सोमवार, 10 जून 2013

संवादसेतु / मीडिया का आत्मावलोकन…

पूंजीपतियों के चरणों में अर्पित पत्रकारिता- माखनलाल चतुर्वेदी


वर्तमान समय में पत्रकारिता के कर्तव्य, दायित्व और उसकी भूमिका को लोग संदेह से परे नहीं मान रहे हैं। इस संदेह को वैश्विक पत्रकारिता जगत में न्यूज आफ द वर्ल्ड और राष्ट्रीय स्तर पर राडिया प्रकरण ने बल प्रदान किया है। पत्रकारिता जगत में यह घटनाएं उन आशंकाओं का प्रादुर्भाव हैं जो पत्रकारिता के पुरोधाओं ने बहुत पहले ही जताई थीं। पत्रकारिता में पूंजीपतियों के बढ़ते प्रभाव के बारे में पत्रकारिता के महान आदर्श माखनलाल चतुर्वेदी ने कहा था-
दुख है कि सारे प्रगतिवाद, क्रांतिवाद के न जाने किन-किन वादों के रहते हुए हमने अपनी इस महान कला को पूंजीपतियों के चरणों में अर्पित कर दिया है। (पत्रकारिता: इतिहास और प्रश्न – कृष्ण बिहारी मिश्र)
भारत की पत्रकारिता की कल्पना हिंदी से अलग हटकर नहीं की जा सकती है, परंतु हिंदी पत्रकारिता जगत में भी अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। भाषा के मानकीकरण की दृष्टि से यह उचित नहीं कहा जा सकता। माखनलाल चतुर्वेदी भाषा के इस संक्रमण से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने कहा कि-
राष्ट्रभाषा हिंदी और तरूणाई से भरी हुई कलमों का सम्मान ही मेरा सम्मान है।‘(राजकीय सम्मान के अवसर पर)
राष्ट्रभाषा हिंदी के विषय में माखनलाल जी ने कहा था-
जो लोग देश में एक राष्ट्रभाषा चाहते हैं, वे प्रांतों की भाषाओं का नाश नहीं चाहते। केवल विचार समझने और समझाने के लिए राष्ट्रभाषा का अध्ययन होगा, बाकि सब काम मातृभाषाओं में होंगे। ऐसे दुरात्माओं की देश को जरूरत नहीं, जो मातृभाषाओं को छोड़ दें। (पत्रकारिता के युग निर्माता- माखनलाल चतुर्वेदी, शिवकुमार अवस्थी)
पत्रकारिता पर सरकारी नियंत्रण एक ऐसा मुद्दा है, जो हमेशा जीवंत रहा है। सरकारी नियंत्रण के बारे में भी माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने विचारों को स्पष्ट करते हुए अपने जीवनी लेखक से कहा था-
जिला मजिस्ट्रेट मिओ मिथाइस से मिलने पर जब मुझसे पूछा गया कि एक अंग्रेजी वीकली के होते हुए भी मैं एक हिंदी साप्ताहिक क्यों निकालना चाहता हूं तब मैंने उनसे निवेदन किया कि आपका अंग्रेजी साप्ताहिक तो दब्बू है। मैं वैसा समाचार पत्र नहीं निकालना चाहता हूं। मैं एक ऐसा पत्र निकालना चाहूंगा कि ब्रिटिश शासन चलता-चलता रूक जाए। (पत्रकारिताः इतिहास और प्रश्न – कृष्ण बिहारी मिश्र)
माखनलाल चतुर्वेदी ने पत्रकारिता के ऊंचे मानदंड स्थापित किए थे। उनकी पत्रकारिता में राष्ट्र विरोधी किसी भी बात को स्थान नहीं दिया जाता था। यहां तक कि माखनलाल जी महात्मा गांधी के उन वक्तव्यों को भी स्थान नहीं देते थे जो क्रांतिकारी गतिविधियों के विरूद्ध होते थे। सरकारी दबाव में कार्य करने वाली पत्रकारिता के विषय में उन्होंने अपनी नाराजगी इन शब्दों में व्यक्त की थी-
मैंने तो जर्नलिज्म में साहित्य को स्थान दिया था। बुद्धि के ऐरावत पर म्यूनिसिपल का कूड़ा ढोने का जो अभ्यास किया जा रहा है अथवा ऐसे प्रयोग से जो सफलता प्राप्त की जा रही है उसे मैं पत्रकारिता नहीं मानता।‘‘ (पत्रकारिताः इतिहास और प्रश्न- कृष्ण बिहारी मिश्र)

वर्तमान समय में हिंदी समाचारपत्रों को पत्र का मूल्य कम रखने के लिए और अपनी आय प्राप्त करने के लिए विज्ञापनों पर निर्भर रहना पड़ता है, क्योंकि पाठक न्यूनतम मूल्य में ही पत्र को लेना चाहते हैं। हिंदी पाठकों की इस प्रवृत्ति से क्षुब्ध होकर माखनलाल जी ने कहा-
मुफ्त में पढ़ने की पद्धति हिंदी से अधिक किसी भाषा में नहीं। रोटी, कपड़ा, शराब का मूल्य तो वह देता है पर ज्ञान और ज्ञान प्रसाधन का मूल्य चुकाने को वह तैयार नहीं। हिंदी का सबसे बड़ा शत्रु यही है। (पत्रकारिता के युग निर्माता- माखनलाल चतुर्वेदी, शिवकुमार अवस्थी)
माखनलाल चतुर्वेदी पत्र-पत्रिकाओं की बढ़ती संख्या और गिरते स्तर से भी चिंतित थे। पत्र-पत्रिकाओं के गिरते स्तर के लिए उन्होंने पत्रों की कोई नीति और आदर्श न होने को कारण बताया। उन्होंने लिखा था-
हिंदी भाषा का मासिक साहित्य एक बेढंगे और गए बीते जमाने की चाल चल रहा है। यहां बरसाती कीड़ों की तरह पत्र पैदा होते हैं। फिर यह आश्चर्य नहीं कि वे शीघ्र ही क्यों मर जाते हैं। यूरोप में हर एक पत्र अपनी एक निश्चित नीति रखता है। हिंदी वालों को इस मार्ग में नीति की गंध नहीं लगी। यहां वाले जी में आते ही, हमारे समान चार पन्ने निकाल बैठने वाले हुआ करते हैं। उनका न कोई आदर्श और उद्देश्य होता है, न दायित्व। (इतिहास- निर्माता पत्रकार, डा. अर्जुन तिवारी)
पत्रकारिता को किसी भी राष्ट्र या समाज का आईना माना गया है, जो उसकी समसामयिक परिस्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण करता है। पत्रकारिता की उपादेयता और महत्ता के बारे में माखनलाल चतुर्वेदी जी ने कर्मवीर के संपादकीय में लिखा था-
किसी भी देश या समाज की दषा का वर्तमान इतिहास जानना हो तो वहां के किसी सामयिक पत्र को उठाकर पढ़ लीजिए, वह आपसे स्पष्ट कर देगा। राष्ट्र के संगठन में पत्र जो कार्य करते हैं वह अन्य किसी उपकरण से होना कठिन है। (माखनलाल चतुर्वेदी, ऋषि जैमिनी बरूआ)
किसी भी समाचार पत्र की सफलता उसके संपादक और उसके सहयोगियों पर निर्भर करती है, जिसमें पाठकों का सहयोग प्रतिक्रिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। समाचारपत्रों की घटती लोकप्रियता के लिए माखनलाल जी ने संपादकों और पाठकों को जिम्मेदार ठहराते हुए लिखा था-
इनके दोषी वे लोग ही नहीं हैं जो पत्र खरीदकर नहीं पढ़ते। अधिक अंशों में वे लोग भी हैं जो पत्र संपादित और प्रकाशित करते हैं। उनमें अपने लोकमत की आत्मा में पहुंचने का सामर्थ्य नहीं। वे अपनी परिस्थिति को इतनी गंदी और निकम्मी बनाए रखते हैं, जिससे उनके आदर करने वालों का समूह नहीं बढ़ता है।‘(पत्रकारिता के युग निर्माता- माखनलाल चतुर्वेदी, शिवकुमार अवस्थी)
भारतीय पत्रकारिता अपने प्रवर्तक काल से ही राष्ट्र और समाज चेतना के नैतिक उद्देश्य को लेकर ही यहां तक पहुंची है। वर्तमान समय में जब पत्रकार को पत्रकारिता के नैतिक कर्तव्यों से हटकर व्यावसायिक हितों के लिए कार्य करने में ही कैरियर दिखने लगा है। ऐसे समय में पत्रकारिता के प्रकाशपुंज माखनलाल चतुर्वेदी के आदर्षों से प्रेरणा ले अपने कर्तव्य पथ पर बढ़ने की आवश्यकता है।
सूर्यप्रकाश

