मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

मिलावटी मीडिया के खतरे







Thu 01 Sep ,2011 (03:28:13 ,PM)
सोलहवीं सदी में जब बाबर ने हिंदुस्तान पर हमला किया तो उसकी आखिरी और सबसे निर्णायक लड़ाई खनवा में राणा सांगा से हुई। बाबर के पास तब मात्र पांच हजार सैनिक थे और राणा सांगा के पास लगभग एक लाख सेना थी। युद्ध हुआ और जीत बाबर की हुई। इस लड़ाई ने भारत के इतिहास को बदल दिया। पिछले दिनों देश के मीडिया मुगलों ने मध्ययुग के उस युद्ध की यादें ताजा कर दी हैं।  आंदोलन पैदा करने और सरकार व संसद को ही नहीं बल्कि देश की पूरी राजनीति को अपनी उंगलियों पर नचाने के रोमांच से रूबरू हो चुके भारतीय मीडिया के हाथ में वह अलोकतांत्रिक और भस्मासुरी ताकत लग चुकी है, जिसके जरिये कभी भी तख्तापलट जैसे हालात पैदा किये जा सकते हैं। कॉरपोरेट स्वार्थों से संचालित होने वाले स्वछंद मीडिया के पास ऐसा अमर्यादित खेल खेलने की ताकत का आना देश की एकता-अखंडता ही नहीं बल्कि लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए भी खतरनाक है। इस घटना के जरिये देश ने मनमोहन सिंह को एक दयनीय और निरीह प्रधानमंत्री के रूप में देखा तो यह भी देखा कि देश के भाग्य की चाबी मीडिया और मध्यवर्ग के हाथों में आ गयी है। यह बाजारवादी ताकतों और व्यवस्था का कमाल है कि जो उपभोक्ता वस्तुओं का जितना बड़ा खरीददार है, उसकी आवाज मीडिया के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है। इस वाकये ने यह चेतावनी दे दी है कि कॉरपोरेट मीडिया अब ऐसा भस्मासुर है, जो बिना किसी बहस के अपना एजेंडा ही नहीं बल्कि अपनी प्राथमिकताएं भी देश पर थोप सकता है। पत्रकारिता के एक छात्र के नाते हम सब जिंदगी भर आचार संहिता की उस किताब को पढ़ते रहे हैं, जो बताती है कि मीडिया को जजमेंट नहीं देना चाहिए। पत्रकारीय तटस्थता और निष्पक्षता का अर्थ एक खबर के सारे पहलू लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी और सच के प्रति पत्रकार की जवाबदेही है। हममें से कई लोग पत्रकारिता को जिस पेशेवर ईमानदारी के लिए प्यार करते रहे हैं, उसका एक गुण यह भी है कि पत्रकारिता तथ्य और कथ्य के बीच का नाजुक संतुलन बनाये रखने की कला है। यानी कि कथ्य को उतना ही वाचाल या खामोश होना चाहिए जितना कि उपलब्ध तथ्य। हम जिसे पाठक या दर्शक कहते हैं, वह दरअसल खबरों का उपभोक्ता है जो अपना समय और पैसा इसलिए खर्च करता है, ताकि उसे पता चल सके कि उसके इर्दगिर्द क्या हो रहा है। अखबारों की खरीद और न्यूज चैनलों को देखे जाने के पीछे मुख्य कारण खबरें ही हैं। यदि आप खबरों के पाठक या दर्शकों की तादाद की तुलना संपादकीय स्तंभ पढऩे और टीवी की खबरिया बहसों के दर्शकों की संख्या से करें तो साफ जाहिर हो जाएगा कि खबरों के 80 प्रतिशत से ज्यादा पाठक या दर्शक बहसों या संपादकीय स्तंभों के दर्शक या पाठक नहीं हैं। लेकिन खतरनाक बात यह है कि भारतीय मीडिया में खबर और विचार की लक्ष्मण रेखाएं गड्डमड्ड हो गयी हैं। यह बीमारी न्यूज चैनलों में सर्वाधिक है, जहां खबर में ही चैनल का एजेंडा भी मिला दिया जाता है। यह अनैतिक और गैर पत्रकारीय कृत्य है। क्योंकि खबर एक घटना का तटस्थ ब्यौरा है, जो पत्रकार या मीडिया स्वामियों के व्यक्तिगत आग्रहों, दुराग्रहों और विचारों से स्वतंत्र है। न्यूज चैनलों और अखबारों का कर्तव्य है कि वे अपने उपभोक्ता तक वह सामग्री पहुंचाएं, जिसके लिए उसने दाम चुकाये हैं। यदि चैनल और अखबार उसमें अपने एजेंडे की मिलावट करते हैं तो यह उसी तरह का कृत्य है, जैसा नकली पनीर या दूध बेचना। अपराध