सोमवार, 5 अगस्त 2013

क्यो होगा आप का ?




सामाजिक आंदोलनों से निकले अरविंद केजरीवाल ने जब राजनीतिक दल बनाने की घोषणा की तो इसने एक बड़े वर्ग को चौंकाया. इसको लेकर तमाम तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं. लोग इस बात पर चर्चा करते हुए दिखाई दिए कि केजरीवाल का राजनीति में आने का फैसला सही है या गलत. सही और गलत का प्रश्न इस बात से भी उपजा कि क्या एक सामाजिक आंदोलन का राजनीतिक आंदोलन में सफलता से तब्दील हो पाना संभव है. क्या जनलोकपाल के विषय पर जुटने वाली भीड़ एक राजनीतिक दल को दिए जाने वाले वोटों में बदली जा सकती है ? और सबसे बड़ा प्रश्न यह कि क्या वे राजनीति का एक वैकल्पिक ढांचा तैयार कर पाने में सफल होंगे. ऐसा नहीं है कि इन सभी प्रश्नों का पूरा जवाब लोगों को मिल गया है. ये सवाल आज भी अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी (आप) के सामने बने हुए हैं, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि अब कई लोगों को आम आदमी पार्टी इन प्रश्नों का जवाब देने की दिशा में काम करती हुई दिखाई देने लगी है. हाल ही में अरविंद द्वारा किए गए 15 दिन के उपवास में ऊपर लिखे कई सवालों के जवाब ढूंढ़ने की कोशिश की जा सकती है. दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के उस बयानरूपी सवाल के जवाब की भी, जिसमें वे कहती हैं ‘इन लोगों को पता ही नहीं है कि इन्हें क्या चाहिए.' शीला को भले ही अरविंद और उनकी टीम भ्रमित लोगों की मंडली दिखाई दे, लेकिन अरविंद की राजनीति के तौर-तरीकों को अगर हम ध्यान से देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि वे चुनावी अखाडे़ में दो-दो हाथ करने के लिए बेहद सोच-समझकर, बड़ी मजबूती के साथ प्लानिंग कर रहे हैं. अरविंद के निशाने पर सबसे पहले 2013 का दिल्ली विधानसभा चुनाव ही है. पार्टी की इस चुनाव को लेकर की जा रही तैयारियों से पता चलता है कि वह दिल्ली में अपना असर पैदा करने के लिए जबर्दस्त व्यूह-रचना कर रही है. विधानसभा की सभी 70 सीटों को लेकर 'आप' की विशेष तैयारी जारी है. पार्टी के लोगों से पता चलता है कि हर सीट के लिए लगभग अलहदा रणनीति तैयार की जा रही है. बिजली-पानी के मुद्दे को लेकर 15 दिन के अरविंद के उपवास को देखें तो साफ दिखाई देता है कि उन्होंने काफी हद तक अपना वोटर चुन लिया है. पार्टी बनाने के फैसले के बाद अरविंद का यह संभवतः पहला सबसे बड़ा कार्यक्रम था. दिल्ली के जिस सुंदर नगरी इलाके में उन्होंने उपवास किया उस क्षेत्र के नाम में सुंदर शब्द होने के अलावा शायद ही यहां कुछ और सुंदर हो. जिस तरह से अधिकांश चमचमाते भारतीय शहरों के भीतर एक दूसरा शहर भी मौजूद होता है, उसी तरह दिल्ली को आइना दिखाने का काम सुंदर नगरी जैसे इलाके करते हैं. इस क्षेत्र में दिल्ली शहर के वे लोग रहते हैं जो यहां बुनियादी सुविधाओं के मामले में हाशिये पर हैं. यही वोटर अरविंद के निशाने पर है. जो मुद्दे उठाकर अरविंद ने अपनी राजनीति का श्रीगणेश किया है वे समाज के सबसे निचले पायदान पर आने वाले लोगों के जीवन से जुड़े हैं. दिल्ली में पारंपरिक तौर पर कांग्रेस के साथ रहे इस वोटर को लेकर पार्टी को उम्मीद है कि उनकी बुनियादी समस्याओं को आवाज़ देकर वह इन्हें अपने पाले में कर लेगी. जानकारों का मानना है कि जिन मुद्दों को उठाकर अरविंद ने अपनी राजनीति का श्रीगणेश किया है वे सामाजिक संरचना के सबसे निचले पायदान पर आने वाले लोगों के जीवन से जुड़े हैं. उन्होंने गरीबों और वंचितों के