गुरुवार, 8 मई 2014

मीडिया संवाद विमर्श








आपातकाल की हिन्दी पत्रकारिता का अनुशीलन

25 जून 1975 भारत के इतिहास में एक ऐसा काला दिवस रहा है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर भय, आतंक और दहशत का माहौल बना दिया। 19 महीनों तक चले आपातकाल के काले बादल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी छाए और इंदिरा गांधी ने प्रेस पर भी सेंसरशिप थोप दी। आपातकाल के चलते पत्रिका के स्वरूप में बड़ा बदलाव देखा गया और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया तानाशाही का शिकार हुआ।
वर्ष 1974 तक पत्रकारिता के माध्यम से सत्ता और सरकार की सर्वत्र आलोचना हो रही थी। देश में भ्रष्टाचार, शैक्षणिक अराजकता, महंगाई और कुव्यवस्था के विरोध में समाचार-पत्रों में बढ़-चढ़ कर लिखा जा रहा था। गुजरात और बिहार में छात्र-आंदोलन ने जनांदोलन का रूप ले लिया था जिसके नेतृत्व का भार लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अपने कंधों पर ले लिया। उन्होंने पूरे देश में संपूर्ण क्रांति आंदोलन का आह्वान कर दिया था। दूसरी ओर लंबे समय तक सत्ता में बने रहने, सत्ता का केंद्रीयकरण करने, अपने विरोधियो को मात देने और बांग्लादेश बनाने में अपनी अहम भूमिका के कारण इंदिरा गांधी में अधिनायकवादी प्रवृत्तियां बढ़ती चली गईं और जब इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद अपने-आपको सत्ता से बेदखल होते पाया तो उन्होंने अपने कुछ चापलूसों के परामर्श से आपातकाल की घोषणा का निर्णय ले लिया। 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी नेताओं की जनसभा से श्रीमती गांधी घबरा गईं और उन्होंने आपातकाल की घोषणा कर दी।
आपातकाल के दौरान एक ओर जहां सत्ता और सरकार की चापलूसी करने वाले पत्रकार थे, वहीं दूसरी ओर प्रेस की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले पत्रकारों की भी कमी नहीं थी। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर, देवेंद्र स्वरूप, श्याम खोसला, सूर्यकांत बाली, के.आर. मलकानी जैसे पत्रकारों ने तो जेल की यातनाएं भी भोगीं। इसके विपरीत ऐसे पत्रकारों की भी कमी नहीं थी, जिन्होंने सेंसरशिप को स्वीकार किया और रोजी-रोटी के लिए नौकरी को प्राथमिकता दी। यही स्थिति साहित्यकारों के साथ भी थी।
स्वतंत्र भारत में वर्ष 1975 में आपातकाल की घोषणा के साथ ही पत्र-पत्रिकाओं पर सेंसरशिप लगा दी गई, किंतु तमाम प्रतिबंधों के बावजूद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पूरी तरह ग्रहण नहीं लग सका। पत्र-पत्रिकाओं पर सेंसर लगा तो भूमिगत बुलेटिनों ने कुछ हद तक इसकी क्षतिपूर्ति की। कुछ संपादकों ने संपादकीय का स्थान खाली छोड़कर तो कुछ ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में महापुरूषों की उक्तियों को छापकर सरकार का विरोध किया।
