमेरिका में है। हां, आर्थिक रफ्तार अवश्य धीमी हो सकती है। पहले हम 90 पर अगर थे तो अब 80 पर हैं, बस! इसीलिए आपको इन दोनों अखबारों में 'मंदी' नाम का शब्द भी नहीं दिखेगा, सिवाय उस हेडलाइन के जो कहती है 'कैसी मंदी' (वॉट रिसेशन)। यानी कुछ महीनों के दौरान भारत में मंदी को जबरन नहीं आने दिया गया। बात यह है कि कि दरअसल उन्होंने शेयर बाजार में इतना भारी निवेश किया हुआ है कि वे आपसे सच बोल ही नहीं सकते।

संयोगवश, ये सारे रुझान सभी क्षेत्रों में दिखाई देते हैं, लेकिन एक ऐसा क्षेत्र है जहां इसकी जबरदस्त अभिव्यक्ति हमें देखने को मिलती है- इंडियन प्रीमियर लीग। अखबार आईपीएल टीमों के मालिकान हैं। डेकन चार्जर्स का मालिक डेकन क्रॉनिकल है। कोलकाता टेलीग्राफ कोलकाता नाइटराइडर्स का मीडिया प्रायोजक है। इस समूचे ढांचे का निर्माण दरअसल उस एक सूत्र के इर्द-गिर्द हुआ है जिसे मैं कहता हूं एबीसी यानी एडवर्टाइजिंग, बॉलीवुड और कॉरपोरेट सत्ता। ये तीन चीजें ही आज भारतीय मीडिया को चला रही हैं। इसी संदर्भ में मैं यह भी कहना चाहूंगा कि आज पेड न्यूज कोई विकृति नहीं है। जी हां, पेड न्यूज कोई विकृति नहीं, मीडिया के साथ जो कुछ किया गया है वह दरअसल उसकी तार्किक परिणति भर है। आप अगर समाज के हर पहलू का अतिव्यावसायीकरण करते जाएं, मीडिया के हर कल्पनीय पक्ष का व्यावसायीकरण करते जाएं, तो ऐसे में कैसे यह उम्मीद लगा सकते हैं कि खबर इस सब से अनछुई रह जाएगी। ऐसा नहीं होगा। जब आपने हर चीज को धंधा बना डाला और सब कुछ बेचने में लगे हैं तो खबरों को भी बेचना ही पड़ेगा। यहां उन छह-सात प्रक्रियाओं को मैं आपको गिनाना चाहूंगा जो आज भारतीय मीडिया में जारी हैं। पहला, हमारे समय के मीडिया का बुनियादी लक्षण जैसा कि मैंने कई बार कहा भी है जन संचार और जन यथार्थ के बीच बढ़ती दूरी है। दूसरा, गरीबों पर पूरी तरह से व्यवस्था के स्तर पर परदा डाल दिया गया है। यह उनकी उपेक्षा नहीं है, दरअसल गरीबों की मीडिया को जरूरत ही नहीं। इन तमाम अखबारों में जो निर्देश दिए जाते हैं वे साफ बताते हैं कि आपका लक्षित पाठक कौन है और कौन नहीं, किन क्षेत्रों में हमारी दिलचस्पी है, किन रिहाइशों में हमें जाना है, इत्यादि। इसका मतलब समझाने के लिए मैं आपको एक मिसाल देता हूं। आप अखबारों की बीट पर नजर डालें। किसी भी अखबार में एक पूर्णकालिक कृषि संवाददाता नहीं होता। द हिंदू में है, जो दूसरे स्तंभकारों से उलट खेतों में चला जाता है। लोग समझते हैं कि वह मैं हूं, लेकिन मेरा काम सिर्फ इस तक ही सीमित नहीं है। मुझे और चीजें भी कवर करनी होती हैं, पलायन आदि। ग्रामीण इलाकों का मतलब सिर्फ खेती नहीं है, वह बस एक प्रमुखता है। इसी तरह अखबारों में पूर्णकालिक श्रम संवाददाता आपको नहीं मिलेंगे। श्रम की बीट वह रिपोर्टर कवर करता है जो उद्योग आदि देखता है। वह मजदूरों के बारे में प्रबंधन से बात करता है। कंपनी का पीआरओ उसे मजदूरों के बारे में बताता है। यानी श्रम संवाददाता भी अखबारों से खत्म हो चुके हैं। और जब आप कहते हैं कि हमें कृषि और श्रम संवाददाता की जरूरत नहीं, तो दरअसल आप यह कह रहे होते हैं कि आपको देश की 75 फीसदी आबादी से बात नहीं करनी। आप कह रहे होते हैं कि 75 फीसदी आबादी से खबर नहीं बनती। क्या उस देश में मजदूर खबर नहीं हैं जहां सितंबर 2008 के बाद से 40 लाख रोजगार खत्म हो चुके? सरकारी अनुमानों के मुताबिक ही अकेले निर्यात केंद्रित उद्योगों में सितंबर 2008 से मई 2009 के बीच 15 लाख नौकरियां गईं। सितंबर 2008 के बाद पहली तिमाही में पांच लाख नौकरियां। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में तो मंदी शुरू होने से पहले ही लाखों नौकरियां चली गईं, और आप कह रहे हैं कि मजदूर खबर नहीं होते। तीसरी बात! मीडिया के एजेंडे पर कॉरपोरेट कब्जा और खुद मीडिया पर कॉरपोरेट कब्जा। अलग-अलग मीडिया समूहों की वेबसाइट पर जाकर उनके निदेशक बोर्ड में लिखे नाम देखिए, काफी दिलचस्प होगा। मैकडोनाल्ड के प्रमुख, ऐसे लोग जो जनरल इलेक्ट्रॉनिक्स के बोर्ड सदस्य हैं, मोबिल ऑयल के बोर्ड सदस्य जैसे नाम मिल जाएंगे। भारत के शीर्ष कॉरपोरेट प्रमुख किसी न किसी मीडिया समूह के निदेशक बोर्ड में बैठे आपको मिल जाएंगे। यह वाकई कॉरपोरेट व्यभिचार के भीतर कॉरपोरेट व्यभिचार है। मीडिया का चौथा लक्षण मेरे हिसाब से यह है कि लोकतंत्र की सभी संस्थाओं में अकेले मीडिया सामाजिक रूप से सबसे ज्यादा विभेदकारी स्तंभ है। खराब से खराब सरकार का भी प्रतिनिधित्व किसी न किसी सामाजिक तबके में होता ही है क्योंकि यह संविधान और कानून द्वारा अनिवार्य है। मीडिया में दलितों को खोज कर दिखाइए। आदिवासियों को खोजिए। किसी भी मीडिया में इन्हें किसी भी प्रमुख पद पर आप खोज कर दिखाइए। यह आसान नहीं होगा। उन जगहों पर ये शायद मिल जाएं जहां कुछ लोगों ने निजी तौर पर उनकी मौजूदगी को बढ़ाने के लिए सचेतन फैसले लिए होंगे।

अगली बात। जैसा कि मेरे मित्र प्रो. प्रभात पटनायक कहते हैं, मीडिया का नैतिक जगत खिसक गया है और यह बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसा इस देश में ही हुआ है, जाहिर है कि मीडिया में भी होगा। इस बात को कृषि संकट से ही समझने की कोशिश करें। पिछले 50 साल में सबसे बड़ा कृषि संकट फिलवक्त जारी है। साठ और सत्तर के दशक में हमारे यहां बड़े पैमाने पर किसान संघर्ष हुआ करते थे। नब्बे और 2000 के दशक में हमारे यहां बड़े पैमाने पर किसान आत्महत्याएं हो रही हैं। भारत कैसे सोचता है, इसमें कुछ बेहद बुनियादी बदलाव आया है। यह देश, समाज कैसे काम करता है उसके बारे में कुछ बेहद बुनियादी चीज बदली है। आखिर जन संघर्ष क्यों आत्महत्याओं में तब्दील हो गए? इनकी गति सामान्य या गैर-कृषि आबादी में हो रही आत्महत्याओं से भी तेज है और इस बारे में कोई कुछ नहीं कर रहा। मीडिया का नैतिक जगत दरअसल बदल चुका है।

छठी बात, सत्‍ता प्रतिष्ठान और कॉरपोरेट सत्ता में एक प्रमुख स्थान रखने वाले मीडिया का अगर कोई वैचारिक आधार है तो वो यह कि यह राजनीतिक रूप से स्वतंत्र है लेकिन मुनाफे की गुलामी में जकड़ा हुआ है। हम राजनीतिक रूप् से स्वतंत्र होंगे यदि हम ऐसा चुनना चाहें। आखिर आप पत्रकारिता को कैसे नापते हैं? क्या कोई पैमाना है जिसके आधार पर हम कह सकें कि ये अच्छी पत्रकारिता है और वो बुरी या फिर फलां प्रासंगिक पत्रकारिता है? हां। मैं मानता हूं कि ऐसा एक पैमाना है। मैं मानता हूं कि अच्छी पत्रकारिता, प्रासंगिक पत्रकारिता को हमेशा इस आधार पर तय किया जाएगा कि हम अपने समय की सबसे बड़ी परिघटनाओं के साथ कैसे खुद को जोड़ते हैं। चाहे वह थॉमस पेन और फ्रेंच क्रांति व अमेरिकी क्रांति का रिश्ता हो या फिर गांधी, आंबेडकर और भगत सिंह के साथ आजादी के आंदोलन का रिश्ता। किसी भी दौर की पत्रकारिता का इस आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा कि वह अपने दौर की विशाल प्रक्रियाओं के साथ कैसे जुड़ती है, कैसा बरताव करती है। तो हमारे दौर की विशाल प्रक्रियाएं हैं क्या? आइए, मैं कुछ मुट्ठी भर गिनाता हूं। हम 1973-74 के बाद अपने इतिहास में सबसे ज्यादा महंगाई के दौर में हैं। ठीक इसी वक्त हम देख रहे हैं कि आबादी में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन खाद्यान्न की उपलब्धता तेजी से गिर रही है। 2005 से 2008 के बीच यह उपलब्धता 432 ग्राम प्रतिदिन थी जो कि 1955-58  के दौर के आंकड़ों से काफी कम है। यह भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण का आंकड़ा है। इसका मतलब यह कि भूख के मोर्चे पर बहुत बुनियादी स्तर पर बदलाव हो रहा है। दूसरी बड़ी प्रक्रिया बेरोजगारी से जुड़ी है। तीसरी, पिछले पचास साल में सबसे बड़ा कृषि संकट। चौथी, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट से पैदा हुआ व्यापक विस्थापन। पांचवीं प्रक्रिया के रूप में हम एक स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर अपने समाज में तेजी से बढ़ती असमानता को पाते हैं। छठवीं प्रक्रिया हमारे इतिहास में चल रही सबसे बड़ी लूट और हड़प का खेल है। एक हमजोली जुआरी पूंजीवाद जो अब देखने में आ रहा है। कॉमनवेल्थ खेलों के नाम पर हमारे यहां जो कुछ हो रहा है नया नहीं है। यह रोजाना हमारे समाज में होता है। बस हुआ ये है कि सब कुछ एक जगह एक समय में एक हाई प्रोफाइल संस्थान में चल रहा है। वरना इमारतें ऐसे ही बनाई जाती हैं, ठेके ऐसे ही दिए जाते हैं। कुछ भी नया नहीं है। सब कुछ वैसे ही चल रहा है। कुछ चीजें बस हमें इसलिए पसंद नहीं आतीं क्योंकि हम इस बात को लेकर ज्यादा चिंतित हो जाते हैं कि दुनिया हमें कैसे देख रही है। दुनिया मतलब जाहिर तौर पर गोरों की दुनिया।

