शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

पत्रकारिता की परिभाषा

...Loving Boy........

Tuesday, April 21, 2009


पत्रकारिता : अर्थ और परिभाषा
पत्रकारिता के लिए अंग्रेजी का शब्द है,'जर्नलिज्म',
जर्नलिज्म शब्द की व्युत्पति जर्नल शब्द से हुई है। जर्नल शब्द का अर्थ दैनिकी, दैनन्दिनी, रोजनामचा होता है। पत्रकारिता के सन्दर्भ में इसका अर्थ पत्र, अखबार तथा दैनिक होता है।
सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी के पूर्व अंग्रेजी शब्द पीरिऑडिकल अर्थात्‌ नियतकालीन का प्रयोग होता है। पश्चात्‌ में इसका स्थान लैटिन शब्द डियूरनल और जर्नल ने ले लिया। दैनन्दिन गतिविधियों और राजकीय क्रिया-कलाप का समावेश जर्नल में होता है। इसके अन्तर्गत समाविष्ट विषयों को बीसवीं शताब्दी में गम्भीरता प्रदान की गयी। समालोचना और शोध-विषयों के प्रतिनिधि के रूप में जर्नल को मान्यता दी गयी है।
फ्रेंच भाषा का एक शब्द है जर्नी। जर्नीशब्द से भी जर्नलिज्म शब्द की उत्पति मानी जाती है जर्नी शब्दा का अर्थ होता है, दैनन्दिन गतिविधियों अथवा घटनाओं की विवरण-प्रस्तुति।
जर्नल को व्यापकता प्रदान करने वाला शब्द जर्नलिज्म बहुआयामी है। लेख्न, सम्पादन, संकलन तथा इनसे सम्बद्व आकाशवाणी, दूरदर्शन, वीडियो, फिल्म इत्यादि मीडिया भी अन्तर्गत आते हैं।
विभिन्न द्विानों ने पत्रकारिता की भिन्न-भिन्न परिभाषाएं दी है। आइए, उनके दृष्टिकोण से अवगत हों!
1. सामयिक ज्ञान के व्यवसाय को पत्रकारिता कहते हैं। इस व्यवसाय में आवश्यक तथ्यों की प्राप्ति, सजगतापूर्वक उनका मूल्यांकन तथा सम्यक्‌ प्रस्तुति होती है।
- सी.जी.मूलर
2. कला, वृति और जन-सेवा ही पत्रकारिता है।
- डब्ल्यू.टी. स्टीड
3. प्रकाशन, सम्पादन, लेखन अथवा प्रसारण सहितसमाचार माध्यम के संचालन के व्यवसाय को पत्रकारिता कहते हैं।
- न्यू वेवस्टर शब्दकोश
4. पत्रकारिता पांचवां वेद है, जिसके द्वारा ज्ञान-विज्ञान सम्बन्धी बातों को जानकर अपने बन्द मस्तिष्क को खोलते हैं।
- इन्दे विद्याचस्पति
वास्तव में अब समय के साथ-साथ, समाचार पत्र केवल सुबह- शाम की वार्ता के अथवा चर्चा के विषय नहीं रह गये हैं, अपितु वे ज्ञान के प्रसार का महत्वपूर्ण साधन तथा जनता के चिन्तन और आचरण की दृष्टि से लोकतन्त्रीय बनाने का भी सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं। आरम्भ के दिनों मे समाचारपत्रों का काम केवल लोगों की जानकारी देना और अपने चारों ओर देश अथवा विश्व में जो कुछ घट रहा है, उसके प्रति सचेत करना था, किन्तु जिस तरह किसी भी शिक्षा-प्रद माध्यम का एक अथवा अनेक उद्देश्य के लिए सदुपयोग अथवा दुरूपयोग हो सकता है, उसी तरह समचारपत्राों को 'फोर्थ एस्टेट कहा था और हम भी सहज ही इन्हें लोकतन्त्रीय शासन-तन्त्र का चौथा सबसे महत्वपूर्ण अंग मान सकते