सेंसरशिप और अन्य प्रतिबंधों के कारण सरकार और समाज के बीच सूचनाओं का प्रसारण इकतरफा हो रहा था। सरकार की घोषणाओं और तानाशाही रवैये की खबर तो किसी न किसी रूप में जनता तक पहुंच जाती थी, किंतु जनता द्वारा आपातकाल के विरोध और सरकारी नीतियों की आलोचना की खबर सरकार तक नहीं पहुंच पाती थी। सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों के सहारे ही अखबारों में अधिकतर समाचार छप रहे थे। इकतरफा पक्ष की बार-बार प्रस्तुति से पत्र-पत्रिकाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया था। इसलिए इकतरफा संचार के कारण आपातकाल के 19 महीनों तक सरकार गलतफहमी में रही, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।
सेंसरशिप के कड़े प्रतिबंधों और भय के वातावरण के कारण अनेक पत्र-पत्रिकाओं को अपने प्रकाशन बंद करने पड़े। इनमें सेमिनार और ओपिनियन के नाम उल्लेखनीय हैं। आपातकाल के दौरान 3801 समाचार-पत्रों के डिक्लेरेशन जब्त कर लिए गए। 327 पत्रकारों को मीसा में बंद कर दिया गया। 290 अखबारों के विज्ञापन बंद कर दिए गए। विदेशी पत्रकारों को भी पीडि़त-प्रताडि़त किया गया। ब्रिटेन के टाइम और गार्जियन के समाचार-प्रतिनिधियों को भारत से निकाल दिया गया। रायटर सहित अन्य एजेंसियों के टेलेक्स और टेलीफोन काट दिए गए। आपातकाल के दौरान 51 पत्रकारों के अधिस्वीकरण रद्द कर दिए गए। इनमें 43 संवाददाता 2 कार्टूनिस्ट तथा 6 कैमरामैन थे। 7 विदेशी संवाददाताओं को भी देश से बाहर जाने को कहा गया।
प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश डालने के लिए समाचार-समितियों का विलय किया गया। आपातकाल के पूर्व देश में चार समाचार-समितियां थीं – पी.टी.आई., यू.एन.आई., हिंदुस्थान समाचार और समाचार भारती जिन्हें मिलाकर एक समिति समाचार का गठन किया गया था जिससे यह पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में रहे। आपातकाल के दौरान आकाशवाणी और दूरदर्शन पर से जनता का विश्वास उठ चुका था। भारत के लोगों ने उस समय बी.बी.सी. और वायस आफ अमेरिका सुनना शुरू कर दिया था।
आपातकाल की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री के द्वारा ली गई पहली ही बैठक में प्रस्ताव आया कि प्रेस-परिषद् को खत्म किया जाए। 18 दिसंबर, 1975 को अध्यादेश द्वारा प्रेस-परिषद् समाप्त कर दी गई। आपातकाल के दौरान भूमिगत पत्रकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया था। भूमिगत संचार-व्यवस्था के द्वारा एक समानांतर प्रचार-तंत्र खड़ा किया गया था। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो जन-जीवन को एकपक्षीय समाचार ही मिल पाता और सच्ची खबरों से वह वंचित रह जाते। आपातकाल में संचार अवरोध का खामियाजा जनता पर नहीं पड़ सका, किंतु सत्ता और सरकार आपातकाल विरोधियों की मनोदशा को नहीं समझ पाए। संचार अवरोध का कितना बड़ा खामियाजा सत्ता को उठाना पड़ सकता है, यह वर्ष 1977 के चुनाव परिणाम से सामने आया।
संपादकों का एक समूह चापलूसी की हद किस तरह पार कर रहा था, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दिल्ली के 47 संपादकों ने 9 जुलाई 1975 को श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा उठाए गए सभी कदमों में अपनी आस्था व्यक्त की, जिसमें समाचार-पत्रों पर लगाया गया सेंसर भी शामिल है। सेंसरशिप के कारण दिनमान एकपक्षीय खबर छापने को बाध्य हुई। दिनमान ने सेंसरशिप लगाए जाने का विरोध भले ही न किया हो, किंतु सेंसरशिप हटाए जाने पर संपादकीय अवश्य लिखा है।
