शनिवार, 28 जून 2014

मीडिया का घिनौना चरित्र






डा0 रमा शंकर शुक्ल

किसी ज़माने में रहीम ने एक दोहा लिखा था, जो बार-बार मेरे जेहन में कौध उठता है-
ते रहीम अब बिरिछ कंह जिनकर छांह गंभीर
बागन बिच-बिच देखियत सेहुंड कांस करीर।
पत्रकारिता के जो मानदंड हमारे पुरखों ने अपना सम्पूर्ण जीवन दांव पर लगाकर खड़ा किया था, जेल तक जाने से नहीं हिचके थे, उस परंपरा के लोग अब क्यों नहीं मिलते? इस प्रश्न का उत्तर शायद ही कोई मीडिया समूह देना चाहे। मुझे अरविन्द केजरीवाल की बात सही समझ में आती है कि मीडिया ने उनसे दूरी बना राखी है। क्योंकि उन्हें कबरेज देने से मीडिया का व्यवसाय प्रभावित होता है। शायद उनका आकलन कम है, हम इससे भी ज्यादा महसूस कर रहे हैं। समकालीन मीडिया खासकर हिंदी माध्यम के अखबार महज आंचलिक पम्पलेट मात्र बनकर रह गए हैं। वे एक तरह से पेड़ न्यूज या फिर विग्यप्तिजिवी खबरे छापने तक खुद को सिमित रखना चाहते हैं। सत्ता पक्ष की पार्टी की छोटी छोटी खबरों को तस्वीरों के साथ पांच-पांच कालम में प्रकाशित करना और अन्य दलों खी खबरों को एक-दो कालम में प्रकाशित करना तो सामान्य बात है, लेकिन ख़ास बात है कि संवेदनशील मामलों को दो-चार पंक्तियों में निबटा देना चकित कर दे रहा है। यह दशा तब है, जब हिंदी अखबार एक जिले के पूरे परिक्षेत्र तक भी नहीं पढ़े जा रहे। आंचलिकता की दशा तो यह है कि अपने जिले की खबर आप पडोसी जिले में भी पढना चाहें तो आपको दूर-दूर तक दर्शन नहीं होंगे।
आप कोई भी हिंदी अखबार उठा लीजिये, कहीं भी आपको कोई खोजी खबर नहीं मिलेगी। कारण? 1- उनके पास खोजने की कूवत और हिम्मत ही नहीं है। 2- खोज भी लिए तो उस बड़े सच को प्रकाशित करने की तो कतई हिम्मत नहीं है। 3- यदि किसी ने कोई बड़ा पर्दाफास किया तो उसे प्रकाशित करने में जैसे मौत ही हो जाती है। मै यह बात हवा-हवाई नहीं कर रहा हूँ बल्कि पूरे 15 साल अखबार में उप समादक रहने के बाद प्राप्त अनुभवों के आधार पर कर रहा हूँ। एक जो सबसे अहम् बात है कि पूंजीपति और भ्रष्टाचारी से मीडिया के 90 फ़ीसदी सिपहसालारों की बड़ी गहरी यारी होती है। सम्बंधित व्यक्ति के भ्रष्टाचार पर बात शुरू करते ही ऐसे मीडियाकर्मी इतने परेशान हो जाते हैं कि कांफ्रेंस करने वालों को इधर-उधर के सवालों में बेतरह घुमाना शुरू कर देंगे।
घटना01- उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले में लालगंज ब्लाक का एक गाँव है अतरैला राजा। यहाँ के प्रधान डा0 दया शंकर तिवारी पहली बार 2005 में ग्राम प्रधान बने। उन्हें क्षेत्र में एक बेहद शातिर व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। समाज में जितने प्रकार के पद हो सकते हैं, वे उसके स्वयंभू नेता हैं। 