मंगलवार, 30 जुलाई 2013

पत्रकार होने की मान्यता



राजनीति के अपराधीकरण पर किये गए विभिन्न अध्ययनों के दौरान जो निष्कर्ष प्राप्त हुआ था, वह आज पत्रकारों के राजनीतिकरण पर भी सटीक बैठ रहा है. मोटे तौर पर विधानमंडलों में अपराधियों की बढ़ती संख्या का कारण यह था कि पहले नेताओं ने अपने प्रतिद्वंदियों को दुश्मन समझ उसे निपटाने के लिए किराए के लिए बाहुबलियों की मदद लेना शुरू किया. बाद में उन अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को लगा कि जब केवल ताकत की बदौलत ही सांसद-विधायक बना जा सकता है, तो बजाय दूसरों के लिए पिस्तौल भांजने के क्यू न खुद के लिए ही ताकत का उपयोग शुरू कर दिया जाय. फलतः वे सभी अपनी-अपनी ताकत खुद के लिए उपयोग करने लगे और ग्राम पंचायतों से लेकर संसद तक अपराधी ही अपराधियों की पैठ हो गयी. इस विषय पर वोहरा कमिटी ने काफी प्रकाश डाला है. तो अब चुनाव प्रणाली में नए-नए प्रयोगों के दौरान भले ही असामाजिक तत्वों पर कुछ अंकुश लगा हो लेकिन यह फार्मूला अब पत्रकारों ने भी अपनाना शुरू कर दिया है.
हाल तक पत्रकारिता के लिए भी पेड न्यूज़ चिंता का सबब बना हुआ था. लेकिन राडिया प्रकरण के बाद यह तथ्य सामने आया कि कलम को लाठी की तरह भांजने वाले लोगों ने भी यह सोचा कि अगर केवल कलम या कैमरे से ही किसी की छवि बनायी या बिगाड़ी जा सकती हो, तो क्यू न ऐसा काम केवल खुद की बेहतरी के लिए किया जाय? कल तक जो कलमकार नेताओं के लिए काम करते थे, अब वे नेता बनाने या पोर्टफोलियो तक डिसाइड करवाने की हैसियत में आ गए. अगर इस पर लगाम न लगाई गयी तो कल शायद ये भी खुद ही लोकतंत्र को चलाने या कब्जा करने की स्थिति में आ जाय. तो 2G स्पेक्ट्रम खुलासे ने यह अवसर मुहैया कराया है जब पत्रकारिता की सड़ांध को भी रोकने हेतु समय रहते ही प्रयास शुरू कर देना उचित होगा. यह सड़ांध केवल दिल्ली तक ही सिमटा नहीं है बल्कि कालीन के नीचे छुपी यह धूल, गटर के ढक्कन के नीचे की बदबू राज्यों की राजधानियों और छोटे शहरों तक बदस्तूर फ़ैली हुई है.
संविधान द्वारा आम जनों को मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी का सबसे ज्यादा उपभोग पत्रकारों को करने दे कर समाज ने शायद एक शक्ति संतुलन स्थापित करना चाहा था. अपने हिस्से की आज़ादी की रोटी उसे समर्पित कर के समाज ने यह सोचा होगा कि यह ‘वाच डाग’ का काम करते रहेगा. नयी-नयी मिली आज़ादी की लड़ाई में योगदान के बदौलत इस स्तंभ ने भरोसा भी कमाया था. लेकिन शायद यह उम्मीद किसी को नहीं रही होगी कि यह ‘डॉग’ भौंकने के बदले अपने मालिक यानी जनता को ही काटना शुरू कर देगा. हाल में उजागर मामले का सबसे चिंताजनक पहलू है समाज में मीडिया की बढ़ती बेजा दखलंदाजी.
निश्चित ही कुछ हद तक मीडिया की ज़रूरत देश को है. लेकिन लोगों में पैदा की जा रही ख़बरों की बेतहाशा भूख ने अनावश्यक ही ज़रूरत से ज्यादा इस कथित स्तंभ को मज़बूत बना दिया है. यह पालिका आज ‘बाज़ार’ की तरह यही फंडा अपनाने लगा है कि पहले उत्पाद बनाओ फ़िर उसकी ज़रूरत पैदा करो. प्रसिद्ध मीडिया चिन्तक सुधीश पचौरी ने अपनी एक पुस्तक में ‘ख़बरों की भूख’ की तुलना उस कहानी ( जिसमें ज़मीन की लालच में बेतहाशा दौड़ते हुए व्यक्ति की जान चली जाती है ) में वर्णित पात्र से कर यह सवाल उठाया है कि आखिर लोगों को कितनी खबर चाहिए? तो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ख़बरों की बदहजमी रोकने हेतु उपाय किया जाना समीचीन होगा.
शास्त्रों में खबर देने वाले को मोटे तौर पर ‘नारद’ का नकारात्मक रूप देकर उसे सदा झगड़े और फसाद की जड़ ही बताया गया है. इसी तरह महाभारत के कथानक में संजय द्वारा धृतराष्ट्र को सबसे पहले आँखों देखा हाल सुनाने की बात आती है. लेकिन महाभारत में यह उल्लेखनीय है कि आँखों देखा हाल सुनाने की वह व्यवस्था भी केवल (अंधे) राजा के लिए की गयी थी. इस निमित्त संजय को दिव्य दृष्टि से सज्जित किया गया था. तो आज के मीडियाकर्मियों के पास भले ही सम्यक दृष्टि का अभाव हो. चीज़ों को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़ कर, अपने लाभ-हानि का विचार करते हुए ख़बरों से खेल कर, व्यक्तिगत पूर्वाग्रह-दुराग्रह के हिसाब से खबर बनाने, निर्माण करने की हरकतों को अब भले ही ‘पत्रकारिता’ की संज्ञा दे दी जाय. भले ही कुछ भी विकल्प न मिलने पर, अन्य कोई काम कर लेने में असफल रहने की कुंठा में ही अधिकाँश लोग पत्रकार बन गए हों, लेकिन आम जनता को आज का मीडिया धृतराष्ट्र की तरह ही अंधा समझने लगा है. तो ऐसी मानसिकता के साथ कलम या कैमरे रूपी उस्तरे लेकर समाज को घायल करने की हरकत पर विराम लगाने हेतु प्रयास किया जाना आज की बड़ी ज़रूरत है.