प्रेस पर अंकुश की मानसिकता


जनमत निर्माण एवं समाज को दिशा-निर्देश देने का महत्वपूर्ण दायित्व प्रेस पर है। जहां तक क्रांतिकारी आंदोलन का सम्बन्ध है भारत का क्रांतिकारी आंदोलन बन्दूक और बम के साथ नहीं समाचार पत्रों से शुरू हुआ, उक्त बातें जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी ने युगान्तर में कही है, किन्तु जनचेतना की शुरूआत करने वाले इस चतुर्थ स्तम्भ की स्वतंत्रता पर आजादी के पूर्व से ही अंकुश लगाए जाते रहें हैं।
29 जनवरी 1780 को जेम्स अगस्टस हिक्की द्वारा प्रारम्भ किए गए साप्ताहिक कलकत्ता जनरल एडवरटाईजर एवं हिक्की गजट से भारत में पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत मानी जाती है। इसका आदर्श वाक्य था- सभी के लिए खुला फिर भी किसी से प्रभावित नहीं। हेस्टिंग्स की शासन शैली की कटु आलोचना का पुरस्कार हिक्की को जेल यातना के रूप में मिला।
सत्ता के दमन के विरूद्ध संघर्ष के कारण गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने हिक्की के पत्र प्रकाशन के अधिकार को समाप्त कर दिया। इस समाचार पत्र का संपादन मात्र दो वर्षों (1780–82 तक ही रहा। कालान्तर में भारतीय पत्रकारिता ने इसी साहसपूर्ण मार्ग का अनुसरण करते हुए सत्य एवं न्याय के पक्ष में संघर्ष का बिगुल बजाया। ऐसे में सत्ता से टकराव स्वाभाविक ही था। पराधीन भारत के इतिहास के अनेक पृष्ठ अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के प्रति समाचार पत्रों की आस्था के उदाहरणों से भरे पड़े हैं। अंग्रेजी सरकार राष्ट्रीय और सामाजिक हितों एवं दायित्वों की आड़ में अपने स्वार्थों के पोषण के लिए प्रेस पर किसी न किसी प्रकार का नियंत्रण बनाये रखना चाहती थी।
लार्ड वेलजली द्वारा सेंसर आदेश, 1799 में) लागू कर दिया गया। समाचार पत्रों के अंत में मुद्रक का नाम व पता प्रकाशित करना अनिवार्य कर दिया गया। संपादक व संचालन के नाम, पते की सूचना सरकार के सचिव को देनी भी अनिवार्य कर दी गई। किसी भी समाचार के प्रकाशन से पूर्व सचिव द्वारा जांच के आदेश के प्रावधान बनाए गए। रविवार को समाचार पत्र के प्रकाशन पर पाबंदी लगा दी गई। इस सेंसरशिप को लार्ड हेस्टिंग्स ने सन् 1813 में समाप्त कर दिया।
सन् 1823 में एडम गवर्नर जनरल ने एडम अधिनियम जारी किया जिसमें प्रेस के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया गया। सर चाल्र्स मेट्काफ प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति उदार थे। उनके द्वारा सन् 1835 में मेट्काफ एक्ट पारित किया गया। इसके साथ-साथ सन् 1823 के एडम एक्ट में भी परिवर्तन किया गया। भारतीय पत्रकारिता को एक बार फिर प्रभावित करने के लिए अंग्रेजी शासन व्यवस्था द्वारा सन् 1857 में गैगिंग एक्ट लागू किया गया और सन् 1823 के एडम एक्ट का प्रत्यारोपण किया गया और पुनः लाइसेंस लेने का अधिनियम लागू कर दिया गया। 1864 में वायसराय लार्ड डफरिंग के कार्यकाल में शासकीय गोपनीयता कानून था, जिसका उद्देश्य उन समाचार पत्रों के खिलाफ कार्यवाही करना था जो गुप्त सरकारी दस्तावेज प्रकाशित करते थे।
सन् 1835 के मेट्काफ एक्ट से मुक्ति दिलाने के लिए लार्ड लारेंस ने सन् 1867 में समाचार पत्र अधिनियम लागू किया। इस अधिनियम के अनुसार प्रेस के मालिकों को मजिस्ट्रेट के सम्मुख घोषणा पत्र देना आवश्यक था। सन् 1867 का अधिनियम कुछ संषोधनों के साथ आज भी चला आ रहा है। इसका उद्देष्य छापेखानों को नियंत्रित करना है।
भारतीय समाचारपत्रों को कुचलने के लिए सन् 1878 में वर्नाक्यूलर एक्ट लगाया गया। इस कानून के तहत सरकार ने बिना न्यायालय के आदेश के भारतीय भाषाओं के प्रेस के मुद्रकों और प्रकाशकों को जमानत जमा करने तथा प्रतिज्ञा पत्र देने के आदेश दिए, ताकि वह ऐसी बातों का प्रकाशन नहीं करेंगे जिससे सरकार के प्रति घृणा उत्पन्न हो या समाज में वैमनस्य फैले। इसके साथ ही अवांछनीय सामग्री को जब्त करने के आदेश भी दिए गए। इस कानून की भारतीयों ने कड़ी निन्दा की। आंग्ल समाचार पत्रों को इस अधिनियम से मुक्त रखा गया जिससे भारतीयों में रोष और बढ़ गया। सन् 1878 के वर्नाक्यूलर एक्टको 1881 में समाप्त किया गया।
ब्रिटिश सरकार ने सन् 1910 में भारतीय प्रेस अधिनियम लगाया और भारतीय पत्रकारिता पर अपना अंकुश और भी सख्त कर दिया। इस अधिनियम के अंतर्गत मुद्रकों को 7 हजार से लेकर 10 हजार रूपए तक जमानत देने को कहा गया। किसी भी आपत्तिजनक खबर के छपने पर धनराशि जब्त करने का अधिकार मजिस्ट्रेट को दिया गया। यह कानून 12 वर्षों तक प्रभाव में रहा और सन् 1922 में इसे रद्द कर दिया गया।
सन् 1930 में वायसराय इरविन ने देषव्यापी आंदोलन को देखते हुए प्रेस एंड अनआथराइज्ड न्यूज पेपर्सअध्यादेश को मई-जून से लागू कर दिया । इस अध्यादेश द्वारा सन् 1910 की सम्पूर्ण पाबंदियों को पुनः लागू कर जमानत की राशि 500 रूपए से और अधिक बढ़ा दिया गया। इसके अतिरिक्त सरकार ने हैंडबिल व पर्चों पर भी प्रतिबंध लगा दिया।
सन् 1931 में जब पूरा देश एवं राजनेता गोलमेज सम्मेलन में व्यस्त थे तो ब्रिटिश सरकार ने ऐसे समय का पूरा लाभ उठाते हुए प्रेस बिल 1931, के अध्यादेश को कानून के रूप में पारित करा लिया। इसके अंतर्गत सरकार ने समाचारपत्रों के शीर्षक, संपादकीय टिप्पणियों को बदलने का अधिकार भी अपने पास सुरक्षित रख लिया। इसके पश्चात सन् 1935 में भारतीय प्रशासन कांग्रेस के हाथ में आ गया और फलतः समाचार पत्रों को स्वतंत्रता प्राप्त हुई।
सन् 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ होते ही कांग्रेस सरकार को पदत्याग करना पड़ा और पत्रों की स्वतंत्रता पुनः नष्ट हो गई, जो सन् 1947 तक चली। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सन् 1950 में नया कानून बना जिसके द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता को पुनः स्थापित किया गया।
सरकार की छत्रछाया में विकसित होती भारतीय प्रेस की गति को अवरूद्ध करने के प्रयास भी लगभग दो शताब्दी पूर्व प्रारम्भ हो गये थे जो सन् 1947 तक किसी न किसी प्रकार जारी रहे। इन बाधाओं के बावजूद भारतीय प्रेस ने संघर्ष का मार्ग नहीं छोड़ा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देश में सन् 1867 में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया प्रेस कानून ही कार्य पद्धति में लागू था, जिसमें सर्वप्रथम बड़ा संशोधन सन् 1955 में पहले प्रेस आयोग की सिफारिशों के आधार पर किया गया। इसके साल भर बाद सन् 1956 में रजिस्ट्रार आफ न्यूज पेपर्स आफ इंडिया (आरएनआई) के कार्यालय ने काम शुरू किया। इसके पश्चात आजाद भारत में स्वतंत्र पत्रकारिता पर दमन का आरम्भ आपातकाल 1974-75 से शुरू हुआ।
चर्चित पत्रकार और मानवाधिकार विशेषज्ञ कुलदीप नैयर ने कहा है कि-
इमरजेंसी भारतीय इतिहास का एक दुखद काल था, जब हमारी आजादी लगभग छिन सी गई थी और आपातकाल आज भी अनौपचारिक रूप से देश में अलग-अलग रूपों में मौजूद है, क्योंकि शासक वर्ग, नौकरशाही, पुलिस और अन्य वर्गों के पूर्ण सहयोग से अधिनायकवादी और लोकतंत्र विरोधी गतिविधियों में लिप्त है।
आपातकाल के समय भारतीय पत्रकारिता जगत में इलेक्ट्रानिक मीडिया के नाम पर केवल सरकारी रेडियो और सरकारी चैनल अर्थात दूरदर्शन मात्र था, जिनसे वैसे भी तात्कालिक सरकार को कोई खतरा नहीं था, लेकिन देश भर के अखबारों पर लगी सेंसरशिप ने तो जैसे आम जनता की आवाज का गला ही घोंट दिया था। तात्कालिक समय में अखबारों में जो कुछ भी छपना होता था, वो संपादक की कलम से नहीं बल्कि सेंसर की कैंची से कांट-छाट करके छपती थी।
आपातकाल के समय अखबार मालिक अपने दफ्तरों में जाकर खबरों को उलटते पलटते थे और उन्हें जिन खबरों में सरकार की आलोचना व खिलाफत का अंदेशा होता, वे उस खबर को छपने से रोक देते थे। देश में लगभग 19 माह तक ऐसी स्थिति व्याप्त थी। जनता सरकार द्वारा सन् 1978 में द्वितीय प्रेस आयोग का गठन किया गया, इसके गठन का मुख्य उद्देश्य आपातकाल के परिप्रेक्ष्य में प्रेस की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना था। मोरारजी देसाई काल में गठित इस आयोग ने अपनी रिर्पोट सन् 1982 में तैयार की, लेकिन इस चार वर्ष की अवधि में देश का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह से बदल चुका था। यहां हमें यह याद रखने की आवश्यक्ता है कि प्रथम आयोग और द्वितीय आयोग के गठन के बीच 26 वर्ष का अंतराल था। इस अंतराल के बाद भारतीय प्रेस में कई परिवर्तन आ चुके थे। इसी क्रम में वर्तमान पत्रकारिता के स्तर में सुधार हेतु तृतीय प्रेस आयोग के गठन का प्रस्ताव रखा गया है।
इन सब प्रतिबंधों के बाद भी वर्तमान समय में चतुर्श स्तंभ की भूमिका नीचे दी गई पंक्तियों से स्पष्ट है-
जमीं बेच देंगे, गगन बेच देंगे
चमन बेच देंगे, सुमन बेच देंगे
कलम के सिपाही अगर सो गए तो,
वतन के मसीहा वतन बेच देंगे।।