2005 के पहले लखपति थे। लेकिन उसके बाद आठ शाल में करोडपति हो गए। आम आदमी पार्टी के एक सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआइ एक्टिविस्ट ने पूरे छह माह मेहनत कर जो साक्ष्य निकाले वे हैरान करने वाले थे। उन्होंने हम लोगों से संपर्क किया। हमने पूरी सावधानी बरतते हुए प्रकरण को अपने साथी और इलाहबाद उच्च न्यायलय के वरिष्ठ अधिवक्ता डा0 अरविदं त्रिपाठी को पूरा प्रकरण सौंप दिया। डा0 त्रिपाठी ने अध्ययन के बाद 24 मार्च 2013 को इसकी जानकारी को देने का कार्यक्रम तय किया। प्रेस कांफ्रेंस में 10 न्यूज चैनल और 05 हिंदी अखबारों के पत्रकार आये। साक्ष्य करीब 70 पन्ने के थे। कुल सो सभी की 15 फ़ाइल बनाने में ही साथियों की कमर टेढ़ी हो गयी। हजारों रुपये खर्च हो गए।
मीडिया को जो जानकारी दी गयी वह संक्षेप में यहाँ प्रस्तुत है :
ग्राम अतारैला राजा, ब्लाक लालगंज, मिर्ज़ापुर के ग्राम प्रधान डा0 दया शंकर तिवारी धसडा राजा, परसिया, गोकुल गाँवों में तब नवम्बर 2006 में गहरीकरण का काम मनारेगा के तहत कराया, जब इन तीनों तालाबों में पानी भरा था। ख़ास बात यह कि गहरीकरण की अनुमति और धन 18-01-2007 को मिली। इसमें भी 56 ऐसे जाब कार्ड धारक रहे, जो इनके ख़ास थे और एक साथ तीनों स्थानों पर काम कर रहे थे। प्रधान जी ने मस्टर रोल बनाकर भारी भुगतान भी कर दिया। ये कार्ड धारक होली के त्यौहार पर भी काम करते दिखाए गए हैं। इन जाब कार्ड धारकों में प्रधान जी के भाई कमला शंकर तिवारी और भतीजा भी शामिल रहे। प्रधान जी ने दूसरी बार 2009-10 में प्रधान बन्ने के बाद 67 इंदिरा, महामाया आवास अपने भाई-बंधुओं और रिश्तेदारों को आवंटित कर दिया। हुई तो जिलाधिकारी संयुक्ता समद्दार ने जिला पंचायत राज अधिकारी को कार्यवाही करने को आदेश दिया। प्रधान जी आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट चले गए। वहां से इनकी याचिका निरस्त हो गयी और प्रधान जी को रिमूवल का आदेश पारित कर दिया। फिर भी जिला पंचायत राज अधिकारी ने प्रधान जी को नहीं हटाया। प्रधान जी ने गाँव की बस्ती के बीच स्थित एक तालाब को मनरेगा के धन से पटवा कर अपने सगे सम्बन्धियों द्वारा कब्जा करवा दिया। साथ ही इस भूमि पर पक्का मकान भी बनवा दिया। शिकायत पर एसडीम ने तहसीलदार को जांच करने को कहा। आरोप सही मिला। कार्रवाई की बारी आई तो प्रधान जी फिर कोर्ट चले गए। कोर्ट ने 25 हजार की पेनालिटी के साथ प्रधान जी की याचिका निरस्त कर दी। आदेश दिया की इन्हें रिमूव कर दिया जाए। इसके अलावा 10 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से हर साल हुए नुक्सान की वसूली भी की जाए। आदेश के दो माह बीत गए, पर जिला प्रशासन ने कोई कार्रवाई न की। इसके अलावा भी अनेक घपले के मामले हैं। अहम् बात यह है की प्रधान जी के पास पहली बार प्रधान बनने के बाद से लेकर आज तक 01 करोड़ 10 लाख की अतिरिक्त आय अर्जित की गयी। जबकि इनके परिवार में कृषि के अलावा अन्य कोई व्यवसाय नहीं है।
