मंगलवार, 5 मार्च 2013

एक और जांलियावाला बाग में हजारों शहीद





Wednesday, 1 February 2012


जो इस धरती के मूलवासी थे, उन्होने लम्बे अर्से तक जमीन और प्रकृति से जुड़ी अपनी व्यवस्था कायम की। संस्कृति, धर्म समाज और भौतिक जीवन की एक मूल्यवान परम्परा विकसित की। बाहर से आक्रांता आये और युग-युगों तक चले लंबे आक्रमण, विरोध, संघर्ष और जय-पराजय की प्रक्रिया में मूलवासियों को सुविधाजनक परिस्थितियों से महरूम करते गये । जो पकड़ लिए गये उन्हें दास दलित बनाकर सेवा के लिए कोल्हू के बैल की तरह जोता गया और उनके ललाट पर अछूत की स्थायी मोहर लगा दी। जो खदेड़ दिये गये उन्हें दूर दराज दुर्गम पहाड़-जंगलों में षरण लेने के लिए बाध्य कर समाज से ही बहिष्कृत कर दिया गया। इस सबके चलते अब तक उस मानवता को वर्चस्वकारी व्यवस्था के बुल्डोजर के द्वारा रौंदा जाता रहा, फिर भी वह जन समुदाय जिंदा है, चूंकि उसमें गज़ब की प्राणश्‍क्ति है। यह अलग बात है कि अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए उन्हें लगातार संघर्ष करते रहना पड़ा। अतीत के सुरासुर संग्रामों या आर्य-अनार्य संघर्षों से वर्तमान दौर के विकास के नाम पर विस्थापन तक आदिवासियों को अपने अस्तित्व के लिए लड़ते रहना है। अस्तित्व के संकट के साथ आदिवासियों को पहचान के संकट से भी आदिकाल से ही जुझते रहना पड़ा। थोडी देर सुविधा के लिए ’’सनातनी’’ टर्मिनोलोजी का इस्तेमाल करें, तो सतयुग त्रेता-द्वापर काल-खंडों में इन आदिवासियों को असुर, दैत्य, दानव, राक्षस, प्रेत न जाने क्या-क्या संज्ञाएं देकर मनुष्य जाति होने से नकारते रहने का दुष्चक्र रचा गया और इस कलियुग में उनकी आदिवासी पहचान (इंडिजीनस आइडेंटीटी) को नष्ट करने के लिए उन्हें जनजाति या वनवासी कहा जाकर उनके मौलिक स्वरूप को ही तिरोहित करने का बाकायदा सरकारी ऐलान किया जा रहा है। कुछ साल पहले विष्व स्तर पर ’’इंडिजीनस ईयर’’ मनाया गया। भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्रसंघ को सीधे लिख दिया कि ’’भारत में इंडिजीनस लोग’’ न होने के कारण ऐसा कोई वर्ष नहीं मनाया जायेगा और न ही कोई प्रतिनिधि मंडल वहंा जायेगा। यही रवैया डरबन सम्मेलन में सरकार ने दलितों के प्रति अपनाया। आदिवासियों पर किए जाते रहे अध्ययन शोध की परम्परा का तनिक विशलेषण करें, तो बात थोड़ी और स्पष्ट हो सकेगी। भारतीय आदिवासी समुदायों पर लेखन की षुरूआत औपनिवेषिक दौर में आरम्भ हो गयी थी। आरियंटलिस्ट ने उन्हें कौतूहल व हिकारत भरी नजरों से देखा, नृतत्वषास्त्रियों ने उनके प्रति सामान्यीकृत औपचारिकता का दृष्टिकोण अपनाया, भाषाई अध्येता सतह से नीचे नहीं उतर पाये। जहंा तक प्रगतिषील नजरिये का सवाल है, तो डी.डी. कौषम्बी, डी.पी. चट्टोपाध्याय, भगवती शरण उपाध्याय एवं राहुल सांकृत्यायन जैसी विभूतियों ने आदिवासियो ंको समझने में गहरी दिलचस्पी ली, लेकिन कुल मिलाकर उनमें भी एक सतही व रोमानी नजरिया ही हावी होता जान पड़ता है। आगे दिये कुछ उदाहरणों से यह सिद्ध हो जायेगा। वर्तमान में आदिवासियों को लेकर बड़े-बड़े विद्वान चिंतित और चिंतनषील दिखायी देते हैं, जिनमें डा. बृहमदेव शर्मा, रामषरण जोषी, कुमार सुरेष सिंह (अब स्वर्गीय), जी.एन. देवी और भी कई नाम लिए जा सकते हैं, फिर भी किसी ठोस वजह से एक बेचैनी वहीं की वहीं उसी मात्रा में बनी रहती है। कुकुरमुत्तों की तरह ढ़ेर सारे एन.जी. ओज आदिवासी क्षेत्रों में नजर आयेंगे, मगर अधिकांष में ख्याति और स्वार्थ सिद्धि का तत्व ही हावी है। इस सारी परम्परा में महाष्वेता देवी जैसे अपवाद है। वजह, आदिवासियों के प्रति उनकी सोच काफी सीमा तक विषिष्ट लगती है जिसमें बहुत कुछ कर सकने की तड़पड़ाहट है। आदिवासी विमर्ष की नयी पहल रमणिका गुप्ता जी ने की। उनका नाम केवल इसलिए मैं यहंा नहीं ले रहा हँू, प्रत्युत इस वजह से कि उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात लगातार कही है। वह यह है कि ’’साहित्य, संस्कृति, धर्म, परम्परा, इतिहास, समाज कोई भी क्षेत्र से सम्बन्धित आदिवासी अभिव्यक्ति का सवाल हो, नेतृत्व स्वयं आदिवासियों को अपने हाथ में लेना पड़ेगा और अन्य लोग कंधे से कंधा मिलाकर उनके साथ चलेंगे। सारी चिंताओं के रहते बात क्यों नहीं बन पा रही ? इस प्रष्न का समाधान शायद हमें रमणिका जी के उक्त विचार में मिल सके। इसलिए यह बात मुझे महत्वपूर्ण लगती है। प्रख्यात समाजषास्त्री श्री पूरनचन्द्र जोषी जब ’’बोद्धिक वर्चस्वषाली परिप्रेक्ष्य से आदिवासी संस्कृति और ज्ञान के ’’एक्सक्लूजन’ (निष्कासन) पर गंभीर चिंता व्यक्त करते है, (कथादेष, अगस्त-2002 में राजाराम भादू का लेख) तो इससे संकेत यह मिलता है कि पूर्वोवत बोद्धिक परंपरा के दृष्टिकोण से आदिवासियों की सही तस्वीर का खींचना मुष्किल है। इसलिए अहम् सवाल आज भी ज्यों के त्यों सर उठाये खड़े दिखते हैं - ऽ आदिवासियों के समृद्व सांस्कृतिक रिक्त की मौलिकता को प्रगतिषील विकास के साथ संरक्षित कैसे रखा जाये ? ऽ विकास की प्रक्रिया के साथ उनके पुष्तेनी भौतिक-प्राकृतिक संसाधनों का लाभ उन्हे कैसे मिले ? ऽ धर्म के नाम पर उनके साम्प्रदायिकरण को कैसे रोका जाय ? ऽ साहित्य की उनकी मौखिक परम्परा को लिपिबद्व कैसे किया जायें ? ऽ उत्थान के साथ उनकी स्वस्थ प्राकृतिक जीवन शैली को कैसे बचाये रखा जाये ? ऽ चैतरफा दबावों के कारण यह सम्भव ही नहीं कि समाज की मुख्यधारा से अलग-थलग रहकर जैसी भी स्थितियंा है, उनमें वे अपना जीवन जीते चले जायें। सवाल यह उठना है कि मुख्य धारा में लाने की प्रक्रिया में उन्हे दोयम दर्जे का जन समुदाय बनने के सम्भावित खतरे को कैसे टाला जाये ? ऽ अनुभव यह बताता है कि आदिवासियों में से जो भी व्यक्ति, परिवार या समुह षिक्षित, उन्नत और आधुनिक बनने लगता है वही अपनी मौलिक जीवन शैली और सोच को त्याग कर गैर आदिवासी जैसा व्यवहार करने लगता है। प्रष्न यहँा सुविधाओं और साधनों का नहीं है, बल्कि समृद्व परम्परा का है, उस परम्परा के संरक्षण का है। समान स्तर पर वह आधुनिकता की विकृतियों को भी अपनाने लगता है। यहाँ तक कि वह जान-बुझकर अपनी संस्कृति और संस्कारों को भुलाने लगता है। उसे यह भी होष नहीं रहता कि यह उसकी विवेक सम्मत प्रााथमिकता नहीं, प्रत्युत अनाभासित मनोवैज्ञानिक दबाव है। प्रष्न यह है कि इसका विकल्प क्या हो ? ऽ अपने त्रासद अनुभव की वजह से जो आदिवासी समूह बाहरी दुनिया के प्रति अत्यंत शत्रुवत (हाॅस्टाइल) है, उन्हें जैसे ही विकास या उत्थान की ओर लाने के प्रयास किए जाते है तो अपने जीवन में आक्रामक हस्तक्षेप मानते हैं। प्रयास चालू रखा गया तो एक असहनीय मानसिक दबाव महसूस करने लगते है। यहंा तक कि मरने लगते हैं। अंडमान के आदिवासियों (विषेषकर जारवा और सेंटेनलीज) के साथ यह सब घटित हुआ है। अंततः सरकारी और गैर-सरकारी प्रयासों को रोकना पड़ा और उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना पड़ा। इस विकट और अनूठी समस्या का समाधान क्या हो ? मैं यह महसूस करता हूँ कि इसके लिए नृतत्वषास्त्रियों, समाज-षास्त्रियों और मनोविष्लेषकों का संयुक्त दल बनाया जाना चाहिए। ऽ वैष्विक पूंजी व जन्य व्यक्ति व स्वार्थ केंद्रित माहौल में आदिवासी सामुहिक जीवन पद्धति को कैसे बचाया जाये ? ऽ भविष्य को बहतर गढने के लिए अतीत को समझना अनिवार्य होता है। अस्तित्व के संकट की तरह आदिवासियों के इतिहास को जान-बूझकर नजरअंदाज करते रहना भी अपने आप में बड़ी समस्या है। इस लंबे इतिहास को लिपिबद्व कैसे किया जाये ? और यह काम कौन करेगा या कर सकता है ? कुछ सवालों के साथ यह पृष्ठभूमि देना इसलिए जरूरी समझा गया कि पहले हम आदिवासियों के प्रति अब तक जो दृष्टिकोण के चलते ईमानदारी और समझदारी के साथ आदिवासी इतिहास संभव नहीं। मुझे यहंा विजयदेव नारायण साही की एक कविता की निम्न पंक्तियंा काफी प्रासंगिक लगती है- ’’ तुम हमारा जिक्र इतिहासों में नहीं पाओगे क्योंकि, हमने अपने को इतिहास के विरूद्ध दे दिया है................’’ ये पंक्तियंा उन्होने किसी भी संदर्भ में लिखी हों, आदिवासी परिप्रेक्ष्य में अर्थस्पष्ट है, फिर भी अपने-अपने हिसाब से इन पंक्तियों को समझा जा सकता है। निष्कर्ष यही निकलेगा कि जिस इतिहास (व्यापक अर्थ में) के विरोध में आदिवासी युग-युगों से लड़ते रहे, उसमें उन्हें जगह कैसे मिलेगी। आदिवासियों का वास्तविक इतिहास क्या था, उसकी खोज कैसे की जाए एवं उसे सामने कैसे लाए ? यह मूल प्रष्न अपनी जगह है। इसका उत्तर तलाषने से पूर्व हमें इस महत्वपूर्ण प्रष्न से मुठभेड करनी होगी कि जैसा इतिहास हमें पढाया-सुनाया जाता रहा है, उसमें आदिवासी किस रूप में है ? इसे समझने के लिए हमें भारतीय मिथक परंपरा में जाना होगा, चंूकि सारी गड़बड़ी वहीं से शुरू हुई है। मिथक एवं इतिहास के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह रही है कि हारी हुई कौमों को विकृत करके चित्रित किया जाता है, वर्चस्वकारी वर्ग के पक्ष में सारा सोच होता है और प्रायः इतिहासकार स्वयं की वर्ग परंपरा के पक्ष में तथा विपक्ष (जिस भी स्वरूप और मात्रा में ) के विरोध में कुछ न कुछ पूर्वाग्रहों से ग्रसित होता है। ऐतिहासिक प्रमाण तो निरपेक्ष होते हैं, समस्या यह है कि वे सब मूक होते हैं। जब उनके अधिकांष की व्याख्या-विष्लेषण-निष्कर्ष का मौका इतिहासकार को मिलता है तो प्रमाणिक सामग्री के अनुरूप उसका तदस्थ और निष्पक्ष हो पाना बहुत मुष्किल होता है। इतिहासकार के संस्कार सोच, दुष्टि और विचारधारा प्रत्यक्ष-परोक्ष या जाने-अनजाने समाविष्ट होकर रचे जा रहे इतिहास को प्रभावित करने लगते है। यह किसी के साथ भी हो सकता है। इस उलझन से बचने के लिए हमें ’’वाद-विवाद-संवाद’’ की मेथोडोलोजी को अपनाना चाहिए जिसके माध्यम से विभिन्न दृष्टिकोणों से लिखें और अनलिखें इतिहास का विष्लेषण करके उस निष्कर्ष तक पहुँचना चाहिए जो बौद्धिद-तार्किक व तथ्यात्मक-वैज्ञानिक तुला पर खरा उतरे। पढ़ सुन कर लगे कि ’’हाँ, यह प्रमाणिक है, यह सच है, इसे स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं।’’ इतिहास की ऐसी प्रमाणिकता के सामने तथ्यात्मक यथार्थ बनाम मूल्यात्मक आग्रह की असुविधाजनक स्थिति भी पैदा नहीं होनी चाहिए। इतिहास को ’’क्या है’’ के रूप में ही देखना चाहिए, न कि ’’क्या होना चाहिए’’ के रूप में। ’’इतिहास के प्रति दृष्टिकोण’’ पर यह संक्षिप्त चर्चा विषयांतर नहीं है। जब तक हम इसे न समझे, ’’इतिहास और आदिवासी’’ विषय पूरी तरह हमारी समझ में नहीं आता। हाँ, तो इतिहास-चर्चा से पहले हम मिथकों पर कुछ उदाहरणों के सहारे बात करें। जहंा तक मिथकों में आदिवासियों की विकृत प्रस्तुति का प्रष्न है हमें पुराणों के साथ रामायण और महाभारत में भी जाना होगा। पुराण ई.पू. की दूसरी सदी से ई.पू. की सातवीं सदी के कालखंड में लिखे गये। इनके माध्यम से बुद्ध और महावीर द्वारा आरंभ किए ब्राह्मण विरोधी आन्दोलन से ध्वस्त पुरोहित वर्चस्व को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया गया। ध्यातव्य है कि सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान किया। जैन ग्रंथो में इस बात का उल्लेख है कि अंत में वे जन मुनि बन गये (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेष खंड-एक, डा. रामविलास शर्मा -पृष्ठ 636) यह तो सर्वविदित है कि सम्राट अषोक ने बौद्व धर्म के प्रसार-प्रचार में जी-जान लगा दी। ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र अपने स्वामी मौर्य सम्राट ब्रहदथ का वध करके जब सम्राट बनते हैं, (ई.पू. 184) तभी से ब्राह्मणवादी वर्चस्व पुनः स्थापित होता है जिसे गुप्तवंषीय राजाओं का भरपूर प्रश्रय मिला। यह सारा कालखंड ई.पू. दूसरी सदी के सातवीं सदी तक चलता है। इसी दौरान पुराण लिखे जाते हैं जिनमें चमत्कार, अतिषयोक्ति एवं मिथकों के माध्यम से ब्राह्मणवादी व्यवस्था को गौरवान्वित किया जाता है जो अनार्य-आदिवासी विरोधी रहती आयी थी और आगे भी चलती है। पौराणिक मिथकों का कुछ अंष रामायण में और अधिकांष महाभारत के माध्यम से पहले ही प्रस्तुत हो चुका था। रामायण के प्रमुख पात्र राम हैं, जिन्हे पुरूषोत्तम के रूप में अब तक संपूर्ण समाज पर स्थापित किया जाता रहा। अगर राम के जीवन में से वनवास के चैदह वर्ष निकाल दिए जायें तो उनके व्यक्तित्व में क्या बचेगा ? उन महत्वपूर्ण चैदह वर्षो में राम आदिवासियों के साथ रहे और उन्ही की ताकत से अनार्याें (आदिवासियों के विषेष संदर्भ में) से युद्वोपरांत विजयी होते हैं। इस सबके बावजूद राम की व्यवस्था में आदिवासी नायकों की भागीदारी, हस्तक्षेप एवं दर्जा क्या रहा ? भद्रजन के लिए यह बड़ा ही असुविधाजनक प्रष्न होगा। निर्दोष शंबूक के वध के बावजूद राम महान रहेंगे ! कितना रोचक होगा अगर हम ’’गुजरात के गोधराकाण्ड-न्यूटन का सिद्वांत-प्रायोजित नरसंहार’’ के समीकरण की ही तरह ’’सूर्पणखा-सीता अपहरण-लंका काण्ड पर न्यूटन के सिद्वांत को लागू करके देखें। राम-रावण युद्ध में दोनों ही तरफ से मरने वाले आदिवासी-अनार्य और युद्व किसके लिए ? इससे भी आगे-आपके लिए जो मानव समुदाय शत्रुपक्ष था उसे मनुष्य न मानकर राक्षस, असुर, दैत्य दानव न जाने किस- किस तरह विरूपित किया गया और जिन्होनें आपका साथ दिया उन्हें गिद्ध, रीछ वानर आदि की संज्ञा देकर जंगली जानवरों की श्रेणी में रख दिया, ताकि भविष्य तक में कभी उनकी असली पहचान न हो सके ?? महाभारत में चिरपरिचित एकलव्य का प्रसंग आता है। आर्यगुरू ने धनुर्विधा सिखाने से मना कर दिया। निषादराजपूत्र से फिर भी उसको गुरू मनवा दिया और अपने बलबूते पर धनुर्धर बन जाने पर भी बतौर दक्षिणा अंगुठा काट कर दिलवा दिया। कान पक गये यह कथा सुनते-सुनते मेरे गले यह कथा इस रूप में कतई नहीं उतरती। तर्क सम्मत यह लगता है कि एकलव्य का अगुंठा जबरन काटा होगा। इस जघन्य अपराध को ढकने के लिए तथा कथित दक्षिणा का स्वांग रचकर थोप दिया गया। आदिवासी स्त्री हिडिम्बा के पुत्र घटोत्कच का प्रसंग आता है। अर्जुन को बचाने के लिए शहीद कर दिया जाता है। घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक का महत्वपूर्ण प्रसंग महाभारत में है। वह किषोरावस्था में ही था, मगर अत्यन्त बलवान। दुर्योधन कहीं से ढूंढ कर उसे अपने पक्ष में लड़ने के लिए बुला लेता है। वहीं कौरवों की तरफ से लड़ता है। ध्यान देने की बात है कि महाभारत युद्व में अधिकांष आदिवासी कौरवों के पक्ष में लड़े थे। एकलव्य स्वयं इसका उदाहरण है। उसका अगुंठा अगर द्रोणाचार्य मांगता तो शायद वह उसकी सेना के पक्ष में न लड़ता। अगूंठा काटने वाले पांडव थे, इसलिए वह पांडवों के विरूद्व लड़ा था। हो, तो बर्बरीक की कथा यूं चलती है कि जैसे ही वह युद्धभूमि में आया तो, कृष्ण समझ गये कि अब पांडवों का बचना मुष्किल है। क्या किया जावें ? भोले किषोर बर्बरीक को सोलह कला प्रवीण भगवान छलने के लिए चल देते हैं। कहते है-’’कलियुग में तेरी पूजा का इंतजाम किये देता हूँ। इस वक्त बैंकंुठ (या स्वर्ग) धाम में भेजने की गारन्टी भी लेता हूँ। बस एक काम कर दे, लडे मत और तेरी शीष मुझे सौंप दे।’’ ’’जवाब मिलता है, ’’आप तो भगवान है, जो करेगे ठीक ही होगा। मेरी इतनी सी इच्छा है कि दोनो ओर से बडे-बडे धुरंधर लड़ रहे है। मैं इनकी बहादुरी देखना चाहता हँू।’’ शर्त मान ली जाती है। बर्बरीक शीष सौंप देता है। एक मत के अनुसार कुरूक्षेत्र के मैदान के निकट लम्बे बांस पर बर्बरीक का शीष टांँक दिया जाता है, जहंँा से उसने सारा युद्व देखा। दूसरे मत के अनुसार कुरूक्षेत्र के निकट सबसे उँची पहाड़ी चोटी पर शीष रख दिया जाता है। यह पहाड़ सीकर (राजस्थान) के निकट हर्ष पर्वत है जिसकी ऊँचाई 3300 फीट है। माउन्ट आबू के गुरू षिखर (करीब 6000 फीट) के बाद राजस्थान-हरियाणा-निकटवर्ती-उत्तरप्रदेष-पंजाब के अंचल में यही सब से ऊँचा पहाड़ हैं। हर्षपर्वत और रींगस के बीच खाटू श्याम जी का धर्मस्थल है, जिसमें केवल शीष वाली प्रतिमा है, जिसकी पूजा होती है। इसे ’’ष्याम बाबा’’ कहते है। शीष मूर्ति से लगता है यह बर्बरीक ही होगा। हर्ष के पर्वत सीकर से ही उसने महाभारत युद्व देखा। इस प्रसंग को यहीं रोकते है और यह कहते है कि खाटू श्याम जी की मूर्ति तो बर्बरीक की है लेकिन मान्यता यह चली आ रही है कि यह श्री कृष्ण का बाल रूप है और उसी की पूजा होती है। सालाना लक्खी मेला यहंा लगता है। विड़म्बना यह है कि शीष काटकर देने के बाद भी आदिवासी बर्बरीक की जगह कृष्ण को पूजा गया। एक ओर प्रसंग महाभारत में। अष्वमेघी यज्ञ के घोडे की यात्रा के दौरान अर्जुन की लड़ाई बभू्र वाहन से होती है। यह स्थान पूर्वांचल है। बभ्रूवाहनं मणीपुर के आदिवासी राजा चित्रवाहन की राजकुमारी चित्रांगदा का पुत्र था। उल्लेखनीय है अर्जुन ने चित्रांगधा और नाग कन्या उलूपी (दोनों आदिवासी) से विवाह (?) किया था। लड़ाई में अर्जुन मारा जाता हंै (बेहोष हुआ होगा) और उलूपी जड़ी-बूटियों से उसे जीवित (?) करती है। प्रष्न यह है कि अर्जुन को धूल चटा देने वाला शुरवीर बभ्रूवाहन महान नहीं माना जाकर अतुलनीय योद्वा अर्जुन को ही बताया जाता है। एक और प्रसंग। कृष्ण का वध जारा शबर नामक आदिवासी के हाथों होता है। मैंने वध स्थल (गुजरात) की यात्रा की है। घटना स्थल की परख की । किसी भी कोंण से देखैं, यह सम्भव ही नहीं कि हरिण की आंँख समझ कर पगतल में चमकते पदम चिन्ह पर निषाना साधा हो। अगबर आखेट था तो शबर का बाण जहरीला नहीं हो सकता और बाण जहरीला नहीं था, तो पैर में बाण लगने से कम से कम तत्काल तो मृत्यु नहीं हो सकती। इसके लिए पूरे शरीर का ’’सेप्टिक’’ होना जरूरी होगा। वह भी तब, जब कि कोई उपचार न किया जाये। आप कहते रहिए अगल जन्म में बाली के हाथों मरने वाला वरदान राम ने दिया था। और जारा शबर ही त्रेतायुग का बाली था। सारे सन्दर्भ देखने पडंेगे। खाण्डव वन दहन में आदिवासी नाग जाति को भस्म करने में कृष्ण एवं अर्जुन द्वारा अग्नि का सहयोग करने से लेकर कंस-षिषुपाल-जयद्रथ वध, एकलव्य का ’’अगुंठा’’, घटोत्कच-बर्बरीक-बभ्रूवाहन प्रसंग तक। यही नहीं, जाना होगा सतयुग और त्रेतायुग में भी। आप भीलों की मौखिक और गेय परम्परा का महाभारत (’’भीलों का भारथ’’ द्वारा श्री भगवानदास पटेल) पढ जाइये। पात्र एवं घटनास्थल करीब-करीब वही है लेकिन संदर्भ बदले हुए पायेंगे। वहंा अर्जुन की जगह नागवंषी आदिवासी राजा वासुकी अतुलनीय यौद्वा और बलवान मिलेगा। श्री पटेल भीलों की रामायण भी लिख रहे हैं। उनका यह अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है आदिवासियों की दृष्टि से भारतीय मिथकों की व्याख्या के परिप्रेक्ष्य में। पूरा का पूरा तथा कथित सतयुग भरा पड़ा है मिथकों से और मिथकों में आदिवासियों के विकृतिकरण से। इंद्र का सन्दर्भ ले लिजिए। छल-छद्म, अययास, व्यभिचार, यहाँ तक की बलात्कार (कानूनी परिभाषा और अहल्या प्रसंग) क्या-क्या कुकर्म उसने नहीं किए, और मनुष्य में श्रेष्ठ देवता और देवताओं के स्वामी (श्रेष्ठम) इन्द्र की पूजा आप करते रहिए। नारद, तुम्बरू जैसे पात्र अनार्य-आदिवासी थे। नारद के चरित्र को समझिए इन्द्र की व्यवस्था के विरोध में हर जगह व्यंग करता है। उसके कथनों की मूल भावना और उद्देष्यों को समझने के लिए दिमाग पर अधिक जोर देने की आवष्यकता ही नहीं पड़ेगी। क्या हैं ये ’’महान’’ चंद्रवंषी और सूर्यवंषी श्रत्रिय ? उन्हीं के समर्थन में लिये गये षास्त्रों से स्थिति स्पष्ट हो जायेगी। पुरूरवा की अप्सरा (वेष्या) पत्नी उर्वषी की औलाद की पीढ़ियां चंद्रवंषी और अप्सरा (वेष्या) मेनका पुत्री ष्षंकुतला की औलाद की पीढ़िया सूर्यवंषी हुए। यह पूछना बड़ा ही असुविधाजनक होगा कि ‘‘तुम्हारी (दोनों वंषों की) आद्यजननी तो ...............