इन प्रक्रियाओं के साथ दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता मीडिया कैसे खुद को जोड़ता है? मिसाल के तौर पर भूख को ही लें। वही मीडिया जो जेसिका लाल या रुचिका गिरहोत्रा के मामले पर न्यायपालिका के हस्तक्षेप को लेकर इतना उत्साहित होता है, खूब वाहवाही करता है, उसके द्वारा भूख के मामले में दखल देने पर संपादकीय लिखने लगता है कि न्यायपालिका कुछ ज्यादा ही दखल दे रही है। ठीक उसी वक्त सरकार द्वारा गठित तीन कमेटियां एक ही बात कहती हैं कि सरकार को ग्रामीण गरीबी के आंकड़ों में सुधार कर उसे आबादी के 42-50 फीसदी के बजाय 77 फीसदी पर ले आना चाहिए। लेकिन इससे मीडिया को कोई फर्क नहीं पड़ता। इन कमेटियों में सबसे छोटी तेंदुलकर कमेटी कहती है कि सरकारी अनुमानों के मुकाबले गांवों में गरीबी बहुत ज्यादा है। इसी दौरान मंत्रियों का विशेषाधिकार प्राप्त समूह खाद्य सुरक्षा पर बैठक करता है और पहली बात जो बैठक की कार्यवाही के रूप में दर्ज की जाती है वो यह है कि 'यह विधेयक खाद्य सुरक्षा पर है, इसका पोषण सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं है।' तो आइए देखते हैं कि आखिर भूख का मतलब क्या है।

भूख वह है जैसा कि हमने इन गर्मियों में महसूस किया, जो बारिश आते और बदतर हो जाती है क्योंकि लोगों के पास करने को कोई काम नहीं होता। भूख के कुछ चेहरे देखें- जब गर्मी अपने उफान पर थी और तापमान 49 डिग्री पर था और सरकार स्कूलों को बंद कर रही थी, गांवों की मांएं गुहार लगा रही थीं कि स्कूलों को खोले रखा जाए ताकि उनके बच्चों को एक वक्त तो कायदे का भोजन मिल सके। और जब आप तेलंगाना जाते हैं, तो वे आपको घेर लेती हैं और कहती हैं कि आप अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उनकी बात कलक्टर तक पहुंचाएं। जब मुंबई शहर के बाहरी इलाकों में स्कूलों के अध्यापक हमसे कहते हैं कि सोमवार को मिड डे मील के राशन का कोटा दोगुना होना चाहिए, तो वह भूख होती है। क्यों भला? क्योंकि बच्चा शनिवार और इतवार को भूखा रहा था। पिछली बार कायदे का भर पेट खाना उसे शुक्रवार की दोपहर मिला था। और अध्यापक मुझे बताते हैं कि उनमें से कोई भी सोमवार को एक बजे से पहले पढ़ाने को तैयार नहीं क्योंकि बच्चे पढ़ाई पर ध्यान ही नहीं देंगे। यह भूख नरेगा की लाइनों में दिखती है जब 74 साल के पुरुष और 65 साल की विधवाएं काम के आस में खड़ी रहती हैं क्येांकि तुअर की दाल जब से 100 रुपए किलो पर पहुंची है, उनकी 200 रुपए की वृद्धावस्था पेंशन का कोई मतलब नहीं रह गया है। भूख तब होती है जब अन्न उगाने वालों को खुद भोजन की सुरक्षा नहीं मिलती। भूख तब पैदा होती है जब हम यह जानते हैं कि इस देश में प्रत्येक किसान परिवार में प्रति व्यक्ति मासिक व्यय के रूप में 503 रुपए का साठ फीसदी खाने पर खर्च हो जाता है। और ऐसे में लोग संपादकीय लिख कर उत्सव मनाते हैं कि बढ़ती खाद्यान्न कीमतों से किसानों को फायदा हो रहा है। इस देश के 75 फीसदी किसान खुले बाजार से राशन खरीदते हैं, इसलिए अनाज की कीमतों में बदलाव उन पर गंभीर असर डालता है। भूख उस व्यापक बेरोजगारी से पैदा हो रही है जिसे इस देश में शुरू हुए 18 साल बीत गए। महाराष्ट्र जैसे औद्योगीकृत राज्य में मंदी से पहले का नजारा देखें। मंदी शुरू होने से के 36 महीनों में महाराष्ट्र में 20 लाख नौकरियां गईं। एक लाइन में देखें तो यह कुछ ऐसे बनता हैः कुल रोजगारों में गिरावट, 43 लाख से 41 लाख पर आया आंकड़ा। आप इसे अनदेखा कर सकते हैं यह सोच कर कि बस दो लाख नौकरियां ही गई हैं। लेकिन इसका मतलब यह हुआ कि 1800 नौकरियां महाराष्ट्र में उस दौर में खत्म हो रही थीं। सोचिए कि भूख के मोर्चे पर इसके क्या प्रभाव होंगे। मीडिया आखिर कैसे भूख के इस मसले से जुड़ता है? कैसे वह कृषि के मसले से जुड़ता है? 1997 से 2008 के बीच दो लाख किसानों ने आत्महत्या की। दो जनगणनाओं के बीच में 80 लाख लोगों ने खेती छोड़ दी। वास्तविक आत्महत्या के मामलों से कहीं ज्यादा खुदकुशी की कोशिश के मामले हैं। 1991 से 2001 के बीच कर्जदारी नाटकीय तरीके से बढ़ी। इसके अलावा बहुत कुछ है जो हम नहीं भी जानते। कृषि ऋण तेजी से बढ़ता जा रहा है, और इसका पचास फीसदी उन बैंकों से दिया जाता है जो महानगरों और शहरों में हैं, अधिकतर मुंबई में। ये सभी ठेकेदार किसान हैं, अनुबंध खेती करते हैं। और इस कर्ज को हम कृषि ऋण के नाम से जानते हैं! सोचिए यह स्टोरी किसने की? किसी पत्रकार ने नहीं, रिजर्व बैंक के एक शोधार्थी ने। 30 अगस्त को आरबीआई के एक शोधार्थी ने इस बारे में द हिंदू में लिखा था। यह जो पचास फीसदी कर्ज शहरों और महानगरों की बैंक शाखाओं से दिया गया, इसमें से अधिकांश दो कंपनियों की झोली में गया। आप इनके नाम बता सकते हैं। दोनों कंपनियां इंसानियत की सेवा, खासकर ग्रामीण भारत की सेवा के लिए जानी जाती हैं।

मैं आपको यह उदाहरण पहले भी दे चुका हूं। आत्महत्याओं के सबसे खराब वर्ष में सिर्फ छह पत्रकार थे जो इसे कवर कर रहे थे, जब 2006 में 4453 किसानों ने खुदकुशी की। उस वक्त विदर्भ में सिर्फ छह पत्रकार इसे कवर कर रहे थे। विदर्भ केरल के दोगुने आकार का है। यहां के 11 जिलों में छह प्रभावित जिले मिला कर पंजाब के आकार का 2000 गुना हैं। इतनी भी छोटी जगह नहीं है। हम ऐसी जगह की बात कर रहे हैं जो कई यूरोपीय देशों से भी आकार में बड़ा है। उसी दौरान लैकमे फैशन वीक भी चल रहा था जिसे कवर करने 512 मान्यता प्राप्त पत्रकार मौजूद थे। सीएमएस की लैब ने पिछले चार साल यानी 2005, 06, 07, 08 में कृषि मामलों की टीवी और अखबारों में कवरेज पर हमें कुछ आंकड़े दिए हैं। 2005 में 0.1 फीसदी, 2006 में 0.6 फीसदी, 2007 में 0.19 फीसदी और 2008 में 0.29 फीसदी। 2006 में यह बढ़ कर 0.6 फीसदी इसलिए हो गया क्योंकि प्रधानमंत्री का विदर्भ दौरा हुआ था। प्रधानमंत्री को कवर करना कृषि को कवर करना बन गया। आप देख सकते हैं कि हम कैसे अपने दौर की सबसे बड़ी प्रक्रियाओं के साथ जुड़ रहे हैं। इस मामले में अखबार हालांकि टीवी चैनलों से बेहतर रहे, और अंग्रेजी अखबार हिंदी के अखबारों के मुकाबले बेहतर।

अपने समय की सबसे प्रभावशाली प्रक्रिया असमानता के साथ हम आखिर कैसे जुड़ते हैं? इस देश में असमानता चौंकाने वाली है। भारत को लें जो डॉलर अरबपतियों के मामले में दुनिया में पांचवें स्थान पर है। इसमें 49 ऐसे अरबपति हैं जिनकी संपत्ति देश के सकल घरेलू उत्पाद के एक-चौथाई से एक-तिहाई के बीच है। और मानव विकास सूचकांक में आप 134वें स्थान पर हैं। दुनिया के सबसे धनी दस लोगों में चार भारतीय हैं यानी अमेरिकियों से भी ज्यादा। इनमें एक, मेरा पसंसदीदा अरबपति मुंबई में रहता है जिसने आज तक का सबसे बड़ा घर बनवाया है- साठ माले की ऊंचाई के बराबर 27 माले का घर। और यह ज्यादा बहुत सादा घर है जहां सिर्फ चार हेलीपैड हैं। इसको बनाने में दो अरब डॉलर लग गए एक ऐसे शहर में जहां की आधे से ज्यादा आबादी झुग्गियों और सड़कों पर रहती है। दूसरे छोर पर जनता है। वह करोड़ों जनता जो रोजाना सवा डॉलर भी नहीं कमाती। 83.6 करोड़ रोजाना 20  रुपए से भी कम पर गुजारा करते हैं। इस संदर्भ में रोजगार को लें। टाटा के जमशेदपुर प्लांट में 88000  कामगारों से दस लाख टन स्टील बनाया जाता था। 2005 तक उत्पादन बढ़कर 50 लाख टन हो गया, कामगारों की संख्या 44000 पर पहुंच गई। बजाज 24000 मजदूरों की मदद से 10 लाख दुपहिया वाहन बनाता था। अब उत्पादन दोगुना हो चुका है और मजदूरों की संख्या आधे से कम। जो देश मेडिकल टूरिज्म के नाम पर चौड़ा होता है, वहां 28 फीसदी मरीज इलाज के बारे में सोच तक नहीं सकते।