लोकतंत्र में चूंकि सत्ता ‘लोक’ में समाहित है, अतः यह उचित ही है कि ख़बरों को प्राप्त करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार रहे. लेकिन ‘घटना’ और ‘व्यक्ति’ के बीच ‘माध्यम’ बने पत्रकार अगर बिचौलिये-दलाल का काम करने लगे तो ऐसे तत्वों को पत्रकारिता से बाहर का रास्ता दिखाने हेतु प्रयास किये जाने की ज़रूरत है. जनता को धृतराष्ट्र की तरह समझने वाले तत्वों के आँख खोल देने हेतु व्यवस्था को कुछ कड़े कदम उठाने की ज़रूरत है. कोई पत्रकार अपने ‘संजय’ की भूमिका से अलग होकर अगर ‘शकुनी’ बन जाने का प्रयास करे, षड्यंत्रों को उजागर करने के बदले खुद ही साजिशों में संलग्न हो जाय तो समाज को चाहिये कि ऐसे तत्वों को निरुत्साहित करे.
अव्वल तो यह किया जाना चाहिए कि हर खबर के लिए एक जिम्मेदारी तय हो. अगर खबर गलत हो और उससे किसी निर्दोष का कोई नुकसान हो जाय तो उसकी भरपाई की व्यवस्था होना चाहिए. इसके लिए करना यह होगा कि ‘पत्रकार’ कहाने की मंशा रखने वाले हर व्यक्ति का निबंधन कराया जाय. कुछ परिभाषा तय किया जाय, उचित मानक पर खड़े उतरने वाले व्यक्ति को ही ‘पत्रकार’ के रूप में मान्यता दी जाय. कुछ गलत बात सामने आने पर उसकी मान्यता समाप्त किये जाने का प्रावधान हो. जिस तरह वकालत या ऐसे अन्य व्यवसाय में एक बार प्रतिबंधित होने के बाद कोई पेशेवर कहीं भी प्रैक्टिस करने की स्थिति में नहीं होता, उसी तरह की व्यवस्था मीडिया के लिए भी किये जाने की ज़रूरत है. अभी होता यह है कि कोई कदाचरण साबित होने पर अगर किसी पत्रकार की नौकरी चली भी जाती है तो दूसरा प्रेस उसके लिए जगह देने को तत्पर रहता है. राडिया प्रकरण में भी नौकरी से इस्तीफा देने वाले पत्रकार को भी अन्य प्रेस द्वारा अगले ही दिन नयी नौकरी से पुरस्कृत कर दिया गया. तो जब तक इस तरह के अंकुश की व्यवस्था नहीं हो तब तक निरंकुश हो पत्रकारगण इसी तरह की हरकतों को अंजाम देते रहेंगे.
जहां हर पेशे में आने से पहले उचित छानबीन करके उसे अधिसूचित करने की व्यवस्था है वहाँ पत्रकार किसको कहा जाय यह मानदंड आज तक लागू नहीं किया गया है. आप देखेंगे कि चाहे वकालत की बात हो, सीए, सीएस या इसी तरह के प्रोफेसनल की. हर मामले में कठिन मानदंड को पूरा करने के बाद ही आप अपना पेशा शुरू कर सकते हैं. डाक्टर-इंजीनियर की तो बात ही छोड़ दें, एक सामान्य दवा की दुकान पर भी एक निबंधित फार्मासिस्ट रखने की बाध्यता है. कंपनियों के लिए यह बाध्यता है कि एक सीमा से ऊपर का टर्नओवर होने पर वो नियत सीमा में पेशेवरों को रखे और उसकी जिम्मेदारी तय करे. लेकिन बड़ी-बड़ी कंपनियों का रूप लेते जा रहे मीडिया संगठनों को ऐसे हर बंधनों से मुक्त रखना अब लोकतंत्र पर भारी पड़ने लगा है. चूंकि आज़ादी के बाद, खास कर संविधान बनाते समय पत्रकारों के प्रति एक भरोसे और आदर का भाव था. तो संविधान के निर्माताओं ने इस पेशे में में आने वाले इतनी गिरावट की कल्पना भी नहीं की थी. तो ज़ाहिर है इस तन्त्र पर लगाम लगाने हेतु उन्होंने कोई खास व्यवस्था नहीं की. लेकिन अब बदली हुई परिस्थिति में यह ज़रूरी है कि पत्रकारों के परिचय, उसके नियमन के लिए राज्य द्वारा एक निकाय का गठन किया जाय, अन्यथा इसी तरह हर दलाल खुद को पत्रकार कह लोकतंत्र के कलेजे पर ‘राडिया’ दलता रहेगा.
लेखक पंकज झा छत्‍तीसगढ़ बीजेपी के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.
Comments
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kumar
rajesh kumar 2010-12-22 20:07:46