अमल कुमार श्रीवास्तव, अगस्त अंक, २०११

वेब मीडिया का बढ़ता क्षितिज


वर्तमान दौर संचार क्रांति का दौर है। संचार क्रांति की इस प्रक्रिया में जनसंचार माध्यमों के भी आयाम बदले हैं। आज की वैश्विक अवधारणा के अंतर्गत सूचना एक हथियार के रूप में परिवर्तित हो गई है। सूचना जगत गतिमान हो गया है, जिसका व्यापक प्रभाव जनसंचार माध्यमों पर पड़ा है। पारंपरिक संचार माध्यमों समाचार पत्र, रेडियो और टेलीविजन की जगह वेब मीडिया ने ले ली है।
वेब पत्रकारिता आज समाचार पत्र-पत्रिका का एक बेहतर विकल्प बन चुका है। न्यू मीडिया, आनलाइन मीडिया, साइबर जर्नलिज्म और वेब जर्नलिज्म जैसे कई नामों से वेब पत्रकारिता को जाना जाता है। वेब पत्रकारिता प्रिंट और ब्राडकास्टिंग मीडिया का मिला-जुला रूप है। यह टेक्स्ट, पिक्चर्स, आडियो और वीडियो के जरिये स्क्रीन पर हमारे सामने है। माउस के सिर्फ एक क्लिक से किसी भी खबर या सूचना को पढ़ा जा सकता है। यह सुविधा 24 घंटे और सातों दिन उपलब्ध होती है जिसके लिए किसी प्रकार का मूल्य नहीं चुकाना पड़ता।
वेब पत्रकारिता का एक स्पष्ट उदाहरण बनकर उभरा है विकीलीक्स। विकीलीक्स ने खोजी पत्रकारिता के क्षेत्र में वेब पत्रकारिता का जमकर उपयोग किया है। खोजी पत्रकारिता अब तक राष्ट्रीय स्तर पर होती थी लेकिन विकीलीक्स ने इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयोग किया व अपनी रिपोर्टों से खुलासे कर पूरी दुनिया में हलचल मचा दी। भारत में वेब पत्रकारिता को लगभग एक दशक बीत चुका है। हाल ही में आए ताजा आंकड़ों के अनुसार इंटरनेट के उपयोग के मामले में भारत तीसरे पायदान पर आ चुका है। आधुनिक तकनीक के जरिये इंटरनेट की पहुंच घर-घर तक हो गई है। युवाओं में इसका प्रभाव अधिक दिखाई देता है। परिवार के साथ बैठकर हिंदी खबरिया चैनलों को देखने की बजाए अब युवा इंटरनेट पर वेब पोर्टल से सूचना या आनलाइन समाचार देखना पसंद करते हैं। समाचार चैनलों पर किसी सूचना या खबर के निकल जाने पर उसके दोबारा आने की कोई गारंटी नहीं होती, लेकिन वहीं वेब पत्रकारिता के आने से ऐसी कोई समस्या नहीं रह गई है। जब चाहे किसी भी समाचार चैनल की वेबसाइट या वेब पत्रिका खोलकर पढ़ा जा सकता है।
लगभग सभी बड़े-छोटे समाचार पत्रों ने अपने ई-पेपर‘यानी इंटरनेट संस्करण निकाले हुए हैं। भारत में 1995 में सबसे पहले चेन्नई से प्रकाशित होने वाले ‘हिंदू‘ ने अपना ई-संस्करण निकाला। 1998 तक आते-आते लगभग 48 समाचार पत्रों ने भी अपने ई-संस्करण निकाले। आज वेब पत्रकारिता ने पाठकों के सामने ढेरों विकल्प रख दिए हैं। वर्तमान समय में राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों में जागरण, हिन्दुस्तान, भास्कर, डेली एक्सप्रेस, इकोनामिक टाइम्स और टाइम्स आफ इंडिया जैसे सभी पत्रों के ई-संस्करण मौजूद हैं।
भारत में समाचार सेवा देने के लिए गूगल न्यूज, याहू, एमएसएन, एनडीटीवी, बीबीसी हिंदी, जागरण, भड़ास फार मीडिया, ब्लाग प्रहरी, मीडिया मंच, प्रवक्ता, और प्रभासाक्षी प्रमुख वेबसाइट हैं जो अपनी समाचार सेवा देते हैं।
वेब पत्रकारिता का बढ़ता विस्तार देख यह समझना सहज ही होगा कि इससे कितने लोगों को रोजगार मिल रहा है। मीडिया के विस्तार ने वेब डेवलपरों एवं वेब पत्रकारों की मांग को बढ़ा दिया है। वेब पत्रकारिता किसी अखबार को प्रकाशित करने और किसी चैनल को प्रसारित करने से अधिक सस्ता माध्यम है। चैनल अपनी वेबसाइट बनाकर उन पर बे्रकिंग न्यूज, स्टोरी, आर्टिकल, रिपोर्ट, वीडियो या साक्षात्कार को अपलोड और अपडेट करते रहते हैं। आज सभी प्रमुख चैनलों (आईबीएन, स्टार, आजतक आदि) और अखबारों ने अपनी वेबसाइट बनाई हुईं हैं। इनके लिए पत्रकारों की नियुक्ति भी अलग से की जाती है। सूचनाओं का डाकघर‘कही जाने वाली संवाद समितियां जैसे पीटीआई, यूएनआई, एएफपी और रायटर आदि अपने समाचार तथा अन्य सभी सेवाएं आनलाइन देती हैं।
कम्प्यूटर या लैपटाप के अलावा एक और ऐसा साधन मोबाइल फोन जुड़ा है जो इस सेवा को विस्तार देने के साथ उभर रहा है। फोन पर ब्राडबैंड सेवा ने आमजन को वेब पत्रकारिता से जोड़ा है। पिछले दिनों मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट की ताजा तस्वीरें और वीडियो बनाकर आम लोगों ने वेब जगत के साथ साझा की। हाल ही में दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने गांवों में पंचायतों को ब्राडबैंड सुविधा मुहैया कराने का प्रस्ताव रखा है। इससे पता चलता है कि भविष्य में यह सुविधाएं गांव-गांव तक पहुंचेंगी।
वेब पत्रकारिता ने जहां एक ओर मीडिया को एक नया क्षितिज दिया है वहीं दूसरी ओर यह मीडिया का पतन भी कर रहा है। इंटरनेट पर हिंदी में अब तक अधिक काम नहीं किया गया है, वेब पत्रकारिता में भी अंग्रेजी ही हावी है। पर्याप्त सामग्री न होने के कारण हिंदी के पत्रकार अंग्रेजी वेबसाइटों से ही खबर लेकर अनुवाद कर अपना काम चलाते हैं। वे घटनास्थल तक भी नहीं जाकर देखना चाहते कि असली खबर है क्या\
यह कहा जा सकता है कि भारत में वेब पत्रकारिता ने एक नई मीडिया संस्कृति को जन्म दिया है। अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी पत्रकारिता को भी एक नई गति मिली है। युवाओं को नये रोजगार मिले हैं। अधिक से अधिक लोगों तक इंटरनेट की पहुंच हो जाने से यह स्पष्ट है कि वेब पत्रकारिता का भविष्य बेहतर है। आने वाले समय में यह पूर्णतः विकसित हो जाएगी।
वंदना शर्मा, अगस्त अंक, २०११

