सोमवार, 16 सितंबर 2013

मरती भाषाओं के दौर में

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मरती भाषाओं के दौर में


शेखर पाठक
जनसत्ता 13 सितंबर, 2013 : कभी रघुवीर सहाय ने कहा था, ‘न सही कविता मेरे हाथ की छटपटाहट सही’। यही बात भाषा के बारे में कही जा सकती है। सिर्फ मनुष्य अपनी छटपटाहट को भाषा यानी शब्द दे सका है। यह कहानी सत्तर हजार साल पहले शुरू होती है, हालांकि लिपियों का संसार करीब पांच हजार साल पहले बनना शुरू हुआ। आज भाषा मानव अस्तित्व की अनिवार्यता और पहचान हो गई है और वही उसे अन्य जीव प्रजातियों से अलग करती है।
वडोदरा की ‘भाषा शोध तथा प्रकाशन केंद्र’ नामक संस्था अभी बीस साल की भी नहीं हुई थी कि उसकी नजर में सौ साल पहले किया गया जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का भारतीय भाषा सर्वेक्षण आ गया। उसने ग्रियर्सन के सौ साल बाद भारत के वर्तमान भाषा परिदृश्य पर नजर डालने का निर्णय किया। उसने किसी प्रकार के भाषा वैज्ञानिक या भाषा ऐतिहासिक काम करने का दावा नहीं किया था। उसका लक्ष्य भारतीय भाषाओं के लोक-सर्वेक्षण का था। यानी सदियों में बनी और विकसित हुई भाषाओं, जो सामूहिक, सांस्कृतिक समुच्चय की तरह हैं, पर आज की आर्थिकी, संसाधनों की लूट और अपने क्षेत्रों से पलायन के कारण जो दबाव बना है उसे समझना। ‘विकास’ ने किस तरह समुदायों और फिर भाषाओं को सिमटने और मिटने को विवश किया है, इसकी पड़ताल करना।
‘भाषा’ कहीं भी भाषाओं को कम या अधिक महत्त्व की श्रेणियों में नहीं बांटती और न बोलने वालों की संख्या के अनुसार उनका स्थान निर्धारित करती है। इस अभियान ने भाषा और बोली या लिपि के होने या न होने का विभाजन भी किनारे रख दिया था। खासकर उन भाषाओं की पड़ताल करना इसका लक्ष्य था, जिनके सिर पर खो जाने का खतरा मंडरा रहा है। यह कार्य कहीं भी ग्रियर्सन के भारतीय भाषा सर्वेक्षण का विकल्प, उसका दोहराव या उसके समांतर नहीं है। यह भारतीय भाषाओं का व्यापक सर्वेक्षण या उनके साहित्य की गहन पड़ताल भी नहीं है।
यह 2011 में भारतीय समुदायों में अब भी जीवित तमाम भाषाओं का एक विस्तृत परिदृश्य प्रस्तुत करने की कोशिश है। ‘भाषा’ विभिन्न समुदायों का एक ऐसा नेटवर्क बनाना चाहती थी, जो टिकाऊ विकास की ऐसी योजना तैयार कर सके, जिसमें समुदाय अपने पारंपरिक ज्ञान की पड़ताल कर सकें और उसकी हिफाजत भी। यह संस्था उस जैविक, सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को कायम रखना चाहती है, जिसे सदियों से तमाम लिपिविहीन या सामान्य भाषाओं ने संरक्षण दिया है। वह चाहती है कि भारत के विविध भाषा समुदायों में अधिक गहरा रिश्ता बने, जिससे भारतीय समाज में बहु-भाषिकता और सांस्कृतिक बहुलता को मजबूती मिले और भारत एक मिले-जुले भाषा और संस्कृति क्षेत्र के रूप में विकसित हो सके।
