गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

पावर और बाजार से बचना होगा मीडिया को




बिहार ऑब्जर्वर: world-press-freedom-day-2013आज विश्व प्रेस फ्रीडम डे है इस अवसर पर आज पूरे विश्व में प्रेस की स्वतंत्रता पर बड़े बड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। सेमिनार होता है प्रेस की आजादी पर लम्बे चौड़े भाषण का दौर चलता है और अंत में अपने कर्तव्य का निर्वाहन करते हुए अपनी जान निछौवार करने वाले पत्रकारों की याद में लोग दो मिनट का मौंन रखते हैं।
संयुक्त राष्ट संघ की और से जारी सूची के अनुसार 2012 में 70 पत्रकारों की हत्या हुई है हलाकि पिछले दो दशक में यह संख्या सबसे कम है। लेकिन एक पत्रकार के रुप में आज का यह दिन विश्व प्रेस फ्रीडम डे मुझे लगता है अब प्रसांगिक नही रहा। अब तो आज के दिन को विश्व प्रत्रकार फ्रीडम डे घोषित होना चाहिए, जिसमें वैसे पत्रकार जो पत्रकारिता के वसूलो के लिए काम करते हैं। इसी बहाने उन्हे सम्मानित किया जाये ताकि उसमें पत्रकारिता को बनाये रखने का जूनुन कायम रहे।
मेरा तो मानना है जिस तरीके से सरकार कई राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा करती है उसी तरह पत्रकारो के लिए भी सम्मान और पुरस्कार होनी चाहिए तभी पत्रकारिता और पत्रकार बच सकता हैं। क्यों कि अब प्रेस की आजादी  खतरे में नही है बल्कि पत्रकारों की आजादी खतरे में है जिस तरीके से प्रेस अब रोजगार का रुप ले लिया है वैसे में अब पत्रकारिता होती कहा है या फिर यू कहे पत्रकारो का पत्रकारिता करने की छुट कहा है अब तो सौंदे बाजी होती है। सरकार से और ऐड देने वाली कम्पनी से।सौंदा पट गया तो सरकार का गुणगान करना है नही तो बस सरकार के कामों की आलोचना करते रहना है और दूसरी और ऐड देने वाली कम्पनी का मार्केटिंग चले इसके लिए मदर डे, फादर डे, भेलनटाईन डे पता नही कितने तरह के हमलोग डे मनाते है उसे प्रचारित कर के जनता को मार्केट में जाने के लिए प्रेरित करते है उससे भी बात नही बनी तो अखबार और चैनल को प्रोडक्ट के रुप में बाजार में बेचते है।
आज मीडिया एक बड़े उधोग का रुप धारण कर लिया है और लगभग 10 प्रतिशत बाजार पर इसका कब्जा हो गया है ।यही कारण है कि आज अधिकांश मीडिया हाउस में रिलान्स जैसे औधोगिक घराने का पैंसा लग रहा है।लगभग पूरे मीडिया हाउस पर रिलान्स का कब्जा हो गया है 30 से 49 प्रतिशत शेयर उसका है ।वही कई और औधोगिक घराने निवेश करने की तैयारी में हैं क्यो कि अब मीडिया जनसरोकार से जुड़े मुद्दों के लिए नही रहा ये तो अब मार्केट को संचालित करने का एक प्रभावी माध्यम हो गया है।अब जरा आप भी इस माध्यम के पीछे के सच का जानिए मीडिया की दुनिया में हो क्या रहा है-
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- कैसे लोग पत्रकारिता कर रहे है ?
- क्यो मीडिया वाले अपने बच्चे को पत्रकार बनना नही चाह रहे है ?
- क्यो मीडिया का स्तर इतना तेजी से गिर रहा है?
- क्यो ऐसे लोग मीडिया में आ रहे है जिनकी कोई समझ नही है?
यह खेल 90 के दशक से शरु हुआ और अब तो पूरी तौर पर व्यवस्थित हो गया है।
पहले अखबार की बात करे क्यों कि अभी भी इस मीडिया का सबसे अधिक पहुंच हमारे देश में है। क्या हुआ इस माध्यम का आज अखबारों के लिए खबर कोई माईने नही रखता पहले क्या था पूरे बिहार का एक अखबार होता था जन सरोकार से जुड़े मामले को गांव से लेकर मुख्यमंत्री तक पढते थे, और उस पर कारवाई भी होती थी। लेकिन अब क्या है हर जिले का अलग अलग अखबार है अब पत्रकारो का काम क्या है गांव गांव जाकर मुखिया जी ,स्कूल के हेड मास्टर से लेकर थाना अध्यछ और बीडीओ, सीओ से ऐड वसूलिए खबर पर कोई जोड़ नही है।इसलिए सड़क छाप लोग पत्रकार बन रहे है क्यो कि अखबार अब खबर के लिए नही कौन कितना ऐड देता है वही उसकी योग्यता है। फिर जिले में वसूली के लिए एक सेन्टर बना रखा है जहां न्यूज पर कम ऐड पर ज्यादा समय देना है और उन्हे बदले में  5 से 10हजार रुपया वेतन। और बाकी पत्रकारो को प्रेस इन्हे क्या देता है कभी सोचे है जानेगे तो रुह कांप जायेगा ।अखबार का अंतिम कड़ी अभी प्रखंड है जहां वो अपना प्रतिनिधि रखते है पता है अखबार वाले उसे क्या देते है।पांच रुपया के 25 रुपया प्रति न्यूज और फोटो लगा तो 25 रुपया से 40 रुपया प्रति फोटो किसी भी पत्रकार का महिने ने दो बहुत ज्यादा खबरे छपी तो दो हजार रुपया का बिल बनेगा और वो भी कम मिलेगा इसकी कोई गांरटी नही है लेकिन अखबार उसी पत्रकार से वर्ष में दो से चार लाख का ऐड वसूलवाता है और बदले में 10 से 15 प्रतिशत कमीशन देता है और काम 24 घंटे का है। बताये कैसे जीवन चल रहा है इन पत्रकारों का ।पूरे देश में दस लाख पत्रकार है तो 9 लाख पत्रकार इसी तरह काम कर रहे हैं।