थीं, फिर तुम महान कुल परंपरा कैसे हुए ?’’ दूसरी तरफ यह सवाल उठता है कि प्राचीन काल में अपनी पुष्तैनी धरती पर ष्षांति से जीवन जी रहे आदिम समुदायों पर आपने बाहर से आकर हमले किए, उन्हें मारा, दास बनाया, भगाया और फिर असुर, राक्षस, जंगली जानवरों की संज्ञा दी। फिर तुम श्रेष्ठ कैसे हुए ? आदिवासी इतिहास लिखने से पहले हमें ‘‘मिथकों में आदिवासी’’ के सारे संदर्भो को पुनव्र्याख्याथित करना होगा। आस्था और भावना अपनी जगह है मगर अतीत का निरूपण तो तथ्यात्मक, तार्किक, बौद्धिक व वैज्ञानिक ही होगा। अब बात आती है इतिहास में आदिवासियों की। इससे पहले यह देखा जाये कि इतिहास मंे आम आदमी किस हद तक होता है ? इतिहास के नाम पर हजारों वर्षों तक राजा - महाराजाओं का इतिहास ही लिखा जाता रहा। प्राचीन काल से मुगल काल तक भाट - चारणी - दरबारी इतिहासकारों की परंपरा हावी रही। इसमें प्राचीन सम्राटों , तथाकथित गणराज्यों के शासकों , मुस्लिम बादषाहों , रियासती सामंतों के पक्ष में इतिहास लिखा व लिखवाया जाता रहा। अंग्रेज काल में इतिहास लेखन के क्षेत्र में बहुत सारा काम हुआ। अंग्रेज इतिहासकारों की मानसिकता पूरे भारत देष की परम्परा को हेय दृष्टि से देखने की ही रही। उपनिवेषवाद के दौर में यह सम्भव ही नहीं हो सकता था कि इतिहास में आम आदमी को जगह मिले। आजादी के बाद इस क्षेत्र में निस्संदेह महत्वपूर्ण कार्य वामपंथी इतिहासकारों ने किया। किसानों व श्रमिकों के आन्दोलनों, सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियों, वर्ग संघर्ष की परम्परा आदि को उजागर करने का प्रयास हुआ। लेकिन वामपंथी विचारधारा के सिद्वांत उन पर इस कदर हावी रहे कि वे देष की परम्पराओं के, समस्याओ के समाधान के सारे सूत्र (ऐतिहासिक दृष्टि से) अन्तराष्ट्रीय साम्यवाद में ही ढंूढते रहे। हर प्रषन का उत्तर माक्र्स, ऐंगिल्स लेनिन, माओ के विष्लेषण में तलाषते रहे। उदाहरणार्थ, भारत में जाति व्यवस्था के यथार्थ को नजरअंदाज करते रहे। आजादी की लड़ाई के दौरान बाबा साहेब अम्बेडकर के नेतृत्व में समाज का दलित वर्ग बाह्मणवादी वर्चस्व के विरूद्व मोर्चा थामें आगे बढ़ रहा था तो उन्होने वामपंथियों के साथ आने का आग्रह किया। इस पर स्वंय ई एम एस नम्बूदरीपाद ने कहा कि ’’दलितों के पचड़े’’ में अभी नहीं पड़ना है। साम्राज्यवाद पर विजय प्राप्त करने के बाद दलितों की समस्या अपने आप हल हो जायेगी। यही वजह रही कि सर्वहारा के पक्ष में चिंतित चिन्तनषील वामपंथियों को दलितों ने अब तक स्वीकार नहीं किया है। वर्तमान दौर में तो इतिहास लेखन (पुर्नलेखन) का काम सत्ता पोषित इतिहासकार खुले आम कर ही रहे हैं और इस मुहिम में वे ब्राह्मणवादी वर्चस्व को पुनः स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। इतिहासकारों की ऐसी परम्परा व मानसिकता के चलते इतिहास में आदिवासी कहँा मिलेंगे। आदिवासियों से जुड़ी एवं बडी एक एतिहासिक घटना का जिक्र मैं करना चाहूँगा। राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में गुजरात सीमा पर एक जगह है मानगढ़ का पहाड। अंग्रेजो और रियासती सांमतों के मिले-जुले शोषण के षिकार आदिवासी लोग 17 नवम्बर, 1913 के दिन वहँा एकत्रित हुए। बनजारा जाति के आदिवासी गोविंद गुरू की अगुवाई में उप निवेषवादी-सामंतवादी व्यवस्था के विरूद्व यह आदिवासियों के द्वारा देष की आजादी की लड़ाई का हिस्सा था। करीब 15-20 हजार आदिवासी वहंा एकत्रित हुए। बैगार प्रथा, वन सम्पदा के उपयोग पर पाबंदी एवं भारी लगान के विरोध में यह सभा आयोजित की गई। ब्रिटिष कमाण्डेन्ट जे.पी. स्टोक्ले के नेतृत्व में जाट रेजीमेंट, राजपूत रेजीमेंट और मेवाड़ भील कोर की चार फौजी कम्पनियों के हथियार बंद लवाजमें ने उन आदिवासियों पर अचानक धावा बोला। बंदूकों-मषीनगनों की गोलियों से उन्हे भून डाला। डेढ़ हजार आदिवासी शहीद हुए। गोविंद गुरू के साथ सेकड़ों आदिवासियों को गिरफ्तार कर लिया गया। यह तिथि माघषीर्ष पूर्णिमा थी। हर साल इस दिन वहंा आदिवासियों का विषाल मेला भरता है। अंचल का बच्चा-बच्चा इस घटना के बारें में जानता है। जाहिर है, इस घटना में जलियांवाला बाग कांड से चार गुना संख्या में आदिवासी शहीद हुए थे। भारत की स्वतंत्रता के इतिहास में इस घटना का कहीं जिक्र नहीं है। अंग्रेजो ने तो खैर इस घटना को अपने हिसाब से दबा देने का षडयंत्र रचा ही, हमारे धुरंधर इतिहासकार भी सोते रहे। इतिहास की दृष्टि से यह घटना इतनी पुरानी नहीं है कि प्रमाण न जुटाये जा सके। मैंने स्वयं घटना स्थल और क्षेत्र का दौरा किया। कुछ दस्तावेज भी इधर-उधर से जुटाये। इस घटना में तनिक भी संदेह नही। स्थानीय आदिवासी नेताओं ने पिछले कुछ अर्से से आवाज उठाई। 15 अगस्त, 2001 को दैनिक भास्कर अखबार में मेरा संपादकीय इस विषय पर छपा था। पहल-71 पत्रिका में विस्तृत यात्रा वृतान्त के रूप में इस घटना को मैंने उजागर किया। यहंा मैं मेरी बात नहीं कर रहा हँू,, अचंल के आदिवासी जागरूक थे। शहीद स्थल के रूप में मानगढ़ के विकास की योजना बनी। शहीद स्मारक का षिलान्यास राजस्थान के वर्तमान मुख्य मंत्री महोदय ने ता. 27 मई, 1999 को कर दिया है। उसी दिन सवा करोड़ की राषि खर्च करने की घोषणा भी की थी। हाल ही इस अगस्त (2002) के पहले सप्ताह भारत सरकार ने दो करोड़ तेईस लाख की राषि और स्वीकृत कर दी है और यह मान लिया है कि पहला जलियावांला कांड मानगढ़ में हुआ था। आष्चर्य है कि करीब एक सदी तक यह घटना इतिहास का हिस्सा न बन पायी जिसमें से आधी सदी आजाद भारत के खाते में है। चुल्लूभर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए हमारे महान इतिहासकारों को ! कम से कम शर्म आनी चाहिए और राष्ट्र से क्षमा मांगनी चाहिए कि वे इतिहासकार के रूप में कितने नकारा साबित हुए। एक और ऐसी ही घटना मानगढ़ से थोड़ी दूर गुजरात की विजयनगर रियासत (अब तहसील) के गांव पालचित्तरिया में घटी थी। मानगढ़ की ही तरह 7 मार्च, 1922 के दिन में 1200 आदिवासी शहीद हुए थे। ’’इण्डिया टू-डे’’ की एक टीम वहंा गई। कुछ लोग जिंदा है जो घटना के चष्मदीद गवाह है, उनसे भी बातें की। ’’इण्डिया टू-डे’’ के 3 सितम्बर 1997 के अंक में उदय माहूरकर की रपट इस सम्बन्ध में छपी। विरसा मुडंा जैसे क्रांतिचेता को बहुत अर्से बाद स्वीकार किया गया। आदिवासी अचंलों में ऐसी एकाध नहीं, वरन् सैंकड़ो घटनाएं हुई है। अतीत से लेकर आज तक का आदिवासी इतिहास संघर्ष का सिलसिला रहा है, जिसे जाने-अनजाने भुलाया जाता रहा। इतिहास के तथ्यों को कैसे तोड़ा-मरोड़ा जाता है, इसका एक उदाहरण देखिए। महाराणा प्रताप के अत्यन्त विष्वसनीय और योद्वा सेनापति राणा पूंजा थे। वे भील थे। भीलू राजा भी उन्हे कहा जाता रहा । राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे, तो राणा पूंजा की प्रतिमा का उदयपुर में उन्होने अनावरण किया। हिरणमगरी (पहाड़ी) जहँा राणा प्रताप की प्रतिमा है, उसी से कुछ दूरी पर राणा पूँजा की प्रतिमा स्थापित की गई। यह सर्वविदित है कि राणा प्रताप के साथ पड़ने वाले राजपूत अत्यल्प थे और आदिवासी ही प्रमुख रूप से लड़े थे। कुछ लोगों ने एक कुचक्र रचा। चमचे किष्म के इतिहासकारों की एक कमेटी बनायी। उनसे यह साबित करवाया गया कि राणा पूंजा आदिवासी न होकर राजपूत थे। उनके हिसाब से योैद्वा केवल राजपूत होते हैं, और सब टटपुंजिये हैं। अगर इस साजिष का विरोध नहीं हुआ तो सम्भव है एक-न-एक दिन ऐसे लोग अपने प्रयासों में सफल हो जायें और राणा प्रताप के साथ लड़े आदिवासियों के बलिदान को पूरी तरह भुला दिया जाये। इतिहास से सम्बन्धित एक ओर अत्यन्त गम्भीर बात है आदिवासियों का अपराधी के रूप में समाज के सामने प्रस्तुतीकरण। यह षडयंत्र अंग्रेजो और देषी सामन्तांे का मिला-जुला प्रयास था। आदिवासियों की सत्ता और संसाधन छिन लिए जाने पर वे विद्रोही बन गये। राज्य शक्ति के साथ उन्हें कानून की ताकत से दबाने का दुष्चक्र रचा गया। सन् 1871 में क्रिमीनल ट्राइब एक्ट सबसे पहले बाम्बे प्रेसेडेन्सी में लागू किया गया। बाद में एक-एक कर अन्य क्षेत्रों में। यद्यपि आजादी के बाद यह कानून समाप्त कर दिया गया और इसकी जगह ’’आदतन अपराधी अधिनियम’’ बना दिया गया, जो समुह आधारित न होकर व्यक्ति आधारित है। सवाल यह है कि ऐतिहासिक प्रमाण कहीं सिद्व नहीं करते कि आदिवासी अपराधी रहे हैं, लेकिन गैरआदिवासी समाज का अधिकंाष स्वर्ण तबका उस षड़यंत्र की वजह से अब तक आदिवासियों के प्रति वही मानसिकता अपनाये हुए है। आष्चर्य होगा यह जानकर कि राजस्थान स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं की सामान्य ज्ञान की पुस्तकों में अभी भी मीणों, भीलों एंव अन्य आदिवासियों का परिचय यह कह कर दिया जाता है कि ’’इनका मुख्य धंधा चोरी, लूट, डकैती रहा है।’’ कंजर ,सांसी , बावरिया, कालबेलिया, पारधी, बेड़िया जैसी आदिम समूहों को पुलिस चैन से नहीं बैठने देती। इस दौर में यह समाज शास्त्रीय दृष्टिकोण आदिवासियों के प्रति अंग्रेज कालीन व्यवस्था (जो कि अब इतिहास है) और देषी सामन्तवाद की उपज है। उस इतिहास को पढकर यह समाज शास्त्रीय धारणा बनती है, जिसका विरोध आदिवासियों एवं कुछ अन्य व्यक्तियों एवं संगठनो के अलावा आम बुद्विजीवी क्यों नही करता ? आष्चर्य तो यह है कि ऐसी पुस्तकों के ऐसे घोर ’’आब्जेक्षनेबल’’ अंषों की ओर सरकार व प्रषासन का ध्यान भी क्यों नहीं जाता ? ऐसे लखकों और प्रकाषकों के विरूद्व दण्डात्मक कार्यवाही क्यों नहीं की जाती ? यह उदाहरण सिद्व करते है कि किस प्रकार प्रयोजित-प्रायोजित या जाने-अनजाने आदिवासिायों से सम्बन्धित महान घटनाओं व राष्ट्र के लिए उनके त्याग व बलिदान को इतिहास से बाहर रखा गया। इसके साथ उन्हे बदनाम भी किया जाता रहा। अह्म सवाल उठता है कि आदिवासियों के इतिहास को सामने कैसे लाया जाये ? इतिहास की खोज और लेखन का महत्वपूर्ण काम सम्भव कैसे हो ? किसी बात को कहने के लिए यदि व्यक्तिगत अनुभव व जानकारी का इस्तेमाल किया जाये तो मैं समझता हूँ, अधिक सहज और आधिकारिक होगा। जयपुर के निकट बस्सी निवासी श्री झूथालाल नाढंला (मीणा आदिवासी) ने वर्षो मेहनत करके सन् 1968 में ’मीणा इतिहास’ छपवाया। बहुत सारी सामग्री एकत्रित की। जागा-पोथियों का अध्ययन, जागाओं की पंचायत, स्थलों का भ्रमण, पुराने दस्तावेजों की परख, मोैखिक परम्परा आदि का अध्ययन करके यह सामग्री बटोैरी। इतिहासकार रावत सारस्वत से यह इतिहास लिखवाया पूरी इतिहास पुस्तक को पढ कर लगता है कि मीणा इतिहास के हर पृष्ठ पर स्वयं रावत सारस्वत कहीं न कहीं हस्तक्षेप करते हुए दिखायी देते हैं उनके माध्यम से उनके अपने ब्राह्मणवादी संस्कार, पूर्वाग्रह, सोच, दृष्टि आदि झलकती दिखती है। बडा काम हुआ, मगर ईमानदारी से नहीं हो पाया। इससे पहले मुनि मगन सागर (मीणा परिवार में जन्में और बाद में जैन मुनि बन गये थे) ने मीणा आदिवासियों पर गहन अध्ययन किया। मीणो के प्राचीन राज्य, राजवंष, गोत्र आदि पर महत्वपूर्ण सामग्री बटौरी। मीणो की उत्पत्ति की खोज की। टोटम के रूप में ’’मीन’’ (मत्स्य) के आधार पर मीना, मीणा, मारण आदि संज्ञाओं की व्याख्या की। ’’मीन पुराण भूमिका’’ और ’’मीन पुराण’’ के रूप में महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखें। उन्हे किसी ने कह दिया कि ’’काषी में विद्वान पण्डित रहते हैं, उनमें से किसी को बुलवाओ और उनकी सलाह लेकर इस सब को अन्तिम स्वरूप दो।’’ काषी के दो पण्डितो के चक्कर में वे पड गये और अधिकांष सामग्री के अर्थ का अनर्थ कर दिया। उदाहरणार्थ ’’मीन’’ को टोटम से बदलकर विष्णू के मत्स्यावतार से जोड दिया और यह निष्कर्ष निकलवा दिया कि मीणा लोग आर्यों से सम्बन्ध रखते हैं और क्षत्रिय है। वर्णाश्रमी व्यवस्था मीणा आदिवासियों में नही मिलती। उनके रीति-रिवाज, मौखिक परम्परा, संस्कृति, धर्म, संघर्ष, गाथांए, प्रकृति से जुडाव, पंचायत व्यवस्था सब कुछ आदिवासी है, मगर केवल एक शब्द ’’मीन’’ (मत्स्य) की गलत व्याख्या करने से सब कुछ गुड-गोबर हो गया। अभी भी कुछ लोग इस फहमी के षिकार हैं। प्रतिष्ठित इतिहासकारों का आदिवासियों के प्रति रवैया काफी हद तक हमने इस लेख के पूर्वोक्त हिस्सों में देख लिया। अब भी क्या आदिवासी लोग इन्तजार करेंगे और उन्हीं की ओर झांकते रहेंगे, कि वे ही आदिवासियों का इतिहास लिखने के लिए अधिकृत और सक्षम हैं ? जब यह सिद्ध हो चुका कि आदिवासियों द्वारा लिखा गया साहित्य तुलनात्मक दृष्टि से किसी ओर साहित्य से कम नहीं है, प्रत्युत आदिवासी विषय वस्तु के परिप्रेक्ष्य में तो उससे अधिक गुणात्मक व आधिकारिक है, तो आदिवासी ही आदिवासियों का इतिहास क्यों न लिखें ? इन प्रष्नों का सीधे-सीधे ’’ हंा’’ या ’’ना’’ में उत्तर देना कुछ उलझन पैदा कर सकता है। उचित यह होगा कि जागरूक व बुद्विजीवी आदिवासी लोग एवं आदिवासी समाज को लेकर प्रतिबद्व गैर आदिवासी प्रबुद्धजन दायित्वबोध के साथ गम्भीर होकर इस मुद्दे पर विचार करें। अपने-अपने स्तर पर या टीम बनाकर इस काम में जुट जायें और कुछ सार्थक करके बतलायें। इतिहासकारों ने अब तक जो भूल की है उसका पष्चाताप करें और इतिहास में से जो महत्वपूर्ण छूट गया है, उसे जोड़ने का मूल्यवान काम तुरंत हाथ में लें। इतिहास लिखने/लिखवाने या उसे प्रकाषित करवाने की समस्या इतनी बड़ी नहीं है, जितनी बड़ी चुनौती इतिहास को खोजने की है। इसके लिए निम्न सुझाव उपयोगी हो सकते है: ऽ आदिवासियों से सम्बन्धित भारतीय मिथकों की पुनव्र्याख्या की जाये। ऽ प्राचीन षिलालेख, ताम्रपत्र, सिक्के, पट्टे, परवाने तथा अन्य लिपिबद्ध प्रमाण जो किसी भी प्रकार आदिवासियों से सम्बन्ध रखते हो। ऽ प्राचीन हस्तलिखित पोथियंा, पीढियंा, वंषावालियंा और स्फुट बातें जिनमें आदिवासियों का उल्लेख हो। ऽ शास्त्रों, ग्रंथों, महाकाव्यों में जहंा आदिवासियों के सन्दर्भ आये हैं उनकी सही व्याख्या। ऽ प्राचीन गढ, किले, मन्दिर, देवले, बावड़ी, तालाब, कुएं, हथाई तथा अन्य ऐसी इमारतें जिनका ताल्लुक आदिवासियों से रहा हो। ऽ आदिवासियों के बारें में जागाओं, भाटों, गायकों द्वारा कही जाती रही बातें। ऽ राणाओं तथा अन्य याचकों द्वारा गाये जाने वाले गीत, कवित्त, दोहा एवं कहावतों का अध्ययन। ऽ आदिवासी समाज में प्रचलित लोकगीत, लोक गाथाओं आदि में जो सन्दर्भ आये, उनका संकलन। ऽ आदिवासी उत्सव, मेलों, खेल, प्रतियोगिताओं, शोर्यगाथाओं, मुहावरों, पहलियों से निकलने वाली ऐतिहासिक महत्व की बातें। ऽ आदिवासी समाज में प्रचलित जन्म, विवाह, मृत्यू, श्राद, पितर, लोकदेवता, टोटम आदि से सम्बन्धित परम्पराओं का अध्ययन। ऽ आदिवासियों की जीवन शैली एंव जीवन दर्षन के विविध आयामों का वैज्ञानिक - तार्किक विष्लषण जो एक पंरपरा का शन कराता है। ऽ अंधविष्वासों एंव कुरीतियों के पीछे वास्तविक कारणों की खोंज। ऽ आदिवासियों की पंचायती परंपरा, स्वषासन पद्धति, सामाजार्थिक जीवन आदि की जानकारी जो परपंरा के सूत्र बताती हो। ऽ आदिवासियों का अतीत उथल-पुथलों से भरा पडा है। आक्रमण, विरोध, हार- जीत, एक स्थान से दूसरे स्थलों की ओर पलायन आदि आदि। ऐसे किस्से बडों-बूढों की जुबान पर अब श्ी हैं। इनका संकलन और विष्लेषण। देष के अंचल अंचल में आदिवासी बिखरे हुए हैं लेकिन धर्म, संस्कृति, सामाजिक-व्यवस्था, आर्थिक जीवन, स्वभाव, बाहरी दबाव, शोषण, शोषण का प्रतिरोध और अस्मिता के लिए निरतंर संघर्ष आदि ऐसे तत्व हैं जो हर आदिवासी समुदाय को आपस में एक सूत्र में बांधे हुए हैं। अब देखिए ना, जब विरसा मुंडा झारख्ंाड अंचल में आदिवासियों को संगठित कर जागरूक कर रहे थे और अंग्रेजों एंव देसी शासकों के विरूद्ध लड रहे थे, उसी दौर में गोविन्द गुरू के नेतृत्व में आदिवासी राजस्थान व गुजरात में अंग्रेजों और रियासती व्यवस्था से लोहा ले रहे थे। देखने की बात यह है कि उनके बीच कोई संवाद-संप्रेषण नहीं था फिर श्ी लड़ाई एक ही दौर में एक सी शैली में हुई। शषा का क्या, शषा-बोली तो हर बारह कोस पर बदलती जाती है। फिर श्ी कुछ शब्द होते हैं जो पुरानी पहचान कराते रहते हंै। उदाहरणार्थ, ’‘जोहार’‘ ऐसा शब्द है जो अभिवादन के लिए हर अंचल में इस्तेमाल किया जाता है। फर्क इतना सा ही मिलेगा कि झारखंड में ’‘जोहार’‘ है तो राजस्थान में ’‘जुहार’‘। देष के किसी भी क्षेत्र के सामूहिक आदिवासी आयोजन को देख लो, नजारा एक सा मिलेगा। वाद्ययंत्रों की बनावट व सुर और गीतों की धुन में समानता मिलेगी। प्रकृति प्रेम और मानव स्वभाव सभी आदिवासी समूहों में एक समान कारक (थ्।ब्ज्व्त्) मिलेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी अंचल के आदिवासी हों, उनका एक इतिहास भी सामने आना चाहिए। ऐतिहासिक सामग्री व्यापक स्तर के साथ आंचलिक स्तर पर भी एकत्रित करनी होगी। इस प्रक्रिया में कुछ सीमा तक संभव है, आंचलिक झलकियां-झांकियां देखने को मिले। उनको भी एक सूत्र में पिरोना होगा। यह सब करने से ही इतिहास में आदिवासियों को पहचान मिल पायेगी, अन्यथा नहीं। प्रस्तुतकर्ता हरि राम मीणा Hari Ram Meena पर 1:13 पूर्वाह्न 0 टिप्पणियाँ: एक टिप्पणी भेजें इस संदेश के लिए लिंक एक लिंक बनाएँ नई पोस्ट मुखपृष्ठ सदस्यता लें टिप्पणियाँ भेजें 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भारतीय मिथक, इतिहास और आदिवासी मेरे बारे में About Me मेरा फोटो हरि राम मीणा Hari Ram Meena जयपुर Jaipur, राजस्थान Rajasthan, India भारत के राजस्थान प्रान्त में अवस्थित बामनवास नामक ग्राम में रहने वाले आदिवासी किसान परिवार में जन्मा। पिता को केवल अक्षर ज्ञान था और मा एकदम अनपढ। लेकिन इन दोनों ने मुझे शिक्षा दिलाने की ठानी। प्रारम्भिक शिक्षा ग्रामीण परिवेश मे फिर उच्च शिक्षा जयपुर में प्राप्त की। राजस्थान विश्व् विधालय से मैंने एम.ए. राजनीति विज्ञान में किया। बैंक में क्लर्क की नौकरी के बाद राजस्थान पुलिस सेवा में भर्ती होकर वर्ष 1993 की वरिष्ठता के साथ आई. पी. एस. में पदोन्ंती के माध्यम से पठन-लेखन रुचि। पुलिस और लेखन कर्म में बेहतरीन सामन्जस्य बनाये रखने का प्रयास करता रहा हू । समय प्रबन्धन के साथ प्रकृति मानवेत्तर प्राणी जगत और आम आदमी के हर्ष व विषाद के सौन्दर्य प्रेरणास्पद शोध के साथ उनके विभिन्न पक्षों की अभिव्यक्ति कविता व गध दोनो में करते रहने का प्रयास करता रहा हू । जिन्हें समाज के हाशिये से भी नीचे धकेलते रहने के जान-अनजाने प्रयास किये जाते रहे हैं। उन आदिवासीजन से जुडे मुद्दों को प्राथमिकता देते रहना सुख देता है। पाठकों एवं अन्य साहित्यिक मित्रों ने यथोचित साथ दिया है। नितांत एकांत में मैं ‘मैं’ हू इसलिए ‘मैं’ के अतिरिक्त मैं अन्य कुछ भी नहीं और ‘मैं’ होने का मुझे गर्व है। लेकिन ‘मैं’ के सत्य की खोज में इस ‘मैं’ एवं दृष्यादृष्य सृष्टि के विस्तार में स्वयं को यायावर सा अनुभव करता रहा हू। मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें

जो इस धरती के मूलवासी थे, उन्हाेने लम्बे अर्से तक जमीन और प्रकृति से जुड़ी अपनी व्यवस्था कायम की। संस्कृति, धर्म समाज और भौतिक जीवन की एक मूल्यवान परम्परा विकसित की। बाहर से आक्रांता आये और युग-युगों तक चले लंबे आक्रमण, विरोध, संघर्ष और जय-पराजय की प्रक्रिया में मूलवासियों को सुविधाजनक परिस्थितियों से महरूम करते गये । जो पकड़ लिए गये उन्हें दास दलित बनाकर सेवा के लिए कोल्हू के बैल की तरह जोता गया और उनके ललाट पर अछूत की स्थायी मोहर लगा दी। जो खदेड़ दिये गये उन्हें दूर दराज दुर्गम पहाड़-जंगलों में षरण लेने के लिए बाध्य कर समाज से ही बहिष्कृत कर दिया गया। इस सबके चलते अब तक उस मानवता को वर्चस्वकारी व्यवस्था के बुल्डोजर के द्वारा रौंदा जाता रहा, फिर भी वह जन समुदाय जिंदा है, चूंकि उसमें गज़ब की प्राणश्‍क्ति है। यह अलग बात है कि अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए उन्हें लगातार संघर्ष करते रहना पड़ा। अतीत के सुरासुर संग्रामों या आर्य-अनार्य संघर्षों से वर्तमान दौर के विकास के नाम पर विस्थापन तक आदिवासियों को अपने अस्तित्व के लिए लड़ते रहना है। अस्तित्व के संकट के साथ आदिवासियों को पहचान के संकट से भी आदिकाल से ही जुझते रहना पड़ा। थोडी देर सुविधा के लिए ’’सनातनी’’ टर्मिनोलोजी का इस्तेमाल करें, तो सतयुग त्रेता-द्वापर काल-खंडों में इन आदिवासियों को असुर, दैत्य, दानव, राक्षस, प्रेत न जाने क्या-क्या संज्ञाएं देकर मनुष्य जाति होने से नकारते रहने का दुष्चक्र रचा गया और इस कलियुग में उनकी आदिवासी पहचान (इंडिजीनस आइडेंटीटी) को नष्ट करने के लिए उन्हें जनजाति या वनवासी कहा जाकर उनके मौलिक स्वरूप को ही तिरोहित करने का बाकायदा सरकारी ऐलान किया जा रहा है। कुछ साल पहले विष्व स्तर पर ’’इंडिजीनस ईयर’’ मनाया गया। भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्रसंघ को सीधे लिख दिया कि ’’भारत में इंडिजीनस लोग’’ न होने के कारण ऐसा कोई वर्ष नहीं मनाया जायेगा और न ही कोई प्रतिनिधि मंडल वहंा जायेगा। यही रवैया डरबन सम्मेलन में सरकार ने दलितों के प्रति अपनाया। आदिवासियों पर किए जाते रहे अध्ययन शोध की परम्परा का तनिक विशलेषण करें, तो बात थोड़ी और स्पष्ट हो सकेगी। भारतीय आदिवासी समुदायों पर लेखन की षुरूआत औपनिवेषिक दौर में आरम्भ हो गयी थी। आरियंटलिस्ट ने उन्हें कौतूहल व हिकारत भरी नजरों से देखा, नृतत्वषास्त्रियों ने उनके प्रति सामान्यीकृत औपचारिकता का दृष्टिकोण अपनाया, भाषाई अध्येता सतह से नीचे नहीं उतर पाये। जहंा तक प्रगतिषील नजरिये का सवाल है, तो डी.डी. कौषम्बी, डी.पी. चट्टोपाध्याय, भगवती शरण उपाध्याय एवं राहुल सांकृत्यायन जैसी विभूतियों ने आदिवासियो ंको समझने में गहरी दिलचस्पी ली, लेकिन कुल मिलाकर उनमें भी एक सतही व रोमानी नजरिया ही हावी होता जान पड़ता है। आगे दिये कुछ उदाहरणों से यह सिद्ध हो जायेगा। वर्तमान में आदिवासियों को लेकर बड़े-बड़े विद्वान चिंतित और चिंतनषील दिखायी देते हैं, जिनमें डा. बृहमदेव शर्मा, रामषरण जोषी, कुमार सुरेष सिंह (अब स्वर्गीय), जी.एन. देवी और भी कई नाम लिए जा सकते हैं, फिर भी किसी ठोस वजह से एक बेचैनी वहीं की वहीं उसी मात्रा में बनी रहती है। कुकुरमुत्तों की तरह ढ़ेर सारे एन.जी. ओज आदिवासी क्षेत्रों में नजर आयेंगे, मगर अधिकांष में ख्याति और स्वार्थ सिद्धि का तत्व ही हावी है। इस सारी परम्परा में महाष्वेता देवी जैसे अपवाद है। वजह, आदिवासियों के प्रति उनकी सोच काफी सीमा तक विषिष्ट लगती है जिसमें बहुत कुछ कर सकने की तड़पड़ाहट है। आदिवासी विमर्ष की नयी पहल रमणिका गुप्ता जी ने की। उनका नाम केवल इसलिए मैं यहंा नहीं ले रहा हँू, प्रत्युत इस वजह से कि उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात लगातार कही है। वह यह है कि ’’साहित्य, संस्कृति, धर्म, परम्परा, इतिहास, समाज कोई भी क्षेत्र से सम्बन्धित आदिवासी अभिव्यक्ति का सवाल हो, नेतृत्व स्वयं आदिवासियों को अपने हाथ में लेना पड़ेगा और अन्य लोग कंधे से कंधा मिलाकर उनके साथ चलेंगे। सारी चिंताओं के रहते बात क्यों नहीं बन पा रही ? इस प्रष्न का समाधान शायद हमें रमणिका जी के उक्त विचार में मिल सके। इसलिए यह बात मुझे महत्वपूर्ण लगती है। प्रख्यात समाजषास्त्री श्री पूरनचन्द्र जोषी जब ’’बोद्धिक वर्चस्वषाली परिप्रेक्ष्य से आदिवासी संस्कृति और ज्ञान के ’’एक्सक्लूजन’ (निष्कासन) पर गंभीर चिंता व्यक्त करते है, (कथादेष, अगस्त-2002 में राजाराम भादू का लेख) तो इससे संकेत यह मिलता है कि पूर्वोवत बोद्धिक परंपरा के दृष्टिकोण से आदिवासियों की सही तस्वीर का खींचना मुष्किल है। इसलिए अहम् सवाल आज भी ज्यों के त्यों सर उठाये खड़े दिखते हैं - ऽ आदिवासियों के समृद्व सांस्कृतिक रिक्त की मौलिकता को प्रगतिषील विकास के साथ संरक्षित कैसे रखा जाये ? ऽ विकास की प्रक्रिया के साथ उनके पुष्तेनी भौतिक-प्राकृतिक संसाधनों का लाभ उन्हे कैसे मिले ? ऽ धर्म के नाम पर उनके साम्प्रदायिकरण को कैसे रोका जाय ? ऽ साहित्य की उनकी मौखिक परम्परा को लिपिबद्व कैसे किया जायें ? ऽ उत्थान के साथ उनकी स्वस्थ प्राकृतिक जीवन शैली को कैसे बचाये रखा जाये ? ऽ चैतरफा दबावों के कारण यह सम्भव ही नहीं कि समाज की मुख्यधारा से अलग-थलग रहकर जैसी भी स्थितियंा है, उनमें वे अपना जीवन जीते चले जायें। सवाल यह उठना है कि मुख्य धारा में लाने की प्रक्रिया में उन्हे दोयम दर्जे का जन समुदाय बनने के सम्भावित खतरे को कैसे टाला जाये ? ऽ अनुभव यह बताता है कि आदिवासियों में से जो भी व्यक्ति, परिवार या समुह षिक्षित, उन्नत और आधुनिक बनने लगता है वही अपनी मौलिक जीवन शैली और सोच को त्याग कर गैर आदिवासी जैसा व्यवहार करने लगता है। प्रष्न यहँा सुविधाओं और साधनों का नहीं है, बल्कि समृद्व परम्परा का है, उस परम्परा के संरक्षण का है। समान स्तर पर वह आधुनिकता की विकृतियों को भी अपनाने लगता है। यहाँ तक कि वह जान-बुझकर अपनी संस्कृति और संस्कारों को भुलाने लगता है। उसे यह भी होष नहीं रहता कि यह उसकी विवेक सम्मत प्रााथमिकता नहीं, प्रत्युत अनाभासित मनोवैज्ञानिक दबाव है। प्रष्न यह है कि इसका विकल्प क्या हो ? ऽ अपने त्रासद अनुभव की वजह से जो आदिवासी समूह बाहरी दुनिया के प्रति अत्यंत शत्रुवत (हाॅस्टाइल) है, उन्हें जैसे ही विकास या उत्थान की ओर लाने के प्रयास किए जाते है तो अपने जीवन में आक्रामक हस्तक्षेप मानते हैं। प्रयास चालू रखा गया तो एक असहनीय मानसिक दबाव महसूस करने लगते है। यहंा तक कि मरने लगते हैं। अंडमान के आदिवासियों (विषेषकर जारवा और सेंटेनलीज) के साथ यह सब घटित हुआ है। अंततः सरकारी और गैर-सरकारी प्रयासों को रोकना पड़ा और उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना पड़ा। इस विकट और अनूठी समस्या का समाधान क्या हो ? मैं यह महसूस करता हूँ कि इसके लिए नृतत्वषास्त्रियों, समाज-षास्त्रियों और मनोविष्लेषकों का संयुक्त दल बनाया जाना चाहिए। ऽ वैष्विक पूंजी व जन्य व्यक्ति व स्वार्थ केंद्रित माहौल में आदिवासी सामुहिक जीवन पद्धति को कैसे बचाया जाये ? ऽ भविष्य को बहतर गढने के लिए अतीत को समझना अनिवार्य होता है। अस्तित्व के संकट की तरह आदिवासियों के इतिहास को जान-बूझकर नजरअंदाज करते रहना भी अपने आप में बड़ी समस्या है। इस लंबे इतिहास को लिपिबद्व कैसे किया जाये ? और यह काम कौन करेगा या कर सकता है ? कुछ सवालों के साथ यह पृष्ठभूमि देना इसलिए जरूरी समझा गया कि पहले हम आदिवासियों के प्रति अब तक जो दृष्टिकोण के चलते ईमानदारी और समझदारी के साथ आदिवासी इतिहास संभव नहीं। मुझे यहंा विजयदेव नारायण साही की एक कविता की निम्न पंक्तियंा काफी प्रासंगिक लगती है- ’’ तुम हमारा जिक्र इतिहासों में नहीं पाओगे क्योंकि, हमने अपने को इतिहास के विरूद्ध दे दिया है................’’ ये पंक्तियंा उन्होने किसी भी संदर्भ में लिखी हों, आदिवासी परिप्रेक्ष्य में अर्थस्पष्ट है, फिर भी अपने-अपने हिसाब से इन पंक्तियों को समझा जा सकता है। निष्कर्ष यही निकलेगा कि जिस इतिहास (व्यापक अर्थ में) के विरोध में आदिवासी युग-युगों से लड़ते रहे, उसमें उन्हें जगह कैसे मिलेगी। आदिवासियों का वास्तविक इतिहास क्या था, उसकी खोज कैसे की जाए एवं उसे सामने कैसे लाए ? यह मूल प्रष्न अपनी जगह है। इसका उत्तर तलाषने से पूर्व हमें इस महत्वपूर्ण प्रष्न से मुठभेड करनी होगी कि जैसा इतिहास हमें पढाया-सुनाया जाता रहा है, उसमें आदिवासी किस रूप में है ? इसे समझने के लिए हमें भारतीय मिथक परंपरा में जाना होगा, चंूकि सारी गड़बड़ी वहीं से शुरू हुई है। मिथक एवं इतिहास के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह रही है कि हारी हुई कौमों को विकृत करके चित्रित किया जाता है, वर्चस्वकारी वर्ग के पक्ष में सारा सोच होता है और प्रायः इतिहासकार स्वयं की वर्ग परंपरा के पक्ष में तथा विपक्ष (जिस भी स्वरूप और मात्रा में ) के विरोध में कुछ न कुछ पूर्वाग्रहों से ग्रसित होता है। ऐतिहासिक प्रमाण तो निरपेक्ष होते हैं, समस्या यह है कि वे सब मूक होते हैं। जब उनके अधिकांष की व्याख्या-विष्लेषण-निष्कर्ष का मौका इतिहासकार को मिलता है तो प्रमाणिक सामग्री के अनुरूप उसका तदस्थ और निष्पक्ष हो पाना बहुत मुष्किल होता है। इतिहासकार के संस्कार सोच, दुष्टि और विचारधारा प्रत्यक्ष-परोक्ष या जाने-अनजाने समाविष्ट होकर रचे जा रहे इतिहास को प्रभावित करने लगते है। यह किसी के साथ भी हो सकता है। इस उलझन से बचने के लिए हमें ’’वाद-विवाद-संवाद’’ की मेथोडोलोजी को अपनाना चाहिए जिसके माध्यम से विभिन्न दृष्टिकोणों से लिखें और अनलिखें इतिहास का विष्लेषण करके उस निष्कर्ष तक पहुँचना चाहिए जो बौद्धिद-तार्किक व तथ्यात्मक-वैज्ञानिक तुला पर खरा उतरे। पढ़ सुन कर लगे कि ’’हाँ, यह प्रमाणिक है, यह सच है, इसे स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं।’’ इतिहास की ऐसी प्रमाणिकता के सामने तथ्यात्मक यथार्थ बनाम मूल्यात्मक आग्रह की असुविधाजनक स्थिति भी पैदा नहीं होनी चाहिए। इतिहास को ’’क्या है’’ के रूप में ही देखना चाहिए, न कि ’’क्या होना चाहिए’’ के रूप में। ’’इतिहास के प्रति दृष्टिकोण’’ पर यह संक्षिप्त चर्चा विषयांतर नहीं है। जब तक हम इसे न समझे, ’’इतिहास और आदिवासी’’ विषय पूरी तरह हमारी समझ में नहीं आता। हाँ, तो इतिहास-चर्चा से पहले हम मिथकों पर कुछ उदाहरणों के सहारे बात करें। जहंा तक मिथकों में आदिवासियों की विकृत प्रस्तुति का प्रष्न है हमें पुराणों के साथ रामायण और महाभारत में भी जाना होगा। पुराण ई.पू. की दूसरी सदी से ई.पू. की सातवीं सदी के कालखंड में लिखे गये। इनके माध्यम से बुद्ध और महावीर द्वारा आरंभ किए ब्राह्मण विरोधी आन्दोलन से ध्वस्त पुरोहित वर्चस्व को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया गया। ध्यातव्य है कि सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान किया। जैन ग्रंथो में इस बात का उल्लेख है कि अंत में वे जन मुनि बन गये (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेष खंड-एक, डा. रामविलास शर्मा -पृष्ठ 636) यह तो सर्वविदित है कि सम्राट अषोक ने बौद्व धर्म के प्रसार-प्रचार में जी-जान लगा दी। ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र अपने स्वामी मौर्य सम्राट ब्रहदथ का वध करके जब सम्राट बनते हैं, (ई.पू. 184) तभी से ब्राह्मणवादी वर्चस्व पुनः स्थापित होता है जिसे गुप्तवंषीय राजाओं का भरपूर प्रश्रय मिला। यह सारा कालखंड ई.पू. दूसरी सदी के सातवीं सदी तक चलता है। इसी दौरान पुराण लिखे जाते हैं जिनमें चमत्कार, अतिषयोक्ति एवं मिथकों के माध्यम से ब्राह्मणवादी व्यवस्था को गौरवान्वित किया जाता है जो अनार्य-आदिवासी विरोधी रहती आयी थी और आगे भी चलती है। पौराणिक मिथकों का कुछ अंष रामायण में और अधिकांष महाभारत के माध्यम से पहले ही प्रस्तुत हो चुका था। रामायण के प्रमुख पात्र राम हैं, जिन्हे पुरूषोत्तम के रूप में अब तक संपूर्ण समाज पर स्थापित किया जाता रहा। अगर राम के जीवन में से वनवास के चैदह वर्ष निकाल दिए जायें तो उनके व्यक्तित्व में क्या बचेगा ? उन महत्वपूर्ण चैदह वर्षो में राम आदिवासियों के साथ रहे और उन्ही की ताकत से अनार्याें (आदिवासियों के विषेष संदर्भ में) से युद्वोपरांत विजयी होते हैं। इस सबके बावजूद राम की व्यवस्था में आदिवासी नायकों की भागीदारी, हस्तक्षेप एवं दर्जा क्या रहा ? भद्रजन के लिए यह बड़ा ही असुविधाजनक प्रष्न होगा। निर्दोष शंबूक के वध के बावजूद राम महान रहेंगे ! कितना रोचक होगा अगर हम ’’गुजरात के गोधराकाण्ड-न्यूटन का सिद्वांत-प्रायोजित नरसंहार’’ के समीकरण की ही तरह ’’सूर्पणखा-सीता अपहरण-लंका काण्ड पर न्यूटन के सिद्वांत को लागू करके देखें। राम-रावण युद्ध में दोनों ही तरफ से मरने वाले आदिवासी-अनार्य और युद्व किसके लिए ? इससे भी आगे-आपके लिए जो मानव समुदाय शत्रुपक्ष था उसे मनुष्य न मानकर राक्षस, असुर, दैत्य दानव न जाने किस- किस तरह विरूपित किया गया और जिन्होनें आपका साथ दिया उन्हें गिद्ध, रीछ वानर आदि की संज्ञा देकर जंगली जानवरों की श्रेणी में रख दिया, ताकि भविष्य तक में कभी उनकी असली पहचान न हो सके ?? महाभारत में चिरपरिचित एकलव्य का प्रसंग आता है। आर्यगुरू ने धनुर्विधा सिखाने से मना कर दिया। निषादराजपूत्र से फिर भी उसको गुरू मनवा दिया और अपने बलबूते पर धनुर्धर बन जाने पर भी बतौर दक्षिणा अंगुठा काट कर दिलवा दिया। कान पक गये यह कथा सुनते-सुनते मेरे गले यह कथा इस रूप में कतई नहीं उतरती। तर्क सम्मत यह लगता है कि एकलव्य का अगुंठा जबरन काटा होगा। इस जघन्य अपराध को ढकने के लिए तथा कथित दक्षिणा का स्वांग रचकर थोप दिया गया। आदिवासी स्त्री हिडिम्बा के पुत्र घटोत्कच का प्रसंग आता है। अर्जुन को बचाने के लिए शहीद कर दिया जाता है। घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक का महत्वपूर्ण प्रसंग महाभारत में है। वह किषोरावस्था में ही था, मगर अत्यन्त बलवान। दुर्योधन कहीं से ढूंढ कर उसे अपने पक्ष में लड़ने के लिए बुला लेता है। वहीं कौरवों की तरफ से लड़ता है। ध्यान देने की बात है कि महाभारत युद्व में अधिकांष आदिवासी कौरवों के पक्ष में लड़े थे। एकलव्य स्वयं इसका उदाहरण है। उसका अगुंठा अगर द्रोणाचार्य मांगता तो शायद वह उसकी सेना के पक्ष में न लड़ता। अगूंठा काटने वाले पांडव थे, इसलिए वह पांडवों के विरूद्व लड़ा था। हो, तो बर्बरीक की कथा यूं चलती है कि जैसे ही वह युद्धभूमि में आया तो, कृष्ण समझ गये कि अब पांडवों का बचना मुष्किल है। क्या किया जावें ? भोले किषोर बर्बरीक को सोलह कला प्रवीण भगवान छलने के लिए चल देते हैं। कहते है-’’कलियुग में तेरी पूजा का इंतजाम किये देता हूँ। इस वक्त बैंकंुठ (या स्वर्ग) धाम में भेजने की गारन्टी भी लेता हूँ। बस एक काम कर दे, लडे मत और तेरी शीष मुझे सौंप दे।’’ ’’जवाब मिलता है, ’’आप तो भगवान है, जो करेगे ठीक ही होगा। मेरी इतनी सी इच्छा है कि दोनो ओर से बडे-बडे धुरंधर लड़ रहे है। मैं इनकी बहादुरी देखना चाहता हँू।’’ शर्त मान ली जाती है। बर्बरीक शीष सौंप देता है। एक मत के अनुसार कुरूक्षेत्र के मैदान के निकट लम्बे बांस पर बर्बरीक का शीष टांँक दिया जाता है, जहंँा से उसने सारा युद्व देखा। दूसरे मत के अनुसार कुरूक्षेत्र के निकट सबसे उँची पहाड़ी चोटी पर शीष रख दिया जाता है। यह पहाड़ सीकर (राजस्थान) के निकट हर्ष पर्वत है जिसकी ऊँचाई 3300 फीट है। माउन्ट आबू के गुरू षिखर (करीब 6000 फीट) के बाद राजस्थान-हरियाणा-निकटवर्ती-उत्तरप्रदेष-पंजाब के अंचल में यही सब से ऊँचा पहाड़ हैं। हर्षपर्वत और रींगस के बीच खाटू श्याम जी का धर्मस्थल है, जिसमें केवल शीष वाली प्रतिमा है, जिसकी पूजा होती है। इसे ’’ष्याम बाबा’’ कहते है। शीष मूर्ति से लगता है यह बर्बरीक ही होगा। हर्ष के पर्वत सीकर से ही उसने महाभारत युद्व देखा। इस प्रसंग को यहीं रोकते है और यह कहते है कि खाटू श्याम जी की मूर्ति तो बर्बरीक की है लेकिन मान्यता यह चली आ रही है कि यह श्री कृष्ण का बाल रूप है और उसी की पूजा होती है। सालाना लक्खी मेला यहंा लगता है। विड़म्बना यह है कि शीष काटकर देने के बाद भी आदिवासी बर्बरीक की जगह कृष्ण को पूजा गया। एक ओर प्रसंग महाभारत में। अष्वमेघी यज्ञ के घोडे की यात्रा के दौरान अर्जुन की लड़ाई बभू्र वाहन से होती है। यह स्थान पूर्वांचल है। बभ्रूवाहनं मणीपुर के आदिवासी राजा चित्रवाहन की राजकुमारी चित्रांगदा का पुत्र था। उल्लेखनीय है अर्जुन ने चित्रांगधा और नाग कन्या उलूपी (दोनों आदिवासी) से विवाह (?) किया था। लड़ाई में अर्जुन मारा जाता हंै (बेहोष हुआ होगा) और उलूपी जड़ी-बूटियों से उसे जीवित (?) करती है। प्रष्न यह है कि अर्जुन को धूल चटा देने वाला शुरवीर बभ्रूवाहन महान नहीं माना जाकर अतुलनीय योद्वा अर्जुन को ही बताया जाता है। एक और प्रसंग। कृष्ण का वध जारा शबर नामक आदिवासी के हाथों होता है। मैंने वध स्थल (गुजरात) की यात्रा की है। घटना स्थल की परख की । किसी भी कोंण से देखैं, यह सम्भव ही नहीं कि हरिण की आंँख समझ कर पगतल में चमकते पदम चिन्ह पर निषाना साधा हो। अगबर आखेट था तो शबर का बाण जहरीला नहीं हो सकता और बाण जहरीला नहीं था, तो पैर में बाण लगने से कम से कम तत्काल तो मृत्यु नहीं हो सकती। इसके लिए पूरे शरीर का ’’सेप्टिक’’ होना जरूरी होगा। वह भी तब, जब कि कोई उपचार न किया जाये। आप कहते रहिए अगल जन्म में बाली के हाथों मरने वाला वरदान राम ने दिया था। और जारा शबर ही त्रेतायुग का बाली था। सारे सन्दर्भ देखने पडंेगे। खाण्डव वन दहन में आदिवासी नाग जाति को भस्म करने में कृष्ण एवं अर्जुन