आपातकाल की लोकप्रिय पत्रिका साप्ताहिक हिन्दुस्तान भी सेंसरषिप लागू होते ही सरकार की पक्षधर हो गई। यह पत्रिका सरकार की कितनी तरफदारी कर रही थी इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि चुनाव की घोषणा के बाद 6 फरवरी, 1977 के अंक में राजनीतिक शतरंज के पुराने खिलाड़ी और नए मोहरे, शीर्षक से प्रकाशित आलेख में कांग्रेस का पलड़ा भारी होना सुनिश्चित किया गया है, जबकि वास्तविकता यह है कि वर्ष 1977 के चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह से हार हुई थी।
आपातकाल के पूर्व सरिता में चुटीले बेबाक और धारदार लेख तथा संपादकीय छपा करते थे। सत्ता की मनमानी पर कड़ा प्रहार किया जाता रहा, किंतु आपातकाल लगने के बाद सेंसरशिप के कारण यह सिलसिला टूट गया। सेंसरशिप थोपे जाने और सत्ता के तानाशाही रवैये के कारण सरिता ने 6 महीनों मे संपादकीय कालम लिखना छोड़ दिया।
सारिका का जुलाई 1975 का अंक सेंसरशिप का पालन कड़ाई से किए जाने का जीवंत दस्तावेज बन गया है। सेंसर अधिकारी द्वारा सारिका के पन्नों पर काला किए गए वाक्यों और शब्दों को संपादक ने विरोध-स्वरूप वैसे ही प्रकाशित कर दिया था। इस अंक के पृष्ठ संख्या 27-28 को तो लगभग पूरी तरह काला कर दिया गया था। इसके बाद के अंकों में संपादकीय विभाग इतना संभल गया कि सेंसर अधिकारी को पृष्ठ काला करने की नौबत ही नहीं आई। लोकराज के 5 जुलाई 1975 के अंक में आपातघोषणा शीर्षक से संपादकीय छपा है। इस संपादकीय में कहा गया है कि कुछ लोगों के अपराध के लिए संपूर्ण प्रेस-जगत् को सेंसरशिप क्यों झेलना पड़े\ लोकराज के 12 जुलाई, 1975 के अंक में अनुशासन-पर्व शीर्षक से एक संपादकीय छपा जिसमें आपातकाल की घोषणा का स्वागत किया गया था।
इस प्रकार हम देखते हैं कि सेंसरशिप की कैंची ने पत्रकारिता के स्वरूप को ही बिगाड़ दिया था। दहशत और आतंक के माहौल में अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं ने सेंसरशिप को स्वीकार कर लिया था। संपादकीय खाली छोड़ने और पृष्ठों के काले अंश को हू-ब-हू छापने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बच गया था।
आपातकाल की यह अवधि पत्रकारिता की दृष्टि से ऐसी रही कि यह अलग पहचान लिए है। आपातकालीन हिंदी पत्रकारिता के संबंध में आज अधिक सामग्री उपलब्ध नहीं है। ऐसे में डा. अरूण कुमार भगत द्वारा आपातकाल की हिंदी पत्रकारिता का अनुशीलन विषय पर किया गया शोध कार्य महत्वपूर्ण है।
डा. अरूण भगत, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, पीएचडी (सन्-2009)
सितम्बर अंक २०११

हिन्दी पत्रकारिता की दशा और दिशा

वर्तमान समय में हिन्दी भाषा को और व्यापक रूप देने के लिए जो संघर्ष चल रहा है उससे सभी भली-भांति परिचित हैं। क्या आपको लगता है कि पत्रकारिता जगत में भी हिन्दी भाषा का जो प्रयोग हो रहा है वह सही प्रकार से नहीं हो रहा है? इसमें भी कहीं कुछ त्रुटियां या अशुद्धियां व्याप्त है, क्या हिन्दी भाषा के वर्तमान प्रयोग की स्थिति पूरी तरह से उचित और अर्थ पूर्ण है?
