शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

सारा जमाना काफिर काफिर



By Newsracemedia
मैं भी काफिर, तू भी काफिर'

'पाकिस्तान के एक मशहूर शायर सुलेमान हैदर की एक कविता ‘मैं भी काफिर, तू भी काफिर’ इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। पाकिस्तान में इस कविता पर विवाद भी हो रहा है। हमारे एक मित्र सिकंदर हयात ने इसको उर्दू से अनुवाद करके मुझे मेल किया है। आप भी पढ़िए और सोचिए।
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मैं भी काफिर, तू भी काफिर
फूलों की खुशबू भी काफिर
शब्दों का जादू भी काफिर...
यह भी काफिर, वह भी काफिर
फैज भी और मंटो भी काफिर

नूरजहां का गाना काफिर
मैकडोनैल्ड का खाना काफिर
बर्गर काफिर, कोक भी काफिर
हंसी गुनाह, जोक भी काफिर
तबला काफिर, ढोल भी काफिर
प्यार भरे दो बोल भी काफिर
सुर भी काफिर, ताल भी काफिर
भांगरा, नाच, धमाल भी काफिर
दादरा, ठुमरी, भैरवी काफिर
काफी और खयाल भी काफिर
वारिस शाह की हीर भी काफिर
चाहत की जंजीर भी काफिर
जिंदा-मुर्दा पीर भी काफिर
भेंट नियाज की खीर भी काफिर
बेटे का बस्ता भी काफिर
बेटी की गुड़िया भी काफिर
हंसना-रोना कुफ्रÞ का सौदा
गम काफिर, खुशियां भी काफिर
जींस भी और गिटार भी काफिर
टखनों से नीचे बांधो तो
अपनी यह सलवार भी काफिर
कला और कलाकार भी काफिर
जो मेरी धमकी न छापे
वह सारे अखबार भी काफिर
यूनिवर्सिटी के अंदर काफिर
डार्विन भाई का बंदर काफिर
फ्रायड पढ़ाने वाले काफिर
मार्क्स के सबसे मतवाले काफिर
मेले-ठेले कुफ्रÞ का धंधा
गाने-बाजे सारे फंदा
मंदिर में तो बुत होता है
मस्जिद का भी हाल बुरा है
कुछ मस्जिद के बाहर काफिर
कुछ मस्जिद में अंदर काफिर
मुस्लिम देश में अक्सर काफिर
काफिर काफिर मैं भी काफिर
काफिर-काफिर तू भी काफिर

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