है। अन्य तीन स्तम्भ हैं- 1. नगरपालिका 2. न्यायपालिका। उन्नीसवीं शताब्दी में समाचारपत्रों के राजनीतिक अस्तित्व का पता चला। लाडर्स, टेम्पोरल तथा कॉमन्स के बाद पत्रकारिता का महत्व सर्वोपरि है। यदि समाचारपत्र स्वतन्त्र हैं ओर उनके समाचार निष्पक्ष हैं, तो इससे लोगों का मस्तिष्क हर प्रकार के प्रभावों ओर विचारों के लिए खुला रह सकता है। सच तो यह है कि आज-कल समाचारों में अलक्ष्य विचार और यत्र-तत्र, ताड.-मरोड. रहा करती है। इस प्रकार आज के समाचारनपत्रों का पहला उद्देश्य पाठक-पाठिकाओं की राय को किसी न किसी पक्ष में बदलाना हो गया है। वे जनता को बने-बनाये, गढ़-गढ़ाये विचार और पके-पकाये विचार दिया करते है। लोग भी उनको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण कर लेते है।, क्योंकि आम आदमी के पास न तो इतनी बुद्वि है, न इतने साधन और समय हैं कि वह समाचारों की सच्चाई को जान सकें, वहीं आज के लिखे-पढ़े लोगों की भी यह कमजोरी है कि वे सुनी हुई बात की बजाय छपी हुई बात पर अधिक भरोसा कर लेते हैं। यही कारण हैं कि लोग अपनी बात के समर्थन में समाचारपत्रों का सन्दर्भ दिया करते है। वे यह भूल जाते हैं कि समाचारपत्रों का सन्दर्भ दिया करते है। वह भूल जाते हे। कि समाचारपत्रों ने अपने दल की नीति के अनुसार अथवा अपनी ही नीति के अनुसार समाचार में झूठ भर दिये है। एक बार विचार का प्रसारण हो गया तो साधनों के अभाव में झूठ और सच को दूध और पानी की तरह अलग-अलग कर पाना कठिन हो जाता है।
यदि कुता आादमी को काट ले तो यह कोई समाचार नहीं, किनतु यदि आदमी कुते को काट ले जो यह समाचार है।
समाचारपत्रों का काम केवल ऐसी घटनाओं की जानकारी देना नहीं, जिनमें मानवी अभिरूचि हो ओर किसी समस्या में बौद्विक और भावनात्मक रूप से शामिल हों, बल्कि कहीं इससे अधिक है।
ऐसे में, सहजता के साथ मस्तिष्क में एक प्रश्न कौंधता है, क्या समाचारपत्राके को वास्तव में स्वतन्त्र और स्वाधीन बनाया जा सकता है+। इसमें निश्चय ही सन्देह है, क्यांकि आज कल समाचार पत्र बड़े-बड़े व्यापारियों के हाथ में है। औंर ये आज 'उद्योग' बन गयें हैं। अन्य सब उद्योगों की तरह इन्हें भी आज लाभ के उद्देश्य से चलाया जाता है और इन सभी तरीकों से चलाया जाता है, जो किसी उद्योग के विकास के लिए आवश्यक होते हैं, फिर आज उस प्राकर की पत्रकारिता अथवा अंग्रेजी में 'येलो जर्नलिज्म' कहा जाता है। यही कारण है कि सही मायने में पत्रकारिता का उद्देश्य लेकर चन?लने वाले पत्र प्रायः पूर्णत सफल नहीं हो पाते।
इस पीत- पत्रकारिता के सन्दर्भ में भी एक धटनाक्रम है। जो इस प्रकार है। संयुक्त राज्य अमेंरिका में एक पत्रिका निकली थी। उसका कागज ही पीले रंक का था। उसका व्यावसायिक पक्ष यह था कि बच्चों की सहज सुप्रवृतियों

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