मंगलवार, 24 जून 2014

स्टिंग अॉपरेशन के पीछे की मानसिकता





Tarun Tezpal-


अमृतांशु कुमार मिश्र

प्रस्तुति-  बिमलेश पांड़ेय / निम्मी नर्गिस
वर्धा
   भारत में स्टिंग आपरेशन का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। यहां स्टिंग आपरेशन तहलका मामले के बाद ही चर्चा में आया था।
तहलका मामले के पहले स्टिंग आपरेशन का भारत में कोई खास चलन नहीं था या यों भी कह सकते हैं कि उस समय तक भारतीय मीडिया ने आधुनिकता को अपना हथियार नहीं बनाया था। तहलका मामले के बाद स्टिंग आपरेशन की झड़ी सी लग गई। सभी चैनल एक्सक्लूसिव दिखाने के चक्कर में स्टिंग आपरेशन का सहारा लेने लगे। तहलका के बाद स्टिंग आपरेशन उस समय काफी चर्चित रहा जब एक चैनल ने कई फिल्मी सितारों को लड़कियों से फिल्मों में काम दिलाने के बदले कीमत वसूलने की बात करते हुए दिखाया। लेकिन यहीं से स्टिंग आपरेशन का पतन भी शुरू हुआ। हालांकि, ऐसी कोई पुष्ट खबर तो नहीं है। लेकिन, यह चर्चा में था और  चैनल ने भी कहा था कि उनकी आगे की कड़ी में कई और नामी-गिरामी फिल्मी सितारे आएंगे। उसके बाद सिर्फ एक ही नाम आया अमन वर्मा का।
उसके बाद लोग अन्य फिल्मी सितारों का स्टिंग आपरेशन देखने को तरसते रहे। लेकिन, इसके बाद किसी सितारे का स्टिंग आपरेशन उस चैनल ने नहीं दिखाया। यहीं से चर्चा शुरू हुई कि चैनल वालो ने जिन फिल्मी सितारों का स्टिंग आपरेशन किया था उनसे इसे न दिखाने के बदले में मोटी रकम वसूली गई है। इसमें कितनी सच्चाई है यह तो पता नहीं। लेकिन, आम लोगों में स्टिंग आपरेशन की महत्ता यहीं से कम होती गई और इसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होने लगे। इसके बाद आपरेशन दुर्योधन भी काफी चर्चा में रहा था। इसमें फंसे कई सांसद आज भी बर्खास्त हैं।
आपरेशन दुर्योधन को अंजाम देने वाले लोगों में कुछ लोग ऐसे थे जो तहलका से जुड़े थे। पैसे की बात यहां भी आई। आम लोगों में फिर इस बात की चर्चा शुरू हो गई कि इसमें भी अनेक नेताओं को लपेटा गया था और पैसे लेकर उन्हें नहीं दिखाया गया। गृह राज्यमंत्री मानिक राव गावित-पप्पू भाटी बातचीत, संजय जोशी का सीडी प्रकरण तथा राजदीप सरदेसाई मामले में उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी कि ‘स्टिंग आपरेशन पैसा कमाने का धंधा बन गया है’ ने तो रही-सही कसर भी पूरी कर दी। इन्हीं बातों का हवाला देकर अब संसद में इसके विरूद्ध विधेयक की तैयारी हो रही है। हालांकि अभी भी स्टिंग आपरेशन जारी हैं।
पिछले दिनों कुछ चैनलों ने विधायकों को पैसे लेते दिखाया तो किसी ने किसी की बातचीत सुनाई। लेकिन, इन सबका कोई प्रभाव लोगों पर नहीं पड़ा। सभी के मन में यह बात घर कर गई कि मीडिया पैसे कमाने के लिए यह सब कर रही है। इन स्टिंग आपरेशनों ने लोगों के मन से धीरे-धीरे मीडिया की विश्वसनीयता को कम करना शुरू कर दिया। फिर खबरों की होड़ और जल्दी दिखाने के चक्कर में कई चैनलों ने तो गलत खबर ही देनी शुरू कर दी। पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायणन को एक चैनल ने 3-4 बजे के बीच ही मृत घोषित कर दिया था। लेकिन, डाक्टरों ने 6 बजे के बाद उनकी मृत्यु की घोषणा की थी।
मीडिया के प्रत्येक स्कूल में यह पढ़ाया जाता है कि ‘सामान्यतया अपराध की खबरों को लीड स्टोरी नहीं बनाई जाती।’ लेकिन, अब इसका ठीक उल्टा हो रहा है। समाचार पत्र और खबरिया चैनल अपराध की खबरों को ही मुख्य खबर के रूप में परोस रहे हैं। इससे समाज में भय और असुरक्षा का वातावरण व्याप्त हो रहा है। साथ ही एक अरूचि भी पैदा हो रही है। सामाजिक या अच्छी खबरें समाचार पत्रों, खबरिया चैनलों से गायब होती जा रही हैं। किसी भी समाचार माध्यम में दोनों पक्षों को अहमियत दी जानी चाहिए। लेकिन, दूसरा पक्ष अधिकतर गायब रहता है। इसका उदाहरण है दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके में एक लड़की ने अपने मामा पर बलात्कार का आरोप लगाया।
