मंगलवार, 6 अगस्त 2013

एक नंबर पैसा से चुनाव जीतना है








साक्षात्कार

हम एक नंबर के पैसे से चुनाव जीत कर दिखाएंगे


अरविंद केजरीवाल

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला किया है। इन चुनावों को लेकर आम आदमी पार्टी की क्या तैयारी है और दिल्ली की जनता को वे कैसा शासन देना चाहते हैं इस बारे में शुक्रवार प्रतिनिधि नरेन्द्र कुमार वर्मा की उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंशः
दिल्ली विधानसभा चुनावों को लेकर आपकी पार्टी की रणनीति क्या बिजली-पानी के मुद्दे तक ही सीमित है या आम आदमी की दूसरी प्रमुख समस्याएं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, परिवहन प्रणाली और कानून-व्यवस्था की स्थिति भी आपके घोषणा-पत्र में शामिल है?
- हमारी पार्टी के घोषणा-पत्र का जो ड्राफ्ट बना है, उसमें भ्रष्टाचार, महंगाई, महिलाओं की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था भी अहम मुद्दे हैं। राजनीतिक शक्ति के विकेंद्रीयकरण पर जोर है। हमारे घोषणा-पत्र में यह बात स्पष्ट है कि ऐसे कानून बनाए जाएंगे, जिससे कि ज्यादा से ज्यादा फैसले जनता से पूछ कर लिये जाएं जनता से पूछने की प्रक्रिया यह होगी कि हर नगर निगम के वॉर्ड को दस हिस्सों में बांटा जाएगा और एक हिस्से को कहा जाएगा मोहल्ला। दिल्ली के तीनों नगर निगमों में २७२ वार्ड हैं तो इस तरह २,७२० मोहल्ले बनेंगे। हर महीने हर मोहल्ले की मोहल्ला सभा होगी। मोहल्ला सभा में उस मोहल्ले के मतदाता हिस्सा लेंगे। इसका दिल्ली में हमने पहले सफल परीक्षण भी किया है। हमारी पार्टी के साथ दिल्ली के एक निर्दलीय पार्षद भी जुड़े हैं। उनके साथ हमारी दो सफल मोहल्ला सभाएं हो चुकी हैं। इन सभाओं में दस-बारह हजार लोग थे।
पहली सभा में इस पार्षद ने लोगों से कहा कि मेरे पास निगम से पत्र आया है जिसमें बताया गया है कि विकास के लिए पचास लाख रुपये का फंड है तो इसे कैसे खर्च किया जाए? पहली मोहल्ला सभा में लोगों ने पार्षद को अपनी-अपनी समस्याएं बतार्इं तो हमें लगा कि इतना पैसा भी कम पड़ जाएगा लेकिन तमाम समस्याओं का हल केवल सवा पांच लाख रुपयों में हो गया। फिर अगली सभा में पार्षद ने कहा कि मेरे फंड से छह गलियां बनी हैं तो आप लोग बताएं कि क्या काम सही हुआ है? लोगों ने पांच गलियों के काम को ठीक बताया लेकिन एक गली के बारे में बताया कि काम सही नहीं हुआ है तो वहीं पर एक समिति बनी और अगली मोहल्ला सभा में निगम के इंजीनियरों और ठेकेदार को मौके पर बुलाया गया, जिन्होंने निरीक्षण करके कहा कि वास्तव में गली सही नहीं बनी है, तो फिर वह गली बनी। तो अगर आम आदमी पार्टी की सरकार बनती है तो हर वॉर्ड और विधानसभा क्षेत्र में मोहल्ला सभा द्वारा ही तय किया जाएगा कि कौन-सा सरकारी प्रोजेक्ट कहां और कैसे बनेगा।
ऐसा कानून बनाया जाएगा कि मोहल्ले में पड़ने वाले स्कूल, अस्पताल या सामुदायिक केंद्र के कर्मचारी अगर सही ढंग से काम नहीं कर रहे हैं तो मोहल्ला सभा उन्हें सम्मन कर सकती है या उनकी तनख्वाह रोक सकती है। अगर इस तरह का कानून ही बना दिया जाए तो जनता के हाथ में सीधे ताकत आ जाएगी। जो कानून सीधे जनता को प्रभावित करते हैं, उनमें मोहल्ला सभा को शामिल किया जा सकता है जैसे जनलोकपाल कानून बनाना है तो उसका ड्राफ्ट बनाकर सभी मोहल्ला सभाओं के पास भेजिए और उनकी राय लीजिए। इससे कार्यपालिका और विधायिका में जनता का सीधा हस्तक्षेप होगा और जनता जो चाहेगी वही काम होगा। सत्ता के इतने ज्यादा विकेंद्रीकरण से क्या विधायकों और पार्षदों को नहीं लगेगा कि हम किस बात के लिए हैं, हमारी ताकत क्या है? उन्हें लगेगा कि इस तरह तो उनकी सारी शक्तियां छिन जाएंगी?