मिशन, प्रोफेशन और कामर्शियलाइजेशन…

एक समय आएगाजब हिंदी पत्र रोटरी पर छपेंगेसंपादकों को ऊंची तनख्वाहें मिलेंगीसब कुछ होगा किन्तु उनकी आत्मा मर जाएगीसम्पादकसम्पादक न होकर मालिक का नौकर होगा।
स्वतंत्रता आंदोलन को अपनी कलम के माध्यम से तेज करने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर जी ने यह बात कही थी। उस समय उन्होंने शायद पत्रकारिता के भविष्य को भांप लिया था। पत्रकारिता की शुरूआत मिशन से हुई थी जो आजादी के बाद धीरे-धीरे प्रोफेशन बन गया और अब इसमें कामर्शियलाइजेशन का दौर चल रहा है।
स्वतंत्रता आंदोलन को सफल करने में पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उस समय पत्रकारिता को मिशन के तौर पर लिया जाता था और पत्रकारिता के माध्यम से निःस्वार्थ भाव से सेवा की जाती थी। भारत में पत्रकारिता की नींव रखने वाले अंग्रेज ही थे। भारत में सबसे पहला समाचार पत्र जेम्स अगस्टस हिक्की ने वर्ष 1780 में बंगाल गजट निकाला। अंग्रेज होते हुए भी उन्होंने अपने पत्र के माध्यम से अंग्रेजी शासन की आलोचना की, जिससे परेशान गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने उन्हें प्रदत्त डाक सेवाएं बंद कर दी और उनके पत्र प्रकाशन के अधिकार समाप्त कर दिए। उन्हें जेल में डाल दिया गया और जुर्माना लगाया गया। जेल में रहकर भी उन्होंने अपने कलम की पैनी धार को कम नहीं किया और वहीं से लिखते रहे। हिक्की ने अपना उद्देश्य घोषित किया था-
“अपने मन और आत्मा की स्वतंत्रता के लिए अपने शरीर को बंधन में डालने में मुझे मजा आता है।”
हिक्की गजट द्वारा किए गए प्रयास के बाद भारत में कई समाचार पत्र आए जिनमें ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाजें उठने लगी थी। समाचार पत्रों की आवाज दबाने के लिए समय-समय पर प्रेस सेंसरशिप व अधिनियम लगाए गए लेकिन इसके बावजूद भी पत्रकारिता के उद्देश्य में कोई परिवर्तन नहीं आया। भारत में सर्वप्रथम वर्ष 1816 में गंगाधर भट्टाचार्य ने बंगाल गजट का प्रकाशन किया। इसके बाद कई दैनिक, साप्ताहिक व मासिक पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ हुआ जिन्होंने ब्रिटिश अत्याचारों की जमकर भत्र्सना की।
राजा राम मोहन राय ने पत्रकारिता द्वारा सामाजिक पुनर्जागरण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। ब्राह्मैनिकल मैगजीन के माध्यम से उन्होंने ईसाई मिशनरियों के साम्प्रदायिक षड्यंत्र का विरोध किया तो संवाद कौमुदी द्वारा उन्होंने महिलाओं की स्थिति में सुधार करने का प्रयास किया। मीरात-उल-अखबार के तेजस्वी होने के कारण इसे अंग्रेज शासकों की कुदृष्टि का शिकार होना पड़ा।
जेम्स बकिंघम ने वर्ष 1818 में कलकत्ता क्रोनिकल का संपादन करते हुए अंग्रेजी शासन की कड़ी आलोचना की, जिससे घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें देश निकाला दे दिया। इंग्लैंड जाकर भी उन्होंने आरियेंटल हेराल्ड पत्र में भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों को उजागर किया।
हिन्दी भाषा में प्रथम समाचार पत्र लाने का श्रेय पं. जुगल किशोर को जाता है। उन्होंने 1826 में उदन्त मार्तण्ड पत्र निकाला और अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों की आलोचना की। उन्हें अंग्रेजों ने प्रलोभन देने की भी कोशिश की लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया और आर्थिक समस्याओं से जूझते हुए भी पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रवाद की मशाल को और तीव्र किया।
1857 की विद्रोह की खबरें दबाने के लिए गैगिंग एक्ट लागू किया। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन के नेता अजीमुल्ला खां ने दिल्ली से पयामे आजादी निकाला जिसने ब्रिटिश कुशासन की जमकर आलोचना की। ब्रिटिश सरकार ने इस पत्र को बंद करने का भरसक प्रयास किया और इस अखबार की प्रति किसी के पास पाए जाने पर उसे कठोर यातनाएं दी जाती थी। इसके बाद इण्डियन घोष, द हिन्दू, पायनियर, अमृत बाजार पत्रिका, द ट्रिब्यून जैसे कई समाचार पत्र सामने आए।
लोकमान्य तिलक ने पत्रकारिता के माध्यम से उग्र राष्ट्रवाद की स्थापना की। उनके समाचार पत्र मराठा और केसरी, उग्र प्रवृत्ति का जीता जागता उदाहरण है। गांधीजी ने पत्रकारिता के माध्यम से पूरे समाज को एकजुट करने का कार्य किया और स्वाधीनता संग्राम की दिशा सुनिश्चित की। नवभारत, नवजीवन, हरिजन, हरिजन सेवक, हरिजन बंधु, यंग इंडिया, आदि समाचार पत्र गांधी जी के विचारों के संवाहक थे। गांधी जी राजनीति के अलावा अन्य विषयों पर भी लिखते थे। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों को भी उजागर कर इसे समाप्त करने पर बल दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर से प्रताप नामक पत्र निकाला जो अंग्रेजी सरकार का घोर विरोधी बन गया। अरविंद घोष ने वंदे मातरम, युगांतर, कर्मयोगी और धर्म आदि का सम्पादन किया। बाबू राव विष्णु पराड़कर ने वर्ष 1920 में आज का संपादन किया जिसका उद्देश्य आजादी प्राप्त करना था।
आजादी से पहले पत्रकारिता को मिशन माना जाता था और भारत के पत्रकारों ने अपनी कलम की ताकत आजादी प्राप्त करने में लगाई। आजादी मिलने के बाद समाचार पत्रों के स्वरूप में परिवर्तन आना स्वाभाविक था क्योंकि उनका आजादी का उद्देश्य पूरा हो चुका था। समाचार-पत्रों को आजादी मिलने और साक्षरता दर बढ़ने के कारण आजादी के बाद बड़ी संख्या में समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं का प्रकाशन होने लगा। साथ ही रेडिया एवं टेलीविजन के विकास के कारण मीडिया जगत में बड़ा बदलाव देखा गया। स्वतंत्रता से पहले जिस पत्रकारिता को मिशन माना जाता था अब धीरे-धीरे वह प्रोफेशन में बदल रही थी।
वर्ष 1947 से लेकर वर्ष 1975 तक पत्रकारिता जगत में विकासात्मक पत्रकारिता का दौर रहा। नए उद्योगों के खुलने और तकनीकी विकास के कारण उस समय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में भारत के विकास की खबरें प्रमुखता से छपती थी। समाचार-पत्रों में धीरे-धीरे विज्ञापनों की संख्या बढ़ रही थी व इसे रोजगार का साधन माना जाने लगा था।
वर्ष 1975 में एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर काले बादल छा गए, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर मीडिया पर सेंसरशिप ठोक दी। विपक्ष की ओर से भ्रष्टाचार, कमजोर आर्थिक नीति को लेकर उनके खिलाफ उठ रहे सवालों के कारण इंदिरा गांधी ने प्रेस से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली। लगभग 19 महीनों तक चले आपातकाल के दौरान भारतीय मीडिया शिथिल अवस्था में थी। उस समय दो समाचार पत्रों द इंडियन एक्सप्रेस और द स्टेट्समेन ने उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की तो उनकी वित्तीय सहायता रोक दी गई। इंदिरा गांधी ने भारतीय मीडिया की कमजोर नस को अच्छे से पहचान लिया था। उन्होंने मीडिया को अपने पक्ष में करने के लिए उनको दी जाने वाली वित्तीय सहायता में इजाफा कर दिया और प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी। उस समय कुछ पत्रकार सरकार की चाटुकारिता में स्वयं के मार्ग से भटक गए और कुछ चाहकर भी सरकार के विरूद्ध स्वतंत्र रूप से अपने विचारों को नहीं प्रकट कर सकें। कुछ पत्रकार ऐसे भी थे जो सत्य के मार्ग पर अडिग रहें। आपातकाल के दौरान समाचार पत्रों में सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां ही ज्यादा नजर आती थी। कुछ सम्पादकों ने सेंसरशिप के विरोध में सम्पादकीय खाली छोड़ दिया। लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी एक पुस्तक में कहा है-
“उन्होंने हमें झुकने के लिए कहा और हमने रेंगना शुरू कर दिया।”
1977 में जब चुनाव हुए तो मोरारजी देसाई की सरकार आई और उन्होंने प्रेस पर लगी सेंसरशिप को हटा दिया। इसके बाद समाचार पत्रों ने आपातकाल के दौरान छिपाई गई बातों को छापा। पत्रकारिता द्वारा आजादी के दौरान किया गया संघर्ष बहुत पीछे छूट चुका था और पत्रकारिता अब पेशे में तब्दील हो चुकी थी।भारत में एक और ऐसी घटना घटी जिसने पत्रकारिता के स्वरूप को एक बार फिर बदल दिया। वर्ष 1991 की उदारीकरण की नीति और वैश्वीकरण के कारण पत्रकारिता पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा और पत्रकारिता में धीरे-धीरे कामर्शियलाइजेशन का दौर आने लगा।
आम जनता को सत्य उजागर कर प्रभावित करने वाले मीडिया पर राजनीति व बाजार का प्रभाव पड़ना शुरू हो गया। पत्रकारों की कलम को बाजार ने प्रभावित कर खरीदना शुरू कर दिया। वर्तमान दौर कामर्शियलाइजेशन का ही दौर है, जिसमें मीडिया के लिए समाचारों से ज्यादा विज्ञापन का महत्व है। बाजार में उपलब्ध उत्पादों का प्रचार समाचार बनाकर किया जा रहा है। आज समाचार का पहला पृष्ठ भी बाजार खरीदने लगा है। वहीं पिछले कुछ दिनों में पत्रकारिता में भ्रष्टाचार के जो मामले सामने आए उसको देखकर पत्रकारिता का उद्देश्य धुंधला होता नजर आता है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में जिस तरह कुछ पत्रकारों की भूमिका सामने आई उसको देखकर अब आम जन का विश्वास भी मीडिया से हट रहा है।
आजादी से पहले पत्रकारों ने किसी भी प्रलोभनों में आए बिना निःस्वार्थ भाव से अपना कर्तव्य निभाया था। अंग्रेजों द्वारा प्रेस पर रोक लगाने के बाद भी उन्होंने अपनी कलम को नहीं रोका, लेकिन आज परिस्थितियां बदलती नजर आ रहीं हैं। पत्रकारिता आज सेवा से आगे बढ़कर व्यवसाय में परिवर्तित हो चुकी है। यहां पर एक बार फिर पराड़कर जी के वही शब्द याद आते हैं जिनमें उन्होंने पत्रकारिता के भविष्य को भांप लिया था-
“एक समय आएगा, जब हिंदी पत्र रोटरी पर छपेंगे, संपादकों को ऊंची तनख्वाहें मिलेंगी, सब कुछ होगा किन्तु उनकी आत्मा मर जाएगी, सम्पादक, सम्पादक न होकर मालिक का नौकर होगा।”
नेहा जैन, अगस्त अंक, २०११