अब चलिए भिजुउल मीडिया की बात करे ले इसका प्रतिनिधि देश के सभी जिलों में काम कर रहा है और आज चैनल इऩ्ही जिला प्रतिनिधियों के सहारे चल रहा है जरा इनके बारे में भी जान ले ईटीवी को छोड़कर कोई भी चैनल प्रतिमाह पैसा नही देता है पहली बात। दूसरी बात इन्हे मिलता क्या 100 रुपया से लेकर 250 रुपया तक रिजनल चैनल में जिनता आपका खबर चला उसके आधारा पर— राष्ट्रीय चैनल का हाल जान ले ये लोग 750 रुपया से 2500 रुपया एक पूरी स्टोरी पर देता है वो भी खबरे चली तो ।और खबर बनाने में क्या खर्च है 25 से 30 हजार का कैमरा–25से 50 हजार का लैबटांप और फिर दो पहिया वाहन तभी आपकी ये चैनल वारे रखेगे हलाकि रिजनल चैनल को छोड़कर राष्ट्रीय चैनल इन प्रतिनिधियों पर ऐड कि जिम्मेवारी नही सौंपी है लेकिन जिसे में काम करने वाले इन प्रतिनिधियों को अब 5 से 10 हजार बहुत हुआ एक माह में और कई माह तो शून्य पर भी चला जाता है यही कारण है कि आपको जिले में काम करने वाले रिपोर्टर खबरे कम फिल्म ज्यादा बनाते है रोजना सुबह से शाम ये लोग स्टोरी ही प्लांट करता है अच्छा दिल्ली में सरबजीत को लेकर दुआए मांगी जा रही ये खबरे अभी हीट है तो फिर ये लोग योजना बनाने लगते है ऐसा क्या करे जो स्टोरी चल जाये फिर जुगार तकनीक के सहारे स्टोरी का प्लांट किया जाता है।
आप देखते होगे कि दिल्ली में गैग रेप हुआ तो फिर पूरे देश से गैग रेप की एक से एक खबरे चैनल पर दिखने लगती है सरबजीत के दुआ तो एक से एक आईडिया आपको चैनल पर दिखने लगेगा जिला में काम करने वाले रिपोर्टर सुबह उठते ही पहले चैनल खोलता है देखता है आज कौन सी खबर बिक रहा है बस कैमरा उठाया और स्टोरी पलान्ट करने चल दिया एक से एक जीनियस है जिले में काम करने वाले जो लाखो की सैलरी पाने वाले को बेवकूफ बनाते रहते है।आपको चैनल और अखबार में जन सरोकार से जुड़े मुद्दे पढने और देखने को नही मिलता है उसकी सबसे बड़ी वजह यही है।मीडिया बाजार और बाजार मीडिया को चला रही है और पत्रकार उसके अस्त्र के रुप में काम कर रहा है उसे पता कहां है कि जनता के विश्वास को कारण हमारी अहमियत है हम उसी को रोज दाव पर लगा रहे हैं।ये हलात है आज के पत्रकारिता का इस फिल्ड से जुड़े 95 प्रतिशत पत्रकार आज अपने वेतन के बूते पर परिवार चलाने की स्थिति में नही है।यह सच है मीडिया से जुड़े लोगो के चहरे पर जो चमक आप देख रहे हैं उसे बनाये रखने के लिए एक मीडिया मैंने को क्या क्या खोना पड़ता है आप सोच नही सकते ।आज बड़ा और पैसे वाला पत्रकार वही है जो पत्रकारिता के साथ साथ सभ्य भाषा में लाबिंग और जरा असभ्य भाषा में कहे तो दलाली आज जो पत्रकार ये नही करेगा उसको यह फिल्ड छोड़कर जाना ही है या फिर जिसका परिवारिक आधार मजबूत है और मीडिया के सेलरी से कोई मतलब नही है वो लोग है जिसका स्वार्थ कुछ दूसरे तरह का होता है।
अब आप ही बताये इस फिल्ड से लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की बात करना बेमानी नही होगी जिसका सारा खम्भा बालू के रेत पर खड़ा है लेकिन इन सबके बावजूद अभी भी उम्मीद की थोड़ी सी किरणे दिखती है तो वह मीडिया ही है जैसे भी है आज ये न रहती तो पता नही प्रशासक पुलिस और नेता जनता के साथ क्या करता ये एक बड़ी बात वही समय समय पर मीडिया मैंने अपना रास्ता भी निकालते रहते है जनता से जुड़े सवालो को लेकर आज भले ही अखबार और टीवी में आम लोग दूर हो रहे है उनके मुद्दे दूर हो रहे है लेकिन सोशल मीडिया ने इसे नयी दिशा दी है और आने वाले समय में यह मीडिया सबसे बड़ा प्रभावी मीडिया होगा जिस पर हमारा और आपका प्रभुत्व होगा अंत में आपसे आग्रह है टेकनोलांजी ने जो आपको सोशल मीडिया के रुप से एक जो बड़ा हथियार दिया है उसका सही उपयोग करीए भलाई इसी में हैं।

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