वर्तमान में जो मीडिया में हिन्दी का स्तर गिरता जा रहा है, उसके पीछे सबसे बड़ा कारण पाश्चात्य संस्कृति का बढ़ता स्तर है। हर व्यक्ति अपने को अंग्रेजी भाषा बोलने में गौरवान्वित महसूस करता है। इसके उत्थान के लिए सबसे पहले हमें ही शुरूआत करनी होगी क्योकि जब हम शुरूआत करेंगे तभी दूसरा हमारा अनुसरण करेगा।
सोहन लाल भारद्वाज, राष्ट्रीय उजाला
संस्कृत मां, हिन्दी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है, ऐसा कथन डा. फादर कामिल बुल्के का है, जो संस्कृत और हिन्दी की श्रेष्ठता को बताने के लिए सम्पूर्ण है। मगर आज हमारे देश में देवभाषा और राष्ट्रभाषा की दिनों-दिन दुर्गति होती जा रही है। या यूं कह लें कि आज के समय में मां और गृहिणी पर नौकरानी का प्रभाव बढ़ता चला जा रहा है तो गलत नहीं होगा। टीवी के निजी चैनलों ने हिन्दी में अंग्रेजी का घालमेल करके हिन्दी को गर्त में और भी नीचे धकेलना शुरू कर दिया और वहां प्रदर्शित होने वाले विज्ञापनों ने तो हिन्दी की चिन्दी की जैसे नीम के पेड़ पर करेला चढ़ गया हो। इसी प्रकार से रोज पढ़े जाने वाले हिन्दी समाचार पत्रों, जिनका प्रभाव लोगों पर सबसे अधिक पड़ता है, ने भी वर्तनी तथा व्याकरण की गलतियों पर ध्यान देना बंद कर दिया और पाठकों का हिन्दी ज्ञान अधिक से अधिक दूषित होता चला गया। मैं ये बात अंग्रेजी का विरोध करने के लिए नहीं कह रहा हूं, बल्कि मेरी ये बात तो हिन्दी के ऊपर अंग्रेजी को प्राथमिकता देने पर केन्द्रित है।
अवनीश सिंह राजपूत, हिन्दुस्थान समाचार
हिन्दी पत्रकारिता स्वतंत्रता पूर्व से ही चली आ रही है और आजादी के आंदोलन में इसका बहुत बड़ा योगदान भी रहा है, लेकिन आज जो मीडिया में हिन्दी का स्तर गिरता दिखाई दे रहा है, वह पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रभाव के कारण हो रहा है। आज मीडिया ही नहीं बल्कि हर जगह लोग अंग्रेजी के प्रयोग को अपना भाषाई प्रतीक बनाते जा रहे हैं। इसके लिए सभी को एकजुट होकर हिन्दी भाषा को प्रयोग में लाना होगा।
धर्मेन्द्र सिंह, दैनिक हिन्दुस्तान
अगर आज आप किसी को बोलते है कि यंत्र तो शायद उसे समझ न आए लेकिन मशीन, शब्द हर किसी की समझ में आएगा। इसी प्रकार आज अंग्रेजी के कुछ शब्द प्रचलन में हैं, जो सबके समझ में है। इसलिए यह कहना कि पूर्णतया हिन्दी पत्रकारिता में सिर्फ हिन्दी भाषा का प्रयोग ही हो यह तर्क संगत नहीं है। हां, यह जरूर है कि हमें अपनी मातृभाषा का सम्मान अवश्य करना चाहिए और उसे अधिक से अधिक प्रयोग में लाने का प्रयास करना चाहिए।
नागेन्द्र, दैनिक जागरण