धुंधले होते सपने, मीडिया संस्थान की देन

पत्रकार शब्द सुनते ही हाथ में कलम, पैरों में हवाई चप्पल व कंधे पर एक झोला टांगे हुए व्यक्ति दिखाई देता है, जो देश की समस्यों पर गहन विचार करता है, लेकिन वास्तविकता में वर्तमान समय में इसका परिदृश्य बदल रहा है। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र की ओर युवाओं का आकर्षण बढ़ा है जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह बदल रहा परिदृश्य ही है। पत्रकारिता के क्षेत्र में अधिकतर युवा मीडिया के ग्लैमर का हिस्सा बनने के सपने संजोए आते है। किंतु धीरे-धीरे उन्हें जब वास्तविकता से चित-परिचित होना पड़ता है तो उनके यह सपने धुंधले होते जाते है कि यहां अपना स्थान प्राप्त करना बड़ा सरल है।
इसका एक कारण जगह-जगह पर दुकानों की तरह खुलते मीडिया के शिक्षण संस्थान भी है। यह शिक्षण संस्थान व्यावहारिक ज्ञान की अपेक्षा किताबी ज्ञानों पर अधिक जोर देते हैं। जिसके कारण विद्यार्थी व्यावहारिक ज्ञान के अभाव में मीडिया जगत में स्वयं का स्थान बना पाने में अपने को असहज महसूस करता है।
विश्वविद्यालय तथा अनुदान प्राप्त कालेजों मे चल रहे पत्रकारिता कोर्सों में दी जा रही शिक्षा गुणवत्ता की कसौटी पर खरी नहीं उतर रही है। यहां पिछले डेढ़ दशक से वही घिसा-पिटा कोर्स पढ़ाया जा रहा है। इस तकनीकी युग में जब हर दिन एक नई तकनीक का विस्तार और आविष्कार हो रहा है तो वहां इस कोर्स की क्या अहमियत होगी! एक ओर जहां थ्रीडी, नए कैमरा सेटअप, न्यू मीडिया का प्रचलन बढ़ गया है, तो वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालयों का पाठ्यक्रम ज्यों का त्यों ही है।
इन कॉलेजों या संस्थानों में यह भी ध्यान नहीं दिया जाता कि वह इन छात्रों की प्राथमिक जरूरतें पूरी कर रहे हैं या नहीं। पत्रकारिता के क्षेत्र में अध्ययनरत विद्यार्थी को व्यवहारिक प्रशिक्षण के लिए प्रयोगशाला, उपकरणों व अच्छे पुस्तकालय की आवश्यकता होती है पर अधिकांश संस्थानों द्वारा इस समस्या की ओर ध्यान केन्द्रित नहीं किया जाता है। यह संस्थान मोटी फीस के बाद भी पुराने ढर्रे पर चलने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देते हैं।
विडम्बना यह है कि विश्वविद्यालय के इन छात्रों ने किसी कैमरे के लेंस से यह झांककर भी नहीं देखा कि इससे देखने पर बाहर की दुनिया कैसी दिखाई देती है़, पत्रकारिता में दाखिला लेने और अपने तीन साल कॉलेज में बिताने के बदले छात्रों को एक डिग्री दे दी जाती है। ये एक ऐसा सर्टिफिकेट होता है जो किसी छात्र को बेरोजगार पत्रकार बना देता है। कुछ डिग्रीधारकों को  चवन्नी पत्रकारिता करने का अवसर मिल जाता है तो उन्हें सफल होने में कई साल लग जाते हैं। इसका कारण यह है कि उसे जो पढ़ाई के समय पर सिखाया जाना चाहिए था. उसे वह धक्के खाने के बाद सीखने को मिलता है। इस कारण कुछ छात्रों में इतनी हताशा घर कर जाती है कि वे पत्रकारिता को प्रणाम कर किसी और व्यवसाय को चुन लेते हैं।
यह कॉलेज तथा संस्थान न केवल उदीयमान पत्रकारों के भविष्य के साथ धोखा और भटकाव की स्थिति उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी हैं, अपितु भविष्य की पत्रकारिता को प्रश्न चिन्हों की ओर धकेल रहे हैं। जल्द ही कुछ उपाय करने होंगे ताकि गुणवत्ता वाले पत्रकार उभर सकें। इसके लिए कम्प्यूटर की बेहतर शिक्षा, लैब और लाइब्रेरी की जरूरतों को पूरा करने के साथ ही देश और दुनिया की सही समझ विकसित करने का काम भी इन संस्थानों को करना होगा।
वंदना शर्मा, जुलाई अंक, २०११

सोशल नेटवर्किंग साइट्स का युवा पीढ़ी पर प्रभाव

जब से समाज की स्थापना हुई है तब से मनुष्य समाज में रहने वाले अन्य लोगों के साथ निरंतर संपर्क साधता रहता है। इसी संपर्क साधने की प्रक्रिया में विकास के चलते नई खोज हुई और सोशल नेटवर्किग साइट्स अस्तित्व में आई। इन साइट्स के जरिए लोग एक दूसरे से संपर्क स्थापित करते हैं। युवा पीढ़ी के लिए यह जानकारी प्राप्त करने, मनोरंजन तनाव से मुक्त रहने, नए लोगों से पहचान बनाने का साधन बन गया है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर वह अपनी बात अपने संपर्क के लोगों के साथ सांझा करते हैं।
अपने शुरूआती दौर में सोशल नेटवर्किंग साइट एक सामान्य सी दिखने वाली साइट होती थी और इसके जरिए उपयोगकर्ता एक-दूसरे से चैटरूम के जरिए बात करते थे और अपनी निजी जानकारी व विचार एक-दूसरे के साथ बांटते थे। इन साइट्स में द वेल, (1985, ‘द ग्लोब डाट काम, 1994, ट्राईपोड डाट काम (1995 शामिल थीं। 90 के दशक से इन साइट्स में बदलाव आया और इसमें फोटो, वीडियो, संगीत, शेयरिंग, आनलाइन गेम्स, विज्ञान, कला. ब्लागिंग, चैटिंग, आनलाइन डेटिंग जैसी तमाम सुविधाएं बढ़ीं। भारत में सबसे ज्यादा प्रयोग होने वाली वेबसाइट्स में फेसबुक, ट्विटर व आरकुट शामिल हैं। इसके अलावा हाय फाइव, बेबो, याहू 360, फ्रेंड ज़ोर्पिया आदि कई सोशल नेटवर्किंग साइट उपलब्ध हैं। फेसबुक फरवरी 2004 में लांच हुई थी जिसने बहुत कम समय में युवाओं के बीच पहुंच बनाकर प्रसिद्धि पाई । वहीं आरकुट वर्ष 2004 में बनाई गई थी जिस पर गूगल इंक का स्वामित्व है। ट्विटर वर्ष 2006 में जैक डर्सी द्वारा बनाई गई थी । इसके प्रयोगकर्ता अपने एकाउंट से कोई भी संदेश छोड़ते है जिसे ट्वीटर कहा जाता है।
पत्रकारिता के क्षेत्र में शोध कर रहीं शोधार्थी पंकज द्वारा सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर शोध किया जा रहा है और इस शोध का प्रयोजन यह जानना है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स निजी एवं सामाजिक समस्याओं पर निर्णय लेने में युवाओं को कैसे प्रभावित करती है\ क्या यह किसी मुद्दे पर युवाओं की सोच में परिवर्तन कर सकती है\ क्या सोशल नेटवर्किंग साइट आज सूचनाओं एवं मनोरंजन का एक तीव्र माध्यम बन गई है, क्या युवा पीढ़ी इन साइट्स की आदी हो चुकी है\
इसमें कोई शक नहीं है कि आज जीवनशैली को इंटरनेट ने बहुत प्रभावित किया है। सूचना एवं प्रौद्योगिकी की इस नई तकनीक ने विष्व की सीमाओं को तोड़ दिया है। मैकलुहन के शब्दों में पूरी दुनिया एक वैश्विक ग्राम में बदल चुकी है।
इंटरनेट ने आज विश्व के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ दिया है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए आज कोई भी व्यक्ति एक-दूसरे से कहीं से भी संपर्क साध सकता है। इसका प्रयोग करने वाले युवाओं की संख्या निरंतर बढ़ रही है। न्यू मीडिया के इस साधन पर यह शोध कार्य महत्वपूर्ण है।
शोधार्थी- पंकज, सीडिंग इंस्टीट्यूट फार मीडिया स्टडीज (जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी)

मीडिया की परिपक्वता पर सवाल

न्यूज ऑफ द वर्ल्ड साप्ताहिक समाचार पत्र के बंद होने से मीडिया जगत में हलचल मच गई है। आर्थिक रूप से संपन्न पत्र न्यूज ऑफ द वल्र्ड ब्रिटेन का लोकप्रिय समाचार पत्र था। राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों को उठाने के लिए प्रसिद्ध यह पत्र कालांतर में अपने मार्ग से भटककर लोगों के निजी जीवन में तांक-झांक करने और मनोरंजन सूचना के नाम पर सस्ती एवं सनसनीखेज सामग्री प्रस्तुत करने लगा था। भारतीय मीडिया की भूमिका पर भी जब-जब सवाल उठते हैं, तर्क दिया जाता है कि भारतीय पत्रकारिता अपनी शैशव अवस्था में है, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन की पत्रकारिता की परिपक्वता का उदाहरण देते हुए कहा जाता है कि भारतीय मीडिया समय के साथ उस स्तर तक पहुंच जाएगी। लेकिन यहां प्रश्न उठता है कि इस परिपक्वता का मतलब क्या है? अमेरिका और ब्रिटेन को आदर्श मानने से क्या भारत भी न्यूज ऑफ द वल्र्ड जैसी पत्रकारिता करेगा?  उस आदर्श तक पत्रकारिता उठकर पहुंचेगी या गिरकर?  इस पर पत्रकारों के विचार इस प्रकार से हैं-
न्यूज ऑफ द वर्ल्ड पत्र पर हुए विवाद और अब उसके बंद होने से वैश्विक स्तर पर मीडिया में नैतिकता और बाजारवाद को लेकर बहस शुरू हो गयी है। इस बहस ने एक बार फिर भारतीय मीडिया को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आज भारतीय मीडिया ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां वो नैतिकता और आदर्शों की बलि चढ़ाकर बाजारवाद के चंगुल में फंसा नजर आ रहा है। आज खबरें, खबरें नहीं बल्कि विज्ञापन नजर आ रहीं है और साथ ही साथ समाचारों के फुटपाथीकरण ने भारतीय मीडिया की साख को गहरा आघात पहुंचाया है। भारतीय मीडिया पर आए दिन सवाल खड़े हो रहे हैं, विश्वसनीयता भी कम हुई है। बाजारीकरण का मीडिया पर खासा प्रभाव देखने को मिल रहा है। खबरों और मीडिया के बिकने के आरोपों के साथ-साथ कई नए मामले भी सामने आ रहे हैं। ऐसे में भारत में पत्रकारिता को किसी तरह अपने बूढ़े कन्धों पर ढो रहे पत्रकारों के माथे पर बल जरूर दिखाई दे रहे हैं। उनको यही चिंता है कि ये बच्चा बड़ा कब होगा। भारत में प्रिंट मीडिया इलेक्ट्रानिक मीडिया के मुकाबले ज्यादा परिपक्व नजर आता है, लेकिन वो भी बाजार के हाथों मजबूर है। ऐसे में मैं उम्मीद करता हूं कि भारतीय मीडिया जल्द ही अपनी शैशव अवस्था से बाहर आएगा और अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाएगा।
हिमांशु डबराल, आज समाज
कुछ दशक पहले मीडिया एक मिशन के रूप में जानी जाती थी, लेकिन वर्तमान समय में मीडिया व्यावसायिक हो गई है। आज कुकुरमुत्तों की तरह अखबार और चैनल खुल रहें हैं. टीआरपी की अंधी दौड़ में मीडिया अपने मार्ग से भटकती हुई नजर आ रही है, जबकि दर्शकों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। मेरे विचारानुसार पत्रकारिता को व्यवसाय न मानकर मिशन के रूप में देखा जाए तो ज्यादा बेहतर होगा
आशीष प्रताप सिंह, पीटीसी न्यूज, दिल्ली
सार्थक पत्रकारिता वही है जो देश के हित को ध्यान रखे। तात्कालिक लाभ कमाने के लिए सनसनीखेज पत्रकारिता का दुरूपयोग उसका भविष्य अंधकार की ओर ले जाएगा। हमें भारतीय पत्रकारिता को ब्रिटेन के संदर्भ में देखने की जरूरत नहीं है। पत्रकारिता के मूल्य विदेशी न होकर हमारे अपने होने चाहिए। पत्रकारिता में पूंजी का प्रभुत्व कम और देश सेवा का अधिक होना चाहिए। आदर्श पत्रकारिता माखनलाल चतुर्वेदी और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे महान दिग्गजों की थी जिसे पत्रकारिता का शैशव काल कहा जा रहा है । हमें उसी शैशव अवस्था की ओर वापस लौटना होगा।
विमल कुमार सिंह, भारतीय पक्ष
भारतीय पत्रकारिता शैशवावस्था में है! मैं नहीं मानता। रही बात सीखने की तो इसकी कोई सीमा या उम्र नहीं होती। न्यूज ऑफ द वल्र्ड बंद हो गया, हंगामा पसर गया। क्या इससे पत्रकारिता व्यवसाय से परे हटकर समाज सेवा में लग जाएगी, ऐसा नहीं होने वाला है। पत्रकार नौकरी करता है। उसे भी भूख लगती है, ऊपर उठने की ललक उसमें भी है, सबसे तेज के चक्कर में वह भी गलतियां करता है। यही उसके पेशे का उसूल है। और हां, पेशा और आदर्श को मिलाकर मत देखिए, बड़ा घाल-मेल है। नौकरी खतरे में पड़ जाएगी।‘‘
चंदन कुमार, जागरण जोश डाट काम
वर्तमान समय में मीडिया की भूमिका वाकई संदेह के घेरे में है, लेकिन इसके लिए मीडिया को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। कभी समाज और कद्दावर लोगो के हिसाब से कुछ करना पड़ता है तो कभी खुद की मजबूरी में, पर सच यही है कि गलत हो रहा है। जहां तक बात विदेशी मीडिया की नकल करने का है तो किसी की कॉपी करना एकदम गलत है, हां उससे कुछ बेहतर तथ्य निकाल कर खुद का विकास करना सही है। परिपक्वता के लिए खुद की समझ को परखना जरूरी है कि आखिर व्यक्ति या संस्था विशेष क्या चाहता है और उसके लिए किस प्रकार के मार्ग को अपनाता है- समझौते का या सिद्धांत का.
आकाश राय, हिन्दुस्थान समाचार
वर्तमान समय में समाचारपत्रों में एक सबसे बड़ी कमी यह आ रही है कि यहां हिन्दी भाषा पर अधिक जोर न देते हुए अंग्रेजी पर दिया जा रहा है। इसलिए मेरे विचार से अगर वास्तव में भारतीय पत्रकारिता की गरिमा बनाएं रखना है तो हमें अपनी मातृभाषा पर अधिक जोर देना चाहिए। हमें किसी भी अन्य भाषा का प्रयोग कर महान बनने से अच्छा है कि अपनी मातृभाषा पर गर्व करें।
सोहन लाल, राष्ट्रीय उजाला
यह चिंता की बात है कि मीडिया नकारात्मक चीजों को आगे ला रहा है जिससे समाज पर बुरा असर पड़ रहा है। मीडिया समाज, देश और सत्ता के बीच में सकारात्मक गतिविधियों को प्रोत्साहन दे क्योंकि यही एक माध्यम है जो देश-दुनिया में नकारात्मक को सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है। समाचार पत्र और समाचार चैनल यदि सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ चलें तो यह भारत के प्रगतिशील समाज की प्रगति के लिए बहुत अच्छा होगा।
अवनीश राजपूत, विश्व हिन्दू वायस, वेब पोर्टल  

