शुक्रवार, 9 मई 2014

क्या विदर्भ होगा देश का 30 वां राज्य ?




 बुधवार, 5 मार्च, 2014 को 13:22 IST तक के समाचार 
प्रस्तुति-- पंकज सोनी, शीरिन शेख
वर्धा 
विदर्भ मोर्चा
नागपुर विधानसभा के सामने कुछ लोग हाथों में झंडे लिए विदर्भ को अलग राज्य का दर्जा देने की मांग के नारे लगा रहे हैं.
ये लोग यहां रोज़ आकर विदर्भ के पक्ष में नारे लगाते हैं. इसी तरह के नारे महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के कुछ दूसरे शहरों में भी लगाए जाते हैं. लेकिन विदर्भ राज्य की मांग के लिए जन आंदोलन नहीं शुरू हो सका है.
लेकिन क्लिक करें तेलंगाना के बाद क्या विदर्भ की बारी है? कम से कम नागपुर में आम लोगों से बातें करके ऐसा ही महसूस होता है.
नागपुर उन गिने चुने शहरों में से एक है जो कभी एक बड़े प्रांत की राजधानी होता था. लेकिन शायद ये एक अकेला ऐसा शहर है जो केवल साल में कुछ हफ़्तों के लिए महाराष्ट्र की राजधानी बनता है.
लेकिन भावनात्मक रूप से विदर्भ वाले इसे राजधानी से कम नहीं समझते. और समझें भी क्यों नहीं. यह विदर्भ के 11 ज़िलों में सब से अधिक विकसित है.

नागपुर की पहचान

एक राजधानी के लिए जो भी बुनियादी ढांचा चाहिए वो यहां मौजूद है. इसके अलावा कई कारणों से इसकी एक अलग पहचान है. ये संतरों का शहर है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस का मुख्यालय है. कपास की एक बड़ी मंडी भी यहां है.
यह एक साफ़ सुथरा शहर है जहां हरे पेड़ पौधों की कमी नहीं. सड़कें चौड़ी हैं और बाज़ार लोगों से भरे रहते हैं. लेकिन विदर्भ के दूसरे 10 शहर विकास से वंचित हैं.
विदर्भ मोर्चा
विदर्भ के गांवों की हालत और भी ख़राब है. ग़रीबी हर जगह नज़र आती है. क़र्ज़ों में डूबे यहां के किसान आज भी आत्महत्या कर रहे हैं. यहां के लोगों को यह शिकायत है कि उनके साथ भेदभाव होता है.
भेदभाव ही मुख्य कारण है विदर्भ के लिए अलग राज्य की मांग का. पिछले दिनों कराए गए एक ग़ैर-सरकारी जनमत संग्रह में 96 प्रतिशत लोगों ने विदर्भ को एक अलग राज्य बनाने का समर्थन किया.
क्लिक करें तेलंगाना के जन्म के बाद अब विदर्भ के लोगों में भी उम्मीद बंधी है किक्लिक करें विदर्भ भारत का तीसवां राज्य बन सकता है. समय-समय पर इसके पक्ष में सड़कों पर भी आवाज़ें सुनाई देती हैं.

बीजेपी-शिवसेना में ठनी

लेकिन इस मुद्दे के कारण भारतीय जनता पार्टी और उसकी सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना के बीच ठन गई है. विदर्भ में 10 लोकसभा सीटें हैं जिन पर साल 2009 के चुनाव में इन दोनों पार्टियों ने बढ़िया प्रदर्शन किया था.
जिस तरह से कांग्रेस ने तेलंगाना के लिए पैरवी की, ठीक उसी तरह से इस बार भाजपा ने यहां की सभी 10 सीटें जीतने के लिए शिवसेना से पुरानी दोस्ती को दांव पर लगा दिया है.
डॉक्टर गोविन्द वर्मा इंदिरा गांधी के ज़माने के कांग्रेसी रह चुके हैं और विदर्भ के लिए लड़ने वालों में सब से आगे हैं. विदर्भ के कारण वो भाजपा की झोली में जा गिरे हैं.
वो कहते हैं, "अब हमारा फ़र्ज़ ये रहेगा कि हर जगह कांग्रेस को गिराओ और भाजपा को लाओ". वो आगे कहते हैं, "जो विदर्भ देगा हम उसके लिए हैं."
गोविंद वर्मा विदर्भ
भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी यहां से लोकसभा चुनाव के भाजपा के उम्मीदवार हैं.
उन्होंने वर्मा को आश्वासन दिया है कि भाजपा सरकार में आते ही विदर्भ को एक अलग राज्य बनाने का प्रस्ताव लाएगी.
वर्मा ने कहा कि अगर भाजपा ने उन्हें धोखा दिया तो वो उसे छोड़ देंगे जिस तरह से कांग्रेस का साथ उन्होंने छोड़ दिया. लेकिन भाजपा को सब से अधिक विरोध का सामना अपने सहयोगी शिवसेना से करना पड़ेगा.