हिन्दी दिवस मतलब चर्चा-विमर्श, बयानबाजी, मानक हिन्दी बनाम चलताऊ हिन्दी। हिन्दी के ठेकेदार और पैरोकार की लफ्फाजी। बस करो यार! भाषा को बांधो मत, भाषा जब तक बोली से जुड़ी है, सुहागन है। जुदा होते ही वह विधवा के साथ-साथ बांझ बन जाती है। वह शब्दों को जन्म नहीं दे पाती। बंगाली, मराठी, गुजराती, उर्दू, फारसी, फ्रेंच, इटालियन कहीं से भी हिन्दी से मेल खाते शब्द मिले, उसे उठा लो। बरसाती नदी की तरह। सबको समेटते हुए। तभी तो हिन्दी समंदर बन पाएगी। रोक लगाओगे तो नाला, नहर या बहुत ज्यादा तो डैम बन कर अपनी ही जमीं को ऊसर करेगी। कॉर्पोरेट मीडिया तो इस ओर ध्यान दे नहीं रहा। हां, लोकल मीडिया का योगदान सराहनीय जरूर है। अरे हां, ब्लॉगरों की जमात को भी इसके लिए धन्यवाद।
चंदन कुमार, जागरण जोश.कॉम
हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है और हमें इसका सम्मान करना चाहिए लेकिन समाज में कुछ ऐसे लोग हैं जो हिन्दी के ऊपर उंगली उठाकर हिन्दी का अपमान करते रहते हैं। बात करें पत्रकारिता की तो हिन्दी पत्रकारिता में आजकल हिन्दी और इंग्लिश का मिला जुला रूप प्रयोग किया जा रहा है जो कि हमारे हिसाब से सही नहीं है। मैं आपको बता दूं कि हिन्दी के कुछ ऐसे शब्द हैं, जिनका इस्तेमाल न करने से वह धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं जो हमारे लिए शर्म का विषय है। मैं अपने हिन्दी-भाषियों से निवेदन करता हूं कि हिन्दी को व्यापक रूप देने में सहयोग करें और हिन्दी को गर्व से अपनी राष्ट्रभाषा का दर्जा दें।
आशीष प्रताप सिंह, पीटीसी न्यूज
भाषाई लोकतंत्र का ही तकाजा है कि नित-नए प्रयोग हों। हां, पर वर्तनी आदि की गलतियां बिल्कुल अक्षम्य है। त्रुटियां-अशुद्धियां तो हैं ही। उचित और अर्थपूर्ण तो जाहिर है कि नहीं है। लेकिन यह सवाल इतना महत्वपूर्ण नहीं है। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है भाषा के अर्थशास्त्र का सवाल। हिन्दी दिवस पर इस बारे में बात होनी चाहिए।
कुलदीप मिश्रा, सीएनईबी
पत्रकारिता के क्षेत्र में हिंदी का प्रयोग अपनी सहूलियत के हिसाब से होता रहा है। यह जो स्थिति है उसका एक कारण हिंदी के एक मानक फान्ट का ना होना भी है। ज्यादातर काम कृति फान्ट में होता है लेकिन जगह-जगह उसके भी अंक बदल जाते है। कहीं श्रीदेव है तो कहीं ४सी गांधी और न जाने कितने फान्ट्स की भरमार है। अब पत्रकारिता में काम करने वाला कोई भी व्यक्ति एक संस्थान से दूसरे संस्थान में जाते समय फान्ट की समस्या से रूबरू होता है। इसलिए यहां हिंदी का प्रयोग सहूलियत के अनुसार हो रहा है, लेकिन पिछले कुछ दिनों में यूनिकोड के आने से कुछ स्थिरता जरूर आई है। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि हम अभी भी यही मानते हैं कि अंग्रेजी हिंदी से बेहतर है। इसलिए जान- बूझकर हिंदी को हिंगलिश बना कर काम करना पसंद करते हैं और ऐसा मानते हैं कि अगर मुझे अंग्रेजी नहीं आती तो मेरी तरक्की की राह दोगुनी मुश्किल है। पत्रकारिता भी आम समाज से अलग नहीं है, उसने भी अन्य बोलियों के साथ-साथ विदेशी भाषा के शब्दों को अपना लिया है।
विकास शर्मा, आज समाज

सितम्बर अंक २०११

वाद, विवाद, अनुवाद की छाया से मुक्त हो हिन्दी पत्रकारिता