jo aadmi har sal apana nam badalta hai. wo patrakaro ke lia manak ki bat kar raha hai. durbhagya ki bat hai
pahle ye tay kar lo ki ab apna nam nahi badloge fir nasihat dena

समाचार जगत दम तोड़ देगा
Prem Arora Kashipur Uttarakhan 2010-12-22 20:14:22

प्रिये भाई यशवंत,

पंकज झा जी की बातों की गहराई में जाया जाये तो उनकी बात से मेरे जैसे कई लोग सहमत होंगे जो अब अपने आप को पतरकार कहलाने में शर्म महसूस कर रहें हैं. यशवंत भाई जब भड़ास पहली बार और शयद सबसे पहले मेरे सामने आया था मुझे अहसास नहीं था की हम दिल की बात भी कह पाएंगे. पैर इस मंच के माध्यम से मीडिया का सच सामने आ रहा है यशु भाई अगर कोई भी टी वी चानेल २० हज़ार ले कर अपने चैनल का रिपोर्टर बनाएगा और एक समाचार पटर ५ हज़ार लेकर रिपोर्टर बनाएगा तो किस तरह समाचार जगत दम तोड़ देगा जो धीरे धीरे करके तोड़ भी रहा है. २० हज़ार देकर ५० हज़ार कैसे कमाया जाये यह बिज़नस तो बन ही गया है. हालां की भाजपा भी मीडिया को साधना जानती है par पंकज झा जी ने जिस बेबाकी से इस बहस को शुरू किया है वोह अब लम्बी तो चलेगी ही. खों की भड़ास फॉर मीडिया par जो भी दिल को छूने वाली बात सामने आती है वोह काफी दिनों तक चलती है.

यशु भाई मेरी और से पंकज झा जी को धनयबाद कहना

आपका

प्रेम अरोड़ा काशीपुर

9012043100

अदभुत,
आशीष झा 2010-12-22 21:08:21

अदभुत, अदभुत, अदभुत, पंकज जी का यह आलेख मीडि‍या में रहने और आनेवाले सभी को पढना चाहि‍ए

Anonymous 2010-12-22 21:24:54

70% Gaaon ke desh Bharat mein Patrakaar ban ne ke liya sabse pahle kam se kam 2 saal tak kisi chote se kasbe ya Gaaon se Shuruwat honi chaaiye !
Ye nahi ki *Jugaad * laga kar 30 saal ki umra mein hi Sampaadak ban kar *Bada Patrakaar* kahlaane ki jugat bhidaanee chaaiye !
Pankaj ji Dhyaan dijiye !

Jitendra Dave 2010-12-22 21:31:55

Good Analysis Pankaj Ji. It is time to introspect. Now a days media became a Powerhouse without any accountability. Media is a part of our social life, hence must be responsible for all its acts.

truth
Kamal Tripathi 2010-12-22 22:38:18

ye un sabhe bhawi patrakaro ke liye sandesh hai, ummed karta hu ki esko padh kar unhe kuch labh hoga, aur wo patrikarita ki garima ko banaye rakhne me apana yogdan dege.......baho umda lekh Pankaj sir......

