गुरुवार, 6 जून 2013

भारत के बारे में ये 10 अजीब बातें क्या जानते हैं?




रजनी वैद्यनाथन
 बुधवार, 5 जून, 2013 को 11:51 IST तक के समाचार
क्लिक करें भारत के बारे में लिखने वाले आम तौर पर लंबे ट्रैफिक जाम, नौकरशाही, भ्रष्टाचार और योग पर लिखकर अपना लेख पूरा कर लेते हैं. लेकिन कुछ और बातें भी हैं, जो भारत के लोगों के जीवन का हिस्सा हैं, आइए हम आपको बताते हैं ऐसी 10 बातों के बारे में.

कर देने वालों की कमी

एक अरब 20 करोड़ की आबादी वाले इस देश में केवल तीन फ़ीसदी लोग ही कर देते हैं.
इसे इस तरह समझा जा सकता है कि खेती-बाड़ी को कर के दायरे से बाहर रखा गया है और भारत की दो तिहाई आबादी गांवों में रहती है. क्लिक करें अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा हिस्सा असंगठित हैं, इसलिए कर ले पाना थोड़ा कठिन काम है.
कई लोगों का कहना है कि अगर कर देने से बच रहे लोगों से कर वसूला जाए तो देश की आर्थिक समस्याओं से निजात मिल सकती है.

शादी से पहले जासूसी की बढ़ती मांग

मेरे एक दोस्त ने मुझसे कहा था कि उसकी शादी से पहले उसके ससुराल वालों ने यह जानने के लिए कि उसकी कोई प्रेमिका तो नहीं थी, एक जासूस की सेवाएं ली थीं.
हालांकि उसकी प्रेमिका थी. लेकिन जासूस (शुक्र है कि मेरे दोस्त के बारे में) यह पता लगा पाने में नाकाम रहा. इस तरह उसकी शादी हो गई.
भारत में इस तरह की सेवाएं देने वाली कंपनियों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. ऐसी क़रीब 15 हज़ार कंपनियां काम कर रही हैं.
एक महिला ने मुझे बताया,‘‘यह जासूसी नहीं है.’’ इस महिला ने अपनी बहन के होने वाले पति के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए एक जासूस की सेवाएं ली थीं. उन्होंने बताया कि लड़के ने कहा था कि वह अच्छे परिवार से है. इसकी तस्दीक करने के लिए ही हमने ऐसा किया.

अख़बारों की बढ़ती प्रसार संख्या

जब पश्चिमी देश अख़बारों के अंत का शोक मना रहे हैं, तब भारत का अख़बार उद्योग तेज़ी से बढ़ रहा है. बढ़ती साक्षरता, क्लिक करें इंटरनेट के उपयोग की कम दर और देश की बहुत सी भाषाओं का मतलब यह है कि बहुत से लोग अख़बार पढ़ना चाहते हैं.
यहां अख़बार सस्ते भी हैं.समाज के सभी वर्गों में अख़बार के पाठकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. बढ़ती अर्थव्यवस्था की वजह से छोटे और सामुदायिक अख़बारों की संख्या भी बढ़ी है.
अधिक लोग क्लासीफ़ाइड विज्ञापन दे रहे हैं, जो अख़बारों को आर्थिक मदद पहुंचाता है. एक और बात जो महत्वपूर्ण है, वह यह कि आप अपने अख़बारों और पत्रिकाओं को सड़क के किनारे बैठे दुकानदार को बेच सकते हैं.
वह उसे कम क़ीमत पर खरीद कर फिर उसे बेच देगा. लोग एक साल पुरानी पत्रिका पढ़कर भी खुश होंगे, क्योंकि उस पत्रिका का ताज़ा अंक ख़रीद पाना उनके वश में नहीं है.

गाड़ियों के हॉर्न का शोर

अधिकांश ट्रकों के पीछे यह लिखा होता है,‘हॉर्न ओके, प्लीज.’ भारत में हॉर्न बजाना किसी गाड़ी के पीछे आ रही गाड़ी के ड्राइवर को प्रेरित करता है.
इसमें समस्या यह है कि ड्राइवर इसका किफ़ायती उपयोग नहीं करते हैं. एक ऑटो वाले ने मुझे बताया कि वह एक दिन में क़रीब डेढ़ सौ बार हॉर्न बजाता है.
एक ऑटो रिक्शा औसतन 93 डेसिबल तक का शोर पैदा करता है, ट्रैफिक का शोर एक जंबोजेट विमान के उड़ान भरते समय पैदा हुए शोर के बराबर होता है. यह आवाज़ कानफोड़ू होती है.

नौजवान देश

भारत एक जवान देश है. इसकी एक अरब बीस करोड़ की आबादी का आधे से अधिक हिस्सा 25 साल से कम और दो तिहाई 35 साल से कम आयुवर्ग का है. इनमें से बहुत से भारतीयों में अपने देश के प्रति आत्मविश्वास का भाव है.
अब वे पश्चिम की ओर बहुत नहीं देखते हैं. अपने प्रतिद्वंद्वी ब्रुकलिन की तरह मुंबई भी आधुनिक विचारों और फ़ैशन से ओतप्रोत है. बहुत से युवा अपने परंपरागत पेशों को छोड़कर कला के क्षेत्र में करियर बना रहे हैं.
हर जगह संगीत समारोह आयोजित किए जा रहे हैं, बंगलोर, दिल्ली, मुंबई और चेन्नई लाइव म्यूजिक कनसर्ट के केंद्र बनते जा रहे हैं.