हिन्दी के सर्वप्रथम दैनिक उदन्त मार्तण्ड के प्रथम और अंतिम संपादक पंडित युगल किशोर शुक्ल ने लिखा था-
इस उदन्त मार्तण्ड, के नांव पढ़ने के पहिले पछाहियों के चित का इस कागज न होने से हमारे मनोर्थ सफल होने का बड़ा उतसा था। इसलिए लोग हमारे बिन कहे भी इस कागज की सही की बही पर सही करते गये पै हमें पूछिए तो इनकी मायावी दया से सरकार अंगरेज कम्पनी महाप्रतापी की कृपा कटाक्ष जैसे औरों पर पड़ी, वैसे पड़ जाने की बड़ी आशा थी और मैंने इस विषय में यथोचित उपाय किया पै करम की रेख कौन मेटै। तिस पर भी सही की बही देख जो सुखी होता रहा अन्त में नटों कैसे आम आदमी दिखाई दिए इस हेत स्वारथ अकारथ जान निरे परमारथ को कहां तक बनजिए अब अपने व्यवसायी भाइयों से मन की बात बताय बिदा होते हैं। हमारे कुछ कहे सुने का मन में ना लाइयो जो देव और भूधर मेरी अंतर व्यथा और इस गुण को विचार सुधि करेंगे तो ये गुण मेरे ही हैं। शुभमिति।
यह उद्धरण उस समय का है जब उदन्त मार्तण्ड लगभग अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था। आज इस घटना को लगभग 183 वर्ष होने को हैं लेकिन हालात बहुत कुछ नहीं बदले हैं। बस इतना सा अंतर आया है कि तब पंडित युगल किशोर शुक्ल व्यापारियों से आगे आने को कह रहे थे और आज व्यापारी वर्ग आगे तो आ चुका है मगर आगे आने का उसका एकमात्र उद्देश्य मुनाफा कमाना है। उसे हिन्दी, हिन्दी भाषियों और हिन्दी की पत्रकारिता से कोई भावनात्मक लगाव नहीं है।
यही वजह है कि हर साल हिन्दी दिवस के मौके पर इस भाषा के बढ़ते बाजार, हिन्दीभाषियों की संख्या, इसकी तकनीकी क्षमता के विस्तार और इस प्रकार के तमाम आंकड़ों के सुर्खियों में आने के बावजूद हिन्दी पत्रकारिता अपने स्वतंत्र अस्तित्व के लिए जूझती दिखती है। कहने को हिन्दी पत्रकारिता के बाजार का विस्तार हो रहा है, इसमें निवेश बढ़ रहा है लेकिन साथ ही यह भी कटु सत्य है कि अपनी शुरुआत के 185वें वर्ष में प्रवेश करने के बाद भी हिन्दी पत्रकारिता वाद, विवाद और अनुवाद की छाया से मुक्त नहीं हो पा रही है जिसके कारण सार्थक परिणाम भी नहीं दे पा रही है।
वाद और विवाद सिर्फ हिन्दी की समस्याएं नहीं है बल्कि ये अनुवाद के रास्ते ही हिन्दी जगत में आयी हैं। दरअसल, अनुवाद पर आश्रित होने की वजह से ही हिन्दी पत्रकारिता अंग्रेजी की ही तरह भ्रामक वादों और तुच्छ विवादों में घिरकर अपने मूल उद्देश्य को लगभग भुला चुकी है। इसलिए आज सबसे बड़ी जरूरत उसे अनुवाद की इस छाया से मुक्त करने की है ताकि हिन्दी की पत्रकारिता अपना मौलिक ढांचा विकसित कर सके और हिन्दी के अनुकूल व्यवस्थाएं तैयार हो सकें।
शुक्ल जी ने ही उदन्त मार्तण्ड के प्रथम अंक में लिखा था-