मुद्दे को उठाया है. यही वह तबका है जो चुनावों में वोट करता है. ऐसे में अरविंद की यह रणनीति उनकी सफलता की संभावना को थोड़ा मजबूत कर देती है. ‘आप’ के नेता संजय सिंह कहते हैं, 'जेजे कॉलोनी, स्लम, गांव, अवैध कॉलोनी जैसे पिछड़े क्षेत्रों में रहने वाले लोग ही हमारे मुख्य टार्गेट हैं. हम उन्हें उनका हक दिलाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं.' सुंदर नगरी में अरविंद का अनशन कई मायनों में महत्वपूर्ण था. इसके जरिए अरविंद ने लंबे समय से अपने ऊपर लग रहे उस आरोप का भी जवाब दिया जिसके तहत यह कहा जाता रहा है कि अरविंद और उनकी पूरी टीम के निशाने पर मध्य वर्ग है. लोग जनलोकपाल आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहते कि कैसे यह आंदोलन सिर्फ और सिर्फ मध्य वर्ग तक सीमित था और इसलिए अरविंद की राजनीतिक यात्रा भी उसी मध्य वर्ग पर केंद्रित रह कर आगे बढ़ेगी. लेकिन सुंदर नगरी में अरविंद के अनशन ने उस छवि को कमजोर किया है. जिस तरह से उपवास का आयोजन हुआ वह भी बड़ा रोचक है. आज के समय में नेता अगर किसी तरह के उपवास या अनशन पर हों तो वे चारों तरफ समर्थकों का समंदर चाहते हैं. वहीं अरविंद के उपवास में नजारा थोड़ा अलग था. शुरुआत में बड़ी संख्या में समर्थकों के उपवास स्थल पर पहुंचने के बाद वहां एक बड़े बैनर पर सूचना चिपका दी गई, जिसमें लिखा था ‘समर्थकों से अनुरोध है कि वे यहां ना आएं बल्कि अपने-अपने वार्डों में जाकर आम लोगों से मिलें.’ 'आप' के नेताओं के मुताबिक वह न सिर्फ दिल्ली की सभी सीटों पर आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए कमर कस चुकी है बल्कि उसके नेता बीजेपी और कांग्रेस को पछाड़ते हुए सत्ता में आने का दम भी भर रहे हैं. लेकिन क्या सिर्फ एक खास तबके के मसले को उठाकर उसे टार्गेट करते हुए पार्टी चुनाव में सफल हो सकती है? संजय कहते हैं, 'समाज का मध्य वर्ग और बौद्धिक तबका तो हमारे साथ पहले से ही था, अब वंचित वर्ग भी तेजी से हमारे साथ जुड़ रहा है. ऐसे में हमें हर वर्ग का समर्थन मिल रहा है.' पार्टी का दावा है कि हाल के उसके उपवास को दिल्ली के लगभग साढ़े दस लाख लोगों ने अपना लिखित समर्थन दिया है. दिल्ली में अपने साथ बड़ी संख्या में जुड़ रहे लोगों का उदाहरण देते हुए पार्टी उस दिन की घटना का भी जिक्र करती है जब 272 ऑटो और विभिन्न अन्य माध्यमों से बड़ी संख्या में लोग लाखों लोगों के हस्ताक्षर सौंपने मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के आवास की ओर गए थे. लेकिन क्या यह इतना ही आसान है जितना संजय की बातों से लग रहा है? अरविंद ने जिस तरह से बिजली-पानी के मुद्दे को उठाकर अपनी राजनीति की शुरुआत की है वह राजनीति के विश्लेषकों की निगाह में उन्हें कहां ले जाती दिखती है? जनसत्ता के संपादक ओम थानवी कहते हैं, 'देखिए, इनका दो तरह से प्रभाव पड़ सकता है. पहला ये लोगों में चेतना पैदा करने का काम कर सकते हैं. अगर ऐसा हुआ तो इससे वैकल्पिक राजनीति की संभावना मजबूत होगी. और दूसरा, यह जनता के सामने एक ऐसा विकल्प पेश करेगा जिसकी नीयत, चरित्र और उद्देश्य को लेकर कोई संदेह नहीं है. ऐसे लोगों को चुनने का विकल्प जनता के पास होगा.' आम आदमी पार्टी अपनी राजनीतिक क्षमता का पहला प्रदर्शन 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में करने वाली है और यहां की राजनीति के दोनों प्रमुख दल काफी समय तक उन्हें यह कहकर कमतर बताते रहे कि ये एनजीओ वाले लोग हैं राजनीति इनके बस की बात नहीं. लेकिन पिछले