- वे हैं किस बात के लिए? वे तो सीधे जनता के प्रतिनिधि हैं। जन प्रतिनिधियों को शक्तिशाली बनाने के लिए थोड़े ही हमारा जनतंत्र बना था। ये तो इन लोगों ने एकदम उल्टा कर दिया है। सारी शक्ति जनता से छीन कर इनके हाथ में सौंप दी है। विधायक या पार्षद के पास कोई पावर नहीं होना चाहिए। वह केवल जनता की बातों को निगम या विधानसभा में लेकर जाए। जनप्रतिनिधि का मतलब ही यह है कि वह जिनका प्रतिनिधित्व करता है, उनकी आवाज को आगे लेकर जाए। जनप्रतिनिधि को तो खुद को शक्तिशाली होना ही नहीं चाहिए। अगर वे शक्तिशाली होते हैं तो यह जनतंत्र का दुर्भाग्य होगा। अगर अपने-अपने इलाके के लोग अपनी समस्याओं के प्रति फैसला लेते हैं तो ८० फीसदी समस्याएं दूर हो जाएंगी।
देश में न्यायिक सुधारों के बारे में भी आप बात करते रहे हैं। इस दिशा में आपकी पार्टी का क्या रुख है?
- हां, इस बारे में हमारा कहना है कि न्याय सुलभ और जल्दी मिलना चाहिए, चाहे जितनी भी अदालतें बनानीं पड़ें, बनाई जानी चाहिए, ताकि हर तरह के अपराधों का फैसला मोटे तौर पर छह माह में निपट जाए। किसी भी राज्य की जिम्मेदारी यह होती है कि अपने निवासियों को न्याय व्यवस्था, शिक्षा, रोजगार, पानी, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था दे। अगर वह इन सुविधाओं को नहीं दे पाता तो फिर शासन का क्या मतलब है?
आपका क्या अनुमान है कि दिल्ली में लोगों को छह माह में न्याय मिल जाएगा इसके लिए कितने न्यायालयों की जरूरत होगी?
- हमारी पार्टी की एक टीम लगी हुई है। कानूनविद, पूर्व नौकरशाह, तकनीकी विशेषज्ञ, प्रबंध जगत के दिग्गज जैसे ४०० लोगों की एक टीम इन बातों का अध्ययन कर रही है। योगेंद्र यादव अलग-अलग मुद्दों पर उनके साथ समन्वय कर रहे हैं। आपको क्या लगता है कि सचमुच आपकी पार्टी नवंबर तक इस स्थिति में आएगी जो चुनाव के बाद अपनी सरकार बना सके?
- हमारा तो उद्देश्य दूसरा है। हम कोई सत्ता के लिए तो आए नहीं हैं। हम तो आम आदमी हैं इस देश के। जब भ्रष्टाचार से जनता त्रस्त हो गई तो भ्रष्टाचार के खिलाफ हमने आंदोलन छेड़ा। जब यह लगा कि ये सरकार भ्रष्टाचार से मुक्ति नहीं देने वाली तो हमने यह पार्टी बनाई। यह लड़ाई हमारी नहीं है, जनता की है। हमने अपना कर्तव्य पूरा किया है। अब देखते हैं कि जनता क्या करती है? हमारी पूरी तैयारी है। हम तो जनता पर तन-मन-धन सब कुछ न्योछावर करके बैठे हैं। जनता क्या करेगी, इस बारे में तो कोई कुछ नहीं कह सकता। हम पूरी निष्ठा के साथ अपना काम कर रहे हैं। इस देश की जनता बार-बार इस बात को कहती थी कि ईमानदार लोगों को राजनीति में आना चाहिए तो हमने विकल्प तो दे दिया है। अब जनता तय करे कि उसे यह विकल्प स्वीकार है या नहीं?