यह उदन्त मार्तण्ड अब पहिले पहल हिन्दुस्तानियों के हित हेतु जो आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ फारसी ओ बंगले में जो समाचार का कागज छपता है उसका सुख उन् बोलियों के जान्ने ओ पढ़ने वालों को ही होता है। ……… देश के सत्य समाचार हिन्दुस्तानी लोग देखकर आप पढ़ ओ समझ लेंय ओपराई अपेक्षा जो अपने भावों के उपज न छोड़े, इसलिए बड़े दयावान करुणा ओ गुणनि के निधान सबके विषय श्रीमान् गवरनर जेनेरल बहादुर की आयस से अैसे चाहत में चित्त लगाय के एक प्रकार से यह नया ठाट ठांटा ………
आज हिन्दी को जान्ने ओ पढ़ने वालों’ के लिए उनकी बोली में काम करने वाले संस्थानों की कमी नहीं है। परंपरागत अखबारों, पत्रिकाओं से लेकर टीवी और इंटरनेट तक सब जगह इनकी मौजूदगी है और संख्यात्मक रूप से कहें तो दमदार मौजूदगी है। देश के सर्वाधिक बिकने वाले अखबारों की सूची में अपना दबदबा होता है लेकिन बस इसलिए कि हिन्दी जानने-समझने वालों के लिए इसे समझना आसान है। मौलिकता की खोज में पाठकों/दर्शकों को एक बार फिर से अंग्रेजी का ही रूख करना पड़ता है। आखिर इसकी वजह क्या है, इसकी सबसे बड़ी वजह अनुवाद पर निर्भर रहने की विवशता है।
आय और लाभांश के मामले में हिन्दी मीडिया संस्थानों की हालत जो भी हो, ढांचागत हालत यही है कि उनके पास उतनी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं जितनी अंग्रेजी के पास हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि हिन्दी में भी अव्वल रहने वाले ज्यादातर संस्थान सिर्फ हिन्दी के नहीं हैं। ये द्विभाषिक या बहुभाषी संस्थान हैं और अंग्रेजी को ही इन्होंने अपना चेहरा बना रखा है। सारी मौलिक व्यवस्थाएं और सुविधाएं अंग्रेजी को प्राप्त हैं और शेष भाषाओं की शाखाएं उनके अनुवाद तक सीमित हैं।
प्रिंट से इलेक्ट्रानिक तक हिन्दी की स्थिति यही है। अखबारों, संवाद समितियों और चैनलों तक में जोर अंग्रेजी पर है। संस्थान अपनी ऊर्जा का अधिकतम हिस्सा अंग्रेजी पर खर्च कर रहा है और हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं से उनका वास्ता काम चलाने भर का है। देश में बड़े स्तर के कार्यक्रम हों, विदेश दौरों का मामला हो या फिर कोई अन्य खर्चीला काम, कवरेज के लिए प्राथमिकता अंग्रेजी के पत्रकारों को दी जाएगी या फिर अगर आप हिन्दी के हैं तो आप इसी शर्त पर भेजे जाएंगे कि अंग्रेजी को भी आप पर्याप्त सेवाएं दें। अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद नियति है लेकिन हिन्दी से अंग्रेजी अनुवाद की जहमत नहीं उठायी जाएगी। यही स्थिति बुनियादी सुविधाओं और कई जगह तो वेतन ढांचों के मामले में भी देखने को मिलती है। कई बार देखा जाता है कि एक ही संस्थान में हिन्दी के पत्रकारों का औसत वेतन उसी संस्थान के अंग्रेजी के पत्रकारों के मुकाबले आधे से भी कम है।