किसी भी क्षेत्र में असमानता को देखें। किसी भी क्षेत्र में व्यावसायीकरण को देखें। दरअसल, इसी ढांचे के भीतर पेड न्यूज का जन्म होता है। पेड न्यूज का कोई विकल्प नहीं है। पेड न्यूज के बारे में बहुत से सवाल हैं। मसलन, क्या यह प्रिंट जितना पुराना है। कुछ पुराने निराशावादी पत्रकार हैं जो कहते मिल जाएंगे, 'अरे यार, तुम क्या लिखते हो। तीस साल से मैं ये देख रहा हूं।' मैं कहता हूं- तीस साल से देख रहे हो तो क्या किया तीस साल में?' पेड न्यूज हवा में नहीं पैदा हुआ है। इसके पीछे एक पूरी प्रक्रिया काम कर रही है। इससे पहले इस दशक में मीडियानेट, प्राइवेट ट्रीटी जैसी तमाम चीजें आईं, लेकिन मौजूदा दौर में जो हो रहा है वह तो बिलकुल साफ है। दूसरा सवाल पेड न्यूज को लेकर यह उठाया जाता है कि क्या यह पत्रकारीय भ्रष्टाचार है या कुछ और? कुछ दिन पहले यहीं एक चर्चा में जिसमें आप में से कुछ लोग मौजूद थे, इसे पत्रकारों के मत्थे मढ़ा गया था। आखिर पत्रकार अपने पास बची-खुची स्पेस को कुछ कौड़ियों के मोल क्यों गंवा देते हैं? यह सवाल पत्रकारों पर सटीक बैठता है। लेकिन यह एक बिलकुल अलग सवाल ही है। जिस रूप में पेड न्यूज आज हमारे सामने मौजूद है, वह दरअसल मीडिया कंपनियों द्वारा एक संगठित वसूली है। 'छापो और अभिशप्त हो जाओ' वाले सिद्धांत का यह ठीक उलटा है- कि हमारे यहां नहीं छपे तो बरबाद हो जाओगे। मेरे दोस्त करन थापर ने मुझसे एक कार्यक्रम में पूछा था, 'साइनाथ, नेता मीडिया का दोहन कैसे करते हैं?' सौदेबाजी से! वह सौदेबाजी, जिसमें मीडिया उन्हें ब्लैकमेल कर के उनसे पैसे वसूलता जाता है। यही हुआ भी है। पेड न्यूज की पहली शिकायत एक बड़े नेता ने की थी जो तब केंद्र में राज्यमंत्री थे और प्रेस काउंसिल के सदस्य हैं। वह भी बहुत पले पत्रकार हुआ करते थे। उन्होंने मुझे कॉल कर के कहा कि उनसे उनके क्षेत्र को कवर करने के बदले में 20 लाख रुपए मांगे गए हैं। यह देश में पेड न्यूज की पहली शिकायत थी। हालांकि बाद में जब प्रांजय गुहा ठाकुरता की रिपोर्ट को दबाया गया और गवाहों के गवाही देने की बारी आई तो उन्होंने अपने पांव वापस खींच लिए क्योंकि विदर्भ के इस बड़े मीडिया समूह ने उन पर मुकदमा करने की धमकी दी थी। वह वोटिंग से दूर रहे। इतने मजबूत हैं ये मीडिया समूह। तो क्या यह पत्रकारीय भ्रष्टाचार है? मैं कहूंगा कि यह संगठित और ढांचागत भ्रष्टाचार है मीडिया कंपनियों द्वारा, क्योंकि जब यह सब चल रहा था तो एक वरिष्ठ मराठी पत्रकार ने मुझे फोन कर के कहा कि अगली स्टोरी में उनका नाम आने वाला है लेकिन उन्होंने इसके बदले में कोई पैसे नहीं लिए।

सबसे पहले इस बात को समझना जरूरी है कि पेड न्यूज को को भी कई तरीकों से गढ़ा गया। आपमें से जो पत्रकार हैं, वे जानते हैं कि पेड न्‍यूज कितने तरीके की होती है- प्रीपेड, पोस्टपेड और वैसी जिनका भुगतान नहीं हुआ यानी वे उम्मीदवार जो हार गए और जिन्हें अब भी बकाया चुकाना है। इसमें डीलक्स शुल्क और आम आदमी शुल्क की श्रेणी भी होती है। अब देखिए कि किन-किन स्तरों पर यह काम करता है। पहला एक पीआर एजेंसी का स्तर है जिसे बड़ी पार्टियों से बड़े ठेके मिले, फिर उसने इसे डिजाइन एजेंसियों को दे दिया जिन्होंने पीआर एजेंसी की सोच के मुताबिक बनाया। इसके बाद इसे विज्ञापन एजेंसियों को बांटा गया। यहां आपको हर स्तर पर भ्रष्टाचार घुसा हुआ मिल जाएगा। दूसरा स्तर क्षेत्रीय या जिला स्तरीय है जहां स्थानीय नेता किसी बड़े अखबार के स्थानीय संस्करण के साथ सौदा कर लेता है। इसके बाद आम आदमी शुल्क की बारी आती है। इसमें वे तमाम आम उम्मीदवार आते हैं जिनके पास पैसा नहीं था। उनके फोन कॉल्स की झड़ी लग गई। वे कहते थे, 'साब, जरा मेरा पेड न्यूज देखिए ना, 2000 रुपया तक मैं दे सकता हूं।' आपके पास पैसा नहीं है तो आपका सफाया तय है। अशोक चव्हाण के प्रतिद्वंद्वी का मामला लें। वह एक पूर्व मंत्री है, हम उसका नाम नहीं जानते। नांदेड़ का वह एक काफी सम्मानित सर्जन भी है। नांदेड़ में किसी को उनका नाम तक पता नहीं चला। किसी टीवी चैनल और अखबार ने उनका नाम नहीं छापा क्योंकि उन्होंने पैसे नहीं दिए। उनका नाम है डॉ. माधव किदवलकर। अक्सर ऐसा हुआ कि प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार का नाम ही सामने नहीं आया कि लोग उसे जान पाते। इसके बाद आता है बड़े स्तर सौदा, जहां देश के चौथे बड़े अखबार में 156 रंगीन पन्ने अशोक चव्हाण से पट गए। इस बारे में उन्होंने चुनाव आयोग से क्या कहा, 'मैं कैसे जान सकता हूं कि वे मुझे इतना चाहते हैं और मेरे बारे में इतना लिखना चाहते हैं। अगर ऐसा है तो मैं क्या करूं।' अखबार कहता है कि हम कांग्रेसी हैं और अशोक चव्हाण के बड़े प्रशंसक हैं जो कि 11 महीने से मुख्यमंत्री हैं। बहरहाल, बराक ओबामा भी किसी अखबार के पांच पन्ने नहीं बंटोर सके, जो कि 200 साल में पहले अश्वेत अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जबकि अशोक चव्हाण को 156 पन्ने। इस अखबार की प्रसार संख्या 15 लाख है यानी 15 लाख प्रतियां छापी गईं और 156 पन्ने के हिसाब से सोचें कि कितनी स्याही लगी और कागज लगा। सोचिए कि कितने करोड़ का मामला रहा होगा। यह बेहद गंभीर बात है आपके लिए और मेरे लिए भी क्योंकि इसका अर्थ यह हुआ कि चुनावों की मीडिया कवरेज में आम आदमी और आम औरत को बिलकुल गायब कर दिया गया। लेकिन जैसा कि मैंने पहले बताया, यह सब बहुत तार्किक है। कैसे? जैसा कि प्रांजय अपनी बेहतरीन रिपोर्ट में बताते हैं, जब प्राइवेट ट्रीटी का अवमूल्यन होने लगा तब भी टाइम्स जैसे अखबारों को विज्ञापन से आई कमाई पर आयकर चुकाना ही होता था। पेड न्यूज नेताओं के लिए कारगर है। चुनावों में यह इसलिए काम आता है क्योंकि इसके सहारे नेता चुनाव प्रचार पर किए जाने वाले खर्च की बंदिश को तोड़ पाते हैं। अखबारों के लिए यह इसलिए मुफीद है क्योंकि यह पूरी तरह नकद विनिमय होता है जिस पर कर नहीं देना होता। खैर, वह रिपोर्ट जबरदस्त है। उसे पढ़ा जाना चाहिए। दूसरी बात, मुझे इतनी पेड न्‍यूज की खबरें कहां से मिलीं? दो खबरों के बाद मैं घर से बाहर भी नहीं गया उन्हें लाने और मेरे घर में 32 किलो पेड न्यूज से भरे पैकेट जमा हो गए। महाराष्ट्र भर के युवा पत्रकार मराठी से अंग्रेजी में अनुवाद कर-कर के मेरे घर पर पेड न्यूज के मामले भेजते रहे जो उनके दफ्तरों में जारी था। यह अद्भुत था। सोचा जा सकता है कि भारतीय पत्रकारिता में आदर्शवाद अब भी जिंदा है।

आखिरी हिस्से पर आते हैं। अतीत के प्रति द्वेष और मोह के बीच मैं कभी भी अतीत के सुनहरे दिनों के मोह में नहीं पड़ा। अतीत में बुरे दिन भी रहे हैं, भीषण दिन भी रहे हैं तो अच्छे दिन भी, और भविष्य में भी अच्छे दिन आएंगे। पीछे मुड़ कर देखना और कहना कि हमारे वक्त में सब कुछ अच्छा था, ठीक नहीं। पत्रकारिता के साथ समस्याएं हमेशा से रही हैं, लेकिन शुरुआती आठ बिंदुओं में मैंने मीडिया के जिस निगमीकरण की बात कही है वह सबसे महत्वपूर्ण है। एक चीज मैं बताना भूल गया। किसी ने एक अध्ययन किया था- चुनावों के दौरान जब आम तौर पर विज्ञापनों से राजस्व बढ़ जाता है, तो महाराष्ट्र में यह नीचे आ गया क्योंकि हर कोई पेड न्यूज पर पैसा फूंक रहा था। महाराष्ट्र के प्रेस में चुनावों के दौरान जब विज्ञापन का राजस्व उच्चतम होना चाहिए था, तो उसमें गिरावट आई। इसे अपने यहां के चुनावों से जोड़ कर देखें।

