रविवार, 4 मई 2014

विकल्प तलाशता हाशिए का मीडिया




प्रस्तुति --विपुल पांंडेय, हिमानी सिंह
   वर्धा


"भूमण्डलीकरण की शब्दावली में यह दौर क्वालिटी और सर्विस का है। दुनिया भर में विशेषकर तीसरी दुनिया के देशों में इस नाम का ढ़ोल बज रहा है। इस नाम पर बाजारवाद पिछले दो दशकों से हमारे देश में क्वालिटी और सर्विस के नाम पर लोगों को ठगता आ रहा है। हाशिए की मीडिया को विकल्पहीनता की ओर ले जाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जितना बड़ा निवेश, उतनी बड़ी खबर। दुर्भाग्य है कि इस पूंजी प्रायोजित मीडिया की दुनिया में मानवीय संवेदनाओं को तार-तार होते हुए हम नहीं देख पा रहे हैं।..."

मीडिया हमेशा से संचार और संवाद का प्रभावी माध्यम रहा है। कागज के अविष्कार से पहले पत्थर के शिलालेख, ताड़ के पत्ते और ताम्रपत्र मीडिया के प्रचलित माध्यम रहे हैं। समय, समाज और सत्ता परिवर्तन तथा विकास के स्थापित होते नए पड़ावों पर कागज और प्रिन्टिंग प्रेस के अविष्कार ने मीडिया को नयी पहचान दी। मीडिया का रंग-रूप और चरित्र लगातार बदलता रहा। राजाज्ञाओं और फरमानों के संचार वाली मीडिया का जन रूप भी सामने आया। मीडिया के विस्तार में ऐसा समय भी आया जब पूरा विश्व संचार क्रान्ति से रूबरू हुआ। एक बटन दबाया नहीं कि असंख्य पन्ने और संदेश दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच जाते हैं। लेकिन मीडिया के विस्तार यात्रा में कुछ बातें ऐसी हैं जो पीछे छूटती गई हैं। जैसे, जिस प्रिन्ट मीडिया का महत्व कम होना, जिसकी बदौलत समकालीन मीडिया के दूसरे रूपों का विकास हुआ, प्रस्तुति के स्तर पर जन विरोधी विषयों और विधियों का प्रयोग करना आदि। भूमण्डलीकरण के प्रत्यक्ष और परोक्ष हस्तक्षेप से पिछले दो दशकों में मीडिया का चरित्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है। चन्द बड़े घरानों को छोड़ दिया जाए तो मीडिया का बड़ा हिस्सा हाशिए पर पहुंच चुका है।
मौजूदा दौर में मीडिया खासकर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की चर्चा जोरों पर है। हो भी क्यों न एक क्लिक में चैनल बदल जाते हैं, एक क्लिक में संदेश सात समुंदर पार पहुच जाते हैं। इसी को ग्लोबल वल्र्ड भी कहा जा रहा है। जहां सबकुछ एक कमरे बैठकर संचालित किया जाता है। काबिले गौर है कि आम तौर पर मीडिया से अभिप्राय समाचार पत्र और समाचार चैनलों से लगाया जाता है। जबकि मीडिया अपने विस्तृत अर्थों में वह सब है जिसके माध्यम से लिखित, मौखिक या दृश्य रूप में संवाद और संचार होता है। चिट्ठी-पत्री और रेडियो बीते जमाने की बातें लगती हैं, जिसका स्थान एस.एम.एस. और एम.एम.रेडियो ने लिया है। अखबार और पत्र-पत्रिकाओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन इसके सापेक्ष बाजार की चुनौतियां भी बढ़ी हैं। बाजार के रवैये ने जन मानस में संवादहीनता और संवेदनहीनता को बढ़ाया है। यही कारण है कि आज कानटेन्ट से अधिक सर्कुलेशन पर ध्यान दिया जा रहा है। क्या छापें, कैसे छापें कि सर्कुलेशन बढ़ जाए। बाजारवाद ने प्रिन्ट मीडिया को इस दिशा में बहुत आगे पहुंचा दिया है। कल तक मीडिया के जो समूह औसत क्षमता रखते थे और जिन्होंने भूमण्डलीकरण के मंत्र को वेद और कुरान मानकर निवेशवादियों से दोस्ती कर ली। आज वही समूह बड़े मीडिया घरानों में शुमार किए जाते हैं। जिन्होंने बाजारवाद के साथ दोस्ती से इंकार कर दिया वो मीडिया समूह कमजोर पड़ गए और हाशिए की मीडिया बन कर रह गए। इनके अखबार और पत्र-पत्रिकाओं के पास न तो चमक-दमक है और न ही सर्कुलेशन बढ़ाने का कोई नुस्खा। ऐसा संभव भी नहीं है कि अमृत बाजार के इतिहास को दोहराया जाए। क्योंकि अंग्रेजों की आर्थिक गुलामी और अमेरिकी चैधराहट निदेशित ॅज्व्ए प्डथ् और ॅठ की आर्थिक गुलामी में बड़ा फर्क है। इन संस्थाओं की छत्रछाया में मीडिया की जो विकास गाथा लिखी जा रही है उसमें खबर लाने-बनाने की कला बदल चुकी, रिपोर्टिंग और आलेख के आवरण नए अर्थ तलाश रहे हैं। एक पूरी की पूरी संस्कृति ने जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह मीडिया को भी अपने पूंजीवादी आवरण से घेर रखा है। इस आवरण के बाहर की खबरों का कोई मोल नहीं रह गया है, ऐसा तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया के काम-काज से प्रतीत होता है। पूंजीवादी मीडिया जब जैसी खबर लिख या सुना दे, उसकी प्रमाणिकता पर कोई प्रश्न नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि मीडिया के छोटे-छोटे समूह, जो दरअसल मीडिया कर्मी और पाठक वर्ग दोनों ही स्तरों पर संख्या में अधिक हैं, की पहचान ‘‘हाशिए की मीडिया’’ तक सीमित है।
