बुधवार, 7 अगस्त 2013

आधुनिक हिंदी पत्रकारिता में खच्चरों का महत्व और योगदान


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    मित्रों!आधुनिक हिंदी पत्रकारिता में भले ही अभी तक खच्चरों के योगदान पर शोध नहीं किया गया हो पर जिस तरह से हिेंदी पत्रकारिता में खच्चर प्रजाति की तादाद बढ़ रही है उससे यह जरुरी हो गया है कि इस पर शोध किया जाय। मैं अपना यह लघु शोध प्रबंध आपकी नजर कर रहा हूं। मुझे भय है कि कहीं किसी विश्वविद्यालय का पत्रकारिता विभाग मुझे इस पर डाॅक्टरेट न दे दे और मुझे भी अपने नाम के आगे आम लोगों को आतंकित करने वाली उपाधि डा0 का प्रयोग न करना पड़े। पर मित्रों! मेरे भीतर भी आजकल डा0 बनने की लालसा जन्म ले रही है। क्योंकि साधारण नामाक्षरों वालों को लोग विद्वान नहीं मानते और आपका नाम बीपीएल लगता है। बीपीएल नाम वाले लोगों को सेमीनारों, विचार गोष्ठियों इत्यादि में केवल डा0 नामधारी प्रजाति के विद्वतापूर्ण भाषण झेलने के लिए ही आमंत्रित किया जाता है और भात,रायता,सलाद इत्यादि खिलाकर विदा कर दिया जाता है।ऐसा माना जाता है कि जिन लोगों के नाम के आगे डा0 नहीं लगा है उनके पास काफी समय है और उनके समय को लंच विनिमय के जरिये खरीदा जा सकता है। जबकि डा0 नामधारी जंतुओं को खर्च भी मिलता है। आपकी सेवामें यह लघुशोध प्रबंध प्रस्तुत है-
    पत्रकारिता में खच्चरों का आगमन के वैदिक कालीन अवशेष अभी तक नहीं मिले हैं। स्वतंत्रता कालीन पत्रकारिता में भी खच्चरों का इस पेशे में आने का उल्लेख नहीं मिलता। उस समय पत्रकारिता में बहुत जोखिम था इसलिए भी खच्चरों ने इस पेशे में आना ठीक नहीं समझा। खच्चरों में आमतौर पर जोखिम लेने की परंपरा नहीं पाई जाती। पत्रकारिता में खच्चरों का पहला बड़ा आगमन उदारीकरण के बाद हुआ जब पत्रकारिता ने मिशन और प्रोफेशन के बंधन से मुक्त होकर पूर्ण बेशर्मी से विशुद्ध कारोबार का जामा पहन लिया। अखबार और चैनल मालिकों ने सभी तरह के काम करने को तैयार खच्चरों को उच्च स्तर पर नियुक्त करना शुरु किया। बड़े खच्चरों ने छोटे खच्चरों को और छोटे खच्चरों ने जूनियर खच्चरों को नियुक्त किया। इस तरह से पत्रकारिता खच्चरीकरण हो गया। इसीलिए पत्रकारिता में जो नए बाॅस आए हैं उन्हे घोड़े नहीं चाहिए बल्कि खच्चर चाहिए। लेकिन युद्ध जीतने के लिए तो घोड़े ही चाहिए। इतिहास गवाह है कि युद्ध कभी भी खच्चरों नें नहीं जीते। आज के संपादक टाइप के लोग खच्चरों के बड़े मुरीद हैं। क्योंकि वे कभी भी घोड़े नहीं रहे। उनको प्रमोशन घोड़े होने के कारण नहीं बल्कि खच्चर होने के कारण मिला। मैने पहाड़ की खतरनाक पगडंडियों पर कई यात्रायें खच्चर वालों के साथ की हैं। खच्चरों की पहली विशेषता यह है कि हर खच्चर अपने से पहले वाले खच्चर के पीछे चलता है। खच्चर अपना रास्ता अपने हिसाब से नहीं बल्कि अपने से पहले वाले खच्चर के अनुसार चुनता है। खच्चर भावना रहित होता है। वह जीवन की संवेदनायें कभी प्रकट नहीं करता। घोड़ा अक्सर अपने उत्साह,प्रेम और गुस्से को व्यक्त करता है। घोड़ा हर किसी को अपने पर सवार होने का मौका देने का कायल नहीं होता। घोड़ा पहले अपने पर सवार होने वाली की योग्यता को परखता है और इसके बाद ही उसे सवार होने का मौका देता है। घोड़े को सिर्फ डराकर उस पर सवारी नहीं गांठी जा सकती। घोड़ा अयोग्य और नौसिखये सवारों को पटखनी दे देता है। जो लोग अच्छे घुड़सवार होते हैं वे जानते हैं कि घोड़े को समझे बगैर उस पर सवारी नहीं गांठी जा सकती।
    लेकिन खच्चर के साथ सहूलियत यह होती है कि उस पर कोई भी सवार हो सकता है।वह सवार का चुनाव करने में नहीं बल्कि उसे ढ़ोने में यकीन रखता है। उसे हर एक की सवारी के लिए ही डिजायन किया गया है। लेकिन जिस विशेषता के लिए हर जगह खच्चर पसंद किए जाते हैं वह यह है कि खच्चर कभी भी यह पसंद नहीं करता कि उससे आगे कोई बढ़ जाय। इसके लिए खच्चर दौड़ लगाने में यकीन नहीं रखते बल्कि वे आगे बढ़ने की कोशिश करने वाले के आगे आकर उसे गिराने की कोशिश करते रहते हैं। आप कभी किसी पहाड़ी पगडंडी पर खच्चर से आगे जाने की कोशिश करके देखें तो आपको लगेगा कि खच्चर आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कभी नीचे तो कभी ऊपर की ओर आ जाता है। उसकी कोशिश होती है कि आप उससे आगे न बढ़ें। यदि वह आपको रोक नहीं पा रहा है तो वह आपको गिराने की कोशिश करता है। इसीलिए समझदार खच्चर चालक पहाड़ों की पगडंडियों पर कभी भी खड्ड वाली साइड से आगे नहीं जाते। वे बेंत हाथ में लेकर ऊपर की ओर से आगे जाते हैं। इनके कबीले में माना जाता है कि सबसे आगे वाला खच्चर जिस रास्ते पर जा रहा है वही सबसे उत्तम मार्ग है।यही खच्चरों काजीवन दर्शन है और इनकी सफलता में इसी सूत्र का हाथ है। वरना घोड़ो को विस्थापित कर उनकी जगह पर काबिज हाना कोई बच्चों का खेल तो है नहीं। खच्चर मूलत़ सोचने में यकीन न रखने वाला जीव है। यह न सोचने और बोझा ढ़ोने की अपनी असाधारण योग्यता के कारण ही इसने प्रतिस्पर्धा के सारे आधुनिक सिद्धांतों को उलटपुलट कर दिया है।
    अख्बारों और चैनलों की सारी घुड़सालें आज यदि खच्चरों से पटी हुई हैं तो इसके लिए खच्चरों की ये विशेषतायें ही हैं। अखबारों और चैनलों हर रोज जो लीद बिखरी हुई नजर आती है वह इसी असाधारण रुप से अयोग्य प्रजाति के पराक्रम से संभव हुआ है। लेकिन इस लीद से एक जैविक विकृति की समस्या पैदा हो गई है। खच्चरों की लीद के अत्यधिक संपर्क में रहने से टिटनेस हो जाता है। हिंदी में इसे धनुष्टंकार रोग कहा जाता है। इस रोग से संक्रमित लोग धनुष की तरह झुक जाते हैं। आजकल आप अखबारों और चैनलों को कारपोरेट और सरकारों के आगे धुनष की तरह झुके हुए देखते हैं वह दरअसल खच्चरों की लीद का ही संक्रमण है। खच्चरों ने पत्रकारिता को सोचने और समझने की रुढ़िवादी परंपरा से मुक्ति दिलाई है ,उनका पत्रकारिता में उनका यह योगदान याद रखा जाना चाहिए।उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में पत्रकारिता के खच्चर इसे पूरी तरह से घोड़ों से मुक्त कराकर ही दम लेंगे। तब सही मायनों में हिंदी पत्रकारिता का उत्कर्ष काल शुरु होगा। इति एंड अति।
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