Atul shrivastava 2010-12-22 23:19:02

पंकज जी, आपके लेख की बातों से मैं तो सहमत हूं पर 'राजेश कुमार' जी की जो टिप्‍पणी आपके लेख के साथ है उस पर आपका क्‍या कहना है यदि आप बताएं तो और भी अच्‍छा होगा।

धन्यवाद.
पंकज झा. 2010-12-23 00:17:56

अतुल जी, आप लेख की बातों से सहमत हैं इसके लिए धन्यवाद आपका. लेख के विषय वस्तु पर ही बात हो तो बेहतर, नाम में कुछ भी नहीं रखा है. फ़िर भी अगर जिज्ञासा है तो बता दूं कि मेरे घर का नाम 'पंकज कुमार झा' ही रखा गया था. बाद में मैंने दीक्षा ले ली थी तो गुरूजी ने नाम बदल कर 'जयराम दास' रख दिया था. मूलतः मेरी पढ़ाई-लिखाई आश्रम में ही हुई थी तो सभी प्रमाण पत्र जयराम के नाम से ही थे. पुनः अपने परिवार में वापस आने पर पहचान का थोडा संकट पैदा हो गया तो विहित कानूनी प्रक्रिया द्वारा, एफेडेविट लेकर, अखबारों में इश्तहार देकर मैंने अपना पुराना पहचान वापस पाया. इसमें कुछ भी बुराई नहीं है, और न ही राजेश जी के टिप्पणी की तरह इस नाम बदलने से पत्रकारिता की मानक को कोई चोट पंहुचा है. पत्रकार या रचना कर्म से जुड़े लोग तो वैसे भी अलग नाम से पहचान हासिल करते रहते हैं. उदाहरण नहीं दूंगा, नहीं तो अभी कहा जाने लगेगा कि हम बड़े लोगों से अपनी तुलना कर रहे हैं...खैर.
प्रेम अरोड़ा साहब,आशीष झा जी, अनिनोमस जी, जितेन्द्र दवे साहब, कमल त्रिपाठी जी ...आप सभी का ह्रदय से आभार. :D

सहमत
Journalist 2010-12-23 10:48:15

पंकज जी
आपसे बिलकुल सहमत हैं. आपका एक-एक शब्द सत्य है. कुछ तथाकथित पत्रकार पत्रकारिता की पावन गंगा को दूषित करने पर तुले हुए हैं. ऐसे तथाकथित पत्रकार, पत्रकारिता के लिए कलंक हैं.

अब बात कुमार की, लगता है यह कुमार भी कोई दूषित मानसिकता वाला कोई तथाकथित पत्रकार है, जो आपके सत्य से घबराकर आप पर निजी तौर टिप्पणी कर रहा है.

mukesh aagrawal 2010-12-23 11:40:05

बिलकुल ठीक - * शुचिता कि शपथ पहली प्राथमिकता हो

* ६वा वेतनमान मिले
* विचारो पे बंदिश न हो
* संपादक एडिटिंग न करे
* हर लाइन योग्यता के मानदंडो पर खरी रहे
* अपराध कि राजनिति और राजनिति का अपराधी करण ,corruption eradiction मूलमंत्र हो
* graduate फ़र्स्ट क्लास अनिवार्य किया जाय


- :evil: है न कपोल कल्पना मेरी !
लेकिन आपका लेख सच्चाई है !

Ashwani Kumar Roushan 2010-12-23 12:16:14

@ Mr. Rajesh :- Rajesh ji, Jis prakar se apne es sundar evam vicharniya alekh par par apni pratikriya jahir ki hai wo nischit roop se ghor BHARTSNA ke layak hai. Mahshay jaisa ki aap jante hain PANKAJ JHA jee khud ek patrkar hain aur yadi unhone apne vyawshay se jure kuch ashwikar karne wale tathyon ya yun kahen ki asamajik tatwon ke khilaf awaj uthayi hai to nischit roop se ye bahut hi sarahniya kadam hai. Aur aisa jan parta hai ki LEKHAK mahashay ko aap jaise logon ne hi majboor kiya hai aisa kuch likhne ke liye. Kyunki koi v vyakti jisse kisi ki rozi roti chalti hai wo etni asani se uske khilaf awaj nahi uthata.
Esliye lekahk mahoday se namra nivedan hai ki apni es awaj ko aise hi apni kalam ki takat se aur buland karte rahein.Naam badalne se kuch nahi hota, Balki ush badle hue naam ke sath bhi fir se es bheer me khash kar Rajesh jee jaise logon ke bich apni pahchan apni wahi garima bana lena (jaisa ki aap kar rahe hain) bahut badi baat hoti hai..Hum sab apke sath hain..Bahut khub mahashay..Aap nischit roop se bahut bade dhanywad ke patra hain.

samvednasansaar.blogspot.com
रंजना.. 2010-12-23 12:37:36

बिलकुल सही कहा आपने...शब्दशः सहमत हूँ....