कुछ समय से स्थिति कुछ बदली-सी नजर आने लगी है. जब से 'आप' ने दिल्ली में आक्रामकता के साथ राजनीतिक तैयारी शुरू की है तब से कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों में एके-सी बेचैनी दिख रही है. यह बेचैनी चुनाव करीब आने के साथ और बढ़ती जा रही है. आगामी विधानसभा चुनाव में ‘आप’ के संभावित प्रभाव को लेकर जब तहलका ने दिल्ली की पूर्व मेयर और भाजपा नेता आरती मेहरा से प्रश्न किया तो उनका कहना था, ‘देखिए, इसमें कोई संदेह नहीं है कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस और बीजेपी दोनों के वोट काटेगी. वो अगले चुनाव में खेल बना-बिगाड़ सकती है .’ जब बीजेपी, जो राज्य में विपक्ष में है, की नेता इस बात को स्वीकार कर रही हों कि ‘आप’ आगामी चुनाव परिणामों को प्रभावित करेगा तो फिर ऐसी स्थिति में यह जानना भी दिलचस्प होगा कि इस बारे में सत्तासीन कांग्रेस पार्टी की क्या राय है. मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के संसदीय सचिव मुकेश शर्मा भले ही कांग्रेस को इससे किसी तरह के नुकसान होने की संभावना से इनकार करते हैं लेकिन साथ में वे यह भी जोड़ते हैं कि 'आप' की लड़ाई बीजेपी से है. दोनों में विपक्ष के स्थान को लेकर संघर्ष होगा कि कौन विधानसभा में विपक्ष में बैठेगा. मुकेश की बातों में एक गंभीर अर्थ छिपा है. वह यह कि भले ही वे अपनी पार्टी को 'आप' के कारण किसी तरह के नुकसान की बात से इनकार कर रहे हों लेकिन रोचक यह है कि वे उसको बीजेपी के बराबर भी लाकर खड़ा कर रहे हैं. ‘आप’ को कांग्रेस के एक नेता द्वारा विपक्ष के रूप में स्वीकार करना भी 'आप' के प्रति कांग्रेस की बदली सोच को ही दर्शाता है. दोनों पार्टियों के विभिन्न नेता ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में 'आप' को लेकर चिंतित नजर आते हैं. आम आदमी पार्टी को लेकर दोनों दलों में गंभीर मंथन चल रहा है. उससे होने वाले संभावित नुकसान की काट ढूंढ़ने की तैयारी की जा रही है. दोनों दल अपने यहां उन विभीषणों की पहचान कर रहे हैं जो देर-सवेर ‘आप’ के पाले में जा सकते हैं. इन पार्टियों को पता है कि यह समस्या उस समय और बढ़ेगी जब टिकट बांटने का वक्त आएगा. तब जो सदस्य पार्टी से नाराज होंगे वे 'आप' का जाप कर सकते हैं. राजनीतिक विश्लेषक अभय दुबे कहते हैं, ‘‘आप’ को आगामी चुनावों में कोई चमकदार सफलता मिलने की उम्मीद तो नहीं दिखाई देती लेकिन हां, उसे उन लोगों का साथ जरूर मिल सकता है जो भाजपा और कांग्रेस दोनों से नाराज चल रहे हैं.' आगामी चुनावों में 'आप' की भूमिका को जेएनयू में समाजशास्त्र के प्रोफेसर विवेक कुमार एक जीतने वाली पार्टी के बजाय वोट काटने वाली पार्टी के रूप में ही देखते हैं. वे कहते हैं, 'देखिए, दिल्ली चुनाव को ही अगर हम लें तो ये लोग वोटकटुआ पार्टी की भूमिका में तो आ सकते हैं लेकिन विजयी पार्टी की भूमिका में नहीं.' आम आदमी पार्टी अपनी छवि को लेकर इस लाइन पर काम कर रही है कि वह खुद को बाकी अन्य राजनीतिक दलों से अलग दिखा सके. आम आदमी पार्टी भले ही आज राजनीतिक अखाड़े में दांव आजमाने के लिए तैयार दिख रही हो लेकिन उसके तौर-तरीकों पर आज भी सामाजिक आंदोलनों की छाप होने की बात कही जा रही है. अभय कहते हैं, 'अरविंद केजरीवाल आज राजनीति में हैं लेकिन वो और उनकी पार्टी एक जुझारू सामाजिक आंदोलन की तरह ही काम रह रहे हैं. जिस तरह की गोलबंदी पार्टी कर रही है उसका मोड राजनीतिक नहीं वरन सामाजिक आंदोलन वाला ही है.' पार्टी से जुड़े समाज विज्ञानी योगेंद्र यादव अभय की बात से सहमत होते दिखते हैं जब वे कहते हैं, ‘हां, हम लोग एक राजनीतिक दल हैं भी और नहीं भी.’ पार्टी से जुड़े लोग भी इस बात को मानते हैं कि 'आप' अपनी छवि को लेकर इस लाइन पर काम कर रहा है कि खुद को अन्य राजनीतिक दलों से अलग दिखा सके. योगेंद्र शायद पार्टी के इसी विचार को रेखांकित करते हैं जब वे कहते हैं, 'हम वैसे ही दिखना चाहते हैं जैसे नेता नहीं होते.' आम लोगों की राय भी ‘आप’ को लेकर मिली-जुली ही है. लोगों से बातचीत में दो तरह की बातें सामने आती हैं. पहली प्रतिक्रिया उनकी है जो यह मान चुके हैं कि इस देश में कुछ नहीं बदलने वाला और ऐसे में अरविंद और उनके साथी भी बाद में जाकर अन्य दूसरों की तरह ही हो जाएंगे. वहीं दूसरी प्रतिक्रिया अरविंद के इतिहास और उनके काम के आधार पर एक मौका देने का मन बनाती सी दिखाई देती है. आम आदमी पार्टी के पास कोई जातीय या कहें वर्गीय समर्थन की पूंजी नहीं है, जो हमारे देश में प्रायः किसी राजनीतिक दल के अस्तित्व में आने के समय उसके पास होती है. यह एक चुनौती होने के साथ 'आप' के लिए एक अवसर भी है जहां वह नागरिक समाज के आधार पर एक ऐसे नए वर्ग का निर्माण करे जिसकी राजनीति जाति, धर्म और संप्रदाय के संकीर्ण हितों से बाहर निकलकर एक व्यापक सामाजिक हित से जुड़ती हो. आने वाले सालों में अगर 'आप' को कुछ भी सफलता मिलती है तो यह आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल से ज्यादा वैकल्पिक राजनीति के लिए उम्मीद जगाने वाली बात होगी. at 03:27 Email ThisBlogThis!Share to TwitterShare to Facebook Labels: 'आप’ का क्या होगा? 0 comments: Post a Comment Newer Post Older Post Home twitterfacebookgoogle pluslinkedinrss feedemail You can also receive Free Email Updates: Translator Translate this 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" माँ का क़र्ज़ " (एक प्रेरक लघु कथा) ------------=====)♥ गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभका... अमेरिकन अध्यापिका के सवाल और भारतीय छात्र के जवाब ... भगत सिंह के विरुद्ध गवाही देने वाले " अंधभक्त की कहानी " "नशीब से ज्यादा और समय से पहले ना किसी को मिला है ... ****अन्दर कि खबर**** स्वराज हमारा हक है और हम इसे लेकर ही रहेंगे भाजपा-कांग्रेस में अंतर क्या है? संचार की क्रान्ति और अपनों से दूर होते हम आप के बड़ते कदम और उस पर उठते सवालों के जवाब " गुरु का सच्चा चेला "(अरविन्द केजरीवाल) ///*** एक घोर मोदी भक्त फेसबुकिये का इंटरव्यू ***... पहाड़ पर आपदा बहुगुणा के कुनबे की 'लाटरी' वर्तमान सिस्टम की पोल खोलती एक लघु कथा (मिड-डे मिल... मंगल पांडे के जन्मदिवस पर विशेष 5 बेटियों से 20 साल तक रेप करता रहा बाप एक और आपदा की आहट और सोई सरकार भारतीयों की तरफ सोई प्रजा पर एक लघु कथा भारतीय राजनीति में बदलाव की आहत "आम आदमी पार्टी" भारतीय राजनीती :- साम्प्रदायिकता और मोदी शहीदों से ज्यादा महत्वपूर्ण नेहरु, इंदिरा, गाँधी प... प्रकृति का आश्चर्य नारिलता फूल हो रहा भारत निर्माण (कविता) जाती और सम्प्रदाय के नाम पर राजनीती बंद हो दिग्विजय सिंह और राहुल गांधी का वार्तालाप "फ्लाइंग सिक्ख" मिल्खा सिंह सिस्टम किसी का नही होता (एक प्रेरक कथा) लीडर कैसा हो? :- एक प्रेरक कथा (अब्दुल कलाम के जीव... सहारा की खबर पर मीडिया क्यों है मौन? बुर्के में रहने दो बुरका ना उठाओ, बुरका जो उठ गया ... 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