हर जगह दिखतीं प्लास्टिक की कुर्सियां

बढ़ता वजन

एक बार जब मैं बैंक गई तो मैनेजर ने हंसते हुए मुझसे कहा कि आप कुछ मोटी हो गई हैं. आमतौर पर वजन बढ़ने को मैं शिकायत के तौर पर मैं लेती हूं, यह इस बात का भी प्रतीक है कि आप स्वस्थ्य दिख रहे हैं.
लेकिन मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि भारत में मोटापा (केवल इंसानों में ही नहीं पशुओं में भी) अब एक महामारी का रूप लेता जा रहा है.
आप मैकडोनल्ड्स या किसी अन्य प्रोसेस्ड फूड की दुकान पर भारतीय को जमकर खाते हुए देख सकते हैं. अधिक उम्र के भारतीय पुरुषों में तोंद का दिखना एक आम बात है.
जबकि बहुत से भारतीय अभी भी कुपोषण की समस्या से जूझ रहे हैं. लाखों लोग रोज भूखे सोते हैं. ऐसे में शहरों में लोगों की कमर का बढ़ना एक आम बात है.

थूकने की आदत

मुंबई में सार्वजनिक जगह पर थूकने वालों पर जुर्माना लगाने के लिए एक थूक निरीक्षक की नियुक्ति की गई है. पान और खैनी खाने वाले बहुत से लोग कहीं भी थूक देते हैं.
इससे लाल रंग का एक निशान बनता है, जिसे आप बहुत सी सफ़ेद दीवारों पर देख सकते हैं. टैक्सियों पर, रिक्शों के पीछे और इमारतों के आगे यह लिखा होना आम बात है कि ‘यहां न थूकें’.
यह कफ देश में तपेदिक (टीबी) फैलने के लिए ज़िम्मेदार है. देश में कोई थूक विरोधी अभियान भी नहीं चल रहा है.

कान साफ़ करने वाले

भारत में कुछ दिनों के लिए रहने वाला व्यक्ति भी यह जान जाता है कि सड़क के किनारे की अर्थव्यवस्था देश के जीवन का एक प्रमुख हिस्सा है. यहां के लोगों की चतुराई और कल्पनाशीलता का कोई मुक़ाबला नहीं है.
यहाँ के लोग आपकी हर तरह से सेवा कर सकते हैं और अपनी चीजें बेच सकते हैं. अगर आपका छाता टूट जाए, तो उसे ठीक करने वाला व्यक्ति आपको मिल जाएगा.
अगर आपका जूता टूट गया है, तो उसे ठीक करने वाला आपके घर आ सकता है. सड़क के किनारे बाल काटवाने के बारे में आपका क्या ख्य़ाल है?
आपको सड़क के किनारे हड्डी ठीक करने वाले बैठे हुए मिल सकते हैं, जो आपकी टूटी हुई हड्डियों को जोड़ते हैं. इनके अलावा कान साफ़ करने वाले भी हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि सदियों पुरानी ये परंपराएं और मज़बूत होती जा रही हैं.
कुछ लोग इस बात पर चिंता जताते हैं कि ये परंपराएं ख़तरे में हैं, क्योंकि युवा पीढ़ी परंपरागत पेशों को छोड़ पढ़ाई और अन्य विकल्पों को अपना रहे हैं. वहीं कुछ अधिकारी उन्हें फुटपाथ से खदेड़ने का प्रयास भी कर रहे हैं.

शनिवार की महिमा

भारत दुनिया के कुछ बेहतरीन वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिए घर हो सकता है. लेकिन जब बात पुराने अंधविश्वासों को मानने की आती है, तो तार्किकता बहुत पीछे छूट जाती है.
अलग-अलग लोग अलग-अलग अंधविश्वासों का पालन करते हैं, जैसे कि शनिवार को नए कपड़े नहीं पहना जाता है. रात में घर की सफ़ाई नहीं करते हैं क्योंकि ऐसा करने से धन की देवी लक्ष्मी वापस लौट जाती हैं.
बाएं हाथ से किसी को कुछ देना नहीं चाहिए. इन बातों का पालन हर भारतीय करता है, चाहे अमीर हो या ग़रीब.
ये बातें आज के समाज का हिस्सा बन चुकी हैं. हर नई गाड़ी के बोनट पर फूलों की माला चढ़ाई जाती है, क्योंकि इसे शुभ माना जाता है. बुरी चीजों से बचने के लिए लोग गाड़ी के अंदर या घर के सामने नींबू और मिर्च टांगते हैं. अशुभ अंकों से बचने के लिए बहुत से विमानों में 13 नंबर की लाइन नहीं होती है.
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