गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

माफ करेंगे, पत्रकारिता अब प्रोफेशन है, मिशन नहीं ?



2013.03.17
जब पत्रकारिता प्रोफेशन है तो पत्रकारीय मूल्यों की आशा करना बेमानी है
सवाल तो यह भी है कि जब पत्रकारिता प्रोफेशन है तब सरकार से सुविधाएं किसलिये, पीआईबी मान्यता क्यों, प्रिंटिंग प्रेस पर छूट क्यों? लोकतंत्र का चौथा खम्भा होने का फर्जी नारा क्यों ? कोई प्रोफेशन लोकतंत्र का खम्भा कैसे हो सकता है ?
अमलेन्दु उपाध्याय / प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन जस्टिस मार्कण्डेय काटजू चाहते हैं कि जिस तरह वकालत के पेशे में आने के लिये एलएलबी की डिग्री और बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन और डॉक्टर बनने के लिये एमबीबीएस डिग्री और मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन या टीचर बनने के लिये कुछ कोर्स/ डिग्री अनिवार्य है इसी तरह पत्रकारिता के प्रोफेशन में उतरने के लिये भी कुछ कानूनी योग्यता होना अनिवार्य हो।
इस बावत जस्टिस काटजू ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के संयोजकत्व में एक तीन सदस्यीय समिति गठित कर दी है जो जल्द से जल्द अपनी रिपोर्ट देगी कि इसके लिये क्या न्यूनतम योग्यतायें निर्धारित की जायें। समिति में प्रेस काउंसिल के सदस्य राजीव सबादे और पुणे विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग में एसोसेएट प्रोफेसर डॉ. उज्जवला बार्वे शामिल हैं। बाद में इस समिति में प्रेस काउंसिल के सदस्य राजीव रंजन नाग एवं गुरिंदर सिंह तथा आईआईएमसी के महानिदेशक सुनीत टण्डन को भी शामिल किया गया। जबकि श्री गर्ग को यह शक्तियाँ दी गयी हैं कि वे जिन्हें जरूरी समझें समिति में शामिल कर सकते हैं।
जब पत्रकारिता की दशा और दिशा को लेकर रोज़ बहस हो रही हो कि पत्रकारिता को बाजार के हवाले करने के कारण उसके मूल्यों में ह्रास हो रहा है और पत्रकारिता की पढ़ाई कराने वाले संस्थान तकनीक तो सिखा रहे हैं लेकिन पत्रकारिता को रोज़ मार रहे हैं ऐसे में जस्टिस काटजू के इस आइडिया का विरोध होना तय माना जा रहा है क्योंकि पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा की बात करने वाले लोग इस तथ्य को हमेशा रेखाँकित करते रहे हैं कि पत्रकारिता धंधा नहीं है, मिशन है। ऐसे में पत्रकारिता क्या है और खबरों का धंधा क्या है दोनों में अन्तर रेखांकित करने की जरूरत है।
सवाल है कि आप पत्रकारिता को व्यापार और एक उत्पाद के रूप में परिभाषित कर रहे हैं तब तो प्रेस काउंसिल की पहल सही लगती है लेकिन अगर पत्रकारिता का जनता से वास्ता है, पत्रकारिता धंधा और उत्पाद नहीं है तो उसके धंधे वाले उसूल भी नहीं हो सकते।
जब आप पत्रकारिता में प्रोफेशनलिज्म की बात कर रहे हैं फिर तो पत्रकारिता को पेशा ही बनाना चाहते हैं। जब पत्रकारिता प्रोफेशन है तो पत्रकारीय मूल्यों की आशा करना बेमानी है। जाहिर है जब आपने पत्रकारिता को धंधा मान ही लिया तो उसूल कैसे? व्यापार में क्या उसूल होते हैं? प्रोडक्ट को बेचना ही एकमात्र उसूल है चाहे जैसे बिके।
उदंत मार्तण्ड निकला तो पत्रकारिता की डिग्री नहीं थी। लेकिन वकालत के लिये तब भी डिग्रियाँ थीं और डॉक्टरी के लिये भी डिग्रियाँ थीं। पत्रकारिता के क्षेत्र में जिन लोगों ने भी कुछ उसूल कायम किये और पत्रकारिता को जनता से जोड़ा उनमें से किसी के भी पास कोई डिग्री या रजिस्ट्रेशन नहीं था। जबकि पत्रकारिता को कलंकित करने वाले जितने भी प्रकरण सामने आये हैं उनमें सभी प्रोफेशनल डिग्रियाँ वालों ने ही कलंक लगाया है। आज भी पत्रकारिता के उच्च मानदण्डों का जो पालन कर रहे हैं वे छोटे और गैर प्रोफेशनल पत्रकार ही हैं वरना प्रोफेशनल तो पेड न्यूज़ का कारोबार कर रहे हैं।
ऐसे में कैसे कहा जा सकता है कि डिग्री ले लेने से पत्रकारिता में उच्च मूल्य स्थापित हो जायेंगे ? वैसे भी जनसंचार की पढ़ाई कराने वाले संस्थान गली गली में खुल गये हैं। ये संस्थान तकनीक तो सिखा रहे हैं, खबरों का उत्पादन और प्रस्तुतीकरण और खबरों से खेलना तो सिखा रहे हैं लेकिन पत्रकारिता के मूल्यों से इनका क्या वास्ता है ? 