लेकिन इस खबर का प्रसारण हैरतनाक रहा। दूसरी सुबह जब हमारे सामने अखबार आये तो अमर उजाला ने तीन कालम में सरसरी तौर पर आरोप दिखाते हुए प्रधान का वर्जन भी प्रकाशित कर दिया, जिसमे उसने कहा था कि यह उसके पूर्व प्रधान का मामला है। अमर उजाला ने यह नहीं लिखा कि पूर्व प्रधान भी तो वही है। दैनिक जागरण के पत्रकार ने तो कांफ्रेंस में ही प्रधान के पक्ष में चिल्लाना शुरू कर दिया। हिन्दुस्तान अखबार के पत्रकार ने भी आपत्ति जताई थी कि पूरे जिले का मामला क्यों नहीं उठा रहे आप। फिर दोनों अखबारों ने इसे समाचार संक्षेप के कालम में दस पंक्तियों में निबटा दिया। अब यह पाठकगण तय करें कि एक करोड़ 10 लाख का गबन यदि एक ग्राम प्रधान ने किया तो इसका प्रसारण किस रूप में होना चाहिए। हमारा मानना है कि जब एक ग्राम पंचायत में मात्र 08 साल में इतना बड़ा घोटाला हो सकता है और मनरेगा से आय का स्रोत इतना बड़ा हो सकता है तो पूरे देश के गाँवों के विकास में आने वाले पैसे का क्या हस्र होता होगा। सौ-दो सौ की चोरी की खबरों को चार कालम देने, प्रेमी-प्रेमिका फुर्र को बाक्स में सजा कर देने वाले अखबार 01 करोड़ 10 लाख के घोटाले को हलके में दस पंक्तियों में निबटा रहे हैं तो समझा जा सकता है इसके पीछे का सच।
वे पत्रकार हैं लूट की नदी तलाश रहे हैं
पानी गरम हुआ तो डूब कर नहा लेंगे।
लेखक आम आदमी पार्टी से जुड़े है।
मीडिया का घिनौना चरित्र
डा0 रमा शंकर शुक्ल
किसी ज़माने में रहीम ने एक दोहा लिखा था, जो बार-बार मेरे जेहन में कौध उठता है-
ते रहीम अब बिरिछ कंह जिनकर छांह गंभीर
बागन बिच-बिच देखियत सेहुंड कांस करीर।
पत्रकारिता के जो मानदंड हमारे पुरखों ने अपना सम्पूर्ण जीवन दांव पर लगाकर खड़ा किया था, जेल तक जाने से नहीं हिचके थे, उस परंपरा के लोग अब क्यों नहीं मिलते? इस प्रश्न का उत्तर शायद ही कोई मीडिया समूह देना चाहे। मुझे अरविन्द केजरीवाल की बात सही समझ में आती है कि मीडिया ने उनसे दूरी बना राखी है। क्योंकि उन्हें कबरेज देने से मीडिया का व्यवसाय प्रभावित होता है। शायद उनका आकलन कम है, हम इससे भी ज्यादा महसूस कर रहे हैं। समकालीन मीडिया खासकर हिंदी माध्यम के अखबार महज आंचलिक पम्पलेट मात्र बनकर रह गए हैं। वे एक तरह से पेड़ न्यूज या फिर विग्यप्तिजिवी खबरे छापने तक खुद को सिमित रखना चाहते हैं। सत्ता पक्ष की पार्टी की छोटी छोटी खबरों को तस्वीरों के साथ पांच-पांच कालम में प्रकाशित करना और अन्य दलों खी खबरों को एक-दो कालम में प्रकाशित करना तो सामान्य बात है, लेकिन ख़ास बात है कि संवेदनशील मामलों को दो-चार पंक्तियों में निबटा देना चकित कर दे रहा है। यह दशा तब है, जब हिंदी अखबार एक जिले के पूरे परिक्षेत्र तक भी नहीं पढ़े जा रहे। आंचलिकता की दशा तो यह है कि अपने जिले की खबर आप पडोसी जिले में भी पढना चाहें तो आपको दूर-दूर तक दर्शन नहीं होंगे।