इस परिप्रेक्ष्य में यह बात स्पष्ट तौर पर कही जा सकती है कि हिन्दी इन संस्थानों के लिए दुधारू गाय जरूर मालूम पड़ती है लेकिन उसे चारा देने में सबको परहेज है। हाल के वर्षों तक ऐसा होता था कि बड़े पत्र समूहों में किसी एक संस्करण से प्राप्त होने वाली अच्छी आय का उपयोग नये संस्करण प्रकाशित करने या अखबारों की गुणवत्ता सुधारने में होता था लेकिन अब ऐसी प्रवृति पनप रही है कि हिन्दी का उपयोग केवल राजस्व प्राप्ति के लिए हो और उस राजस्व का इस्तेमाल अन्य खर्चों की पूर्ति के लिए किया जाए। ताज्जुब होता है यह सुनकर कि हिन्दी का एक प्रसिद्ध और काफी पुराना दैनिक इन दिनों अपने विज्ञापन कारोबार से मिलने वाली रकम का भी जायदादी कारोबार में निवेष कर रहा है। बिल्डरों के मीडिया में आने की प्रवृति कुछ वर्ष पहले तक देखी जा रही थी लेकिन मीडिया वालों की बिल्डर बनने या अन्य कारोबार में घुसने की कोशिश कहीं से भी शुभ संकेत नहीं है, खासकर, हिन्दीभाषी मीडिया के मामले में उसकी ढांचागत कमजोरियों के मद्देनजर यह बात ज्यादा प्रभावी दिखती है।
यह तो बात थी अनुवाद की। पत्रकारिता के मूलतः बौद्धिक कार्य होने के कारण इसके पेशेवरों के बीच वैचारिक वादों के प्रति विशेष अनुराग की संभावना हमेशा बनी रहती है। हिन्दी पत्रकारिता के साथ भी ऐसा हो रहा है और वादों के प्रति अनुराग के अतिरेक में इसके पत्रकार कई बार सूचक की अपनी भूमिका से उठकर प्रवक्ता की भूमिका में आने को विकल मालूम पड़ते हैं। इस वजह से बारंबार उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। मार्क्सवाद से उग्र राष्ट्रवाद तक और यथास्थितिवाद से आधुनिकतावाद तक वैचारिक मंथन के मोर्चों पर कई बार पत्रकारों की तटस्थता संदिग्ध होती रही है। इस स्थिति का खामियाजा कहीं न कहीं पत्रकारिता को ही उठाना पड़ेगा। हिन्दी के साथ विडम्बना यह है कि उसके अधिकतर पत्रकार या तो इन वादों के मोहपाश में हैं या तात्कालिक लाभों के अनुकूल अलग-अलग वादों का चोला बदलते रहते हैं और जो लोग बौद्धिकता के इस ज्वर से पीडि़त नहीं हैं उनके लिए विवाद ही खबर है।
जैसा कि पहले कहा गया कि वाद और विवाद की समस्या भी हिन्दी में आयातित है। भारतीय मीडिया का मौलिक चरित्र अंग्रेजी का मीडिया ही तय करता है और इस वजह से अंग्रेजी की ही तरह हिन्दी में भी तुच्छ विवादों को खबर बनाने की कोशिश होती है। अंग्रेजी का टीवी मीडिया तो इस बीमारी से उबरने की बहुत हद तक कोशिश कर रहा है लेकिन अब तक अबोधपन से गुजर रही हिन्दी मीडिया के लिए यह समस्या विकराल ही होती जा रही है। ग्लैमर की दुनिया के बेसिरपैर विवाद प्रिंट से इलेक्ट्रानिक तक में कई बार मुख्य खबर बनकर महत्वपूर्ण खबरों को धकिया रहे हैं। सीएमएस मीडिया लैब समेत कई शोध संस्थान अपनी रिपोर्टों में इस बात की पुष्टि कर चुके हैं। ऐसी सतही खबरों में उलझकर रहने की हिन्दी मीडिया की अनावश्यक विवशता भी कहीं न कहीं उसकी दुर्गति का कारण है। इसलिए अब हिन्दी मीडिया को अपने बेहतर भविष्य से उबरने के लिए वाद, विवाद और अनुवाद की छाया से मुक्त होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित करने के लिए पहल करनी होगी।
ऋतेष पाठक, अगस्त अंक, २०११

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