द्वारा अग्नि का सहयोग करने से लेकर कंस-षिषुपाल-जयद्रथ वध, एकलव्य का ’’अगुंठा’’, घटोत्कच-बर्बरीक-बभ्रूवाहन प्रसंग तक। यही नहीं, जाना होगा सतयुग और त्रेतायुग में भी। आप भीलों की मौखिक और गेय परम्परा का महाभारत (’’भीलों का भारथ’’ द्वारा श्री भगवानदास पटेल) पढ जाइये। पात्र एवं घटनास्थल करीब-करीब वही है लेकिन संदर्भ बदले हुए पायेंगे। वहंा अर्जुन की जगह नागवंषी आदिवासी राजा वासुकी अतुलनीय यौद्वा और बलवान मिलेगा। श्री पटेल भीलों की रामायण भी लिख रहे हैं। उनका यह अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है आदिवासियों की दृष्टि से भारतीय मिथकों की व्याख्या के परिप्रेक्ष्य में। पूरा का पूरा तथा कथित सतयुग भरा पड़ा है मिथकों से और मिथकों में आदिवासियों के विकृतिकरण से। इंद्र का सन्दर्भ ले लिजिए। छल-छद्म, अययास, व्यभिचार, यहाँ तक की बलात्कार (कानूनी परिभाषा और अहल्या प्रसंग) क्या-क्या कुकर्म उसने नहीं किए, और मनुष्य में श्रेष्ठ देवता और देवताओं के स्वामी (श्रेष्ठम) इन्द्र की पूजा आप करते रहिए। नारद, तुम्बरू जैसे पात्र अनार्य-आदिवासी थे। नारद के चरित्र को समझिए इन्द्र की व्यवस्था के विरोध में हर जगह व्यंग करता है। उसके कथनों की मूल भावना और उद्देष्यों को समझने के लिए दिमाग पर अधिक जोर देने की आवष्यकता ही नहीं पड़ेगी। क्या हैं ये ’’महान’’ चंद्रवंषी और सूर्यवंषी श्रत्रिय ? उन्हीं के समर्थन में लिये गये षास्त्रों से स्थिति स्पष्ट हो जायेगी। पुरूरवा की अप्सरा (वेष्या) पत्नी उर्वषी की औलाद की पीढ़ियां चंद्रवंषी और अप्सरा (वेष्या) मेनका पुत्री ष्षंकुतला की औलाद की पीढ़िया सूर्यवंषी हुए। यह पूछना बड़ा ही असुविधाजनक होगा कि ‘‘तुम्हारी (दोनों वंषों की) आद्यजननी तो ...............थीं, फिर तुम महान कुल परंपरा कैसे हुए ?’’ दूसरी तरफ यह सवाल उठता है कि प्राचीन काल में अपनी पुष्तैनी धरती पर ष्षांति से जीवन जी रहे आदिम समुदायों पर आपने बाहर से आकर हमले किए, उन्हें मारा, दास बनाया, भगाया और फिर असुर, राक्षस, जंगली जानवरों की संज्ञा दी। फिर तुम श्रेष्ठ कैसे हुए ? आदिवासी इतिहास लिखने से पहले हमें ‘‘मिथकों में आदिवासी’’ के सारे संदर्भो को पुनव्र्याख्याथित करना होगा। आस्था और भावना अपनी जगह है मगर अतीत का निरूपण तो तथ्यात्मक, तार्किक, बौद्धिक व वैज्ञानिक ही होगा। अब बात आती है इतिहास में आदिवासियों की। इससे पहले यह देखा जाये कि इतिहास मंे आम आदमी किस हद तक होता है ? इतिहास के नाम पर हजारों वर्षों तक राजा - महाराजाओं का इतिहास ही लिखा जाता रहा। प्राचीन काल से मुगल काल तक भाट - चारणी - दरबारी इतिहासकारों की परंपरा हावी रही। इसमें प्राचीन सम्राटों , तथाकथित गणराज्यों के शासकों , मुस्लिम बादषाहों , रियासती सामंतों के पक्ष में इतिहास लिखा व लिखवाया जाता रहा। अंग्रेज काल में इतिहास लेखन के क्षेत्र में बहुत सारा काम हुआ। अंग्रेज इतिहासकारों की मानसिकता पूरे भारत देष की परम्परा को हेय दृष्टि से देखने की ही रही। उपनिवेषवाद के दौर में यह सम्भव ही नहीं हो सकता था कि इतिहास में आम आदमी को जगह मिले। आजादी के बाद इस क्षेत्र में निस्संदेह महत्वपूर्ण कार्य वामपंथी इतिहासकारों ने किया। किसानों व श्रमिकों के आन्दोलनों, सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियों, वर्ग संघर्ष की परम्परा आदि को उजागर करने का प्रयास हुआ। लेकिन वामपंथी विचारधारा के सिद्वांत उन पर इस कदर हावी रहे कि वे देष की परम्पराओं के, समस्याओ के समाधान के सारे सूत्र (ऐतिहासिक दृष्टि से) अन्तराष्ट्रीय साम्यवाद में ही ढंूढते रहे। हर प्रषन का उत्तर माक्र्स, ऐंगिल्स लेनिन, माओ के विष्लेषण में तलाषते रहे। उदाहरणार्थ, भारत में जाति व्यवस्था के यथार्थ को नजरअंदाज करते रहे। आजादी की लड़ाई के दौरान बाबा साहेब अम्बेडकर के नेतृत्व में समाज का दलित वर्ग बाह्मणवादी वर्चस्व के विरूद्व मोर्चा थामें आगे बढ़ रहा था तो उन्होने वामपंथियों के साथ आने का आग्रह किया। इस पर स्वंय ई एम एस नम्बूदरीपाद ने कहा कि ’’दलितों के पचड़े’’ में अभी नहीं पड़ना है। साम्राज्यवाद पर विजय प्राप्त करने के बाद दलितों की समस्या अपने आप हल हो जायेगी। यही वजह रही कि सर्वहारा के पक्ष में चिंतित चिन्तनषील वामपंथियों को दलितों ने अब तक स्वीकार नहीं किया है। वर्तमान दौर में तो इतिहास लेखन (पुर्नलेखन) का काम सत्ता पोषित इतिहासकार खुले आम कर ही रहे हैं और इस मुहिम में वे ब्राह्मणवादी वर्चस्व को पुनः स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। इतिहासकारों की ऐसी परम्परा व मानसिकता के चलते इतिहास में आदिवासी कहँा मिलेंगे। आदिवासियों से जुड़ी एवं बडी एक एतिहासिक घटना का जिक्र मैं करना चाहूँगा। राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में गुजरात सीमा पर एक जगह है मानगढ़ का पहाड। अंग्रेजो और रियासती सांमतों के मिले-जुले शोषण के षिकार आदिवासी लोग 17 नवम्बर, 1913 के दिन वहँा एकत्रित हुए। बनजारा जाति के आदिवासी गोविंद गुरू की अगुवाई में उप निवेषवादी-सामंतवादी व्यवस्था के विरूद्व यह आदिवासियों के द्वारा देष की आजादी की लड़ाई का हिस्सा था। करीब 15-20 हजार आदिवासी वहंा एकत्रित हुए। बैगार प्रथा, वन सम्पदा के उपयोग पर पाबंदी एवं भारी लगान के विरोध में यह सभा आयोजित की गई। ब्रिटिष कमाण्डेन्ट जे.पी. स्टोक्ले के नेतृत्व में जाट रेजीमेंट, राजपूत रेजीमेंट और मेवाड़ भील कोर की चार फौजी कम्पनियों के हथियार बंद लवाजमें ने उन आदिवासियों पर अचानक धावा बोला। बंदूकों-मषीनगनों की गोलियों से उन्हे भून डाला। डेढ़ हजार आदिवासी शहीद हुए। गोविंद गुरू के साथ सेकड़ों आदिवासियों को गिरफ्तार कर लिया गया। यह तिथि माघषीर्ष पूर्णिमा थी। हर साल इस दिन वहंा आदिवासियों का विषाल मेला भरता है। अंचल का बच्चा-बच्चा इस घटना के बारें में जानता है। जाहिर है, इस घटना में जलियांवाला बाग कांड से चार गुना संख्या में आदिवासी शहीद हुए थे। भारत की स्वतंत्रता के इतिहास में इस घटना का कहीं जिक्र नहीं है। अंग्रेजो ने तो खैर इस घटना को अपने हिसाब से दबा देने का षडयंत्र रचा ही, हमारे धुरंधर इतिहासकार भी सोते रहे। इतिहास की दृष्टि से यह घटना इतनी पुरानी नहीं है कि प्रमाण न जुटाये जा सके। मैंने स्वयं घटना स्थल और क्षेत्र का दौरा किया। कुछ दस्तावेज भी इधर-उधर से जुटाये। इस घटना में तनिक भी संदेह नही। स्थानीय आदिवासी नेताओं ने पिछले कुछ अर्से से आवाज उठाई। 15 अगस्त, 2001 को दैनिक भास्कर अखबार में मेरा संपादकीय इस विषय पर छपा था। पहल-71 पत्रिका में विस्तृत यात्रा वृतान्त के रूप में इस घटना को मैंने उजागर किया। यहंा मैं मेरी बात नहीं कर रहा हँू,, अचंल के आदिवासी जागरूक थे। शहीद स्थल के रूप में मानगढ़ के विकास की योजना बनी। शहीद स्मारक का षिलान्यास राजस्थान के वर्तमान मुख्य मंत्री महोदय ने ता. 27 मई, 1999 को कर दिया है। उसी दिन सवा करोड़ की राषि खर्च करने की घोषणा भी की थी। हाल ही इस अगस्त (2002) के पहले सप्ताह भारत सरकार ने दो करोड़ तेईस लाख की राषि और स्वीकृत कर दी है और यह मान लिया है कि पहला जलियावांला कांड मानगढ़ में हुआ था। आष्चर्य है कि करीब एक सदी तक यह घटना इतिहास का हिस्सा न बन पायी जिसमें से आधी सदी आजाद भारत के खाते में है। चुल्लूभर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए हमारे महान इतिहासकारों को ! कम से कम शर्म आनी चाहिए और राष्ट्र से क्षमा मांगनी चाहिए कि वे इतिहासकार के रूप में कितने नकारा साबित हुए। एक और ऐसी ही घटना मानगढ़ से थोड़ी दूर गुजरात की विजयनगर रियासत (अब तहसील) के गांव पालचित्तरिया में घटी थी। मानगढ़ की ही तरह 7 मार्च, 1922 के दिन में 1200 आदिवासी शहीद हुए थे। ’’इण्डिया टू-डे’’ की एक टीम वहंा गई। कुछ लोग जिंदा है जो घटना के चष्मदीद गवाह है, उनसे भी बातें की। ’’इण्डिया टू-डे’’ के 3 सितम्बर 1997 के अंक में उदय माहूरकर की रपट इस सम्बन्ध में छपी। विरसा मुडंा जैसे क्रांतिचेता को बहुत अर्से बाद स्वीकार किया गया। आदिवासी अचंलों में ऐसी एकाध नहीं, वरन् सैंकड़ो घटनाएं हुई है। अतीत से लेकर आज तक का आदिवासी इतिहास संघर्ष का सिलसिला रहा है, जिसे जाने-अनजाने भुलाया जाता रहा। इतिहास के तथ्यों को कैसे तोड़ा-मरोड़ा जाता है, इसका एक उदाहरण देखिए। महाराणा प्रताप के अत्यन्त विष्वसनीय और योद्वा सेनापति राणा पूंजा थे। वे भील थे। भीलू राजा भी उन्हे कहा जाता रहा । राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे, तो राणा पूंजा की प्रतिमा का उदयपुर में उन्होने अनावरण किया। हिरणमगरी (पहाड़ी) जहँा राणा प्रताप की प्रतिमा है, उसी से कुछ दूरी पर राणा पूँजा की प्रतिमा स्थापित की गई। यह सर्वविदित है कि राणा प्रताप के साथ पड़ने वाले राजपूत अत्यल्प थे और आदिवासी ही प्रमुख रूप से लड़े थे। कुछ लोगों ने एक कुचक्र रचा। चमचे किष्म के इतिहासकारों की एक कमेटी बनायी। उनसे यह साबित करवाया गया कि राणा पूंजा आदिवासी न होकर राजपूत थे। उनके हिसाब से योैद्वा केवल राजपूत होते हैं, और सब टटपुंजिये हैं। अगर इस साजिष का विरोध नहीं हुआ तो सम्भव है एक-न-एक दिन ऐसे लोग अपने प्रयासों में सफल हो जायें और राणा प्रताप के साथ लड़े आदिवासियों के बलिदान को पूरी तरह भुला दिया जाये। इतिहास से सम्बन्धित एक ओर अत्यन्त गम्भीर बात है आदिवासियों का अपराधी के रूप में समाज के सामने प्रस्तुतीकरण। यह षडयंत्र अंग्रेजो और देषी सामन्तांे का मिला-जुला प्रयास था। आदिवासियों की सत्ता और संसाधन छिन लिए जाने पर वे विद्रोही बन गये। राज्य शक्ति के साथ उन्हें कानून की ताकत से दबाने का दुष्चक्र रचा गया। सन् 1871 में क्रिमीनल ट्राइब एक्ट सबसे पहले बाम्बे प्रेसेडेन्सी में लागू किया गया। बाद में एक-एक कर अन्य क्षेत्रों में। यद्यपि आजादी के बाद यह कानून समाप्त कर दिया गया और इसकी जगह ’’आदतन अपराधी अधिनियम’’ बना दिया गया, जो समुह आधारित न होकर व्यक्ति आधारित है। सवाल यह है कि ऐतिहासिक प्रमाण कहीं सिद्व नहीं करते कि आदिवासी अपराधी रहे हैं, लेकिन गैरआदिवासी समाज का अधिकंाष स्वर्ण तबका उस षड़यंत्र की वजह से अब तक आदिवासियों के प्रति वही मानसिकता अपनाये हुए है। आष्चर्य होगा यह जानकर कि राजस्थान स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं की सामान्य ज्ञान की पुस्तकों में अभी भी मीणों, भीलों एंव अन्य आदिवासियों का परिचय यह कह कर दिया जाता है कि ’’इनका मुख्य धंधा चोरी, लूट, डकैती रहा है।’’ कंजर ,सांसी , बावरिया, कालबेलिया, पारधी, बेड़िया जैसी आदिम समूहों को पुलिस चैन से नहीं बैठने देती। इस दौर में यह समाज शास्त्रीय दृष्टिकोण आदिवासियों के प्रति अंग्रेज कालीन व्यवस्था (जो कि अब इतिहास है) और देषी सामन्तवाद की उपज है। उस इतिहास को पढकर यह समाज शास्त्रीय धारणा बनती है, जिसका विरोध आदिवासियों एवं कुछ अन्य व्यक्तियों एवं संगठनो के अलावा आम बुद्विजीवी क्यों नही करता ? आष्चर्य तो यह है कि ऐसी पुस्तकों के ऐसे घोर ’’आब्जेक्षनेबल’’ अंषों की ओर सरकार व प्रषासन का ध्यान भी क्यों नहीं जाता ? ऐसे लखकों और प्रकाषकों के विरूद्व दण्डात्मक कार्यवाही क्यों नहीं की जाती ? यह उदाहरण सिद्व करते है कि किस प्रकार प्रयोजित-प्रायोजित या जाने-अनजाने आदिवासिायों से सम्बन्धित महान घटनाओं व राष्ट्र के लिए उनके त्याग व बलिदान को इतिहास से बाहर रखा गया। इसके साथ उन्हे बदनाम भी किया जाता रहा। अह्म सवाल उठता है कि आदिवासियों के इतिहास को सामने कैसे लाया जाये ? इतिहास की खोज और लेखन का महत्वपूर्ण काम सम्भव कैसे हो ? किसी बात को कहने के लिए यदि व्यक्तिगत अनुभव व जानकारी का इस्तेमाल किया जाये तो मैं समझता हूँ, अधिक सहज और आधिकारिक होगा। जयपुर के निकट बस्सी निवासी श्री झूथालाल नाढंला (मीणा आदिवासी) ने वर्षो मेहनत करके सन् 1968 में ’मीणा इतिहास’ छपवाया। बहुत सारी सामग्री एकत्रित की। जागा-पोथियों का अध्ययन, जागाओं की पंचायत, स्थलों का भ्रमण, पुराने दस्तावेजों की परख, मोैखिक परम्परा आदि का अध्ययन करके यह सामग्री बटोैरी। इतिहासकार रावत सारस्वत से यह इतिहास लिखवाया पूरी इतिहास पुस्तक को पढ कर लगता है कि मीणा इतिहास के हर पृष्ठ पर स्वयं रावत सारस्वत कहीं न कहीं हस्तक्षेप करते हुए दिखायी देते हैं उनके माध्यम से उनके अपने ब्राह्मणवादी संस्कार, पूर्वाग्रह, सोच, दृष्टि आदि झलकती दिखती है। बडा काम हुआ, मगर ईमानदारी से नहीं हो पाया। इससे पहले मुनि मगन सागर (मीणा परिवार में जन्में और बाद में जैन मुनि बन गये थे) ने मीणा आदिवासियों पर गहन अध्ययन किया। मीणो के प्राचीन राज्य, राजवंष, गोत्र आदि पर महत्वपूर्ण सामग्री बटौरी। मीणो की उत्पत्ति की खोज की। टोटम के रूप में ’’मीन’’ (मत्स्य) के आधार पर मीना, मीणा, मारण आदि संज्ञाओं की व्याख्या की। ’’मीन पुराण भूमिका’’ और ’’मीन पुराण’’ के रूप में महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखें। उन्हे किसी ने कह दिया कि ’’काषी में विद्वान पण्डित रहते हैं, उनमें से किसी को बुलवाओ और उनकी सलाह लेकर इस सब को अन्तिम स्वरूप दो।’’ काषी के दो पण्डितो के चक्कर में वे पड गये और अधिकांष सामग्री के अर्थ का अनर्थ कर दिया। उदाहरणार्थ ’’मीन’’ को टोटम से बदलकर विष्णू के मत्स्यावतार से जोड दिया और यह निष्कर्ष निकलवा दिया कि मीणा लोग आर्यों से सम्बन्ध रखते हैं और क्षत्रिय है। वर्णाश्रमी व्यवस्था मीणा आदिवासियों में नही मिलती। उनके रीति-रिवाज, मौखिक परम्परा, संस्कृति, धर्म, संघर्ष, गाथांए, प्रकृति से जुडाव, पंचायत व्यवस्था सब कुछ आदिवासी है, मगर केवल एक शब्द ’’मीन’’ (मत्स्य) की गलत व्याख्या करने से सब कुछ गुड-गोबर हो गया। अभी भी कुछ लोग इस फहमी के षिकार हैं। प्रतिष्ठित इतिहासकारों का आदिवासियों के प्रति रवैया काफी हद तक हमने इस लेख के पूर्वोक्त हिस्सों में देख लिया। अब भी क्या आदिवासी लोग इन्तजार करेंगे और उन्हीं की ओर झांकते रहेंगे, कि वे ही आदिवासियों का इतिहास लिखने के लिए अधिकृत और सक्षम हैं ? जब यह सिद्ध हो चुका कि आदिवासियों द्वारा लिखा गया साहित्य तुलनात्मक दृष्टि से किसी ओर साहित्य से कम नहीं है, प्रत्युत आदिवासी विषय वस्तु के परिप्रेक्ष्य में तो उससे अधिक गुणात्मक व आधिकारिक है, तो आदिवासी ही आदिवासियों का इतिहास क्यों न लिखें ? इन प्रष्नों का सीधे-सीधे ’’ हंा’’ या ’’ना’’ में उत्तर देना कुछ उलझन पैदा कर सकता है। उचित यह होगा कि जागरूक व बुद्विजीवी आदिवासी लोग एवं आदिवासी समाज को लेकर प्रतिबद्व गैर आदिवासी प्रबुद्धजन दायित्वबोध के साथ गम्भीर होकर इस मुद्दे पर विचार करें। अपने-अपने स्तर पर या टीम बनाकर इस काम में जुट जायें और कुछ सार्थक करके बतलायें। इतिहासकारों ने अब तक जो भूल की है उसका पष्चाताप करें और इतिहास में से जो महत्वपूर्ण छूट गया है, उसे जोड़ने का मूल्यवान काम तुरंत हाथ में लें। इतिहास लिखने/लिखवाने या उसे प्रकाषित करवाने की समस्या इतनी बड़ी नहीं है, जितनी बड़ी चुनौती इतिहास को खोजने की है। इसके लिए निम्न सुझाव उपयोगी हो सकते है: ऽ आदिवासियों से सम्बन्धित भारतीय मिथकों की पुनव्र्याख्या की जाये। ऽ प्राचीन षिलालेख, ताम्रपत्र, सिक्के, पट्टे, परवाने तथा अन्य लिपिबद्ध प्रमाण जो किसी भी प्रकार आदिवासियों से सम्बन्ध रखते हो। ऽ प्राचीन हस्तलिखित पोथियंा, पीढियंा, वंषावालियंा और स्फुट बातें जिनमें आदिवासियों का उल्लेख हो। ऽ शास्त्रों, ग्रंथों, महाकाव्यों में जहंा आदिवासियों के सन्दर्भ आये हैं उनकी सही व्याख्या। ऽ प्राचीन गढ, किले, मन्दिर, देवले, बावड़ी, तालाब, कुएं, हथाई तथा अन्य ऐसी इमारतें जिनका ताल्लुक आदिवासियों से रहा हो। ऽ आदिवासियों के बारें में जागाओं, भाटों, गायकों द्वारा कही जाती रही बातें। ऽ राणाओं तथा अन्य याचकों द्वारा गाये जाने वाले गीत, कवित्त, दोहा एवं कहावतों का अध्ययन। ऽ आदिवासी समाज में प्रचलित लोकगीत, लोक गाथाओं आदि में जो सन्दर्भ आये, उनका संकलन। ऽ आदिवासी उत्सव, मेलों, खेल, प्रतियोगिताओं, शोर्यगाथाओं, मुहावरों, पहलियों से निकलने वाली ऐतिहासिक महत्व की बातें। ऽ आदिवासी समाज में प्रचलित जन्म, विवाह, मृत्यू, श्राद, पितर, लोकदेवता, टोटम आदि से सम्बन्धित परम्पराओं का अध्ययन। ऽ आदिवासियों की जीवन शैली एंव जीवन दर्षन के विविध आयामों का वैज्ञानिक - तार्किक विष्लषण जो एक पंरपरा का शन कराता है। ऽ अंधविष्वासों एंव कुरीतियों के पीछे वास्तविक कारणों की खोंज। ऽ आदिवासियों की पंचायती परंपरा, स्वषासन पद्धति, सामाजार्थिक जीवन आदि की जानकारी जो परपंरा के सूत्र बताती हो। ऽ आदिवासियों का अतीत उथल-पुथलों से भरा पडा है। आक्रमण, विरोध, हार- जीत, एक स्थान से दूसरे स्थलों की ओर पलायन आदि आदि। ऐसे किस्से बडों-बूढों की जुबान पर अब श्ी हैं। इनका संकलन और विष्लेषण। देष के अंचल अंचल में आदिवासी बिखरे हुए हैं लेकिन धर्म, संस्कृति, सामाजिक-व्यवस्था, आर्थिक जीवन, स्वभाव, बाहरी दबाव, शोषण, शोषण का प्रतिरोध और अस्मिता के लिए निरतंर संघर्ष आदि ऐसे तत्व हैं जो हर आदिवासी समुदाय को आपस में एक सूत्र में बांधे हुए हैं। अब देखिए ना, जब विरसा मुंडा झारख्ंाड अंचल में आदिवासियों को संगठित कर जागरूक कर रहे थे और अंग्रेजों एंव देसी शासकों के विरूद्ध लड रहे थे, उसी दौर में गोविन्द गुरू के नेतृत्व में आदिवासी राजस्थान व गुजरात में अंग्रेजों और रियासती व्यवस्था से लोहा ले रहे थे। देखने की बात यह है कि उनके बीच कोई संवाद-संप्रेषण नहीं था फिर श्ी लड़ाई एक ही दौर में एक सी शैली में हुई। शषा का क्या, शषा-बोली तो हर बारह कोस पर बदलती जाती है। फिर श्ी कुछ शब्द होते हैं जो पुरानी पहचान कराते रहते हंै। उदाहरणार्थ, ’‘जोहार’‘ ऐसा शब्द है जो अभिवादन के लिए हर अंचल में इस्तेमाल किया जाता है। फर्क इतना सा ही मिलेगा कि झारखंड में ’‘जोहार’‘ है तो राजस्थान में ’‘जुहार’‘। देष के किसी भी क्षेत्र के सामूहिक आदिवासी आयोजन को देख लो, नजारा एक सा मिलेगा। वाद्ययंत्रों की बनावट व सुर और गीतों की धुन में समानता मिलेगी। प्रकृति प्रेम और मानव स्वभाव सभी आदिवासी समूहों में एक समान कारक (थ्।ब्ज्व्त्) मिलेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी अंचल के आदिवासी हों, उनका एक इतिहास भी सामने आना चाहिए। ऐतिहासिक सामग्री व्यापक स्तर के साथ आंचलिक स्तर पर भी एकत्रित करनी होगी। इस प्रक्रिया में कुछ सीमा तक संभव है, आंचलिक झलकियां-झांकियां देखने को मिले। उनको भी एक सूत्र में पिरोना होगा। यह सब करने से ही इतिहास में आदिवासियों को पहचान मिल पायेगी, अन्यथा नहीं।

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