जनता के बीच विश्वास जीतने के लिए राजनीतिक दलों को लंबा वक्त लगाना पड़ता है। दूसरे दलों से अलग रह कर इतने कम वक्त में आप जनता का विश्वास कैसे हासिल करेंगे?
- अगर हमें भी सत्ता का खेल ही करना होता तो अभी बिजली-पानी के मुद्दे पर हमें भूखे रहने की जरूरत नहीं थी। पिछले साल हम १५ केंद्रीय मंत्रियों के खिलाफ अनशन पर बैठे थे तो वह अनशन करने की जरूरत भी नहीं थी। हमें लगता है कि हमारे और दूसरे दलों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। जनता का विश्वास हमारे साथ बढ़ रहा है। हमारे विरोध प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली पुलिस के लोग खुद ही कहते हैं कि बीजेपी वालों का प्रदर्शन है एक घंटे में पूरा हो जाएगा लेकिन आम आदमी पार्टी का विरोध प्रदर्शन चलता है तो पुलिस वाले कहते हैं कि ये तो ‘आत्मघाती जत्थे’ हैं। इनसे निबटना बड़ा मुश्किल है। दूसरी पार्टियां प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शित करती हैं। मगर आम आदमी पार्टी वैसा नहीं करती। हम समस्या का समाधान निकालना चाहते हैं। आज भी अगर भारत सरकार जनलोकपाल बिल सही ढंग से पास कर दे तो हम अपनी पार्टी को खत्म कर देंगे। हम यहां पर सत्ता का खेल करने नहीं आए हैं। हम देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए आए हैं। क्या जनलोकपाल विधेयक पास कराना ही आपकी अंतिम मांग है? देश में बहुत से विधेयक बनते हैं और पास भी हो जाते हैं लेकिन उनका क्रियान्वयन सही ढंग से नहीं होता? ऐसे में जनलोकपाल कानून बनने से कैसे आपकी पार्टी का उद्देश्य पूरा हो जाएगा?
- मैंने बहुत कानून पढ़ा है और कानून बनाए भी हैं। अगर किसी कानून के लागू होने में खामियां हैं तो निश्चित रूप से उसकी ड्राफ्टिंग में जानबूझ कर कमियां छोड़ी जाती हैं। हम जब आयकर विभाग में कानून बनाते थे तो हमसे बड़े अफसर कहते थे कि ‘यार’ कुछ कमियां तो छोड़ो, अगर सख्त बना दोगे तो नीचे वाले खाएंगे कैसे?’ यही तो हमारा विवाद था सरकार के साथ। अगर सरकार के ऊपर हम लोकपाल विधेयक छोड़ देते तो वह पास कर देती। वह तो बना कर बैठी है फिर लोग कहते कि कानून तो बना दिया लेकिन सही से लागू नहीं हो रहा। जिस जनलोकपाल का हम ड्राफ्ट बनाकर बैठे हैं, उसका कार्यान्वयन गलत हो ही नहीं सकता। दरअसल जब तक हम सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं करेंगे कोई भी कानून सही ढंग से लागू नहीं हो सकता। हमने सरकार से एक जनलोकपाल मांगा था लेकिन उन्होंने कहा कि न तो हम जनलोकपाल बनाएंगे और न ही भ्रष्टाचार खत्म करेंगे।
अगर कुछ करना है तो चुनाव जीत कर दिखाओ और कानून बनाओ। फिर हमने तय किया और पार्टी बनाई। अब हम चुनाव लड़ेंगे भी और जीतकर भी दिखाएंगे। एक नंबर के पैसे से लड़कर दिखाएंगे और सच्चाई के बल पर लड़कर दिखाएंगे। हम इस धारणा को भी खत्म करेंगे कि केवल गुंडे ही चुनाव लड़ सकते हैं। लेकिन आज भी हम सरकार को चैलेंज करते हैं कि जनलोकपाल बिल बनाओ हम पार्टी खत्म कर देंगे लेकिन हमें पता है कि वे मानने वाले नहीं हैं, क्योंकि अगर बना दिया तो सारे के सारे जेल जाएंगे।
अभी आपकी पार्टी का सारा ध्यान दिल्ली पर केंद्रित है। क्या आप अखिल भारतीय स्तर पर आगे चुनाव लड़ने के लिए भी तैयार हैं? क्या लोकसभा चुनावों पर भी अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं?
