बुधवार, 5 दिसंबर 2012

आदिवासी समाज और सिनेमा

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बाजारवाद ने सिनेमा के रुपहले संसार के रूप-स्वरुप को काफी हद तक बदला है। मुनाफे की संस्कृति में सिनेमा का बाजार वैश्विक हो चूका है। वाजीब सी बात है की निर्माता भी विशुद्ध व्यावसायिक नजरिये से विषय और मुद्दे की तलाश करता है। आज सामाजिक सरोकारों को देखने का नजरिया भी 'अछूत कन्या' (1936) और "सुजाता" (1959) के ज़माने की अपेक्षा बहुत बदला बदला सा है। अब तो ज़िंदगी की खुरदरी वास्तविकता भी परदे पर रोमानी अंदाज में सामने आती हैं। दर्द-दंश और दालान मनोरंजन बन जाता है। आज सिनेमा के आदिवासी प्रश्न और प्रसंग उपेक्षित हैं। चुकी शुरुआती दौर से ही इस दिशा में अबूझ उदासीनता देखने को मिलती रही है। वैसे दलितों के सवाल पर कई अभिनव प्रयोग सिनेमा में देखने को मिलता रहा है। मगर आदीवासी दलित नहीं हैं, इसलिए ऐसे प्रसंगों से आदिवासी समाज भी अछूता है।
बाजारवाद ने सिनेमा के रुपहले संसार के रूप-स्वरुप को काफी हद तक बदला है। मुनाफे की संस्कृति में सिनेमा का बाजार वैश्विक हो चूका है। वाजीब सी बात है की निर्माता भ
ी विशुद्ध व्यावसायिक नजरिये से विषय और मुद्दे की तलाश करता है। आज सामाजिक सरोकारों को देखने का नजरिया भी 'अछूत कन्या' (1936) और "सुजाता" (1959) के ज़माने की अपेक्षा बहुत बदला बदला सा है। अब तो ज़िंदगी की खुरदरी वास्तविकता भी परदे पर रोमानी अंदाज में सामने आती हैं। दर्द-दंश और दालान मनोरंजन बन जाता है। आज सिनेमा के आदिवासी प्रश्न और प्रसंग उपेक्षित हैं। चुकी शुरुआती दौर से ही इस दिशा में अबूझ उदासीनता देखने को मिलती रही है। वैसे दलितों के सवाल पर कई अभिनव प्रयोग सिनेमा में देखने को मिलता रहा है। मगर आदीवासी दलित नहीं हैं, इसलिए ऐसे प्रसंगों से आदिवासी समाज भी अछूता है।

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