के नजरिये से यह नकली और मिलावटी सामान बेचने से ज्यादा गंभीर अपराध है। क्योंकि नकली खाद्य पदार्थ बेचने से तो कुछ व्यक्तियों का स्वास्थ्य खतरे में पड़ता है पर एक मिलावटी खबर पूरे समाज को ही नहीं बल्कि जनमत को भी भ्रमित कर सकती है। इसके सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक असर पीढिय़ों तक जाते हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण 1991-2001 के दौर में चैनलों द्वारा उदारीकरण के पक्ष में बनाया गया माहौल है, जिसके चलते सरकारों ने सामाजिक सुरक्षा कवर के बिना ही निजीकरण और बाजारीकरण का अनुसरण किया। फलत: देश में एक स्थायी असंतुष्ट मध्यवर्ग और सशस्त्र क्रांति पर आमादा ठेठ गरीब वर्ग तैयार हो गया है। इसीलिए प्रख्यात पत्रकार एसपी सिंह से जब पूछा गया कि पत्रकार को क्या नहीं करना चाहिए, तब उन्होंने तपाक से कहा था कि पत्रकार को सरकार नहीं बनानी चाहिए। इसका साफ अर्थ है कि लोकतंत्र में सरकार बनाना जनता का काम है। यह मीडिया का काम नहीं है। मीडिया का काम है कि वह तथ्य पेश करे और फैसला लोगों पर छोड़ दे। उसका काम आंदोलनों के लिए लोगों को उकसाना नहीं है। यदि वह किसी खास आंदोलन के पक्ष में है तो उसे अपने संपादकीय स्तंभों और टीवी बहसों में खुद को एक पक्ष बताना होगा। वह अपने एजेंडे के पक्ष में जनमत तैयार करने के लिए खबरों को शिखंडी की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकता। मीडिया की ईमानदारी इसमें है कि वह स्पष्ट रूप से अपनी पक्षधरता स्वीकार करे ताकि आम पाठक या दर्शक के सामने अखबार या चैनल को रिजेक्ट या स्वीकार करने की आजादी हो। उसकी नैतिकता और जिम्मेदारी है कि वह खबरों के बीच वैधानिक चेतावनी की तरह पाठकों या दर्शकों को आगाह करे कि ये विचार अखबार या चैनल के हैं।

Thu 01 Sep ,2011 (03:28:13 ,PM)
सोलहवीं सदी में जब बाबर ने हिंदुस्तान पर हमला किया तो उसकी आखिरी और सबसे निर्णायक लड़ाई खनवा में राणा सांगा से हुई। बाबर के पास तब मात्र पांच हजार सैनिक थे और राणा सांगा के पास लगभग एक लाख सेना थी। युद्ध हुआ और जीत बाबर की हुई। इस लड़ाई ने भारत के इतिहास को बदल दिया। पिछले दिनों देश के मीडिया मुगलों ने मध्ययुग के उस युद्ध की यादें ताजा कर दी हैं।  आंदोलन पैदा करने और सरकार व संसद को ही नहीं बल्कि देश की पूरी राजनीति को अपनी उंगलियों पर नचाने के रोमांच से रूबरू हो चुके भारतीय मीडिया के हाथ में वह अलोकतांत्रिक और भस्मासुरी ताकत लग चुकी है, जिसके जरिये कभी भी तख्तापलट जैसे हालात पैदा किये जा सकते हैं। कॉरपोरेट स्वार्थों से संचालित होने वाले स्वछंद मीडिया के पास ऐसा अमर्यादित खेल खेलने की ताकत का आना देश की एकता-अखंडता ही नहीं बल्कि लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए भी खतरनाक है। इस घटना के जरिये देश ने मनमोहन सिंह को एक दयनीय और निरीह प्रधानमंत्री के रूप में देखा तो यह भी देखा कि देश के भाग्य की चाबी मीडिया और मध्यवर्ग के हाथों में आ गयी है। यह बाजारवादी ताकतों और व्यवस्था का कमाल है कि जो उपभोक्ता वस्तुओं का जितना बड़ा खरीददार है, उसकी आवाज मीडिया के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है। इस वाकये ने यह चेतावनी दे दी है कि कॉरपोरेट मीडिया अब ऐसा भस्मासुर है, जो बिना किसी बहस के अपना एजेंडा ही नहीं बल्कि अपनी प्राथमिकताएं भी देश पर थोप सकता है। पत्रकारिता के एक छात्र के नाते हम सब जिंदगी भर आचार संहिता की उस किताब को पढ़ते रहे हैं, जो बताती है कि मीडिया को जजमेंट नहीं देना चाहिए। पत्रकारीय तटस्थता