आप कोई भी हिंदी अखबार उठा लीजिये, कहीं भी आपको कोई खोजी खबर नहीं मिलेगी। कारण? 1- उनके पास खोजने की कूवत और हिम्मत ही नहीं है। 2- खोज भी लिए तो उस बड़े सच को प्रकाशित करने की तो कतई हिम्मत नहीं है। 3- यदि किसी ने कोई बड़ा पर्दाफास किया तो उसे प्रकाशित करने में जैसे मौत ही हो जाती है। मै यह बात हवा-हवाई नहीं कर रहा हूँ बल्कि पूरे 15 साल अखबार में उप समादक रहने के बाद प्राप्त अनुभवों के आधार पर कर रहा हूँ। एक जो सबसे अहम् बात है कि पूंजीपति और भ्रष्टाचारी से मीडिया के 90 फ़ीसदी सिपहसालारों की बड़ी गहरी यारी होती है। सम्बंधित व्यक्ति के भ्रष्टाचार पर बात शुरू करते ही ऐसे मीडियाकर्मी इतने परेशान हो जाते हैं कि कांफ्रेंस करने वालों को इधर-उधर के सवालों में बेतरह घुमाना शुरू कर देंगे।
घटना01- उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले में लालगंज ब्लाक का एक गाँव है अतरैला राजा। यहाँ के प्रधान डा0 दया शंकर तिवारी पहली बार 2005 में ग्राम प्रधान बने। उन्हें क्षेत्र में एक बेहद शातिर व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। समाज में जितने प्रकार के पद हो सकते हैं, वे उसके स्वयंभू नेता हैं। 2005 के पहले लखपति थे। लेकिन उसके बाद आठ शाल में करोडपति हो गए। आम आदमी पार्टी के एक सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआइ एक्टिविस्ट ने पूरे छह माह मेहनत कर जो साक्ष्य निकाले वे हैरान करने वाले थे। उन्होंने हम लोगों से संपर्क किया। हमने पूरी सावधानी बरतते हुए प्रकरण को अपने साथी और इलाहबाद उच्च न्यायलय के वरिष्ठ अधिवक्ता डा0 अरविदं त्रिपाठी को पूरा प्रकरण सौंप दिया। डा0 त्रिपाठी ने अध्ययन के बाद 24 मार्च 2013 को इसकी जानकारी को देने का कार्यक्रम तय किया। प्रेस कांफ्रेंस में 10 न्यूज चैनल और 05 हिंदी अखबारों के पत्रकार आये। साक्ष्य करीब 70 पन्ने के थे। कुल सो सभी की 15 फ़ाइल बनाने में ही साथियों की कमर टेढ़ी हो गयी। हजारों रुपये खर्च हो गए।
मीडिया को जो जानकारी दी गयी वह संक्षेप में यहाँ प्रस्तुत है :
ग्राम अतारैला राजा, ब्लाक लालगंज, मिर्ज़ापुर के ग्राम प्रधान डा0 दया शंकर तिवारी धसडा राजा, परसिया, गोकुल गाँवों में तब नवम्बर 2006 में गहरीकरण का काम मनारेगा के तहत कराया, जब इन तीनों तालाबों में पानी भरा था। ख़ास बात यह कि गहरीकरण की अनुमति और धन 18-01-2007 को मिली। इसमें भी 56 ऐसे जाब कार्ड धारक रहे, जो इनके ख़ास थे और एक साथ तीनों स्थानों पर काम कर रहे थे। प्रधान जी ने मस्टर रोल बनाकर भारी भुगतान भी कर दिया। ये कार्ड धारक होली के त्यौहार पर भी काम करते दिखाए गए हैं। इन जाब कार्ड धारकों में प्रधान जी के भाई कमला शंकर तिवारी और भतीजा भी शामिल रहे। प्रधान जी ने दूसरी बार 2009-10 में प्रधान बन्ने के