इसे कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है। देश की तमाम निर्णायक संस्थाओं पर आईआईटी/ आईआईएम से निकले प्रोफेशनल्स का कब्जा है। सिविल सेवा में आने वाले अधिकारी उच्च स्तरीय प्रोफेशनल भी होते हैं और उन्हें प्रशिक्षण भी मिलता है। लेकिन भ्रष्टाचार की गंगोत्री भी इन्हीं प्रोफेशनल्स के चरणों से निकलती है और आम जनता पर जुल्म ढाने के उपाय भी यही तैयार करते हैं।
जस्टिस काटजू के इस नुस्खे में एक और बेसिक खोट है। वह पत्रकारिता को वकालत या डॉक्टरी की तरह देख रहे हैं। ईमानदारी की बात कही जाये तो वकालत और डॉक्टरी में कौन से उसूलों का पालन किया जा रहा है ? क्या बार काउंसिल और मेडिकल काउंसिल नैतिकता का पाठ पढ़ाकर उन पर अमल भी करा पाती हैं ? जब सर्वोच्च न्यायालय के किसी काबिल प्रोफेशनल वकील की एक दिन की फीस 25 से 50 लाख रुपये हो ऐसे में यह काबिल प्रोफेशनल उस बेगुनाह मुल्जिम के किस काम का है जिसकी जेब में एक पेशी पर देने के लिये 25-50 लाख रुपये नहीं हैं।
सवाल तो यह भी है कि जब पत्रकारिता प्रोफेशन है तब सरकार से सुविधाएं किसलिये, पीआईबी मान्यता क्यों, प्रिंटिंग प्रेस पर छूट क्यों ? लोकतंत्र का चौथा खम्भा होने का फर्जी नारा क्यों ? कोई प्रोफेशन लोकतंत्र का खम्भा कैसे हो सकता है ? असल सवाल यही है कि मीडिया में जो पूँजी लग रही है उसका चरित्र क्या है? मीडिया का एजेण्डा यही पूँजी तय कर रही है न कि पत्रकार तय कर रहे हैं।
यह षडयंत्र भी हो सकता है ताकि कम पूँजी और जनोन्मुखी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति पत्रकारिता की चौहद्दी में घुस ही न सके। किसी थके से थके संस्थान से भी पत्रकारिता की डिग्री लेने में कम से कम 5 लाख रुपये का खर्च आता है। जाहिर है शोषित वंचित तबके का आदमी इसे नहीं खरीद सकता न 150 करोड़ लगाकर अखबार निकाल सकता है। और जो 5 लाख खर्च करके प्रोफेशन में उतरेगा वह किन उसूलों पर काम करेगा ? अपना पेट पालेगा, 5 लाख वसूलेगा, अपने आनी वाली पीढ़ी के 5 लाख का इंतजाम करेगा या उसूलों को ओढ़ेगा, बिछायेगा ? जाहिर है इस सोच में बेसिक खोट है। चूँकि अब मीडिया से बाजार का रिश्ता कायम हो रहा है इसीलिये अब आम आदमी की खबरें पन्नों से गायब हो रही हैं। जहाँ पूँजी आती है वहाँ मुनाफे की बात भी आती है और जब मुनाफे की बात आती है तो एकमात्र उसूल भी मुनाफा ही होता है।
इस नुस्खे को साधारण चिन्ता समझकर टालना बहुत खतरनाक हो सकता है। बहुत संभव है इस चिन्ता के पीछे मीडिया मफियाओं का दबाव हो। अधिकाँश मीडिया घराने जनसंचार और पत्रकारिता के स्कूल भी चला रहे हैं। यह देखने वाली बात है कि इनमें से अधिकाँश स्कूलों से निकले प्रोफेशनल पत्रकारों को नौकरियाँ नहीं मिलती हैं और इन नवोदित तथाकथित प्रोफेशनल पत्रकारों को यह संस्थान अपने मीडिया हाउस में ही बतौर ट्रेनी जर्नलिस्ट छह महीने काम कराने के बाद बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। चूँकि अब यह गोरखधंधा समझ में आने लगा है। इसलिये अधिकाँश मीडया स्कूलों में सीटें ठीक उसी तरह खाली रह रही हैं जिस तरह कुकुरमुत्तों की तरह उगे निजी इंनियरिंग क़लेजों में सीटें खाली रह रही हैं। साफ है कि जब कोई डिग्री प्रोफेशन में आने के लिये जरूरी कर दी जायेगी तो डूबते हुये मीडिया स्कूलों में नई जान आ जायेगी। प्रोफेशन से रोजी रोटी मिले या न मिले लेकिन मीडिया की इन दुकानों का कारोबार खूब चमक उठेगा और आने वाले एक-डेढ़ दशक तक इनका कारोबार खूब फलेगा-फूलेगा।