टीवी चैनलों ने इस बात को इतना उछाला और कलयुगी मामा कहकर इतनी खिंचाई  की कि आरोपी ने आत्महत्या कर ली। उसने लिखा कि चैनल ने बिना उसका पक्ष सुने ही उसे दोषी करार दे दिया। जबकि, अदालत में आरोप सिद्ध होने के बाद ही किसी को अपराधी करार दिया जाता है। बाद में यह आरोप भी गलत पाया गया। हां, इस सबके बीच कुछ समाचार पत्र जरूर अपवाद स्वरूप हैं। आजकल सभी चैनलों ने क्राइम की खबरों को काफी महत्वपूर्ण बना दिया है। क्राइम की खबरों का नाटय रूपांतरण भी प्रस्तुत किया जाता है और इसके प्रस्तोता (एंकर) तो कभी-कभी इतने डरावने अंदाज में घटना को बयान करते हैं कि मन में एक भय  समा जाता है। ‘यह आपके साथ भी हो सकता है’, ‘चैन से सोना हो तो जाग जाओ’ आदि वाक्य खूब प्रचलित हैं। एक चैनल के वरिष्ठ पत्रकार ने भी अपने एक लेख में चैनलों का कच्चा चिट्ठा खोला है।
उन्होंने साफ लिखा है कि महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या को शूट करने गई टीम ने वहां बच्चों को रोकर बोलने को कहा। घर के टूटे बरतनों को इस प्रकार रखा गया कि वह कैमरे के एंगल में आ जाएं। महिलाओं को फटे कपड़े और रुआंसा होकर ही कैमरे के सामने आने को कहा गया। इसके लिए बाकायदा समझाया बुझाया गया। इन सभी को पढ़ कर ऐसा लगता है कि एक समय यह भी हो सकता है जब खबरिया चैनलों की टीम यानी कैमरामैन और रिपोर्टर अपने लिए मेकअप मैन और डायलाग लिखने वाले भी लेकर चलेंगे जिससे प्रस्तुति और भी अधिक जीवंत हो सके।
किसी भी खबर को इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोग इस तरह प्रस्तुत करते हैं जैसे वे यदि इसके बारे में नहीं बताते तो अनर्थ हो जाता। इसका उदाहरण प्रधानमंत्री आवास में एक युवक और दो युवतियों का प्रवेश है। यह इतना बड़ा मुद्दा नहीं था जितना बड़ा इसे बनाया गया। दूसरे गेट पर सुरक्षा जांच के बाद उन्हें वापस कर दिया गया था। उनमें से सभी के नशे में धुत्त होने की भी झूठी खबर आई थी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि हमें इस बात की जानकारी नहीं थी कि प्रधानमंत्री से कैसे मिला जाए। हमें मिलने की इच्छा हुई और हम उनके आवास पर पहुंच गए। पहले गेट से तो उन्हें अंदर जाने दिया गया लेकिन, दूसरे गेट से वापस लौटा दिया गया।
सवाल यह भी उठता है कि आखिर उन युवाओं के साथ क्या होना चाहिए था? क्या उनका अपराध यह था कि वे नहीं जानते थे कि प्रधानमंत्री से कैसे मिला जाए? और इसलिए वे सीधे उनके आवास पर पहुंच गए। खबरिया चैनलों ने इसे सुरक्षा में भारी चूक बताया। जबकि, सुरक्षा अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से कहा था कि यहां सुरक्षा में कोई खामी नहीं थी। दूसरे गेट से बिना सुरक्षा जांच के गाड़ी अंदर जाती तो सुरक्षा में भूल मानी जा सकती थी।
आज यह बिल्कुल साफ हो गया है कि मीडिया में बढ़ते बाजारवाद ने इसे सामाजिकता से अलग कर दिया है। आज चैनलों को सिर्फ पैसा चाहिए। पैसे के बदले वे समाज को क्या परोस रहे हैं इसकी परवाह उन्हें नहीं है। वे अपनी रेटिंग खुद करवाते हैं और अपने को नंबर वन घोषित करते रहते हैं। अगर आज इस प्रस्तावित विधेयक का विरोध नहीं हो रहा है तो मीडिया इसके लिए खुद जिम्मेदार है। उसे पैसे के अलावा सामाजिक सरोकारों को भी तवज्जो देनी होगी। अन्यथा अपने आप को चौथा स्तंभ कहने का कोई आधार ही नहीं रह जाएगा। स्टिंग आपरेशन पर प्रस्तावित विधेयक पर चुप्पी काफी कुछ कह रही है।
अगर यही स्थिति रही तो फिर चीन की तरह यहां भी एक सरकारी समाचार एजेंसी होगी और उसके इतर समाचार प्रकाशित/प्रसारित करने की अनुमति अपने देश में भी नहीं रह जाएगी। जनता से इसके विरोध में उठ खड़े होने की आशा बेमानी है। आखिर आज मीडिया जनता को दे ही क्या रहा है जो उससे प्राप्त करने की अपेक्षा करे। समय आ गया है कि लोकतंत्र का चौथा खंभा अपने लिए खुद ही आचार-संहिता बनाए।

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