- दिल्ली के विधानसभा के चुनावों के नतीजों पर यह सब निर्भर होगा कि लोकसभा चुनावों में हमारी क्या भूमिका होगी। हम चुनाव तो जरूर लड़ेंगे लेकिन कितनी भागीदारी रहेगी और किस-किस हिस्से में लड़ेंगे, यह दिल्ली के नतीजों के बाद तय ही होगा।
आपके मन में कैसी दिल्ली बनाने का सपना है? एक तो सत्ता के विकेंद्रीकरण वाली दिल्ली बनाने की बात आपने कही है। आपकी दिल्ली आज की दिल्ली से किस तरह अलग होगी?
- उस दिल्ली में समान विकास होगा। आज आप जो ये बड़े-बड़े फ्लाई ओवर और सड़कें देखते हैं। इनसे पचास मीटर नीचे-या ऊपर जाइए। वह दिल्ली आपको इतनी भयावह लगेगी कि लोग कूड़े के ढेरों पर, नालों के ऊपर रह रहे हैं। पचास फीसदी दिल्ली को आज पीने का पानी नहीं मिलता। हमारे प्रधानमंत्री हर साल लाल किले से कहते हैं कि हम हर गांव में लोगों को पीने का पानी देंगे। देश के गांवों में वे न जाने कब पानी देंगे, आजादी के ६५ साल के बाद दिल्ली तक को भी पीने का पानी नहीं दे पाए। हम साफ-सुथरी दिल्ली सबके सामान विकास की दिल्ली देंगे। हम हर मोहल्ले का सर्वांगीण विकास करेंगे। लोगों को उनकी मूलभूत सुविधाएं मिलेंगी, लोगों को हर सरकारी सुविधा का लाभ मिलेगा।
देश में इस तरह की राजनीतिक परिपाटी देखने को मिलती है कि छोटी पार्टियों के विधायक चुनाव जीतने के बाद बड़ी पार्टी में चले जाते हैं। आपने अपनी पार्टी के ढांचे में क्या व्यवस्था की है कि ऐसी स्थिति में आपके विधायक इधर से उधर न हो पाएं?
- यह एक काल्पनिक सवाल है। एक बार आप चुनाव होने दीजिए, नतीजे आपको अपने आप बता देंगे कि क्या होगा। जनतंत्र के अंदर राजनीतिक दल अपने विधायकों के साथ ऐसा कोई एग्रीमेंट नहीं कर सकते कि वे ऐसा नहीं करेंगे। ऐसा कोई कानून नहीं है लेकिन यह समय बताएगा कि आगे क्या होगा।
भाजपा अक्सर यह आरोप लगाती है कि अरविंद केजरीवाल के पीछे कांग्रेस की शक्ति है, क्योंकि मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित उनके बहुत अच्छे दोस्त रहे हैं और भाजपा को पीछे करने के लिए ही कांग्रेस उन्हें आगे बढ़ा रही है?