अब उन क्षेत्रों को देखें जिनमें भारतीय मीडिया जुड़ा हुआ है। सरसरी निगाह दौड़ाएं- उड्डयन, कृषि, होटल, रेस्टोरेंट, विज्ञापन, ट्रैवेल एजेंसी, धर्मार्थ कृषि कार्य, व्यापार, सीमेंट, जूट, शिपिंग, स्टील, कास्टिंग, रसायन, कृषि रसायन, कपास, रबड़, चाय, कॉफी, टायर, डेयरी, चीनी, रीयल एस्टेट। रीयल एस्टेट की बात न ही करें तो अच्छा है। तमाम मीडिया कंपनियां रीयल एस्टेट से इतना कमाती हैं कि उन्हें फोर्थ एस्टेट की जगह रीयल एस्टेट कहना ही बेहतर होगा। इसके अलावा कपड़ा उद्योग, फाइबर, उत्पाद शुल्क ठेकेदार, बैंक, बिजली, कैप्टिव पावर प्लांट, किताबें, संगीत, जिप्सम खनन, कोयला, चिटफंड, कागज, प्रसंस्करित खाद्य, परिवहन, इलेक्ट्रॉनिक्स, फिल्म, क्रिकेट, आईपीएल, टीक, सूचना उद्योग, हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, सरकारी ठेके, आदि। मुकेश अंबानी की आईपीएल टीम मुंबई इंडियंस का पिछले साल प्रायोजक कौन था? न्यू इंडिया एश्योरेंस। आखिर एक सरकारी कंपनी दुनिया के चौथे सबसे अमीर आदमी की टीम के लिए जूते क्यों खरीदेगी? खैर। पेड न्यूज के अलावा टीवी पर प्रमोशनल अग्रीमेंट भी चलते हैं। क्या कभी आपने सोचा है कि बड़े बैनर वाली हिंदी फिल्में कभी-कभार अंग्रेजी चैनलों पर हिंदी चैनलों के मुकाबले ज्यादा प्रचार क्यों पा जाती हैं? यह प्राइवेट ट्रीटी का टीवी संस्करण है। एक और चीज पर आपको ध्यान देना चाहिए। मीडिया और कॉरपोरेट सेक्टर के बीच के इस सेतु पर। हर महीने करीब कोई न कोई टीवी चैनल या अखबार बिजनेस लीडरशिप पुरस्कार देता फिरता है। आप कौन हैं भाई? और आप कौन होते हैं बिजनेस के लिए पुरस्कार देने वाले? आप पत्रकारिता के लिए पुरस्कार दें तो ठीक है। यह अच्छा होता। क्या मीडिया कभी सबसे अच्छी नर्स, सबसे अच्छे डॉक्टरों या अध्यापकों के लिए पुरस्कार देता है? वही बिजनेस लीडर बदले में सर्वश्रेष्ठ टीवी पुरस्‍कार और सर्वश्रेष्ठ अखबार का पुरस्कार इन्हें दे डालते हैं।

आखिर इस घुसपैठ का क्या किया जाए? हमारे सामने क्या विकल्प हैं? यह विचार कि आप मीडिया की समस्याओं को मीडिया के भीतर ही हल कर लेंगे, काम नहीं करने वाला। मीडिया अब हरेक क्षेत्र में इतने गहरे घुसा हुआ है कि आप इसे अलग से नहीं बरत सकते। इसे भी किसी अन्य कॉरपोरेट इकाई की तरह ही बरतना होगा। वे जहां कहीं भी कॉरपोरेट इकाई हैं, उन्हें कॉरपोरेट कानूनों को मानना ही होगा। इन्हें संज्ञान में लिए बगैर यदि आप बदलाव लाने की बात सोच रहे हैं तो वह टिक नहीं पाएगा। चीजें वापस आ जाएंगी। फिर आपको एकाधिकार से जुड़े तमाम कानूनों को पढ़ना होगा। हम जो कुछ भी कर सकते हैं उसे एक तरफ रख दें, तो एक बात साफ है कि हमें कॉरपोरेट एकाधिकार को चुनौती देनी होगी। दूसरे, आपमें से जो भी लोग मीडिया से सरोकार रखते हैं और जिसके पास पैसा है, उन्हें दो-तीन छोटे प्रकाशनों की मदद करनी होगी जो लीक से अलग हट कर काम करते हैं और अपनी जान की कीमत पर आपको सूचनाएं देते हैं। यदि आप छोटी पत्रिकाएं नहीं खरीदते हैं तो मुझे लगता है कि आप अपना पैसा सही जगह नहीं लगा रहे। तीसरे, इसे एक व्यापक जनतांत्रिक संघर्ष के हिस्से के तौर पर लीजिए। सिर्फ पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को ही मीडिया के बारे में बात करने का हक नहीं है। आप सभी को हक है कि आप भारतीय राजनीति के पतन के बारे में और मीडिया के कुकर्मों के बारे में मुद्दों को उछाल सकें, जैसे कि पेड न्यूज।

मेरे घर पर 32 किलो जो पेड न्‍यूज के पैकेट आए, उनसे उम्मीद बंधती है कि मीडिया में प्रतिरोध अब भी जिंदा है। आप बहुत अन्य चीजें भी कर सकते हैं, लेकिन इसे इतना आसान मत समझें। यह तो सिर्फ मीडिया की बात हुई जबकि यह मोटे तौर पर देश में हमजोली पूंजीवाद, जुआरी पूंजीवाद के विकास से जुड़ी चीज भी है, और उन कॉरपोरेशनों से भी जिन्होंने इस देश में अपनी जड़ें जमा ली हैं।

पी. साइनाथ ने यह व्‍याख्‍यान दिल्‍ली के कांस्टिट़यूशन क्‍लब में पिछले साल दिया था। उसके संपादित अंश प्रस्‍तुत हैं।

A Structural Compulsion  To Lie


जिस तरह किसी जंग को जनरलों के जिम्मे पूरी तरह नहीं छोड़ा जा सकता, उसी तरह हम यह मानते हैं कि मीडिया को भी सिर्फ पत्रकारों के हाथ में नहीं छोड़ा जाना चाहिए क्योंकि मीडिया जो कुछ करता है उसका असर समूचे समाज पर, हम पर, आप पर पड़ता है, फिर आपको यह पसंद आए या न आए।

मीडिया हर साल ताकतवर लोगों की एक सूची निकालता है। उसे आप देखें। ऐसी तमाम सूचियों में मेरी दिलचस्पी एक ही में है, हालांकि यह वह नहीं जो मैं चाहता हूं। यह देश की सबसे ताकतवर 50 कंपनियों की सूची है। इसमें ऐसी तमाम कंपनियां हैं जिन्हें हम मीडिया कंपनियों के रूप में जानते हैं, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इसमें ढेर सारी ऐसी कंपनियां हैं जो घोषित तौर पर तो मीडिया कंपनी नहीं हैं, लेकिन जो मीडिया के क्षेत्र में बड़े खिलाड़ी हैं। दरअसल, कई तो वास्तव में घोषित मीडिया कंपनियों से भी ज्यादा बड़ी हैं। हम इस पर वापस आएंगे क्योंकि अगर मैं आपको मीडिया कंपनियों के मीडिया से बाहर के हितों की सूची गिनाना शुरू करूं तो बता दूं कि पिछली रात मैंने ऐसा किया भी था और 108 तक तो पहुंच गया। लेकिन हमारे पास इतना समय नहीं है। मीडिया की ताकत का एक बड़ा अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि 2008 के सितंबर से मीडिया में जो कुछ भी हो रहा है उस पर कैसे चुप्पी साधे रखी गई है। सितंबर 2008 में 3000  पत्रकारों को नौकरी से निकाला गया। इसके अलावा कैमरामैन, सहयोगी और मीडिया की अन्य कुल 3000 नौकरियां खत्म हो गईं। और यह सब मुट्ठी भर मीडिया समूहों में हुआ। अकेले महाराष्ट्र में तीन टीवी चैनलों और एक अखबार से 2009 में 450 नौकरियां गईं। ये आंकड़े मोटे है क्योंकि बदकिस्मती से हमारे यहां उस किस्म की यूनियनें अब नहीं रह गई हैं जैसी अस्‍सी के दशक में हुआ करती थीं जब हम आसानी से खत्म हुई नौकरियों की संख्या गिन लेते थे। एक संस्थान ने तो नए कैरियर का वादा करके 180 पत्रकारों को तीन महीने पहले उनकी लगी-लगाई नौकरियों से तोड़ लिया था। वह बंद हो गया और अब ये सभी लोग सड़क पर हैं। महाराष्ट्र में एक मीडिया समूह ने एक झटके में 249 पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया। इस पूरे मामले में विडंबना देखिए कि ये पत्रकार उन्हीं अखबारों और चैनलों से निकाले जा रहे हैं जो रोज आपके सामने मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी, चिदंबरम और कुछ दूसरों के वित्तीय प्रबंधन का राग अलापते रहते हैं कि कैसे इसके चलते भारत मंदी से बच गया, यहां मंदी कभी आई ही नहीं और मीडिया जबरदस्त बहाली कर रहा है। वही अखबार जो नौकरियां खा रहे हैं आपको बताते हैं कि सब कुछ ठीक है। जब मंदी अपने चरम पर थी, तब एक दिन के टाइम्स ऑफ इंडिया की हेडिंग देखिए- 'वॉट रिसेशन'। वह बताता है कि शहरी इलाकों के मुकाबले गांवों में कारों की बिक्री बेहतर है। इसकी भी वजह है, लेकिन अगर आप पत्रकारिता नहीं करते तो नहीं जान पाएंगे। बहरहाल, दुनिया भर में जो कुछ चल रहा है यह उसका एक हिस्सा भी है।

अमेरिका में एक साल में 35885 नौकरियां मीडिया में चली गईं जिसकी शुरुआत सितंबर 2008 में हुई थी। यह अध्ययन वहां की एक पत्रिका ने छापा था जिसे अमेरिकी व्यापार जगत की बाइबल कहा जाता है। यह 108 साल पुरानी पत्रिका है। आपको पता है कि जब संपादक और प्रकाशक ने इस स्टोरी को छापा तो क्या हुआ। अगले ही अंक में संपादक, प्रकाशक और इसके सभी कर्मचारियों को अपना बोरिया-बिस्तर समेट लेना पड़ा। अब यह सिर्फ ऑनलाइन दिखती है। प्रिंट में इसका कोई संस्करण नहीं। खैर, मैंने जब यह विषय सुझाया था तो मैं जरा सा चिंतित था कि आखिर झूठ बोलने की व्यवस्थागत मजबूरी को मैं समझाऊंगा कैसे। आज आपके सामने जो बुनियादी बात मैं रखना चाह रहा हूं वह कोई अच्छे लोगों या बुरे लोगों, खराब पत्रकारों और खराब प्रशिक्षण या फिर अच्छे पत्रकारों या अच्छे प्रशिक्षण के बारे में नहीं है। मैं यह कहना चाह रहा हूं कि आर्थिक नीतियों और गतिविधियों के साथ इतने गहरे तरीके से जुड़े हुए, शेयर बाजार से इतना करीबी रिश्ता रखे हुए इस मीडिया में झूठ बोलना दरअसल उसकी ढांचागत मजबूरी है, बाध्यता है क्योंकि सच बोलना वे अफोर्ड ही नहीं कर सकते। आइए एक उदाहरण देते हैं। प्राइवेट ट्रीटी को लें- ऐसा नहीं है कि अकेले टाइम्स ऑफ इंडिया ही प्राइवेट ट्रीटी के धंधे में है। दूसरे भी ऐसा ही करते हैं, लेकिन अलग-अलग नामों से। ये प्राइवेट ट्रीटी है क्या बला!