और निष्पक्षता का अर्थ एक खबर के सारे पहलू लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी और सच के प्रति पत्रकार की जवाबदेही है। हममें से कई लोग पत्रकारिता को जिस पेशेवर ईमानदारी के लिए प्यार करते रहे हैं, उसका एक गुण यह भी है कि पत्रकारिता तथ्य और कथ्य के बीच का नाजुक संतुलन बनाये रखने की कला है। यानी कि कथ्य को उतना ही वाचाल या खामोश होना चाहिए जितना कि उपलब्ध तथ्य। हम जिसे पाठक या दर्शक कहते हैं, वह दरअसल खबरों का उपभोक्ता है जो अपना समय और पैसा इसलिए खर्च करता है, ताकि उसे पता चल सके कि उसके इर्दगिर्द क्या हो रहा है। अखबारों की खरीद और न्यूज चैनलों को देखे जाने के पीछे मुख्य कारण खबरें ही हैं। यदि आप खबरों के पाठक या दर्शकों की तादाद की तुलना संपादकीय स्तंभ पढऩे और टीवी की खबरिया बहसों के दर्शकों की संख्या से करें तो साफ जाहिर हो जाएगा कि खबरों के 80 प्रतिशत से ज्यादा पाठक या दर्शक बहसों या संपादकीय स्तंभों के दर्शक या पाठक नहीं हैं। लेकिन खतरनाक बात यह है कि भारतीय मीडिया में खबर और विचार की लक्ष्मण रेखाएं गड्डमड्ड हो गयी हैं। यह बीमारी न्यूज चैनलों में सर्वाधिक है, जहां खबर में ही चैनल का एजेंडा भी मिला दिया जाता है। यह अनैतिक और गैर पत्रकारीय कृत्य है। क्योंकि खबर एक घटना का तटस्थ ब्यौरा है, जो पत्रकार या मीडिया स्वामियों के व्यक्तिगत आग्रहों, दुराग्रहों और विचारों से स्वतंत्र है। न्यूज चैनलों और अखबारों का कर्तव्य है कि वे अपने उपभोक्ता तक वह सामग्री पहुंचाएं, जिसके लिए उसने दाम चुकाये हैं। यदि चैनल और अखबार उसमें अपने एजेंडे की मिलावट करते हैं तो यह उसी तरह का कृत्य है, जैसा नकली पनीर या दूध बेचना। अपराध के नजरिये से यह नकली और मिलावटी सामान बेचने से ज्यादा गंभीर अपराध है। क्योंकि नकली खाद्य पदार्थ बेचने से तो कुछ व्यक्तियों का स्वास्थ्य खतरे में पड़ता है पर एक मिलावटी खबर पूरे समाज को ही नहीं बल्कि जनमत को भी भ्रमित कर सकती है। इसके सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक असर पीढिय़ों तक जाते हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण 1991-2001 के दौर में चैनलों द्वारा उदारीकरण के पक्ष में बनाया गया माहौल है, जिसके चलते सरकारों ने सामाजिक सुरक्षा कवर के बिना ही निजीकरण और बाजारीकरण का अनुसरण किया। फलत: देश में एक स्थायी असंतुष्ट मध्यवर्ग और सशस्त्र क्रांति पर आमादा ठेठ गरीब वर्ग तैयार हो गया है। इसीलिए प्रख्यात पत्रकार एसपी सिंह से जब पूछा गया कि पत्रकार को क्या नहीं करना चाहिए, तब उन्होंने तपाक से कहा था कि पत्रकार को सरकार नहीं बनानी चाहिए। इसका साफ अर्थ है कि लोकतंत्र में सरकार बनाना जनता का काम है। यह मीडिया का काम नहीं है। मीडिया का काम है कि वह तथ्य पेश करे और फैसला लोगों पर छोड़ दे। उसका काम आंदोलनों के लिए लोगों को उकसाना नहीं है। यदि वह किसी खास आंदोलन के पक्ष में है तो उसे अपने संपादकीय स्तंभों और टीवी बहसों में खुद को एक पक्ष बताना होगा। वह अपने एजेंडे के पक्ष में जनमत तैयार करने के लिए खबरों को शिखंडी की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकता। मीडिया की ईमानदारी इसमें है कि वह स्पष्ट रूप से अपनी पक्षधरता स्वीकार करे ताकि आम पाठक या दर्शक के सामने अखबार या चैनल को रिजेक्ट या स्वीकार करने की आजादी हो। उसकी नैतिकता और जिम्मेदारी है कि वह खबरों के बीच वैधानिक चेतावनी की तरह पाठकों या दर्शकों को आगाह करे कि ये विचार अखबार या चैनल के हैं।

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