- आपने पिछले साल दिग्विजय सिंह के बयान सुने थे। वे कहते थे कि हम आरएसएस की बी टीम हैं। अब ये कह रहे हैं कि हम कांग्रेस की बी टीम हैं। तो पहले ये दोनों मिलकर तय कर लें कि हम किसकी बी टीम हैं? यह कह रहे हैं कि हम भाजपा के वोट काटेंगे तो दिल्ली के पहले तीन विधानसभा चुनावों में तो आम आदमी पार्टी नहीं थी फिर बीजेपी क्यों हार गई? तो सच्चाई यह है कि दिल्ली के अंदर शीला दीक्षित को हराने की बीजेपी की औकात ही नहीं है। बीजेपी दिल्ली के अंदर बहुत कमजोर पार्टी है। उसे हराने के लिए किसी और की जरूरत नहीं है। इसके लिए बीजेपी खुद ही सक्षम है।
आज उसके छह नेता मुख्यमंत्री के दावेदार हैं और सब एक दूसरे को हराने में लगे हुए हैं। उनमें से चार ने हमसे कहा कि अगर फलां को मुख्यमंत्री का दावेदार बना दिया गया तो हम उसे जीतने नहीं देंगे। लिहाजा ये सब एक दूसरे को हराने में लगे हैं। इस बार भी बीजेपी, कांग्रेस को कोई शिकस्त दे पाएगी, ऐसा नजर नहीं आता। दूसरी बड़ी बात यह कि शीला दीक्षित दिल्ली के अंदर भ्रष्टाचार का एक बड़ा प्रतीक बन गई हैं। पिछले तीन चुनावों में बीजेपी ने जानबूझ कर शीला के खिलाफ कमजोर उम्मीदवार उतारा तो आप खुद देख लीजिए कि सेटिंग किसके बीच है? अब ये अगर कहते हैं कि हम संदीप दीक्षित के दोस्त हैं तो मैं आपको बता दूं कि रॉबर्ट वाड्रा का केस किसने उजागर किया था? वह मैंने उजागर किया था। बीजेपीवालों के पास दो साल पहले रॉबर्ट वाड्रा के वो सारे कागजात मौजूद थे तो मैंने उजागर किए, लेकिन इन दोनों के बीच सैंटिग हो गई थी कि तुम हमारे दामाद (रंजन भट्टाचार्य) को बचाओ, हम तुम्हारे दामाद (रॉबर्ट वाड्रा) को बचाएंगे। इसीलिए ये दोनों आम आदमी पार्टी से घबराए हुए हैं कि अब आम आदमी पार्टी इन्हें शिकस्त देगी। इसलिए ये दोनों पार्टियां आम आदमी पार्टी के ऊपर इस तरह के आरोप लगाती हैं।
दिल्ली के चुनावों में झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में रहने वाले मतदाता बहुत बड़ी भूमिका तय करते हैं। ऐसा आरोप लगते रहते हैं कि बड़ी पार्टियां वहां शराब और पैसा बांट कर वोट हासिल करती हैं? इस प्रवृत्ति को आप कैसे रोकेंगे?
- वास्तव में यह बहुत बड़ा चैलेंज है आम आदमी पार्टी के लिए। पैसा और शराब की चुनौती से तो निबटना ही है, साथ ही इन इलाकों के लोगों में जानकारी और साक्षरता बहुत कम है। महंगार्ई से सारे दुखी हैं लेकिन इन इलाके के लोगों को यह नहीं पता है कि महंगाई के लिए कांग्रेस जिम्मेदार है। इतने कम समय में उन्हें राजनीतिक तौर पर जागरूक करना हमारे लिए वास्तव में चुनौती है। अभी बिजली-पानी के आंदोलन के दौरान हमारे कार्यकर्ता झुग्गी-बस्तियों के दस लाख घरों में गए थे तो हमें उन लोगों से थोड़ी-बहुत उम्मीद तो है कि वे जागरूक हुए हैं। इन लोगों को ये दोनों पार्टियां जागरूक नहीं होने देतीं।
कितने कार्यकर्ता अभी आपके साथ जुड़े हैं और किस-किस वर्ग के लोग स्वयंसेवक के तौर पर काम करने के लिए आपके पास आ रहे हैं?