मान लें कि एक मध्यम आकार का रीटेलर दुनिया के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार के साथ ट्रीटी में आता है। आखिर वह ऐसा क्‍यों करता है, इसलिए क्योंकि वह बड़े रीटेलरों की जमात में शामिल होना चाहता है। पैंटालून के किशोर बियानी की बिलकुल यही कहानी है जो एक लघु-मध्यम आकार का रीटेलर था और जिसने 2002 में टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ प्राइवेट ट्रीटी की। टाइम्स ऑफ इंडिया या अन्य कोई भी अखबार जब किसी कंपनी के साथ प्राइवेट ट्रीटी का समझौता करता है तो वह उसकी सात से दस फीसदी हिस्सेदारी को खरीद लेता है और उसके बदले में यह गारंटी देता है कि उसकी निगेटिव कवरेज नहीं की जाएगी और उसका विज्ञापन सुनिश्चित किया जाएगा। ऐसे में अखबार के पत्रकारों के लिए दिक्कत खड़ी हो जाती है, खासकर तब जब उसके 240 कंपनियों के साथ प्राइवेट ट्रीटी के समझौते हों। यहां यह सवाल भी खड़ा होता है कि जब एक अखबार 240 कंपनियों का आंशिक हिस्सेदार बन चुका हो, तो क्या वह अखबार रह भी जाता है या फिर एक इक्विटी फर्म में तब्दील हो जाता है। 240 कंपनियों में शेयर मामूली बात नहीं, ऐसा तो गैर-मीडिया कंपनियों के मालिकाने का भी पैटर्न नहीं होता। यह संयोग नहीं है कि अगर आप भारतीय मीडिया कंपनियों में स्वामित्व और हिस्सेदारी के पैटर्न को तलाशने चलें तो निश्चित तौर पर आप पागल हो जाएंगे। इसे बेन बैगडिकियन ने अपनी प्रसिद्ध किताब 'मीडिया मोनोपोली' में कहा है 'कॉरपोरेट व्यभिचार के भीतर कॉरपोरेट व्यभिचार'। भारतीय मीडिया के निगमीकरण का यह तरीका ही तय करता है कि आपको झूठ बोलना ही है। मान लीजिए कि मेरे पास 240 प्राइवेट ट्रीटी हैं और इन शेयरों के रिटर्न की कीमत अरबों में है। अचानक मंदी आती है और मेरे शेयर कौड़ियों के मोल रह जाते हैं। एक ही तरीका है जिससे मैं बच सकता हूं, कि लोगों को यह बताऊं कि बाजार उछाल पर है। भले ही बाजार की हालत सड़े हुए अंडे की हो, यहां सवाल सिर्फ मेरे शेयरों का नहीं है पूरे बाजार का है। मुझे पाठकों को बताना ही है कि बाजार तेजी से बहाली कर रहा है, जबरदस्त वापसी हो रही है, नहीं तो मैं मर जाऊंगा। यानी झूठ बोलना आपकी ढांचागत बाध्यता है। इसका कोई विकल्प नहीं। इसीलिए देश के दो सबसे बड़े अखबारों ने अपने डेस्क पर फतवा जारी कर दिया कि 'मंदी' शब्द का इस्तेमाल ही नहीं करना है। डेस्क को बताया गया कि भारत में तो मंदी है ही नहीं, अमेरिका में है। हां, आर्थिक रफ्तार अवश्य धीमी हो सकती है। पहले हम 90 पर अगर थे तो अब 80 पर हैं, बस! इसीलिए आपको इन दोनों अखबारों में 'मंदी' नाम का शब्द भी नहीं दिखेगा, सिवाय उस हेडलाइन के जो कहती है 'कैसी मंदी' (वॉट रिसेशन)। यानी कुछ महीनों के दौरान भारत में मंदी को जबरन नहीं आने दिया गया। बात यह है कि कि दरअसल उन्होंने शेयर बाजार में इतना भारी निवेश किया हुआ है कि वे आपसे सच बोल ही नहीं सकते।

संयोगवश, ये सारे रुझान सभी क्षेत्रों में दिखाई देते हैं, लेकिन एक ऐसा क्षेत्र है जहां इसकी जबरदस्त अभिव्यक्ति हमें देखने को मिलती है- इंडियन प्रीमियर लीग। अखबार आईपीएल टीमों के मालिकान हैं। डेकन चार्जर्स का मालिक डेकन क्रॉनिकल है। कोलकाता टेलीग्राफ कोलकाता नाइटराइडर्स का मीडिया प्रायोजक है। इस समूचे ढांचे का निर्माण दरअसल उस एक सूत्र के इर्द-गिर्द हुआ है जिसे मैं कहता हूं एबीसी यानी एडवर्टाइजिंग, बॉलीवुड और कॉरपोरेट सत्ता। ये तीन चीजें ही आज भारतीय मीडिया को चला रही हैं। इसी संदर्भ में मैं यह भी कहना चाहूंगा कि आज पेड न्यूज कोई विकृति नहीं है। जी हां, पेड न्यूज कोई विकृति नहीं, मीडिया के साथ जो कुछ किया गया है वह दरअसल उसकी तार्किक परिणति भर है। आप अगर समाज के हर पहलू का अतिव्यावसायीकरण करते जाएं, मीडिया के हर कल्पनीय पक्ष का व्यावसायीकरण करते जाएं, तो ऐसे में कैसे यह उम्मीद लगा सकते हैं कि खबर इस सब से अनछुई रह जाएगी। ऐसा नहीं होगा। जब आपने हर चीज को धंधा बना डाला और सब कुछ बेचने में लगे हैं तो खबरों को भी बेचना ही पड़ेगा। यहां उन छह-सात प्रक्रियाओं को मैं आपको गिनाना चाहूंगा जो आज भारतीय मीडिया में जारी हैं। पहला, हमारे समय के मीडिया का बुनियादी लक्षण जैसा कि मैंने कई बार कहा भी है जन संचार और जन यथार्थ के बीच बढ़ती दूरी है। दूसरा, गरीबों पर पूरी तरह से व्यवस्था के स्तर पर परदा डाल दिया गया है। यह उनकी उपेक्षा नहीं है, दरअसल गरीबों की मीडिया को जरूरत ही नहीं। इन तमाम अखबारों में जो निर्देश दिए जाते हैं वे साफ बताते हैं कि आपका लक्षित पाठक कौन है और कौन नहीं, किन क्षेत्रों में हमारी दिलचस्पी है, किन रिहाइशों में हमें जाना है, इत्यादि। इसका मतलब समझाने के लिए मैं आपको एक मिसाल देता हूं। आप अखबारों की बीट पर नजर डालें। किसी भी अखबार में एक पूर्णकालिक कृषि संवाददाता नहीं होता। द हिंदू में है, जो दूसरे स्तंभकारों से उलट खेतों में चला जाता है। लोग समझते हैं कि वह मैं हूं, लेकिन मेरा काम सिर्फ इस तक ही सीमित नहीं है। मुझे और चीजें भी कवर करनी होती हैं, पलायन आदि। ग्रामीण इलाकों का मतलब सिर्फ खेती नहीं है, वह बस एक प्रमुखता है। इसी तरह अखबारों में पूर्णकालिक श्रम संवाददाता आपको नहीं मिलेंगे। श्रम की बीट वह रिपोर्टर कवर करता है जो उद्योग आदि देखता है। वह मजदूरों के बारे में प्रबंधन से बात करता है। कंपनी का पीआरओ उसे मजदूरों के बारे में बताता है। यानी श्रम संवाददाता भी अखबारों से खत्म हो चुके हैं। और जब आप कहते हैं कि हमें कृषि और श्रम संवाददाता की जरूरत नहीं, तो दरअसल आप यह कह रहे होते हैं कि आपको देश की 75 फीसदी आबादी से बात नहीं करनी। आप कह रहे होते हैं कि 75 फीसदी आबादी से खबर नहीं बनती। क्या उस देश में मजदूर खबर नहीं हैं जहां सितंबर 2008 के बाद से 40 लाख रोजगार खत्म हो चुके? सरकारी अनुमानों के मुताबिक ही अकेले निर्यात केंद्रित उद्योगों में सितंबर 2008 से मई 2009 के बीच 15 लाख नौकरियां गईं। सितंबर 2008 के बाद पहली तिमाही में पांच लाख नौकरियां। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में तो मंदी शुरू होने से पहले ही लाखों नौकरियां चली गईं, और आप कह रहे हैं कि मजदूर खबर नहीं होते। तीसरी बात! मीडिया के एजेंडे पर कॉरपोरेट कब्जा और खुद मीडिया पर कॉरपोरेट कब्जा। अलग-अलग मीडिया समूहों की वेबसाइट पर जाकर उनके निदेशक बोर्ड में लिखे नाम देखिए, काफी दिलचस्प होगा। मैकडोनाल्ड के प्रमुख, ऐसे लोग जो जनरल इलेक्ट्रॉनिक्स के बोर्ड सदस्य हैं, मोबिल ऑयल के बोर्ड सदस्य जैसे नाम मिल जाएंगे। भारत के शीर्ष कॉरपोरेट प्रमुख किसी न किसी मीडिया समूह के निदेशक बोर्ड में बैठे आपको मिल जाएंगे। यह वाकई कॉरपोरेट व्यभिचार के भीतर कॉरपोरेट व्यभिचार है। मीडिया का चौथा लक्षण मेरे हिसाब से यह है कि लोकतंत्र की सभी संस्थाओं में अकेले मीडिया सामाजिक रूप से सबसे ज्यादा विभेदकारी स्तंभ है। खराब से खराब सरकार का भी प्रतिनिधित्व किसी न किसी सामाजिक तबके में होता ही है क्योंकि यह संविधान और कानून द्वारा अनिवार्य है। मीडिया में दलितों को खोज कर दिखाइए। आदिवासियों को खोजिए। किसी भी मीडिया में इन्हें किसी भी प्रमुख पद पर आप खोज कर दिखाइए। यह आसान नहीं होगा। उन जगहों पर ये शायद मिल जाएं जहां कुछ लोगों ने निजी तौर पर उनकी मौजूदगी को बढ़ाने के लिए सचेतन फैसले लिए होंगे।