क्रान्तिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी


गणेश शंकर विद्यार्थी! यह एक नाम ही नहीं बल्कि अपने आप में एक आदर्श विचार है। वह एक पत्रकार होने के साथ-साथ एक महान क्रांतिकारी और समाज सेवी भी थे। पत्रकारिता के नैतिक कर्तव्य को निभाते हुए गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। उनका समस्त जीवन पत्रकारिता जगत के लिए अनुकरणीय आदर्श है। विद्यार्थी जी का जन्म अश्विन शुक्ल 14, रविवार सं. 1947,1890 ई.) को अपने ननिहाल इलाहाबाद के अतरसुइया मुहल्ले में हुआ था। उनकी माता का नाम गोमती देवी तथा पिता का नाम मुंशी जयनारायण था। गणेश शंकर विद्यार्थी मूलतः फतेहपुर(उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। उनके पिता ग्वालियर रियासत में मुंगावली के ऐंग्लो वर्नाक्युलर स्कूल के हेडमास्टर थे। गणेश शंकर विद्यार्थी का बाल्यकाल भी ग्वालियर में ही बीता तथा वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई।
विद्यारंभ उर्दू से हुआ और 1905 ई. में भेलसा से अंग्रेजी मिडिल परीक्षा पास की। 1907 ई. में प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में कानपुर से एंट्रेंस परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला कालेज में प्रवेश लिया। उसी समय से पत्रकारिता की ओर झुकाव हुआ और इलाहाबाद के हिंदी साप्ताहिक कर्मयोगी के संपादन में सहयोग देने लगे। सन १९०८ में गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर के करेंसी ऑफिस में ३० रुपये मासिक पर नौकरी की, लेकिन एक अंग्रेज अधिकारी से झगड़ा होने के पश्चात् विद्यार्थी जी ने इस नौकरी को त्याग दिया। नौकरी छोड़ने के पश्चात् सन १९१० तक विद्यार्थी जी ने अध्यापन कार्य किया । यही वह समय था जब विद्यार्थी जी ने सरस्वती, कर्मयोगी, स्वराज्य, हितवार्ता आदि पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखना प्रारंभ किया।
सन १९११ में गणेश शंकर विद्यार्थी को सरस्वती पत्रिका में महावीर प्रसाद द्विवेदी के सहायक के रूप में कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कुछ समय बाद सरस्वती, छोड़कर वह अभ्युदय में सहायक संपादक हुए जहां विद्यार्थी जी ने सितम्बर १९१३ तक अपनी कलम से राष्ट्रीय चेतना की अलख जगाने का कार्य किया। दो ही महीने बाद 9 नवंबर, 1913 को कानपुर से स्वयं अपना हिंदी साप्ताहिक प्रताप के नाम से निकाला। गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप के प्रथम अंक में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक आर्थिक क्रांति, राष्ट्रीय गौरव, साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के लिए ही उनकी पत्रकारिता समर्पित है। प्रताप पत्र में अंग्रजों की दमनपूर्ण नीति की मुखर आलोचना के कारण सरकार ने प्रताप का प्रकाशन बंद करवाकर गणेश शंकर विद्यार्थी पर राजद्रोह का मुकदमा लगाकर जेल भेज दिया।
अंग्रेजों की इस दमनपूर्ण कार्रवाई के बाद भी गणेश शंकर विद्यार्थी की राष्ट्रवादी कलम की प्रखरता कम न हो सकी। जेल से छूटने के बाद आर्थिक संकट से जूझते विद्यार्थी जी ने किसी तरह व्यवस्था जुटाई तो 8 जुलाई 1918 को फिर प्रताप की शुरूआत हो गई। प्रताप के इस अंक में विद्यार्थी जी ने सरकार की दमनपूर्ण नीति की ऐसी जोरदार खिलाफत कर दी कि आम जनता प्रताप को मुक्त हस्त से आर्थिक सहयोग करने लगी। इस का परिणाम यह हुआ कि विद्यार्थी जी ने २३ नवम्बर १९१९ से साप्ताहिक प्रताप का प्रकाशन दैनिक समाचार पत्र के रूप में प्रारंभ कर दिया। विद्यार्थी जी के दैनिक पत्र प्रताप का प्रताप ऐसा था कि तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध व्यापक स्तर पर जन-जागरण हुआ। कहा जाता है कि स्वाधीनता आन्दोलन की अग्नि को प्रखर करने वाले समाचार पत्रों में प्रताप का प्रमुख स्थान था।
लगातार अंग्रेजों के विरोध में लिखने से प्रताप की पहचान सरकार विरोधी बन गई और तत्कालीन मजिस्ट्रेट मि. स्ट्राइफ ने अपने हुक्मनामे में प्रताप को ‘बदनाम पत्र’ की संज्ञा देकर जमानत की राशि जब्त कर ली। अंग्रेजों का कोपभाजन बने विद्यार्थी जी को 23 जुलाई 1921 में भी जेल की सजा दी गई परन्तु उन्होंने सरकार के विरुद्ध कलम की धार को कम नहीं किया। विद्यार्थी जी की कलम ने स्वाधीनता आन्दोलन की क्रांति को ही प्रखर नहीं किया, बल्कि पूंजीवाद और सामन्तवाद की जनविरोधी नीतियों का भी अपनी पत्रकारिता के माध्यम से विरोध किया। विद्यार्थी जी वह पत्रकार थे जिन्होंने अपने प्रताप की प्रेस से काकोरी कांड के नायक रामप्रसाद बिस्मिल की जीवनी का प्रकाशन किया। गणेश शंकर विद्यार्थी का प्रताप ही वह पत्र था जिसमें भगत सिंह ने अपने फरारी के दिनों में छद्म नाम से पत्रकारिता की थी। विद्यार्थी जी का सम्पूर्ण पत्रकार जीवन ही राष्ट्रवाद, भारतीय संस्कृति, साम्प्रदायिक सद्भाव को समर्पित रहा।
पत्रकारिता के पुरोधा गणेश शंकर विद्यार्थी साम्प्रदायिकता के भी स्पष्ट विरोधी थे। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी सुनाये जाने पर देशभर में भड़के साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में विद्यार्थी जी ने अपना जीवन भी दांव पर लगा दिया। इन्हीं दंगों के दौरान गणेश शंकर विद्यार्थी निस्सहायों को बचाते हुए शहीद हो गए।
गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या के पश्चात् महात्मा गाँधी ने बड़े ही मार्मिक शब्दों में उनको श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि मुझे यह जानकर अत्यंत शोक हुआ कि गणेश शंकर विद्यार्थी अब हमारे बीच नहीं हैं। उनके जैसे राष्ट्रभक्त और स्वार्थहीन व्यक्ति की मृत्यु पर किस संवेदनशील व्यक्ति को कष्ट नहीं होगा।’’
पं जवाहरलाल नेहरु ने दुःख व्यक्त करते हुए कहा यह जानकर अत्यंत दुःख हुआ कि हमारे प्रिय मित्र और राष्ट्रभक्त गणेश शंकर विद्यार्थी की साम्प्रदायिक दंगे में हत्या कर दी गई है। गणेश शंकर की शहादत एक राष्ट्रवादी भारतीय की शहादत है, जिसने दंगों में निर्दोष लोगों को बचाते हुए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया।
कलम का यह सिपाही असमय ही चला गया लेकिन उनकी प्रेरणाएं पत्रकारिता जगत और समस्त देश को सदैव प्रेरित करती रहेंगी। पत्रकारिता जगत के इस अमर पुरोधा को सादर नमन…..