यह सरकार और समाज के बीच भी ऐसा रिश्ता विकसित करना चाहती है, जिसमें सरकार को विकास की ऐसी रणनीति बनाने को बाध्य किया जा सके, जो समुदायों के पारिस्थितिकीय और सांस्कृतिक संदर्भों से तालमेल रखे। मातृभाषाओं में शिक्षा के लिए क्षमता बढ़ाने और पाठ्य सामग्री विकसित करने का काम करना चाहती है। भारत के किसी भावी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के सर्वेक्षण के लिए एक मूल आधार तैयार करना; विश्व की भाषा विविधता के संरक्षण में योगदान देना और भाषा को राजनीतिक या प्रशासनिक सीमाओं से आगे पारिस्थितिकीय क्षेत्रों के आधार पर देखना इसके अन्य लक्ष्य हैं।
इस संस्था को जनजातियों के बीच काम करने के अनुभव के कारण विभिन्न जनजातियों या समुदायों की भाषा विविधता का ज्ञान था। यह विविधता भूगोल, प्राकृतिक संसाधन, आर्थिकी, स्थायी निवासी या घुमंतू होने से भी जुड़ी थी। ग्रियर्सन ने जो काम 1903 से 1923 के बीच दुनिया के सामने रखा, उसका सामान उन्नीसवीं सदी के अंतिम डेढ़-दो दशकों में जमा किया गया था।
ग्रियर्सन ने एक सौ उन्यासी भाषाओं और पांच सौ चौवालीस बोलियों की चर्चा की है। तब भी एक सौ उन्यासी भाषाओं में से एक सौ पैंसठ पर संकट छाया हुआ था। ग्रियर्सन की टीम पूरे देश की भाषाओं का सर्वेक्षण नहीं कर सकी और जिन प्रांतों में यह काम हुआ, वहां की भी अनेक भाषाएं सामने आने से रह गई थीं। पर इस सर्वेक्षण का अपना महत्त्व था।
इसी बीच 1921 की जनगणना संपन्न हुई और उसमें एक सौ अट्ठासी भाषाएं और मात्र उनचास बोलियां गिनाई गर्इं। तब औपनिवेशिक तंत्र में स्वाभाविक ही अंग्रेजी का वर्चस्व था और भारतीय राष्ट्रवाद या नवजागरण हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की मार्फत बोल रहा था। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त नई पीढ़ी अपनी भाषाओं की तरफ लौट रही थी। यह भी सच है कि औपनिवेशिक काल में भारत की मात्र दो प्रतिशत भाषाएं मुद्रण की दुनिया में प्रवेश कर सकी थीं। यानी तब मौखिकता (ओरलिटी) भाषाओं का एक प्रमुख तत्त्व था।
हिंदी को गांधी से राजगोपालाचारी तक का समर्थन प्राप्त था और अभी भाषा की मामूली राजनीति शुरू नहीं हुई थी। भारत के अधिकतर आंदोलनकारी बहुभाषी थे और भारतीय समाज का भाषाई मिजाज भी यही था। आजादी के बाद अंग्रेजियत का ही नहीं, अंग्रेजी का भी वर्चस्व बना रहा। हिंदी सिर्फ ‘राजभाषा’ बन पाई। सच यही है कि सिर्फ भारतीय समाज उसे ‘राष्ट्रभाषा’ बना सकता है, पर अन्य भाषाओं का भी उतना ही गहरा सम्मान करते हुए। किसी भी भाषा को दोयम दर्जे का नहीं कहा जा सकता।
आज हिंदी के फूल हिंदी हृदय प्रदेश से बाहर ‘तरह-तरह की हिंदी’