इन्हें मैं हाशिए की मीडिया कहना इसलिए बेहतर समझता हूं क्योंकि मेरी इस छोटी सी समझ में वैकल्पिक मीडिया की अवधारणा भी निहित है। संख्या बल की दृष्टि से हाशिए की मीडिया चन्द निवेशवादी पूंजीपति घरानों की मीडिया से अधिक मजबूत है। पाठक वर्ग अधिकतर वही हैं जिनका ताल्लुक समाज के निचले और पिछड़े तबके से है। सवाल यह भी है कि मीडिया पर एकछत्र राज करने वाले चन्द लोग शेष जनता की बातें न लिखकर भी उसी जनसमूह में बड़ा कद और पहचान कैसे रखते है? कहीं सामाजिक न्याय का तो कहीं महिला अधिकारों का और कहीं दोहरी नागरिकता और पहचान की समस्याओं से जूझने वाले मीडिया समूह विकल्पहीन क्यों हैं? अब तो शिक्षा, साक्षरता और जागरूकता भी पहले से बढ़ चुकी है।
ऐसा प्रतीत होता है कि तमाम छोटी-बड़ी उपलब्धियों के बाद भी सामंती, ब्राम्हणवादी और पूंजीवादी बंधनों की जकड़ ढ़ीली नहीं हो सकी हैं। शायद इसी वजह से हाशिए की मीडिया संपादक, संवाददाता, लेखक और पाठक किसी भी रूप में अपनी पहचान नहीं बना पा रही है।
भूमण्डलीकरण की शब्दावली में यह दौर क्वालिटी और सर्विस का है। दुनिया भर में विशेषकर तीसरी दुनिया के देशों में इस नाम का ढ़ोल बज रहा है। इस नाम पर बाजारवाद पिछले दो दशकों से हमारे देश में क्वालिटी और सर्विस के नाम पर लोगों को ठगता आ रहा है। हाशिए की मीडिया को विकल्पहीनता की ओर ले जाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जितना बड़ा निवेश, उतनी बड़ी खबर। दुर्भाग्य है कि इस पूंजी प्रायोजित मीडिया की दुनिया में मानवीय संवेदनाओं को तार-तार होते हुए हम नहीं देख पा रहे हैं।
पिछले दिनों अन्ना आन्दोलन के विस्तार में हिन्दुस्तान के तमाम गांवों को भी शामिल हुआ बताया गया लेकिन पिछले एक महीने में यू.पी. के कम से कम 15 गांव के भ्रमण के दौरान एक व्यक्ति नहीं मिला जो अन्ना को जानता हो। कहने का मतलब यह कि पूंजी आधारित मीडिया का विस्तार और सीमाएं उतनी ही हैं जहां तक सैटेलाइट और बिजली की पहुंच है। जबकि हाशिए की मीडिया के सामने सारा आकाश खुला पड़ा है।
समय आ चुका है कि हाशिए की मीडिया विकल्पहीनता के भंवर से खुद को बाहर निकाले। इससे न सिर्फ हाशिए की मीडिया की अपनी पहचान बनेगी बल्कि निवेश आधारित पूंजीपरस्त मीडिया के वास्तविक चरित्र को भी समझा जा सकेगा। हाशिए की मीडिया को बताना होगा कि ‘‘हम जिन चुनौतियों का सामना करके दुर्गम क्षेत्रों से समाचार लाते हैं या पहुंचाते हैं, अब किसी पूंजीवादी मीडिया घराने के लिए नहीं करेंगे।’’ रही बात क्वालिटी और सर्विस की तो इस तथ्य से कबतक लुका-छिपी का खेल खेला जाता रहेगा कि तथाकथित मुख्य धारा के किसी भी मीडिया घराने की क्वालिटी और सर्विस हाशिए के मीडिया कर्मी के कन्धों पर ही टिकी है। जो कन्धा शोषक मीडिया समूहों के भार को वहन करके सर्विस और गुणवत्ता बनाए रख सकता है, वह कन्धा अपने समाज और देश के लिए क्या वैकल्पिक मीडिया के भार को नहीं उठा सकता? ये बातें परिसंकल्पनात्मक लग सकती हैं लेकिन वास्तविकता के धरातल पर देखा जाए तो बहुत ही व्यावहारिक हैं। यदि हाशिए की मीडिया के लोग वैकल्पिक मीडिया को खड़ा करने में सफल हो जाते हैं तो निश्चित तौर पर मीडिया जगत को एकाधिकारवादी, अधिनायकवादी चरित्र के कुप्रभावों से बचाया जा सकता है। ऐसी पहल जरूरी है क्योंकि मनोरंजन और समाचार के नाम पर कुछ भी किसी भी रूप में छापने, प्रकाशित और प्रसारित करने के चोर रास्तों को बन्द होना ही चाहिए

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