जिन दिनों टी वी पर प्रचारित किया जा रहा था कि अब खबर आपके हाथ में होगा..अपने हिसाब से अपने पसंद के खबर आप देख पाएंगे, मुझे अंदेशा हो गया था कि भविष्य हमें यही दिन दिखायेगा,जो आज जगजाहिर है.....

पर क्या हकीकत सही मायनों में ऐसी हो होनी चाहिए...
केशव आचार्य 2010-12-23 12:59:27

इस समय प्रदेश में दो नयेचैनल आ रहै एक 25 हजार लेकर जिले का संवाद दाता बना रहा है दूसरा20 हजार लेकर तहसील और ब्लाक पर नियुक्त कर रहा है...अब आप बताएं की पत्रकारिता के माप दंड कहां से तय हों...जितने भी करोड पति हैं...पैसा चाहे जहां से आया हो..पर सवाल है कि पैसे के दम परशुरू हो रहे इन अखबारों और चैनल के पास पैसा उगाही का जो ये तरीका ..और सबसे बडी बात..जो लोग इन आई डी या ब्यरों को पैसे के दम परखरीदते हैं.... उन्हें...कौन तय करेगा की पत्रकारिता करनी चाहिए या नही...पर क्या एक सवाल है आपसे.....अगर पत्रकारिता के मापदंड कर दिये जाये तो फिर कितने लोग इस दौड में शामिल होगें...
वैस मेरा एक सबको सुझाव है...
जीवन जीने के लो नये आइडिया..
अगर अम्बानी नही तो बनो राडिया...."

राजेश 2010-12-23 13:02:16

rajesh kumar..जी परम आदरणीय राजेश जी....जिस तरह से आपने पूरा लेख पढने के बाद अपनी टिप्पणी कही है उससे आपका चूतियापन साफ झलक गया है..पहले सोच पैदा करले बाबू....फिर कूदना टिप्पणी करने में......

राजकुमार साहू, जांजगीर छत्तीसग 2010-12-23 16:40:13

पंकज जी, आपने जो मुद्दा उठाया है, वह काबिले तारीफ है। वाकिये में जिस तरह राजनीति का अपराधीकरण हुआ है, वैसे ही पत्रकारिता का राजनीतिकरण भी होता जा रहा है। आज वही सबसे बड़ा पत्रकार माना जाने लगा है, जिसे कोई मंत्री या फिर बड़े नेता जानता-पहचानता हो। इसलिए निश्ष्ति ही पत्रकारिता के लिए मापदण्ड तो तय होना चाहिए, क्योंकि कचरा-बदरा भी पत्रकारिता में आकर मिल गए हैं।

पंकज झा. 2010-12-24 12:17:54

केशव आपका सवाल प्रासंगिक है. लेकिन आप Quantity नहीं Quality की चिंता कीजिए. कुछ सामान्य से मापदंड लागू हो जाने के बाद भी लोगों की कोई कमी नहीं रहेगी. लेख में अपन ने जिन-जिन पेशा का उदाहरण दिया है, वहाँ भी हज़ारों-लाखों की संख्या में लोग कार्य कर रहे हैं. तो लोग तो आयेंगे ही लेकिन शायद अच्छे पेशेवराना अंदाज़ लेकर. शुरू से ही यही तय कर कि पत्रकार ही बनना है. आज की तरह नहीं कि कुछ न कर पाए तो चलो पत्रकार बन जाते हैं. धन्यवाद आपका.
सहमत जी के समर्थन के लिए धन्यवाद. मुकेश जी, आपने भी विचारणीय बात कही है,लेकिन एक बात समझ में नहीं आया. अगर संपादक एडिटिंग न करे तो और क्या करे? अश्विनी जी, रंजना जी, राजेश जी और राजकुमार जी..आप सभी को हार्दिक धन्यवाद.

केशव आचार्य 2010-12-24 12:23:15

पकंज दादा...लेकिन करोडो रूपये का बजट लेकर चलने वाले चैनल को क्वांटिटी और क्लालिटी के बीच क्या चाहिए होगा.... क्या क्लालिटी पैसा दिला पायेगी...यदि नहीं मैं जबाव है तो फिर मापदंढ यही रहने दीजिए

पंज जी को बधाई
मयंक सक्सेना 2010-12-24 16:30:42

ये वही पंकज झा हैं जो एक वक्त भोपाल में पत्रकारिता विश्वविद्यालय में बिना प्रवेश परीक्षा के प्रवेश का समर्थन कर रहे थे...परीक्षा में संघ की महिमा गाने वाले प्रश्नों का समर्थन कर रहे थे...आज मानक तय करने की बातें कर रहे हैं...अद्भुत सामंजस्य है समय के हिसाब से बात करने का...कभी संघ की लॉबीइंग (कुठियाला जैसे आपराधिक लोगों की) तो कभी मानकों की बात....बधाई हो पंकज जी दोहरे मापदंडो पर भी खरे उतरने के लिए....

