शनिवार, 28 जून 2014

विश्व युद्ध को याद करता सारायेवो






प्रस्तुति-- दिनेश कुमार सिन्हा / अखौरी प्रमोद

बोस्नियाई राजधानी सारायेवो के एक पुल पर ऑस्ट्रिया के राजकुमार फर्डीनांड की हत्या हुई और उसके बाद पूरा विश्व युद्ध की आग में झोंका गया. प्रथम विश्व युद्ध के 100 साल पूरे होने पर सारायेवो उस घटना को याद कर रहा है.
बोस्नियाई सर्ब राष्ट्रवादी ने प्रिंस फ्रांस फर्डीनांड और उनकी पत्नी की हत्या कर दी थी, इसके बाद यूरोपीय शक्तियां गुटों में बंट कर आपस में तलवारें भांजने लगीं और बढ़ते बढ़ते इस युद्ध ने दूसरे हिस्सों को भी अपनी चपेट में ले लिया. चार साल तक यह निरर्थक युद्ध चलता रहा.
जर्मनी ने 1915 में पहली बार मस्टर्ड गैस का इस्तेमाल किया, जिस पर उसकी काफी निंदा हुई. बेल्जियम में जिस जगह इसका प्रयोग हुआ, वहीं 100 साल बाद पुराने "दुश्मनों" ने एक साथ फूल चढ़ाए. लेकिन इससे बड़ी बात बोस्नियाई राजधानी में राष्ट्राध्यक्षों के आना है, जहां वे प्रथम विश्व युद्ध की 100वीं बरसी मनाने जुट रहे हैं.
इसी पुल पर हुई राजकुमार फर्डीनांड और उनकी पत्नी की हत्या.
हीरो या विलेन
बोस्नियाई सर्ब इतिहासकार स्लाबोदान सोया का कहना है, "28 जून को हर किसी को (सर्ब मुस्लिम और क्रोएशियाई) सारायेवो लाना असंभव था." यूगोस्लाविया का बनना बिगड़ना भी पिछले सदी की ही घटना थी, जो 1990 के दशक में टूट गया. इस बीच सर्ब राष्ट्रवादी गावरिलो प्रिंसिप को लेकर चर्चा आज भी जारी है, जिसने 1914 में आर्चड्यूक की हत्या की थी. उस वक्त प्रिंसिप सिर्फ 19 साल का था.
सारायेवो की मुस्लिम आबादी प्रिंसिप को एक आतंकवादी मानती है. उसकी पहचान सर्बों से होती है, जिन्होंने 1990 में सारायेवो को घेर लिया था. बोस्निया के इतिहासकार हुस्नीजा काम्बेरोविच का कहना है, "जब सेना सारायेवो पर बमबारी कर रही थी, गावरिलो प्रिंसिप सर्ब आजादी के प्रतीक की तरह का काम कर रहा था." शहर ने प्रिंसिप के नाम की दो पट्टियों को हटा दिया है और एक पुल जो उसके नाम पर कर दिया गया था, उसका नामकरण 1914 के पहले के हिसाब से कर दिया गया है.
लेकिन सर्बों के लिए तो वह हीरो था, जो ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्यवाद से उन्हें आजादी दिलाना चाहता था. प्रिंसिप की जेल में 1918 में मौत हो गई. दो साल बाद उसकी अस्थियों को सारायेवो लाकर दफना दिया गया और हाल तक उसे मिट्टी का लाल कहा जाता रहा. प्रथम विश्व युद्ध के 100 साल होने पर सर्ब नेताओं ने सारायेवो में शिरकत करने से मना कर दिया है. इसकी जगह वे अपना अलग कार्यक्रम करेंगे, जिसमें रिपब्लिका सर्पस्का के राष्ट्रपति मिलोराड डोडिच और फिल्मकार अमीर कुस्तुरीचा हिस्सा लेंगे. बोस्नियाई राष्ट्र के अंदर का कुछ हिस्सा सर्बों के कब्जे में है, जिसे रिपब्लिका सर्पस्का कहते हैं.
अपना अपना राग
जख्मों को याद करता बोस्निया
सारायेवो के दूसरे हिस्से, पूर्वी बोस्निया और सर्बियाई राजधानी बेलग्रेड में प्रिंसिप की मूर्ति का अनावरण किया जाएगा. सौवीं बरसी कार्यक्रम के फ्रांसीसी दल का का नेतृत्व कर रहे योजेफ सिमेट का कहना है, "सारायेवो में 28 जून के कार्यक्रम सर्बिया या रिपब्लिका सर्पस्का पर हमला नहीं है."
जातीय शत्रुता से अलग सारायेवो में 1992-95 युद्ध की याद ताजा है, जिसमें करीब एक लाख लोगों की मौत हो गई और इस वजह से वे इस कार्यक्रम को भी शक की नजर से देख रहे हैं. 34 साल की यासमिन बुकारिच कहते हैं, "हमारे यहां लगभग हर रोज युद्ध से जुड़े कार्यक्रम होते हैं, जो हमारे अपने 1990 के युद्ध से जुड़े हैं. एक दिन यह मुस्लिमों के लिए होता है, दूसरे दिन सर्बों के लिए, फिर क्रोएट्सों के लिए. इससे सिर्फ लोगों में बंटवारा ही बढ़ता है."
पैसे की बर्बादी
पेंशन पर रह रही 63 साल की बादेमा बेसिच कहती हैं कि इन सब बातों से अलग उनकी चिंता है कि कैसे महीने के 300 मार्क (150 यूरो) हासिल किए जाएं, "वे मजा लेंगे और पैसे खर्च करेंगे. हां, वे एक खतरनाक युद्ध को याद कर रहे हैं लेकिन हमारे सामने उससे ताजा युद्ध की यादें हैं."
सारायेवो की 100 साल पुरानी घटना के बाद 52 महीने तक करीब आधी दुनिया हिंसा की चपेट में चली गई और इस दौरान कहते हैं कि एक करोड़ लोगों की जान गई और इससे दोगुने घायल हो गए. इसके अलावा बीमारियों और कुपोषण जैसी घटनाओं से भी लाखों लोग मरे.
विश्व युद्ध खत्म होते होते चार बड़े साम्राज्य रूस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी (हैप्सबर्ग) और उस्मानिया ढह गए. यूरोप की सीमाएं फिर से निर्धारित हुईं और अमेरिका निश्चित तौर पर एक सुपर पावर बन कर उभरा.
एजेए/ओएसजे (एएफपी)

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