सूर्यप्रकाश, जुलाई अंक, २०१२

दाम मजदूर से कम, काम मालिक की निगरानी

पत्रकारिता के प्रारम्भिक दौर में इसे अभिव्यक्ति के साथ-साथ जनजागरण का माध्यम माना जाता था। किन्तु वर्तमान परिवेश में बदल रही पत्रकारिता की दिशा और दशा दोनों ही चिन्ता का विषय बनते जा रहें हैं। पत्रकारिता जगत में हो रहे इस परिवर्तन में कौन सी प्रक्रिया उचित है? इसके बारे में हम यहां राष्ट्रदेव पत्रिका के संपादक श्री अजय मित्तल जी से उनके विचार जानने का प्रयास कर रहें हैं-
प्रश्न 1 आपका पत्रकारिता के क्षेत्र में आने का क्या उद्देश्य रहा ?
उत्तर- पत्रकारिता चुनौतिपूर्ण व्यवसाय है। जो सत्ता सारी व्यवस्थाओं की निगरानी करती है, उसकी भी निगरानी करने का दायित्व पत्रकार का है। इसीलिए समाज को कुछ वैचारिक बदल की ओर अग्रसर करने के लिए मैंने पत्रकारिता को चुना जिससे आम लोग समाज में सकारात्मक परिवर्तन के लिए अपना योगदान दे सकें।
 प्रश्न 2 वर्तमान समय में आप पत्रकारिता के क्षेत्र में क्या बदलाव देखते है ?
उत्तर- आज पत्रकारिता अपने मार्ग से भटक रही है। पत्रकारिता के आधार पर प्राप्त शक्तियों का पत्रकार दुरूपयोग कर रहे हैं। पहले पत्रकार देश में हो रहे घपलों, घोटालों व भ्रष्टाचार को उजागर करते थे लेकिन अब वह इसका हिस्सा बन रहे हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जिस तरह शीर्ष पत्रकारों का नाम आया उससे पत्रकार की गरिमा पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में सभी स्तरों के पत्रकार प्रेस को प्राप्त अधिकारों को अपने विशेषाधिकार समझने लगे हैं और इसका दुरुपयोग कर रहे हैं। स्वयं की सहूलियत के लिए पत्रकार ऐसा करते हैं। उनमें अब समाज के दिशा निर्देशक के बजाए राजनेता के गुण आ रहे हैं।
प्रश्न 3 राष्ट्रीय महत्व के मुददों पर मीडिया की भूमिका और प्रभाव को आप किस प्रकार से देखते हैं?
उत्तर- सामान्य आदमी के पास न तो तथ्यों की जानकारी होती है और न ही विश्लेषण क्षमता। तथ्य और उनका विश्लेषण वह मीडिया से ही प्राप्त करता है। मीडिया ने आम आदमी की इसी कमजोरी का लाभ उठाकर अपनी इच्छानुसार तथ्यों और विश्लेषणों को प्रस्तुत करना और उसके अनुसार समाज को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। मीडिया को अगर भ्रष्टाचार से कुछ प्राप्त होने की उम्मीद होती है तो वह तथ्यों में बदलाव कर देती है या उसे खत्म ही कर देती है। वहीं मीडिया को यदि कुछ निजी लाभ नहीं मिलता तो वह उन्हीं तथ्यों को खोजी पत्रकारिता का नाम दे देती है। ऐसे पत्रकार अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर समाज को अधूरे तथ्य, अर्द्ध-सत्य, असत्य बताकर पत्रकारिता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
 प्रश्न 4 आपकी पत्रिका राष्ट्रदेव ग्रामीण क्षेत्रों में जाती है। ग्रामीण पाठकों के बारे में आपका क्या अनुभव रहा है?
उत्तर- ग्रामीण पाठक देश की समस्याओं के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। वह अपने स्थानीय परिवेश से बाहर जाकर राष्ट्र स्तर पर विचार करना चाहते हैं, देश के इतिहास, महापुरूषों को जानना चाहते हैं। वह पत्रिका के राष्ट्रीय विचारों का बड़ी संख्या में स्वागत करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के पाठकों के बीच किए गए सर्वे के दौरान पता चला कि वह देश के बारे में सोचने की ललक रखते हैं और इसीलिए वह राष्ट्रीय विचारों को पढ़ना भी पसंद करते हैं।
 प्रश्न 5 आप अपनी पत्रिका के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना जगाने का प्रयास करते रहे हैं। क्या आज का मीडिया राष्ट्रवाद के प्रश्न पर अपनी भूमिका का निर्वाह सही ढंग से कर रहा है?
उत्तर- राष्ट्रीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाले पत्रों का स्वर राष्ट्रहित के अनुकूल है। अंग्रेजी मीडिया भारतीय परिवेश व संस्कृति को नहीं समझती। वह देश की समस्याओं और यहां के परिवेश को पश्चिमी चश्मे से निहारती है और विश्लेषण प्रस्तुत करती है। अक्सर यह देखा गया है कि जो अखबार राष्ट्रवाद के समर्थक थे उनकी प्रसार संख्या में अच्छी वृद्धि हुई है और जिन्होंने पंथ-निरपेक्षता के नाम पर राष्ट्रवाद को गिराने का कार्य किया वह ज्यादा नहीं चल पाए।
प्रश्न 6 वर्तमान समय में व्यवस्था परिवर्तन को लेकर चल रहे आंदोलनों के परिप्रेक्ष्य में जनजागरण के विषय पर मीडिया की भूमिका कितनी उपयोगी साबित हुई है?
उत्तर- चाहे अन्ना का आंदोलन हो या बाबा रामदेव का सौभाग्य से मीडिया ने अच्छा प्रदर्शन किया। मीडिया ने अच्छे पक्षों को लगभग ठीक प्रकार से प्रस्तुत किया। इसीलिए राजनेताओं ने इन आंदोलनों को बदनाम करने के लिए कार्रवाई की। मीडिया इस समय व्यवस्था परिवर्तन के मुद्दे पर लगभग समान और अनुकूल विचार रख रहा है।
 प्रश्न 7 आप उत्तर प्रदेश पत्रकार एसोसिएशन मेरठ के अध्यक्ष हैं। पत्रकारों की कौन सी प्रमुख समस्याएं हैं, जिनको लेकर पत्रकार को लड़ाई लड़ने की आवश्यकता पड़ती है?
उत्तर- पत्रकारों, विशेषकर जो छोटे और मंझले पत्रों में काम कर रहे हैं, के सामने सबसे बड़ी समस्या वेतन की है। छोटे अखबारों में तो वेतन सरकार द्वारा अकुशल कर्मियों के लिए निर्धारित न्यूनतम मजदूरी दर से भी कम है। छोटे अखबारों में पत्रकारों को मिट्टी ढोनेवाले मजदूरों को मिलने वाले वेतन से भी आधा वेतन मिलता है। जबकि पत्रकारों की बड़ी संख्या इन्हीं छोटे एवं मंझले समाचार पत्रों व चैनलों में कार्यरत हैं। वहीं पत्रकारों के लिए काम के घंटे भी बहुत अधिक है जिसके कारण वह न तो अपना श्रेष्ठतम योगदान दे सकते हैं और न ही उन्हें अध्ययन के लिए समय मिल पाता है। यह स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। इसके अलावा पत्रकारों के बेहतर भविष्य के लिए बीमा जैसी योजनाएं भी होनी चाहिए। आज यह आवश्यक है कि पत्रकार आर्थिक रूप से इस लायक तो हो कि वह वर्तमान और भविष्य की चिंता से मुक्त रह सकें।
 प्रश्न 8 जेडे हत्याकांड से एक बार फिर पत्रकारों की सुरक्षा का मुददा सामने आया है। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए आपके अनुसार क्या कदम उठाए जाने चाहिए?
उत्तर- पत्रकारों के लिए सुरक्षा नीति बनाए जाने की आवश्यकता है। यह संभव नहीं है कि हरेक पत्रकार के साथ एक अंगरक्षक चल सके लेकिन इसके लिए बेहतर कानून होना चाहिए। राज्य स्तर पर कर्मचारियों के काम में बाधा डालने वाले पर कार्रवाई का कानून बना हुआ है, लेकिन पत्रकार को उसके काम के लिए धमकी अथवा रूकावट को इस कानून के दायरे में नहीं लिया जाता। पत्रकारों के विरूद्ध आपराधिक मामले की जांच भी जिले के एसपी स्तर के अधिकारी की देखरेख में होनी चाहिए क्योंकि छोटे स्तर के पुलिस अधिकारियों तक अपराधियों की पहुंच होती है। यह जिला स्तर का पुलिस अधिकारी पत्रकार-संबंधी किसी भी मामले की जांच की जानकारी राज्य शासन को भी नियमित भेजे।
प्रश्न 9 वर्तमान समय में किस पत्रकार की पत्रकारिता आपको आदर्श पत्रकारिता के सबसे निकट दिखाई देती है?
उत्तर- पत्रकारिता क्षेत्र सेवा क्षेत्र है। पांचजन्य समाचार पत्र आज कम वेतन में भी समाज को सर्वोत्कृष्ट दे रहा है। आजादी से पहले बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे पत्रकारों की पत्रकारिता बड़ी आदर्श थी। उन्होंने अपने समाचार पत्र आज, और रणभेरी में अंग्रजों के खिलाफ जमकर लिखा और किसी भी प्रकार के प्रलोभन में नहीं आए। मेरे विचार में वर्तमान समय में ऐसी ही पत्रकारिता की आवश्यकता है जैसी पराड़कर जी के द्वारा की गई थी। वैसे तो हिन्दी पत्रकारिता की नींव ही त्याग, बलिदान और संघर्ष पर रखी गई थी। आदि संपादक जुगल किशोर शुक्ल ने अपने उदंत मार्तण्ड नामक हिंदी के प्रथम पत्र को सरकारी प्रलोभनों से दूर रखकर आर्थिक कठिनाइयों से ही चलाया। आज के पत्रकार को इन उदाहरणों को भूलना नहीं चाहिए।
नेहा जैन, जुलाई अंक, २०११