बाद 67 इंदिरा, महामाया आवास अपने भाई-बंधुओं और रिश्तेदारों को आवंटित कर दिया। हुई तो जिलाधिकारी संयुक्ता समद्दार ने जिला पंचायत राज अधिकारी को कार्यवाही करने को आदेश दिया। प्रधान जी आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट चले गए। वहां से इनकी याचिका निरस्त हो गयी और प्रधान जी को रिमूवल का आदेश पारित कर दिया। फिर भी जिला पंचायत राज अधिकारी ने प्रधान जी को नहीं हटाया। प्रधान जी ने गाँव की बस्ती के बीच स्थित एक तालाब को मनरेगा के धन से पटवा कर अपने सगे सम्बन्धियों द्वारा कब्जा करवा दिया। साथ ही इस भूमि पर पक्का मकान भी बनवा दिया। शिकायत पर एसडीम ने तहसीलदार को जांच करने को कहा। आरोप सही मिला। कार्रवाई की बारी आई तो प्रधान जी फिर कोर्ट चले गए। कोर्ट ने 25 हजार की पेनालिटी के साथ प्रधान जी की याचिका निरस्त कर दी। आदेश दिया की इन्हें रिमूव कर दिया जाए। इसके अलावा 10 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से हर साल हुए नुक्सान की वसूली भी की जाए। आदेश के दो माह बीत गए, पर जिला प्रशासन ने कोई कार्रवाई न की। इसके अलावा भी अनेक घपले के मामले हैं। अहम् बात यह है की प्रधान जी के पास पहली बार प्रधान बनने के बाद से लेकर आज तक 01 करोड़ 10 लाख की अतिरिक्त आय अर्जित की गयी। जबकि इनके परिवार में कृषि के अलावा अन्य कोई व्यवसाय नहीं है।
लेकिन इस खबर का प्रसारण हैरतनाक रहा। दूसरी सुबह जब हमारे सामने अखबार आये तो अमर उजाला ने तीन कालम में सरसरी तौर पर आरोप दिखाते हुए प्रधान का वर्जन भी प्रकाशित कर दिया, जिसमे उसने कहा था कि यह उसके पूर्व प्रधान का मामला है। अमर उजाला ने यह नहीं लिखा कि पूर्व प्रधान भी तो वही है। दैनिक जागरण के पत्रकार ने तो कांफ्रेंस में ही प्रधान के पक्ष में चिल्लाना शुरू कर दिया। हिन्दुस्तान अखबार के पत्रकार ने भी आपत्ति जताई थी कि पूरे जिले का मामला क्यों नहीं उठा रहे आप। फिर दोनों अखबारों ने इसे समाचार संक्षेप के कालम में दस पंक्तियों में निबटा दिया। अब यह पाठकगण तय करें कि एक करोड़ 10 लाख का गबन यदि एक ग्राम प्रधान ने किया तो इसका प्रसारण किस रूप में होना चाहिए। हमारा मानना है कि जब एक ग्राम पंचायत में मात्र 08 साल में इतना बड़ा घोटाला हो सकता है और मनरेगा से आय का स्रोत इतना बड़ा हो सकता है तो पूरे देश के गाँवों के विकास में आने वाले पैसे का क्या हस्र होता होगा। सौ-दो सौ की चोरी की खबरों को चार कालम देने, प्रेमी-प्रेमिका फुर्र को बाक्स में सजा कर देने वाले अखबार 01 करोड़ 10 लाख के घोटाले को हलके में दस पंक्तियों में निबटा रहे हैं तो समझा जा सकता है इसके पीछे का सच।
वे पत्रकार हैं लूट की नदी तलाश रहे हैं
पानी गरम हुआ तो डूब कर नहा लेंगे।

प्रस्तुति-- बलि कोकट, वर्धा

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