गलतबयानी.
पंकज झा. 2010-12-24 16:45:05

मयंक जी, कृपया तथ्यों के अआधार पर और सच बात करें तो अच्छा लगेगा. माखनलाल से संबंधित मेरा सारा लिखा किसी न किसी साईट पर है. क्या आप कोई एक लिंक दे पायेंगे जिसमें मैंने कभी भी बिना प्रवेश परीक्षा लिए प्रवेश देने का समर्थन किया हो?
हां आपकी ये बात सही है कि भाजपा से संबंधित सवाल पूछने का मैंने ज़रूर समर्थन किया था. और वो इस आधार पर कि अगर कांग्रेस से संबंधित सवाल पूछे जा सकते हैं तो भाजपा या अन्य राष्ट्रवादी संगठनों से सवाल क्यू नहीं आ सकते? और अपने इस स्टेंड पर मैं आज भी कायम हूं. शायद आपको मालूम हो कि उस परीक्षा में संघ से ज्यादा कांग्रेस को महिमामंडित करने वाले सवालों की संख्या थी.
इसी तरह कभी मैंने कुठियाला जी या और किसी की व्यक्तिगत तारीफ़ नहीं की और न ही उनका बचाव किया. इसी साईट पर संबंधित लेख में अपन ने सबकी आलोचना करते हुए अपने कनिष्ठ छात्रों से केम्पस की राजनीति से दूर रहने का आग्रह किया था..बस.
मयंक जी, अपना लेखन सदा दोहरे मानदंडों के खिलाफ में ही रहा है. अगर आप अपने किसी भी बात के समर्थन में कोई भी सबूत ला पाएं तो खुशी होगी मुझे. और सार्वजिनक रूप से स्वीकार भी करूँगा. टिप्पणी के लिए शुक्रिया लेकिन तथ्यों पर आधारित बात करेंगे तो अच्छा लगेगा.

sahmat
achchhelal verma 2010-12-24 21:50:36

हम सहमत हैं

kuch sach to kuch bhram sa lagta hai
nandkishore sharma 2010-12-28 13:21:59

pankaj ji ka yeh kathan ki janta dhritrashtra hai aaj ke samay me bhram sa prateet hota hai lekin ye kehna ki aaj samyak drishtee rakhne wale sanjay ki tarah ke patrakaron ki jaroorat hai bilkul sahi hai aur me is baat ko apna vote bhi deta hoon

Anonymous 2010-12-30 13:04:45

Sahi hai. Ganga me dubki lagakar pap dhone ke gyan dene wale pande khud hi pap ki gathri liye chal rahe hain. kya dohra mapdand hai. yadi wastav me patrkar banne ki haisiyat rakhte hain to BJP ka daman chhodkar journalism ko sidhe kyo nahi apnate janab. Behtar hoga khud apne apko sudhare aur bad me gyan bahaye.

पंकज झा. 2011-01-03 21:22:12

मैं नीचे की दोनों टिप्पणी को देख नहीं पाया था, इसीलिए विलम्ब हो गया.खैर. पहले नंदकिशोर जी को धन्यवाद उनके समर्थन के लिए. जहां तक जनता को धृतराष्ट्र समझने की बात है तो हम ऐसा नहीं समझते. मैंने ये कहा है कि पत्रकारगण शायद ऐसा सोचते हैं कि जनता अंधी है.जबकि ऐसा है नहीं.
अनिनोमस साहब से इतना ही कहना चाहूँगा कि मैं बीजेपी के लिए काम करता हूं यह कोई छुपा अजेंडा नहीं है मेरा. जैसा आजकल हो गया है पत्रकारों का. आप बनाइये मानक पत्रकारों के लिए और भरोसा मानिए कि उस मानक में मेरा बीजेपी से होना अयोग्यता होगी तो पत्रकार कहा जाना ही पसंद करूँगा.मैं किसी विचारधारा का बाद में हूं, पत्रकार पहले....धन्यवाद.