- सात हजार लड़के-लड़कियां दिल्ली में लगे हुए हैं। ये सारे अवैतनिक हैं। सभी स्वयंसेवक के तौर पर काम कर रहे हैं। सारे बाहर से आए हुए हैं। सब उच्च शिक्षित हैं। सभी में व्यवस्था बदलने का जज्बा है। इन लोगों को अरविंद से मोहब्बत नहीं है बल्कि उन्हें एक आशा दिखाई दे रही है कि देश जरूर बदलेगा। दिल्ली के हर पच्चीस घर के बाद हम एक स्वयंसेवक तैयार कर रहे हैं, जिसे स्थानीय प्रभारी कहा जाएगा। अब तक हमारे पास डेढ़ लाख लोग स्थानीय प्रभारी के तौर पर जुड़ चुके हैं। कोई अगर हमसे पूछता है कि अगर आपकी पार्टी से जुड़ेंगे तो क्या फायदा होगा तो हम कहते हैं कि डंडे मिलेंगे, पुलिस की वाटर कैनन झेलनी पड़ेंगी, जेल जाना पड़ेगा, परिवार बर्बाद हो जाएगा। फिर भी लोगों का जज्बा देखिए, लोग हमारे साथ जुड़ रहे हैं।
दिल्ली के चुनाव में एक लॉबी ऐसी भी है, जो अवैध कॉलोनियां बसाती है। उसमें बिल्डर और प्रॉपर्टी डीलर शामिल हैं। इन लोगों को दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों का आश्रय मिलता है। इनसे आम आदमी पार्टी कैसे निबटेगी?
- ये ही नहीं बहुत सारी लॉबियां हैं इस बार। बिजली कंपनियां किसी भी हाल में नहीं चाहेंगी कि आम आदमी पार्टी जीते। पानी माफिया बहुत बड़ा है। दिल्ली में सैकड़ों वाटर टैंकरों की कंपनियां हैं, जिन्हें बीजेपी और कांग्रेस के नेता चला रहे हैं। दिल्ली में पानी की कमी नहीं है। इन्हीं नेताओं की कंपनियां पानी की चोरी में लगी हैं इसलिए पानी की समस्या है। इस तरह के माफिया नहीं चाहते कि आम आदमी पार्टी सत्ता में आए। बीजेपी या कांग्रेस में से कोई भी आ जाए, इन्हें किसी से कोई परेशानी नहीं है क्योंकि इनका धंधा चलता रहेगा।
क्या ऐसी स्थिति में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं के साथ हिंसा का खतरा मौजूद है?
- हां बिल्कुल हो सकती है। हम उसके लिए भी तैयार हैं। हिंसा न हो, इसकी जिम्मेदारी सरकार की है। आम आदमी के कार्यकर्ता जो सफेद टोपी पहनते हैं उसकी क्या अहमियत है? पहले उस पर लिखा होता था ‘मैं अण्णा हूं’ क्या अण्णा आज आपसे दूर हैं? कभी लगता है दूर हैं, कभी लगता है नजदीक हैं?
- गांधी टोपी अण्णा आंदोलन से ही आई। हमने वहीं से इसे लिया लेकिन अण्णा ने कह दिया कि मेरे नाम का इस्तेमाल नहीं होगा तो हमने उस पर लिख दिया कि ‘मैं आम आदमी हूं।’ वैसे भी टोपी मूल्यों की प्रतीक है। अगर हमारे किसी कार्यकर्ता को सिगरेट भी पीनी होती है तो वह टोपी उतार कर सिगरेट पीता है। लोग टोपी की इज्जत करते हैं। रही बात अण्णा जी की तो अण्णा हमारे साथ हैं। अण्णा के साथ हमारे कोई मतभेद नहीं हैं। उनके साथ हमारे मतभेद हो भी नहीं सकते। वे दस बार डांट लें तो भी वे हमें स्वीकार हैं।
आपने पिछले दिनों चार-पांच बड़े-बड़े ‘खुलासे’ किए थे। उस सिलसिले को आपने अचानक क्यों रोक दिया? - कोई ऐसा बड़ा केस अभी आया नहीं। अगर आता है तो मैं कल जनता के बीच फिर उसे उजागर कर दूंगा।

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