अगली बात। जैसा कि मेरे मित्र प्रो. प्रभात पटनायक कहते हैं, मीडिया का नैतिक जगत खिसक गया है और यह बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसा इस देश में ही हुआ है, जाहिर है कि मीडिया में भी होगा। इस बात को कृषि संकट से ही समझने की कोशिश करें। पिछले 50 साल में सबसे बड़ा कृषि संकट फिलवक्त जारी है। साठ और सत्तर के दशक में हमारे यहां बड़े पैमाने पर किसान संघर्ष हुआ करते थे। नब्बे और 2000 के दशक में हमारे यहां बड़े पैमाने पर किसान आत्महत्याएं हो रही हैं। भारत कैसे सोचता है, इसमें कुछ बेहद बुनियादी बदलाव आया है। यह देश, समाज कैसे काम करता है उसके बारे में कुछ बेहद बुनियादी चीज बदली है। आखिर जन संघर्ष क्यों आत्महत्याओं में तब्दील हो गए? इनकी गति सामान्य या गैर-कृषि आबादी में हो रही आत्महत्याओं से भी तेज है और इस बारे में कोई कुछ नहीं कर रहा। मीडिया का नैतिक जगत दरअसल बदल चुका है।

छठी बात, सत्‍ता प्रतिष्ठान और कॉरपोरेट सत्ता में एक प्रमुख स्थान रखने वाले मीडिया का अगर कोई वैचारिक आधार है तो वो यह कि यह राजनीतिक रूप से स्वतंत्र है लेकिन मुनाफे की गुलामी में जकड़ा हुआ है। हम राजनीतिक रूप् से स्वतंत्र होंगे यदि हम ऐसा चुनना चाहें। आखिर आप पत्रकारिता को कैसे नापते हैं? क्या कोई पैमाना है जिसके आधार पर हम कह सकें कि ये अच्छी पत्रकारिता है और वो बुरी या फिर फलां प्रासंगिक पत्रकारिता है? हां। मैं मानता हूं कि ऐसा एक पैमाना है। मैं मानता हूं कि अच्छी पत्रकारिता, प्रासंगिक पत्रकारिता को हमेशा इस आधार पर तय किया जाएगा कि हम अपने समय की सबसे बड़ी परिघटनाओं के साथ कैसे खुद को जोड़ते हैं। चाहे वह थॉमस पेन और फ्रेंच क्रांति व अमेरिकी क्रांति का रिश्ता हो या फिर गांधी, आंबेडकर और भगत सिंह के साथ आजादी के आंदोलन का रिश्ता। किसी भी दौर की पत्रकारिता का इस आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा कि वह अपने दौर की विशाल प्रक्रियाओं के साथ कैसे जुड़ती है, कैसा बरताव करती है। तो हमारे दौर की विशाल प्रक्रियाएं हैं क्या? आइए, मैं कुछ मुट्ठी भर गिनाता हूं। हम 1973-74 के बाद अपने इतिहास में सबसे ज्यादा महंगाई के दौर में हैं। ठीक इसी वक्त हम देख रहे हैं कि आबादी में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन खाद्यान्न की उपलब्धता तेजी से गिर रही है। 2005 से 2008 के बीच यह उपलब्धता 432 ग्राम प्रतिदिन थी जो कि 1955-58  के दौर के आंकड़ों से काफी कम है। यह भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण का आंकड़ा है। इसका मतलब यह कि भूख के मोर्चे पर बहुत बुनियादी स्तर पर बदलाव हो रहा है। दूसरी बड़ी प्रक्रिया बेरोजगारी से जुड़ी है। तीसरी, पिछले पचास साल में सबसे बड़ा कृषि संकट। चौथी, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट से पैदा हुआ व्यापक विस्थापन। पांचवीं प्रक्रिया के रूप में हम एक स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर अपने समाज में तेजी से बढ़ती असमानता को पाते हैं। छठवीं प्रक्रिया हमारे इतिहास में चल रही सबसे बड़ी लूट और हड़प का खेल है। एक हमजोली जुआरी पूंजीवाद जो अब देखने में आ रहा है। कॉमनवेल्थ खेलों के नाम पर हमारे यहां जो कुछ हो रहा है नया नहीं है। यह रोजाना हमारे समाज में होता है। बस हुआ ये है कि सब कुछ एक जगह एक समय में एक हाई प्रोफाइल संस्थान में चल रहा है। वरना इमारतें ऐसे ही बनाई जाती हैं, ठेके ऐसे ही दिए जाते हैं। कुछ भी नया नहीं है। सब कुछ वैसे ही चल रहा है। कुछ चीजें बस हमें इसलिए पसंद नहीं आतीं क्योंकि हम इस बात को लेकर ज्यादा चिंतित हो जाते हैं कि दुनिया हमें कैसे देख रही है। दुनिया मतलब जाहिर तौर पर गोरों की दुनिया।

इन प्रक्रियाओं के साथ दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता मीडिया कैसे खुद को जोड़ता है? मिसाल के तौर पर भूख को ही लें। वही मीडिया जो जेसिका लाल या रुचिका गिरहोत्रा के मामले पर न्यायपालिका के हस्तक्षेप को लेकर इतना उत्साहित होता है, खूब वाहवाही करता है, उसके द्वारा भूख के मामले में दखल देने पर संपादकीय लिखने लगता है कि न्यायपालिका कुछ ज्यादा ही दखल दे रही है। ठीक उसी वक्त सरकार द्वारा गठित तीन कमेटियां एक ही बात कहती हैं कि सरकार को ग्रामीण गरीबी के आंकड़ों में सुधार कर उसे आबादी के 42-50 फीसदी के बजाय 77 फीसदी पर ले आना चाहिए। लेकिन इससे मीडिया को कोई फर्क नहीं पड़ता। इन कमेटियों में सबसे छोटी तेंदुलकर कमेटी कहती है कि सरकारी अनुमानों के मुकाबले गांवों में गरीबी बहुत ज्यादा है। इसी दौरान मंत्रियों का विशेषाधिकार प्राप्त समूह खाद्य सुरक्षा पर बैठक करता है और पहली बात जो बैठक की कार्यवाही के रूप में दर्ज की जाती है वो यह है कि 'यह विधेयक खाद्य सुरक्षा पर है, इसका पोषण सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं है।' तो आइए देखते हैं कि आखिर भूख का मतलब क्या है।

भूख वह है जैसा कि हमने इन गर्मियों में महसूस किया, जो बारिश आते और बदतर हो जाती है क्योंकि लोगों के पास करने को कोई काम नहीं होता। भूख के कुछ चेहरे देखें- जब गर्मी अपने उफान पर थी और तापमान 49 डिग्री पर था और सरकार स्कूलों को बंद कर रही थी, गांवों की मांएं गुहार लगा रही थीं कि स्कूलों को खोले रखा जाए ताकि उनके बच्चों को एक वक्त तो कायदे का भोजन मिल सके। और जब आप तेलंगाना जाते हैं, तो वे आपको घेर लेती हैं और कहती हैं कि आप अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उनकी बात कलक्टर तक पहुंचाएं। जब मुंबई शहर के बाहरी इलाकों में स्कूलों के अध्यापक हमसे कहते हैं कि सोमवार को मिड डे मील के राशन का कोटा दोगुना होना चाहिए, तो वह भूख होती है। क्यों भला? क्योंकि बच्चा शनिवार और इतवार को भूखा रहा था। पिछली बार कायदे का भर पेट खाना उसे शुक्रवार की दोपहर मिला था। और अध्यापक मुझे बताते हैं कि उनमें से कोई भी सोमवार को एक बजे से पहले पढ़ाने को तैयार नहीं क्योंकि बच्चे पढ़ाई पर ध्यान ही नहीं देंगे। यह भूख नरेगा की लाइनों में दिखती है जब 74 साल के पुरुष और 65 साल की विधवाएं काम के आस में खड़ी रहती हैं क्येांकि तुअर की दाल जब से 100 रुपए किलो पर पहुंची है, उनकी 200 रुपए की वृद्धावस्था पेंशन का कोई मतलब नहीं रह गया है। भूख तब होती है जब अन्न उगाने वालों को खुद भोजन की सुरक्षा नहीं मिलती। भूख तब पैदा होती है जब हम यह जानते हैं कि इस देश में प्रत्येक किसान परिवार में प्रति व्यक्ति मासिक व्यय के रूप में 503 रुपए का साठ फीसदी खाने पर खर्च हो जाता है। और ऐसे में लोग संपादकीय लिख कर उत्सव मनाते हैं कि बढ़ती खाद्यान्न कीमतों से किसानों को फायदा हो रहा है। इस देश के 75 फीसदी किसान खुले बाजार से राशन खरीदते हैं, इसलिए अनाज की कीमतों में बदलाव उन पर गंभीर असर डालता है। भूख उस व्यापक बेरोजगारी से पैदा हो रही है जिसे इस देश में शुरू हुए 18 साल बीत गए। महाराष्ट्र जैसे औद्योगीकृत राज्य में मंदी से पहले का नजारा देखें। मंदी शुरू होने से के 36 महीनों में महाराष्ट्र में 20 लाख नौकरियां गईं। एक लाइन में देखें तो यह कुछ ऐसे बनता हैः कुल रोजगारों में गिरावट, 43 लाख से 41 लाख पर आया आंकड़ा। आप इसे अनदेखा कर सकते हैं यह सोच कर कि बस दो लाख नौकरियां ही गई हैं। लेकिन इसका मतलब यह हुआ कि 1800 नौकरियां महाराष्ट्र में उस दौर में खत्म हो रही थीं। सोचिए कि भूख के मोर्चे पर इसके क्या प्रभाव होंगे। मीडिया आखिर कैसे भूख के इस मसले से जुड़ता है? कैसे वह कृषि के मसले से जुड़ता है? 1997 से 2008 के बीच दो लाख किसानों ने आत्महत्या की। दो जनगणनाओं के बीच में 80 लाख लोगों ने खेती छोड़ दी। वास्तविक आत्महत्या के मामलों से कहीं ज्यादा खुदकुशी की कोशिश के मामले हैं। 1991 से 2001 के बीच कर्जदारी नाटकीय तरीके से बढ़ी। इसके अलावा बहुत कुछ है जो हम नहीं भी जानते। कृषि ऋण तेजी से बढ़ता जा रहा है, और इसका पचास फीसदी उन बैंकों से दिया जाता है जो महानगरों और शहरों में हैं, अधिकतर मुंबई में। ये सभी ठेकेदार किसान हैं, अनुबंध खेती करते हैं। और इस कर्ज को हम कृषि ऋण के नाम से जानते हैं! सोचिए यह स्टोरी किसने की? किसी पत्रकार ने नहीं, रिजर्व बैंक के एक शोधार्थी ने। 30 अगस्त को आरबीआई के एक शोधार्थी ने इस बारे में द हिंदू में लिखा था। यह जो पचास फीसदी कर्ज शहरों और महानगरों की बैंक शाखाओं से दिया गया, इसमें से अधिकांश दो कंपनियों की झोली में गया। आप इनके नाम बता सकते हैं। दोनों कंपनियां इंसानियत की सेवा, खासकर ग्रामीण भारत की सेवा के लिए जानी जाती हैं।

मैं आपको यह उदाहरण पहले भी दे चुका हूं। आत्महत्याओं के सबसे खराब वर्ष में सिर्फ छह पत्रकार थे जो इसे कवर कर रहे थे, जब 2006 में 4453 किसानों ने खुदकुशी की। उस वक्त विदर्भ में सिर्फ छह पत्रकार इसे कवर कर रहे थे। विदर्भ केरल के दोगुने आकार का है। यहां के 11 जिलों में छह प्रभावित जिले मिला कर पंजाब के आकार का 2000 गुना हैं। इतनी भी छोटी जगह नहीं है। हम ऐसी जगह की बात कर रहे हैं जो कई यूरोपीय देशों से भी आकार में बड़ा है। उसी दौरान लैकमे फैशन वीक भी चल रहा था जिसे कवर करने 512 मान्यता प्राप्त पत्रकार मौजूद थे। सीएमएस की लैब ने पिछले चार साल यानी 2005, 06, 07, 08 में कृषि मामलों की टीवी और अखबारों में कवरेज पर हमें कुछ आंकड़े दिए हैं। 2005 में 0.1 फीसदी, 2006 में 0.6 फीसदी, 2007 में 0.19 फीसदी और 2008 में 0.29 फीसदी। 2006 में यह बढ़ कर 0.6 फीसदी इसलिए हो गया क्योंकि प्रधानमंत्री का विदर्भ दौरा हुआ था। प्रधानमंत्री को कवर करना कृषि को कवर करना बन गया। आप देख सकते हैं कि हम कैसे अपने दौर की सबसे बड़ी प्रक्रियाओं के साथ जुड़ रहे हैं। इस मामले में अखबार हालांकि टीवी चैनलों से बेहतर रहे, और अंग्रेजी अखबार हिंदी के अखबारों के मुकाबले बेहतर।

अपने समय की सबसे प्रभावशाली प्रक्रिया असमानता के साथ हम आखिर कैसे जुड़ते हैं? इस देश में असमानता चौंकाने वाली है। भारत को लें जो डॉलर अरबपतियों के मामले में दुनिया में पांचवें स्थान पर है। इसमें 49 ऐसे अरबपति हैं जिनकी संपत्ति देश के सकल घरेलू उत्पाद के एक-चौथाई से एक-तिहाई के बीच है। और मानव विकास सूचकांक में आप 134वें स्थान पर हैं। दुनिया के सबसे धनी दस लोगों में चार भारतीय हैं यानी अमेरिकियों से भी ज्यादा। इनमें एक, मेरा पसंसदीदा अरबपति मुंबई में रहता है जिसने आज तक का सबसे बड़ा घर बनवाया है- साठ माले की ऊंचाई के बराबर 27 माले का घर। और यह ज्यादा बहुत सादा घर है जहां सिर्फ चार हेलीपैड हैं। इसको बनाने में दो अरब डॉलर लग गए एक ऐसे शहर में जहां की आधे से ज्यादा आबादी झुग्गियों और सड़कों पर रहती है। दूसरे छोर पर जनता है। वह करोड़ों जनता जो रोजाना सवा डॉलर भी नहीं कमाती। 83.6 करोड़ रोजाना 20  रुपए से भी कम पर गुजारा करते हैं। इस संदर्भ में रोजगार को लें। टाटा के जमशेदपुर प्लांट में 88000  कामगारों से दस लाख टन स्टील बनाया जाता था। 2005 तक उत्पादन बढ़कर 50 लाख टन हो गया, कामगारों की संख्या 44000 पर पहुंच गई। बजाज 24000 मजदूरों की मदद से 10 लाख दुपहिया वाहन बनाता था। अब उत्पादन दोगुना हो चुका है और मजदूरों की संख्या आधे से कम। जो देश मेडिकल टूरिज्म के नाम पर चौड़ा होता है, वहां 28 फीसदी मरीज इलाज के बारे में सोच तक नहीं सकते।

किसी भी क्षेत्र में असमानता को देखें। किसी भी क्षेत्र में व्यावसायीकरण को देखें। दरअसल, इसी ढांचे के भीतर पेड न्यूज का जन्म होता है। पेड न्यूज का कोई विकल्प नहीं है। पेड न्यूज के बारे में बहुत से सवाल हैं। मसलन, क्या यह प्रिंट जितना पुराना है। कुछ पुराने निराशावादी पत्रकार हैं जो कहते मिल जाएंगे, 'अरे यार, तुम क्या लिखते हो। तीस साल से मैं ये देख रहा हूं।' मैं कहता हूं- तीस साल से देख रहे हो तो क्या किया तीस साल में?' पेड न्यूज हवा में नहीं पैदा हुआ है। इसके पीछे एक पूरी प्रक्रिया काम कर रही है। इससे पहले इस दशक में मीडियानेट, प्राइवेट ट्रीटी जैसी तमाम चीजें आईं, लेकिन मौजूदा दौर में जो हो रहा है वह तो बिलकुल साफ है। दूसरा सवाल पेड न्यूज को लेकर यह उठाया जाता है कि क्या यह पत्रकारीय भ्रष्टाचार है या कुछ और? कुछ दिन पहले यहीं एक चर्चा में जिसमें आप में से कुछ लोग मौजूद थे, इसे पत्रकारों के मत्थे मढ़ा गया था। आखिर पत्रकार अपने पास बची-खुची स्पेस को कुछ कौड़ियों के मोल क्यों गंवा देते हैं? यह सवाल पत्रकारों पर सटीक बैठता है। लेकिन यह एक बिलकुल अलग सवाल ही है। जिस रूप में पेड न्यूज आज हमारे सामने मौजूद है, वह दरअसल मीडिया कंपनियों द्वारा एक संगठित वसूली है। 'छापो और अभिशप्त हो जाओ' वाले सिद्धांत का यह ठीक उलटा है- कि हमारे यहां नहीं छपे तो बरबाद हो जाओगे। मेरे दोस्त करन थापर ने मुझसे एक कार्यक्रम में पूछा था, 'साइनाथ, नेता मीडिया का दोहन कैसे करते हैं?' सौदेबाजी से! वह सौदेबाजी, जिसमें मीडिया उन्हें ब्लैकमेल कर के उनसे पैसे वसूलता जाता है। यही हुआ भी है। पेड न्यूज की पहली शिकायत एक बड़े नेता ने की थी जो तब केंद्र में राज्यमंत्री थे और प्रेस काउंसिल के सदस्य हैं। वह भी बहुत पले पत्रकार हुआ करते थे। उन्होंने मुझे कॉल कर के कहा कि उनसे उनके क्षेत्र को कवर करने के बदले में 20 लाख रुपए मांगे गए हैं। यह देश में पेड न्यूज की पहली शिकायत थी। हालांकि बाद में जब प्रांजय गुहा ठाकुरता की रिपोर्ट को दबाया गया और गवाहों के गवाही देने की बारी आई तो उन्होंने अपने पांव वापस खींच लिए क्योंकि विदर्भ के इस बड़े मीडिया समूह ने उन पर मुकदमा करने की धमकी दी थी। वह वोटिंग से दूर रहे। इतने मजबूत हैं ये मीडिया समूह। तो क्या यह पत्रकारीय भ्रष्टाचार है? मैं कहूंगा कि यह संगठित और ढांचागत भ्रष्टाचार है मीडिया कंपनियों द्वारा, क्योंकि जब यह सब चल रहा था तो एक वरिष्ठ मराठी पत्रकार ने मुझे फोन कर के कहा कि अगली स्टोरी में उनका नाम आने वाला है लेकिन उन्होंने इसके बदले में कोई पैसे नहीं लिए।

