बुधवार, 25 सितंबर 2013

विदर्भ की 30 - 40 जनजातीय बोलियां लुप्त होने की कगार पर








विनय यादव | Aug 09, 2013, 07:52AM IST



Email Print Comment

विदर्भ राज्य की 30 से 40 जनजातीय बोलियां लुप्त होने की कगार पर!
मुंबई। राज्य की 30 से 40 जनजातीय बोलियां लुप्त होने की कगार पर हैं। इनमें विदर्भ की आदिवासी कबीलों की बोलियां सर्वाधिक हैं। इसके अलावा मराठवाड़ा और खानदेश की कई जनजातीय बोलियां भी शामिल हैं। यह जानकारी देश में पहली बार कराए गए भाषाओं के अध्ययन में सामने आई है।
एक शताब्दी पहले ग्रियर्सन की ओर से सर्वेक्षण के बाद देश में पहली बार भारतीय लोकभाषा का सर्वे पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया की ओर से किया गया है। इस सर्वे में हिंदी, मराठी, उर्दू, सिंधी, गुजराती जैसी महत्वपूर्ण भाषाओं के साथ अनुसूचित व जनजाति वर्ग की बोलियों को शामिल किया गया है।
देश की 780 भाषाओं व बोलियों के अलावा 66 लिपियों का भी सर्वे किया गया है।
सर्वे की योजना तैयार करनेवाले डॉ. गणेश देवी के अनुसार विदर्भ, मराठवाड़ा व खानदेश में कई अनुसूचित बोलियां लुप्त होने की कगार पर हैं। राज्य की 30 से 40 बोलियां अंतिम पड़ाव पर हैं।
दो बस्ती में सिमटी नेहाली, सिद्दी लुप्त :डॉ. देवी के अनुसार विदर्भ के बुलढाणा जिले में कभी नेहाली भाषा बोली जाती थी। अब केवल जलगांव-जामोद तहसील की दो आदिवासी बस्तियों में यह भाषा बोली जाती है। इसी तरह आदिवासियों की भाषा हलवी और कुर्को बोलनेवालों की तादाद भी घटी है। कोंकण में बोली जानेवाली सिद्दी भाषा लुप्त हो चुकी है।
अंचल में कई बोलियां
डॉ. देवी ने बताया कि जनगणना के समय जिन भाषाओं को बोलनेवालों की संख्या 10 हजार से कम होती है, उन भाषाओं  को सरकारी दस्तावेजों में शामिल नहीं किया जाता। मध्यप्रदेश का हिस्सा रहा विदर्भ महाराष्ट्र में शामिल किया गया। विदर्भ में हिंदी व मराठी भाषा बोली जाती है। परंतु मुंबई व पुणे से यह भाषाएं अलग हैं। विदर्भ के अधिकांश इलाके जंगल से घिरे हैं। आदिवासियों के अलग-अलग कबीले में अलग-अलग बोलियां बोली जाती हैं।
इसी तरह नाशिक, ठाणे व अन्य इलाकों के आदिवासियों की बोली में भी भिन्नता पाई गई है।
भाषाओं में बदलावडॉ. देवी ने कहा कि भाषाओं में संशोधन कर या दूसरी भाषाओं के शब्दों का इस्तेमाल करना अच्छी बात है लेकिन भाषाओं के व्याकरण को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। कोई भाषा स्थाई नहीं रह सकती। साल-दर साल भाषाओं में बदलाव होते रहते हैं। सर्वेक्षण में महाराष्ट्र की 14 क्षेत्रीय व जनजातीय तथा गुजरात की छह क्षेत्रीय विविधताओं का अध्ययन किया गया है।
पीएलएसआई के भारतीय भाषाओं के लोक सर्वेक्षण की 50 खंडों में 35 हजार पृष्ठों की पुस्तक तैयार की गई है। इस पुस्तक को 5 सितंबर को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन की 125वीं वर्षगांठ पर दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में देश को समर्पित किया जाएगा।
भाषाएं युद्ध नहीं बल्कि आर्थिक विकास की सशक्त माध्यम
विशेषज्ञों का मानना है कि भाषाएं युद्ध नहीं बल्कि आर्थिक विकास की सशक्त माध्यम हैंं। डॉ. देवी के मुताबिक अधिक भाषाओं का ज्ञान न केवल उन्नति की ओर ले जाता है बल्कि भाषाएं आय का सबसे बढिय़ा साधन भी बन सकती हंै। भाषाएं संवाद के लिए होती हैं न कि युद्ध के लिए

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें