बुधवार, 7 अगस्त 2013

पत्रकारिता का बदलता चेहरा .


Monday, September 13, 2010

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मौजूदा  दौर में पत्रकारिता का जो चेहरा हमारे सामने है वो ना तो आदर्शात्मक है ना पेशेवर ही है| आज के दौर की पत्रकारिता बाजारवादी है| बाजार से प्रभावित होने के साथ साथ सत्ता और शासन के दबाव में काम कर रही है| ऐसे हालातों में मीडिया की प्रासंगिकता और उसके औचित्य पर भी सवाल खड़े होना लाजिमी है|

इन  तमाम सवालात को बेहतर ढंग से जानने और समझने और उनके जवाब तलाशने के लिए जरुरत इस बात की है की पत्रकारिता की पृष्ठभूमि का मूल्यांकन और विश्लेषण किया जाये| आजादी से पहले की पत्रकारिता एक मिशन थी जिसका ध्येय अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों की आवाज बुलंद करना था| ब्रिटिश शासन के दमनकारी कानूनों के बावजूद उस दौर के समाचार पत्रों ने अपने काम को बखूबी अंजाम दिया| सरकार के दमनकारी और शोषक चेहरे को जनता के सामने रखा और आवाम के हक की लड़ाई में पुरजोर तरीके से साथ दिया| नतीजतन देश को आजादी मिली|


इस  बीच राजनीतिक चेतना के अलावा पत्रकारिता सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक मोर्चों पर भी जाग्रति लाने का काम करती रही| आजादी के बाद इन मोर्चों पर जागृति का काम तेजी से हुआ मीडिया को दमन कारी कानूनों से मुक्ति मिल चुकी थी| देश के सामने आत्मनिर्भर बनने और अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखने की चुनौती थी| इस दौर में पत्रकारिता का एक नया चेहरा विकासमूलक पत्रकारिता सामने आया| विकास के मुद्दों सड़क बिजली पानी स्वास्थ्य शिक्षा  को तरजीह दी गई इसके अलावा सामाजिक कुरीतियों को हटाने का प्रयास किया गया|


सत्तर और अस्सी के दशक में विकास के मुद्दों के अलावा भ्रष्टाचार महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे हावी रहे| इन्ही के चलते तमाम सरकारें भी बदली| आपातकाल के दौर में इदिरा गाँधी ने अखबारों और रेडियो/टेलीविजन पर सेंसर लगा दिया| इन जबरन लादे गाये आपातकाल के नियमों के विरोध में अख़बारों ने अपने सम्पादकीय पन्ने खाली छोड़ अपना विरोध दर्ज कराया| 


नब्बे के दशक की शुरुआत में वैश्वीकरण के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए पूर्ण रूप से खोल दिया गया| इसका सीधा असर मीडिया पर पड़ा और मीडिया बाजार वादी हो गई| सत्ता और राजनीती के दबाव के अलावा बाजार का दबाव मीडिया पर गहराता गया|


मीडिया पर बाहरी और आंतरिक दोनों दबाव काम करने लगे मीडिया टी आर पी की अंध दौड के चलते अच्छे कंटेंट के बजाय सिर्फ सनसनी और लुभावनी ख़बरों को वरीयता दी जाने लगी| हिंसा अश्लीलता और मसालेदार ख़बरों से चैनलों से आगे जाकर प्रिंट मीडिया ने भी इसी को अपना लिया| साथ ही इन पर टी आर पी और विज्ञापन के दबाव और राजनीतिक दलों के गठजोड़ ने इनको  धराशाई कर दिया| व्यापारिक हलकों में मीडिया को अपने हितों को साधने के लिए प्रयोग किया जाने लगा| मीडिया आज सिर्फ सभी नामी गिरामी लोगों की बपौती बन कर रह गई है| इससे भी बढ़ कर मीडिया में एक नई प्रवृति पेड न्यूज़ घर कर गई| जिससे सच को दबाया जाने लगा और झूठ को सच के चोले में सामने लाया जाने लगा| और खोजी पत्रकारिता का एक नया चेहरा लोगों की निजी जिंदगी में दखल और मनगढ़ंत समाचार के तौर पर सामने आया| जिनमे मिर्च मशाला लगा कर जनता जनार्दन तक पहुचाया जाने लगा| साथ ही काले कमाई को भी इसमें जगह दी जाने लगी| वैश्विक परिदृश्य के लिहाज से विकसित देश ने तीसरी दुनिया के देशों के संचार माध्यमों ने अपना वर्चस्व स्थापित करने लगे| ताकि वह सांस्कृतिक और आर्थिक बाजार के तौर पर अपना कब्ज़ा बनाये रख सके| जिससे वह हमारी संस्कृति को गुलाम बनाये जा रहे हैं| भय को आधार बना कर आप की आवश्यकताएं निर्धारित की जाने लगी| और अगर आप फिर भी उन चीजों को यदि आप ना ग्रहण करे तो वो इतने लुभावन मुखौटे में सामने आती हैं कि आप उनको लिए बगैर नहीं रह सकता हैं| बाजार में हर चीज आप के लिए "ब्रांड" के तौर पर उपयोगी बना दी गई| 


इस तरीके से मौजूदा दौर की पत्रकारिता तमाम तरह के दबावों से ग्रस्त हो गई है| बाजारवाद, सत्ता, सरकार, राजनीति और विकसित देशों के दबावों को झेल रही मीडिया में सरोकारों की पत्रकारिता संभव नहीं दिखाई नहीं देती है| आज के समय में स्वतंत्र होकर पत्रकारिता करना तलवार की धार पर चलने जैसा है| लेकिन इसके बावजूद कहीं न कहीं लोग इस चेहरे को बदलने के लिए कार्य कर रहे हैं|

1 comment:

आज कल पत्रकारिता वाले अपनी धुन में हैं और वो किसी की नहीं सुनते बस उनके अपने राग और अपनी ढपली है| आप यह भी बता रहे है कि कैसे मीडिया बदला है, हाँ आप सही कह रहे है बदलाव तो होने ही चाहिए ही थे लेकिन जिस रस्ते पर आज की पत्रकारिता जा रही है वह हमारे पूर्व पत्रकारों ने सोचा भी नहीं होगा| और आप यह भी बता रहे है कि पहले की पत्रकारिता मिशन थी फिर पेशेवर हुई और अब पेशेवर से बदल कर बाजारवादी हो चली है|पत्रकारिता बाजारवाद से भी एक कदम आगे बढ़ कर बिकाऊ पत्रकारिता में तब्दील होती जा रही है| इस दौर में सत्यता और निष्पक्षता की बात तो बेमानी हो चली है| सरोकारों की बात तो खैर ना ही की जाये तो बेहतर होगा| सरोकार कुंठाओं के शिकार हो गये है| आप का लेख सोचने पर मजबूर अवश्य करता है इस अंधी पत्रकारिता की दौड में ..............
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