सबसे पहले इस बात को समझना जरूरी है कि पेड न्यूज को को भी कई तरीकों से गढ़ा गया। आपमें से जो पत्रकार हैं, वे जानते हैं कि पेड न्‍यूज कितने तरीके की होती है- प्रीपेड, पोस्टपेड और वैसी जिनका भुगतान नहीं हुआ यानी वे उम्मीदवार जो हार गए और जिन्हें अब भी बकाया चुकाना है। इसमें डीलक्स शुल्क और आम आदमी शुल्क की श्रेणी भी होती है। अब देखिए कि किन-किन स्तरों पर यह काम करता है। पहला एक पीआर एजेंसी का स्तर है जिसे बड़ी पार्टियों से बड़े ठेके मिले, फिर उसने इसे डिजाइन एजेंसियों को दे दिया जिन्होंने पीआर एजेंसी की सोच के मुताबिक बनाया। इसके बाद इसे विज्ञापन एजेंसियों को बांटा गया। यहां आपको हर स्तर पर भ्रष्टाचार घुसा हुआ मिल जाएगा। दूसरा स्तर क्षेत्रीय या जिला स्तरीय है जहां स्थानीय नेता किसी बड़े अखबार के स्थानीय संस्करण के साथ सौदा कर लेता है। इसके बाद आम आदमी शुल्क की बारी आती है। इसमें वे तमाम आम उम्मीदवार आते हैं जिनके पास पैसा नहीं था। उनके फोन कॉल्स की झड़ी लग गई। वे कहते थे, 'साब, जरा मेरा पेड न्यूज देखिए ना, 2000 रुपया तक मैं दे सकता हूं।' आपके पास पैसा नहीं है तो आपका सफाया तय है। अशोक चव्हाण के प्रतिद्वंद्वी का मामला लें। वह एक पूर्व मंत्री है, हम उसका नाम नहीं जानते। नांदेड़ का वह एक काफी सम्मानित सर्जन भी है। नांदेड़ में किसी को उनका नाम तक पता नहीं चला। किसी टीवी चैनल और अखबार ने उनका नाम नहीं छापा क्योंकि उन्होंने पैसे नहीं दिए। उनका नाम है डॉ. माधव किदवलकर। अक्सर ऐसा हुआ कि प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार का नाम ही सामने नहीं आया कि लोग उसे जान पाते। इसके बाद आता है बड़े स्तर सौदा, जहां देश के चौथे बड़े अखबार में 156 रंगीन पन्ने अशोक चव्हाण से पट गए। इस बारे में उन्होंने चुनाव आयोग से क्या कहा, 'मैं कैसे जान सकता हूं कि वे मुझे इतना चाहते हैं और मेरे बारे में इतना लिखना चाहते हैं। अगर ऐसा है तो मैं क्या करूं।' अखबार कहता है कि हम कांग्रेसी हैं और अशोक चव्हाण के बड़े प्रशंसक हैं जो कि 11 महीने से मुख्यमंत्री हैं। बहरहाल, बराक ओबामा भी किसी अखबार के पांच पन्ने नहीं बंटोर सके, जो कि 200 साल में पहले अश्वेत अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जबकि अशोक चव्हाण को 156 पन्ने। इस अखबार की प्रसार संख्या 15 लाख है यानी 15 लाख प्रतियां छापी गईं और 156 पन्ने के हिसाब से सोचें कि कितनी स्याही लगी और कागज लगा। सोचिए कि कितने करोड़ का मामला रहा होगा। यह बेहद गंभीर बात है आपके लिए और मेरे लिए भी क्योंकि इसका अर्थ यह हुआ कि चुनावों की मीडिया कवरेज में आम आदमी और आम औरत को बिलकुल गायब कर दिया गया। लेकिन जैसा कि मैंने पहले बताया, यह सब बहुत तार्किक है। कैसे? जैसा कि प्रांजय अपनी बेहतरीन रिपोर्ट में बताते हैं, जब प्राइवेट ट्रीटी का अवमूल्यन होने लगा तब भी टाइम्स जैसे अखबारों को विज्ञापन से आई कमाई पर आयकर चुकाना ही होता था। पेड न्यूज नेताओं के लिए कारगर है। चुनावों में यह इसलिए काम आता है क्योंकि इसके सहारे नेता चुनाव प्रचार पर किए जाने वाले खर्च की बंदिश को तोड़ पाते हैं। अखबारों के लिए यह इसलिए मुफीद है क्योंकि यह पूरी तरह नकद विनिमय होता है जिस पर कर नहीं देना होता। खैर, वह रिपोर्ट जबरदस्त है। उसे पढ़ा जाना चाहिए। दूसरी बात, मुझे इतनी पेड न्‍यूज की खबरें कहां से मिलीं? दो खबरों के बाद मैं घर से बाहर भी नहीं गया उन्हें लाने और मेरे घर में 32 किलो पेड न्यूज से भरे पैकेट जमा हो गए। महाराष्ट्र भर के युवा पत्रकार मराठी से अंग्रेजी में अनुवाद कर-कर के मेरे घर पर पेड न्यूज के मामले भेजते रहे जो उनके दफ्तरों में जारी था। यह अद्भुत था। सोचा जा सकता है कि भारतीय पत्रकारिता में आदर्शवाद अब भी जिंदा है।

आखिरी हिस्से पर आते हैं। अतीत के प्रति द्वेष और मोह के बीच मैं कभी भी अतीत के सुनहरे दिनों के मोह में नहीं पड़ा। अतीत में बुरे दिन भी रहे हैं, भीषण दिन भी रहे हैं तो अच्छे दिन भी, और भविष्य में भी अच्छे दिन आएंगे। पीछे मुड़ कर देखना और कहना कि हमारे वक्त में सब कुछ अच्छा था, ठीक नहीं। पत्रकारिता के साथ समस्याएं हमेशा से रही हैं, लेकिन शुरुआती आठ बिंदुओं में मैंने मीडिया के जिस निगमीकरण की बात कही है वह सबसे महत्वपूर्ण है। एक चीज मैं बताना भूल गया। किसी ने एक अध्ययन किया था- चुनावों के दौरान जब आम तौर पर विज्ञापनों से राजस्व बढ़ जाता है, तो महाराष्ट्र में यह नीचे आ गया क्योंकि हर कोई पेड न्यूज पर पैसा फूंक रहा था। महाराष्ट्र के प्रेस में चुनावों के दौरान जब विज्ञापन का राजस्व उच्चतम होना चाहिए था, तो उसमें गिरावट आई। इसे अपने यहां के चुनावों से जोड़ कर देखें।

अब उन क्षेत्रों को देखें जिनमें भारतीय मीडिया जुड़ा हुआ है। सरसरी निगाह दौड़ाएं- उड्डयन, कृषि, होटल, रेस्टोरेंट, विज्ञापन, ट्रैवेल एजेंसी, धर्मार्थ कृषि कार्य, व्यापार, सीमेंट, जूट, शिपिंग, स्टील, कास्टिंग, रसायन, कृषि रसायन, कपास, रबड़, चाय, कॉफी, टायर, डेयरी, चीनी, रीयल एस्टेट। रीयल एस्टेट की बात न ही करें तो अच्छा है। तमाम मीडिया कंपनियां रीयल एस्टेट से इतना कमाती हैं कि उन्हें फोर्थ एस्टेट की जगह रीयल एस्टेट कहना ही बेहतर होगा। इसके अलावा कपड़ा उद्योग, फाइबर, उत्पाद शुल्क ठेकेदार, बैंक, बिजली, कैप्टिव पावर प्लांट, किताबें, संगीत, जिप्सम खनन, कोयला, चिटफंड, कागज, प्रसंस्करित खाद्य, परिवहन, इलेक्ट्रॉनिक्स, फिल्म, क्रिकेट, आईपीएल, टीक, सूचना उद्योग, हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, सरकारी ठेके, आदि। मुकेश अंबानी की आईपीएल टीम मुंबई इंडियंस का पिछले साल प्रायोजक कौन था? न्यू इंडिया एश्योरेंस। आखिर एक सरकारी कंपनी दुनिया के चौथे सबसे अमीर आदमी की टीम के लिए जूते क्यों खरीदेगी? खैर। पेड न्यूज के अलावा टीवी पर प्रमोशनल अग्रीमेंट भी चलते हैं। क्या कभी आपने सोचा है कि बड़े बैनर वाली हिंदी फिल्में कभी-कभार अंग्रेजी चैनलों पर हिंदी चैनलों के मुकाबले ज्यादा प्रचार क्यों पा जाती हैं? यह प्राइवेट ट्रीटी का टीवी संस्करण है। एक और चीज पर आपको ध्यान देना चाहिए। मीडिया और कॉरपोरेट सेक्टर के बीच के इस सेतु पर। हर महीने करीब कोई न कोई टीवी चैनल या अखबार बिजनेस लीडरशिप पुरस्कार देता फिरता है। आप कौन हैं भाई? और आप कौन होते हैं बिजनेस के लिए पुरस्कार देने वाले? आप पत्रकारिता के लिए पुरस्कार दें तो ठीक है। यह अच्छा होता। क्या मीडिया कभी सबसे अच्छी नर्स, सबसे अच्छे डॉक्टरों या अध्यापकों के लिए पुरस्कार देता है? वही बिजनेस लीडर बदले में सर्वश्रेष्ठ टीवी पुरस्‍कार और सर्वश्रेष्ठ अखबार का पुरस्कार इन्हें दे डालते हैं।

आखिर इस घुसपैठ का क्या किया जाए? हमारे सामने क्या विकल्प हैं? यह विचार कि आप मीडिया की समस्याओं को मीडिया के भीतर ही हल कर लेंगे, काम नहीं करने वाला। मीडिया अब हरेक क्षेत्र में इतने गहरे घुसा हुआ है कि आप इसे अलग से नहीं बरत सकते। इसे भी किसी अन्य कॉरपोरेट इकाई की तरह ही बरतना होगा। वे जहां कहीं भी कॉरपोरेट इकाई हैं, उन्हें कॉरपोरेट कानूनों को मानना ही होगा। इन्हें संज्ञान में लिए बगैर यदि आप बदलाव लाने की बात सोच रहे हैं तो वह टिक नहीं पाएगा। चीजें वापस आ जाएंगी। फिर आपको एकाधिकार से जुड़े तमाम कानूनों को पढ़ना होगा। हम जो कुछ भी कर सकते हैं उसे एक तरफ रख दें, तो एक बात साफ है कि हमें कॉरपोरेट एकाधिकार को चुनौती देनी होगी। दूसरे, आपमें से जो भी लोग मीडिया से सरोकार रखते हैं और जिसके पास पैसा है, उन्हें दो-तीन छोटे प्रकाशनों की मदद करनी होगी जो लीक से अलग हट कर काम करते हैं और अपनी जान की कीमत पर आपको सूचनाएं देते हैं। यदि आप छोटी पत्रिकाएं नहीं खरीदते हैं तो मुझे लगता है कि आप अपना पैसा सही जगह नहीं लगा रहे। तीसरे, इसे एक व्यापक जनतांत्रिक संघर्ष के हिस्से के तौर पर लीजिए। सिर्फ पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को ही मीडिया के बारे में बात करने का हक नहीं है। आप सभी को हक है कि आप भारतीय राजनीति के पतन के बारे में और मीडिया के कुकर्मों के बारे में मुद्दों को उछाल सकें, जैसे कि पेड न्यूज।

मेरे घर पर 32 किलो जो पेड न्‍यूज के पैकेट आए, उनसे उम्मीद बंधती है कि मीडिया में प्रतिरोध अब भी जिंदा है। आप बहुत अन्य चीजें भी कर सकते हैं, लेकिन इसे इतना आसान मत समझें। यह तो सिर्फ मीडिया की बात हुई जबकि यह मोटे तौर पर देश में हमजोली पूंजीवाद, जुआरी पूंजीवाद के विकास से जुड़ी चीज भी है, और उन कॉरपोरेशनों से भी जिन्होंने इस देश में अपनी जड़ें जमा ली हैं।

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