Anonymous 2011-04-18 17:39:32

s

कृपया आप लोग भी ऐसे ही लिखें
हरिओम गर्ग 2011-06-16 01:20:30

अश्वनी कुमार रोशन का पत्र राजेश जो उन्होंने राजेश क़े नाम लिखा को हिंदी में केन्वेर्ट करने क़े बाद.
आप भी आगे से अपने पत्र ,अपनी राय, गूगल की इस उपलब्ध सेवा से ऐसे ही लिखें तो दूसरों को पढने में सहूलियत होगी .
धन्यवाद .
हरिओम गर्ग Mr . राजेश :- राजेश जी , जिस प्रकार से अपने एस सुन्दर एवं विचारनीय आलेख पर पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर कि है वो निश्चित रूप से घोर भर्त्सना क़े लायक है . मह्शय जैसा कि आप जानते हैं पंकज झा जी खुद एक पत्रकार हैं और यदि उन्होंने अपने व्यव्शय से जुरे कुछ अश्वीकार करने वाले तथ्यों या यूँ कहें कि असामाजिक तत्वों क़े खिलाफ आवाज उठाई है तो निश्चित रूप से ये बहुत ही सराहनीय कदम है . और ऐसा जन परता है कि लेखक महाशय को आप जैसे लोगों ने ही मजबूर किया है ऐसा कुछ लिखने क़े लिए . क्यूंकि कोई व् व्यक्ति जिससे किसी कि रोज़ी रोटी चलती है वो इतनी आसानी से उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाता .
इसलिए लेकह्क महोदय से नम्र निवेदन है कि अपनी एस आवाज को ऐसे ही अपनी कलम की ताकत से और बुलंद करते रहे .नाम बदलने से कुछ नहीं होता , बल्कि उश बदले हुए नाम क़े साथ भी फिर से इस भीर में खाश कर राजेश जी जैसे लोगों क़े बीच अपनी पहचान अपनी वही गरिमा बना लेना (जैसा की आप कर रहे हैं ) बहुत बड़ी बात होती है ..हम सब आपके साथ हैं ..बहुत खूब महाशय ..आप निश्चित रूप से बहुत बड़े धन्यवाद क़े पात्र हैं .

बेशर्मी तेरा ही आसरा है
हरिओम गर्ग 2011-06-16 02:08:43

भाई पंकज जी, हालांकि आपका यह लेख दिसंबर 2010 में लिखा हुआ है .पर मेरी नज़र में आज ही आया . आज की तारीख में अन्य किसी भी काम से ज्यादा आसान और फायदेमंद काम पत्रकारिता हो गया है .साथ ही लोगों को यह सम्मानजनक भी दिखाई देता है .पर इस सुविधा को लोगों ने बदनाम कर डाला है .पिछले तीस सालों से ज्यादा समय से इस क्षेत्र में हूँ 26साल तक तो अकेले "पंजाब केसरी"से जुड़ारहा हूँ . पर देख रहाहूं क़ि इस का जो पतन पिछले 5 -7 सालों में हुआ उसे देखकर तो अब अपनेआपको पत्रकार कहने में भी शर्म होने लगी है .
आज तो आठवीं पास भी पत्रकार बनकर चोथवसूली करते हुए बहुत से देखे जासकते हैं .किसी अखबार का रिपोर्टर बनने क़े लिए मेनेजमेंट को मंत्री तक से सिफारिश करवाकर पत्रकार बननेवाले को पिछले कुछ सालों दलाली क़े ज़रिये लाखों कमाते हमने देखा है .अब पत्रकारिता में नैतिकता ,आदर्श ,ईमानदारी, सच्चाई, सुचरिता की बातें करने वालों को बेवकूफ मानाजाता है . p c में बगेर आमंत्रण क़े इसलिए पहुँचते हैं की भोजन और गिफ्ट जो मिल जाते हैं .पत्रकारों क़े नाम पर ऐसे लोगों को पीठ पीछे तो लोग गालियाँ तक निकालते देखे जासकते हैं पर इनके लिए बेशर्मी ही सब कुछ है .बहरहाल .
अब मुझे तो नहीं लगता क़ि पत्रकारों क़े लिए किसी तरह क़े मानक तय किये जासकते हैं ,यह काजल की वो कोठरी हो चुकी है जिससे बचकर खुद को निकाल सकने वाला कोई "बिरला "ही होगा .
हरिओम गर्ग
बीकानेर .

आभार्.
पंकज झा 2011-06-16 10:28:49

बहुत आभारी हूं गर्ग साहब उत्साह बढाने के लिए...सादर/पंकज झा.

vah bhai vah
sudhir awasthi 2011-07-03 08:24:00

sir aapkee dhardar lekhni aur ptrkarita ke chhetr men vyapk soch meel ka ptthr hai. sudhir awasthi

gazab lekh hai janab
faisal khan 2011-07-03 19:03:18

pankaj ji is lekh ke liye apko bahut-bahut badhayi apne is lekh mai shabdon ka chunao bhi kamal ka kiya hai .pankaj ji ab patrkar ban ne ke liye kisi bhi yogyeta ki zaroorat nahi hai zaroorat hai sirf jaib mai paisa hone ki anti dheeli hote hi channel ki ID letter card hath mai aur patrkar tayyar uske baad mai lootna shru jisme channel ka hissa zaroor rakhna chahiye warna shikayat ka ambvar.ab to log patrkar ko aik dalal samajhte hain aur jo kafi had tak sahi bhi hai jo jitna bada patrkar(tatakathith)uske utne hi bade rate hai.magar koi kehne sun ne wala to hai nahi afsaron ne bhi ab aise patrkaron ko bhao dena band kar diya hai ghar mai bethkar khush hote hain ki ham bade patrkar hain magar asal mai dutkar ke hi qabil hain..faisal khan (saharanpur)9412230786