शिवसेना का विरोध

शिवसेना ने इशारों में कह दिया है कि अगर भाजपा ने इस मुद्दे को उछाला तो वो ये दोस्ती ख़त्म भी कर सकती है. शिवसेना के ज़िला प्रमुख शेखर सबर्बन्धे कहते हैं, "शिवसेना एक अखंड महाराष्ट्र चाहती है और महाराष्ट्र को दो टुकड़ों में बांटने नहीं देगी."
उन्होंने बताया, "शिवसेना यह समझती है कि मराठी बोलने वाले सभी इलाक़े एक रहें. सारे मराठी बोलने वालों का राज्य एक रहे और सारे मराठी लोग एक जगह राज्य करें ऐसी भावना शिवसेना की है."
शेखर सबर्बन्धे का यह भी दावा है कि खनिज संपन्न विदर्भ राज्य की मांग नेताओं में अधिक है, जनता में कम. अपने तर्क को साबित करने के लिए वो उन उम्मीदवारों का उदाहरण देते हैं जो विदर्भ के मुद्दे पर चुनाव लड़े और बुरी तरह से हार गए.
वो कहते हैं कि विदर्भ राज्य के लिए आंदोलन शिखर पर था साल 1971 से 1973 तक, जब आम आदमी भी इसकी मांग करने सड़कों पर उतर आया था.
विदर्भ मोर्चा
उन्होंने कहा, "आज आम आदमी को रोटी और रोज़गार की पड़ी है. लोग आज सड़कों पर आंदोलन करने नहीं आ रहे. नेताओं ने कोशिश की लेकिन तेलंगाना के लोगों की तरह आम आदमी में जोश नहीं दिखा."
वो आगे कहते हैं, "विदर्भ की जनता जानती है कि जो नेता एक अलग राज्य चाहते हैं उनका स्वार्थ क्या है. वो केवल अपने फ़ायदे के लिए इसकी मांग कर रहे हैं. इन सभी नेताओं के पास या तो उद्योग है या बड़ा कारोबार."

बना चुनावी मुद्दा

बाज़ारों और देहातों में हमने आम जनता से अलग राज्य पर उनकी राय ली लेकिन अधिकतर ने कहा उनको कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता, यानी कि राज्य बन जाए तो विरोध नहीं करेंगे लेकिन इस मांग के लिए सड़कों पर भी नहीं आएंगे.
कोयले के भारी मात्रा में उत्पादन के लिए जाने जाने वाले विदर्भ के लिए अलग राज्य के आंदोलन से जुड़े कई लोग यह स्वीकार करते हैं कि विदर्भ के हक़ में सभी तत्व अलग-अलग बातें करते हैं. 50 साल से अधिक समय से चले आ रहे इस आंदोलन में शामिल नेताओं के बीच आपसी फूट के कारण लोगों ने इन्हें गंभीरता से लेना छोड़ दिया है.
नागपुर
नागपुर साल 1853 से 1861 तक 'नागपुर प्रॉविंस' की राजधानी रहा. इसके बाद मध्य प्रांत और बरार का साल 1950 तक. इसके बाद मध्य प्रदेश राज्य का जन्म हुआ और नागपुर एक बार फिर इसकी राजधानी बना. लेकिन 1960 में महाराष्ट्र राज्य के निर्माण के बाद इस शहर ने यह रुतबा खो दिया और तब से इसके रुतबे को वापस लाने के लिए एक आंदोलन जारी है.
वर्मा इसीलिए कहते हैं, "हम एक नए राज्य की मांग नहीं कर रहे हैं बल्कि नागपुर के खोए हुए दर्जे को वापस बहाल करने की मांग कर रहे हैं."
क्या नागपुर को एक बार फिर राजधानी बनने का सम्मान हासिल होगा? क्या विदर्भ भारत का 30वां राज्य बन सकेगा? इन सवालों का उत्तर किसी के पास नहीं. हां, यह आगामी आम चुनाव का मुद्दा यहां ज़रूर बन गया है.
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