प्रेस काउंसिल की जो चिन्ता है उसके पीछे इन मीडिया हाउस का दबाव साफ देखा जा सकता है। वरना काउंसिल की चिन्ता पत्रकारों के प्रोफेशनलिज्म की न होकर मीडिया में निवेश होने वाली पूँजी की पड़ताल होना चाहिये था। क्या काउंसिल कोई ऐसा प्रस्ताव भी लाने का प्रयास करेगी कि मीडिया के कारोबार में जो पूँजी घराना उतरेगा वह चिट फण्ड, माइक्रोलेवल मार्केटिंग, बिल्डर- प्रोमोटर, ड्रग्स-केसीनो, डिस्टलरी, पॉवर सेक्टर, खनन जैसे व्यापार नहीं करेगा। मीडिया में पूँजी निवेश करने वाला प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति में हिस्सेदारी नहीं करेगा। क्या प्रेस काउंसिल यह माँग भी करेगी कि मीडिया घरानों में श्रम कानूनों का पालन हो, काम के घण्टे निर्धारित हो, जॉब सिक्योरिटी हो। शायद यह काउंसिल की चिंताओं में शामिल नहीं है।
पिछले वर्ष अप्रैल माह की दो या तीन तारीख को वरिष्ठ पत्रकार और जस्टिस काटजू द्वारा बनाई गई इस समिति के संयोजक श्रवण गर्ग जी से एक कार्यक्रम में संवाद करने का पुण्य लाभ प्राप्त हुआ। वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया जी मीडिया में शोध पर अच्छा काम कर रहे हैं और मास मीडिया व जनमीडिया के नाम से हिन्दी व अंग्रेजी में पत्रकारिता पर शोध पत्रिकाएं प्रकाशित कर रहे हैं। उसी पत्रिका द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में अधिवक्ता प्रशांत भूषण और मीडिया आलोचक आनंद प्रधान ने मीडिया के कृत्यों पर विस्तार से रोशनी डाली और किस तरह से मीडिया पर पूँजी के दबाव में पत्रकारिता की हत्या की जा रही है उस पर अपनी बात रखी। 
जब श्रवण गर्ग जी का विचार रखने का अवसर आया तो वह उखड़ गये। उनका कहना था अखबार निकालने के लिये 150 करोड़ चाहिये, जिसे मीडिया से दिक्कत हो अपना अखबार निकाल ले। अखबार की कीमत 10 रुपये है आपको चार रुपये में मिलता है। जब सवाल जवाब का दौर चला तो मैंने उनसे कहा पूँजीपति 10 रुपये का अखबार चार रुपये में देने का एहसान क्यों करता है? सर्कुलेशन की दौड़ में क्यों पड़ता है? जाहिर है उसके निजी स्वार्थ हैं इसीलिये वरना 10 की चीज़ 4 में क्यों दे रहा है? 10 रु. का अखबार 4 में इसलिये देता है ताकि 10 रु. की असल कीमत पर अखबार निकालने वाला टिक ही न पाये और वह खबरों को धंधे में तब्दील कर दे।
इस पर श्रवण जी बोले कि आपको दिक्कत है तो आप तय कर लीजिये कि आप मीडिया का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
मैंने फिर कहा कि दाऊद इस धंधे में आया तो क्या होगा ? वह तो 10रुपये का अखबार एक रुपये में देगा और अपना एजेण्डा चलायेगा। इस पर श्रवण जी का तर्क था कि फिल्मों में उसका पैसा लगता है आपको कब मालूम पड़ता है। एक और बड़े पते की बात कही उन्होंने। बोले कि रिपोर्टर अगर तथ्यों की पड़ताल करके रिपोर्ट लिखेगा तो अखबार एक साल में निकलेगा।
इतने पर ही नहीं रुके गर्ग साहब। बोले जस्टिस काटजू को हम प्रेस काउंसिल में रोज झेल रहे हैं। मक्खी मारने के लिये भालू के हाथ में तलवार दे दी है।
अब यही श्रवण गर्ग जी जिस समिति के संयोजक हैं वह समिति जल्द से जल्द अपनी रिपोर्ट देगी जो प्रेस काउंसिल में पारित हो जायेगी तो सरकार के पास जायेगी और सरकार इस पर कानून भी बना देगी। हमें दूर से दिख रहा है समिति क्या निष्कर्ष निकालेगी। बहरहाल श्रवण जी का दर्द कुछ कम हुआ होगा कि मक्खी मारने के लिये भालू के हाथ में तलवार नहीं है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक समीक्षक हैं, साथ ही हस्तक्षेप डॉट कॉम के संपादक)
अमलेन्दु उपाध्याय
एससीटी लिमिटेड
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