आभार.
पंकज झा. 2011-07-04 16:10:21

फैसल खान साहब और सुधीर अवस्थी साहब...बहुत ही आभारी हूं उत्साह बढाने के लिए. सादर/पंकज.

naarad vaani
naarad muni 2011-07-08 11:26:01

india ka ek state hai mp
mp ka sambhag hai CHAMBAL jo daakuon ke liye jana jaata raha hai.
isi mp ka ek shahar hai SHEOPUR
jahan patrakarita ke naam par giroh pal rahe hain.
logon ko dara-dara kar chhal rahe hain.
zyadatar bhoo-maafiya hain, jinke tamaam saare dhandhe hain.
prashasan par pakad hai, akhbaar ki akad hai.
pollice se yaari hai, gundon se naatedaari hai.
yeh safedposh kameene apni press tak ko dhoka de rahe hain,
chor-uchakkon ko aage badhne ka moka de rahe hain.
kuchh ke baap diwaliya bankar daulat chhod gaye haim.
kuchh auron ka diwala nikalne par tule hain.
hay bhagwan............kya hoga shareefon aur sahookaaron ka.....?

naarad muni 2011-07-08 11:29:48

india ka ek state hai mp
mp ka sambhag hai CHAMBAL jo daakuon ke liye jana jaata raha hai.
isi mp ka ek shahar hai SHEOPUR
jahan patrakarita ke naam par giroh pal rahe hain.
logon ko dara-dara kar chhal rahe hain.
zyadatar bhoo-maafiya hain, jinke tamaam saare dhandhe hain.
prashasan par pakad hai, akhbaar ki akad hai.
pollice se yaari hai, gundon se naatedaari hai.
yeh safedposh kameene apni press tak ko dhoka de rahe hain,
chor-uchakkon ko aage badhne ka moka de rahe hain.
kuchh ke baap diwaliya bankar daulat chhod gaye haim.
kuchh auron ka diwala nikalne par tule hain.
hay bhagwan............kya hoga shareefon aur sahookaaron ka.....?

dineshsingh 2011-07-11 15:33:42

:D
bilkul sahi hai ki press perorter banne ke liye kam se kam graduate hona chahiye

bihar main aatankwadi govt. acridation le sakte ha
Akhilesh 2013-01-05 23:50:26

koi bhi aantakwadi bihar main suchna jan sampark bibhag per das-bis hazar kharch matra kar ke sarkari manyata prapt patrakar ban sakta hai- details aap dekh sakte hain dmission.org main. grih mantrayalay bihar aur kendra sarkar ko bhi suchna de di gayi hai. local builder, criminals, dalal(anparh) hotal wale, driver, naukar bhi yaha sarkari acridated journalist hai. pl. comment after logon dmission.org
-akhilesh, editor, Democratic Mission. Patna-m.9835199430

nari ki vartman awastha kya ye bhi nahi hai
Akhilesh 2013-01-05 23:58:22

eSa ukjh gwW] ftls balku dks cukus okyk Hkxoku Hkh vktrd le> ugha ik;k gSA eSa vcyk ds uke ij lcyk gwWA esjs ekjs ikuh Hkh ugha ekaxrsA
nqfua;k esa fliQZ rhu \'kfDr;ka ekauh x;h gSa vkSj rhuksa ukjh ds :i esa gh izfrfcfEcr dh x;h gSa nqxkZ] ljLorh vkSj y{ehA eSa bl fo\'o dh tuuh gwW vkSj eSauas fouk\'k Hkh de ugha fd;s gSaA Hkkjr o\"kZ ds bfrgkl esa jkek;.k vkSj egkHkkjr Hkh ge efgykvksa us gh djk;sA yk[kksa ejn ekjs tkrs jgs gSaA gekjh pkgr ls ;g fo\'o pyrk gSA >kalh dh jkuh Hkh ge gh gSsaA ge ikesyk cksMZl Hkh gaS] bafnjk xka/h Hkh gaS vkSj ekjxzsV Fkspj Hkh gSaA fo\'o esa tks Hkh enZ gS os gekjh eqV~Bh esa gSa esjh bPNk ls gh lapkfyr gSaA
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ge vius [ksy esa fdrus balkuksa dks vkRegR;k;sa djkbZ vkSj fdruksa dks IkQkalh ij p


jha sahab thanks
shaielsh kuamr 2013-02-15 21:11:19

aap nai jo kaha ek dam sahi kaha es tarah kai channel ko band kar dena chahiye ,kuch channel wale hi patrkarita ko ek dam badnam kar diya hai ,sachchiyi ko samne lane kai bajay use chipate hai ,aur yeh channel wale bhi blackmaler ko hi apne pas rakhte hai .is tarah to patrkarita badnam ho jayega ,

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