में खिले हैं, तो हिंदी की जड़ें अपनी ‘बोलियों’ से खाद-पानी पाती हैं। तब हिंदी की इस दुनिया में खड़ी बोली थी तो ब्रजभाषा भी और कौरवी, कुमाऊंनी, गढ़वाली से भोजपुरी, मैथिली, मालवी, राजस्थानी आदि तक का सिलसिला था। उर्दू और दक्खिनी हिंदी भी उससे दूर नहीं थी।
अनेक बहुभाषी रचनाकारों का होना भी भारत के लिए सौभाग्य की तरह था। तभी राज्य पुनर्गठन आयोग ने भाषाई आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन का विचार दे डाला। इससे मुश्किलें बढ़ीं और समाधान नहीं निकल सके। फिर जब लोहिया ने ‘अंग्रेजी हटाओ’ का नारा दिया तो दक्षिण- विशेष रूप से तमिलनाडु- में हिंदी विरोध चरम पर पहुंच गया। हालांकि मद्रास में हिंदी फिल्में बनती रहीं और ‘चंदामामा’ भी वहां से छपती रही।
1961 की जनगणना में भारत में 1652 ‘मातृभाषाएं’ बताई गई थीं। दुर्भाग्य से जब 1971 की जनगणना हुई तो किसी नासमझी से उन भाषाओं के आंकड़े नहीं दिए गए या उन सबको ‘अन्य भाषाओं’ में गिना गया, जिनको बोलने वालों की संख्या दस हजार से कम थी। 1971 में दस हजार से ऊपर की आबादी में बोली जाने वाली एक सौ आठ भाषाओं की चर्चा है। एक प्रकार से सरकारी तौर पर लगभग पंद्रह सौ ‘मातृभाषाओं’ को दफ्न कर दिया गया। यह सरकारी तौर पर पहला ‘भाषा संहार’ (गणेश देवी इसे ‘फोनोसाइड’ कहते हैं) था। सामाजिक-सांस्कृतिक वास्तविकता यह थी कि हमारे ऐतिहासिक प्रवाह में बोलियां सदा धारा का गतिशील हिस्सा बनी रहीं और भाषाएं किनारे शान से खड़ी होती रहीं। ‘बोलियों’ के प्रवाह की गति से ‘भाषाओं’ को भी नमी और ताप मिलता रहता था।
फिर भाषाई प्रांतों के विचार-फलन के बाद संविधान की आठवीं अनुसूची बनी। अभी इस अनुसूची में बाईस भाषाएं हैं। संविधान की धारा 347 के अनुसार राज्य द्वारा नई भाषाओं को मान्यता देने का प्रावधान है। यूनेस्को के द्वारा प्रकाशित संकटग्रस्त भाषाओं के एटलस में एक सौ सत्तर भारतीय भाषाओं को खतरे में बताया गया है। यूनेस्को ने दस हजार से कम बोलने वालों की भाषाओं को भी लिया है। हालांकि यूनेस्को का एटलस बहुत-सी खामियां लिए है, पर यह एटलस विश्व संस्था द्वारा की गई महत्त्वपूर्ण पहल है। भाषा मनुष्य की सांस्कृतिक थाती का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि यह हमारे मनुष्य होने का प्रमाण है और रचनात्मकता को प्रकट करने का माध्यम भी।
अभी दुनिया में मौजूद अनुमानित छह हजार भाषाओं में से बाईसवीं सदी तक मात्र तीन सौ भाषाओं के जीवित बचे रहने की संभावना प्रकट की गई है। इसका अर्थ हुआ कि हम अनेक समुदायों को तब तक या तो खो देंगे या वे किन्हीं और समाजों में विलीन हो जाएंगे। पर आज दुनिया और देश के अनेक समुदायों में अपनी स्थिति समझने और बदलने की चेतना दिखाई देती है। उन्हें सरकारों और निगमों/ कंपनियों से लड़ते हुए देखा जा सकता है।
इसलिए अनेक लोगों को लगता है कि अब भाषाओं को बचाने की संभावना बढ़ गई है। आज पापुआ न्यूगिनी (900), भारत (870), इंडोनेशिया (600), नाइजीरिया (400), मैक्सिको (300) आदि भाषाई संपन्नता और विविधता वाले देश हैं। इनके मुकाबले औद्योगिक क्रांति वाले या विकसित देशों में यह भाषाई संपन्नता और विविधता नहीं है। अफ्रीका, अमेरिका, लातिनी अमेरिका और आस्ट्रेलिया में कैसे जन-भाषाओं का संहार किया गया, यह छिपा नहीं है। आज भाषा चेतना किसी भी और समय के मुकाबले अधिक है, उसे राजनीतिक और आर्थिक चेतना के साथ जोड़ने की जरूरत है।
इतिहास में कई बार भाषाओं पर संकट मडराया। पहला संकट तब आया जब मनुष्य पशुचारण से खेती की ओर आया या कहें कि घुुमक्कड़ी से स्थायी बसाहटों की ओर आया। उद्योगीकरण के दौर में दूसरा संकट आया। यह उपनिवेशवाद से जुड़ा था। पर सबसे बड़ा संकट आज खगोलीकरण के दौर में आया है। क्योंकि पूंजीवाद के इस रूप की मुख्य फितरत एकल संस्कृति की है। वह पृथ्वी पर किसी भी तरह की विविधता नहीं चाहता है। कुछ विचार और संस्थाएं भी देशों या क्षेत्रों में इस तरह की विविधता के खिलाफ हैं। यह असहज और अप्राकृतिक स्वभाव कहा जा सकता है और इसका ज्यादा टिकना संभव नहीं होगा।
‘भाषा’ संस्था ने मात्र दो साल के भीतर तीन हजार भाषाविदों, भाषा कार्यकर्ताओं और समुदायों के सहयोग से आठ सौ सत्तर भाषाओं को सामने लाने में कामयाबी हासिल की है। यह काम इक्यावन या इससे भी अधिक खंडों में प्रकाशित हो रहा है। इसमें भारत की छियासठ लिपियां सामने आएंगी और एक संकेत/ इशारा (‘साइन’) भाषा भी। इस भाषा पर एक पूरा खंड है। इन खंडों में भारतीय हिमालयी क्षेत्र की सत्तर और समुद्र तटीय क्षेत्र की पैंतालीस भाषाएं प्रस्तुत हुई हैं। जनजातीय भाषाओं की कुल संख्या साढ़े तीन सौ से अधिक है।
यह संस्था भाषाओं के नमूने रिकार्ड करने, सामुदायिक नृजातीय अध्ययन, पारिस्थितिकीय-सांस्कृतिक नक्शा तैयार करने का काम करेगी। यह एक ऐसे अंतरविश्वविद्यालयी केंद्र की स्थापना करना चाहती है, जहां गैर-अनुसूचित भाषाओं (जो आठवीं अनुसूची में नहीं हैं) का अध्ययन किया जाएगा। संस्था का सपना एक अखिल एशियाई भाषा सर्वेक्षण करने का भी है। वह सपने देखती है और उनको हथेली का यथार्थ भी बनाती ह

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