सत्ता नहीं, पाठक करें मीडिया की समीक्षा: महात्मा गांधी


पत्रकारों की वर्तमान पीढ़ी को ऐसा लगता है जैसे पत्रकारिता जगत वर्तमान समय में संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है पत्रकारिता के बारे में उस समय भी कुछ बातों पर पत्रकार चिंतित थे जिस समय को भारतीय पत्रकारिता का उत्कृष्ट समय कहा जाता है। भारतीय पत्रकारिता का आरंभिक दौर राष्ट्रवाद के जनजागरण को समर्पित था। यह समय भारत के स्वाधीनता आन्दोलन का समय था। भारत की स्वाधीनता को प्राप्त करने की दिशा में तत्कालीन पत्रकारिता और पत्रकारों की महती भूमिका रही थी। उस समय में पत्रकारों का एक ऐसा वर्ग तैयार हुआ जिनके लिए राष्ट्र की स्वाधीनता ही परम ध्येय था. लेकिन उस समय में भी पत्रकारिता में विज्ञापन, पत्रकार का कर्तव्य और पत्रकारिता पर सरकारी नियंत्रण आदि समस्याएं थीं, जिनके बारे में महात्मा गाँधी जैसे अग्रणी नेता और पत्रकार ने भी बहुत कुछ लिखा था। महात्मा गाँधी ने तत्कालीन समाचार पत्रों में विज्ञापन के बढ़ते दुष्प्रभाव पर लिखा था-
मैं समझता हूं कि समाचारपत्रों में विज्ञापन का प्रकाशन बंद कर देना चाहिए। मेरा विश्वास है कि विज्ञापन उपयोगी अवश्य है लेकिन विज्ञापन के माध्यम से कोई उद्देश्य सफल नहीं हो सकता है। विज्ञापनों का प्रकाशन करवाने वाले वे लोग हैं जिन्हें अमीर बनने की तीव्र इच्छा है। विज्ञापन की दौड़ में हर तरह के विज्ञापन प्रकाशित होने लगे हैं जिनसे आय भी प्राप्त होती है। आधुनिक नागरिकता का यह सबसे नकारात्मक पहलू है जिससे हमें छुटकारा पाना ही होगा। हमें गैर आर्थिक विज्ञापनों को प्रकाशित करना होगा जिससे सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति हो सके। लेकिन इन विज्ञापनों को भी कुछ राशि लेकर प्रकाशित करना चाहिए। इसके अलावा अन्य विज्ञापनों का प्रकाशन तत्काल बंद कर देना चाहिए। (इंडियन ओपिनियन, ४ सितम्बर, १९१२)
महात्मा गाँधी ने पत्रकारिता के सिद्धांत और पत्रकार के कर्तव्यों के बारे में भी लिखा था। महात्मा गाँधी ने पत्रकारिता और पत्रकार के कर्तव्यों के बारे में सविस्तार उल्लेख करते हुए लिखा था कि -
मैं महसूस करता हूं कि पत्रकारिता का केवल एक ही ध्येय होता है और वह है सेवा। समाचार पत्र की पत्रकारिता बहुत क्षमतावान है, लेकिन यह उस पानी के समान है जो बांध के टूटने पर समस्त देश को अपनी चपेट में ले लेता है और समस्त फसल को नष्ट कर देता है। (सत्य के साथ प्रयोग अथवा आत्मकथा)
समाचारपत्र लोकतंत्र के स्थायीकरण में किस प्रकार से सहायक हो सकते हैं इसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा -
वास्तव में आदर्श लोकतंत्र की आवश्यकता क्या है, तथ्यों की जानकारी या सही शिक्षा निश्चित तौर पर सही शिक्षा। पत्रकारिता का कार्य लोगों को शिक्षित करना है न कि आवश्यक-अनावश्यक तथ्यों एवं समाचारों से उनके विवेक को सीमित कर देना। एक पत्रकार को हमेशा इस बारे में स्वतंत्र रहना चाहिए कि उसे कब और कौन सी रिपोर्ट करनी है। इसी प्रकार से एक पत्रकार को केवल तथ्य जुटाने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। बल्कि आगे होने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान होना भी पत्रकार के लिए आवश्यक है।(महात्मा गाँधी- तेंदुलकरः महात्मा १९५३, पेज २४७)
महात्मा गाँधी ने समाचार में प्रकाशित समस्त जानकारियों को पूर्णतः सच मानने से भी इनकार किया है। वे समाचार पत्रों के माध्यम से राय बनाने के भी सख्त विरोधी थे। उन्होंने कहा समाचारपत्रों को केवल तथ्यों की जानकारी के लिए पढ़ा जाना चाहिए, लेकिन समाचारपत्रों को यह आज्ञा नहीं दी जा सकती है कि वे स्वतंत्र चिंतन को समाप्त कर दें। उन्होंने समाचारपत्रों को पूर्णतः विश्वसनीय न मानते हुए कहा-
पश्चिमी देशों की तरह पूरब में भी समाचार पत्र को गीता, बाईबल और कुरान की तरह से माना जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है जैसे समाचार पत्रों में ईश्वरीय सत्य ही लिखा हो। मैं समाचारपत्र के माध्यम से राय बनाने का विरोधी हूं। समाचारपत्रों को केवल तथ्यों की जानकारी के लिए ही पढ़ा जाना चाहिए, लेकिन समाचारपत्रों को यह आज्ञा नहीं दी जा सकती है कि वे स्वतंत्र चिंतन को समाप्त कर दें। मैं पत्रकार मित्रों से केवल यही कहूंगा कि वे समाचारपत्रों में केवल सत्य ही प्रकाशित करें, कुछ और नहीं।
जनसंचार माध्यमों की स्वायत्ता और सरकारी नियंत्रण एक ऐसा मुद्दा है जो हमेशा ही जीवंत रहा है। यह उस समय में भी था जब भारत में पत्रकारिता अपने शैशव काल में थी। महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश लोगों पर समाचारपत्रों के व्यापक प्रभाव का अध्ययन किया। उन्होंने यह भी अनुभव किया कि ब्रिटिश सरकार किस प्रकार से समाचार पत्रों को अपने पक्ष में माहौल तैयार करने के लिए अपने प्रभाव में लेती थी। ब्रिटिश लोगों को ध्यान में रखते हुए महात्मा गाँधी ने भारतीय पत्रकारिता जगत को चेताया कि-
ब्रिटिश जनता के लिए उनका समाचार पत्र ही उनका बाईबल होता है। वे अपनी धारणा समाचारपत्रों के माध्यम से ही बनाते हैं। एक ही तथ्य को विभिन्न समाचार पत्रों में विभिन्न तरीकों से दिया जाता है। समाचार पत्र उस पार्टी के मुताबिक लिखते हैं जिस पार्टी का वे समर्थन करते हैं। हमें ब्रिटिश पाठकों को आदर्श मानते हुए यह देखना चाहिए कि समाचारपत्रों के अनुसार ही इनकी विचारधारा में किस प्रकार से बदलाव आता है। ऐसे लोगों के विचारों में बहुत जल्दी-जल्दी परिवर्तन होते रहते हैं। ब्रिटेन में कहा जाता है कि प्रत्येक सात वर्ष के पश्चात पाठकों की राय में परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार से लोग उनके शिकंजे में आ जाते हैं जो एक अच्छे वक्ता अथवा नेतृत्वकर्ता होते हैं। इसको संसद भी कह सकते हैं। यह लोग अपनी सत्ता को जाते हुए नहीं देख सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति उनके और सत्ता के बीच में आता है तो वे उसकी आँख भी निकाल सकते हैं।
महात्मा गाँधी ने लोकतंत्र के स्थायित्व के लिए लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ पत्रकारिता को व्यापक अधिकार देने की भी पैरोकारी की। महात्मा गाँधी ने कहा-‘
प्रेस की आजादी ऐसा बहुमूल्य विशेषाधिकार है जिसे कोई भी राष्ट्र भूल नहीं सकता है।
महात्मा गाँधी ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में जब संपादक ने समाचार पत्र में कुछ ऐसी सामग्री प्रकाशित कर दी हो उसे क्या करना चाहिए, क्या उसे सरकार से माफी मांगनी चाहिए, नहीं, बिल्कुल नहीं। यह सत्य है कि संपादक ऐसी सामग्री प्रकाशित करने के लिए बाध्य नहीं है, लेकिन एक बार प्रकाशन के पश्चात वापस लेना भी उचित नहीं है।
किसी भी समाचारपत्र की सफलता मुख्यत संपादक की कार्यशैली और योग्यता पर ही निर्भर करती है। महात्मा गाँधी ने संपादकों के कार्य के विषय में अपने विचार स्पष्ट करते हुए लिखा-
पत्रकारिता को चैथा स्तम्भ माना जाता है। यह एक प्रकार की शक्ति है, लेकिन इसका गलत प्रयोग एक अपराध है। मैं एक पत्रकार के नाते अपने पत्रकार मित्रों से अपील करता हूं कि वे अपनी जिम्मेदारी को महसूस करें और बिना किसी अन्य विचार के केवल सत्य को ही प्रस्तुत करें।  समाचारपत्रों में लोगों को शक्तिशाली तरीके से प्रभावित करने की क्षमता है। इसलिए संपादकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई गलत रिपोर्ट न चली जाए जो लोगों को उत्तेजित करती हो। संपादक और उसके सहायकों को इस बारे में हमेशा जागरूक रहना चाहिए कि वे किस समाचार को किस तरह से प्रस्तुत करते हैं। किसी स्वतंत्र राष्ट्र में सरकार के लिए प्रेस पर नियंत्रण रख पाना असंभव है। ऐसे में पाठकों का यह उत्तरदायित्व है कि वे प्रेस की समीक्षा करें और उन्हें सही रास्ता दिखाएं। समाज का प्रबुद्ध वर्ग भड़काऊ समाचारपत्रों को नकार देगा।
सूर्यप्रकाश, जुलाई अंक, २०११
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