मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

पत्रकारिता की बदलती दशा और दिशा / हरेश कुमार







हरेश कुमार
आज अभिव्यक्ति की आजादी के इस युग में पत्रकार भी अपनी आजादी सुरक्षित नहीं रख पाए हैं। आज के समय में, घर का खर्चा चलाने के लिए, एक पत्रकार को, पता नहीं क्या-क्या समझौता करना पड़ता है और उपर से हर वक्त नौकरी जाने का डर। ऐसे में एक पत्रकार से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं? क्या-क्या हसीन सपने संजोता है एक व्यक्ति जब वह पत्रकारिता में कदम रखता है, लेकिन अंदर की दुनिया दलालों से भरी पड़ी हुई है। यहां सच्चाई के नाम पर वो सब कुछ दिखाया जाता है जिसका सच्चाई से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता है।

इधर जबसे ज़ी न्यूज़ के संपादक, सुधीर चौधरी और ज़ी बिजनेस के संपादक, समीर अहलूवालिया की गिरफ्तारी हुई है सारे लोग पत्रकारों को संदेह भरी नज़रों से देख रहे हैं और ना जाने क्या-क्या लिख और बोल रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों कोयला ब्लॉक आवेंटन घोटाला से संबंधित ख़बरों को दबाने के एवज में जिंदल स्टील और पावर कॉरपोरेशन के नवीन जिंदल से 100 करोड़ रुपये के विज्ञापन मांगने की बात आई और पुलिस ने नवीन जिंदल के रिवर्स स्टिंग के बाद, फॉरेंसिक जांच के आधार पर दोनों संपादकों को गिरफ्तार करके कोर्ट में पेश किया और कोर्ट ने उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है (इससे पहले इन दोनों संपादकों को 2 दिनों के लिए पुलिस हिरासत में भेजा गया था)। तब से तो हर पत्रकार और पत्रकारिता पर लोग उंगली उठा रहे हैं।

हां, यह सही है कि आज की पत्रकारिता और पत्रकारों की दुनिया में सबकुछ सही नहीं है लेकिन सारे लोग गलत हैं ऐसा कहना भी सही नहीं है। एक पत्रकार युद्ध के मैदान से लेकर विपरीत परिस्थितियों में भी सूचनायें मुहैया कराता है और इसके लिए मात्र एक जज्बा होता है उसके पास। ख़बरों को ढूंढ़ कर जनता के सामने लाने का वो जज्बा और हौसला जो एक पत्रकार को विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी उसे अपने फर्ज को निभाने के लिए तैयार करता और साहस देता है। तभी तो सरकार के लाख दमन के बावजूद भी कितने ही पत्रकारों ने अपने जान पर खेलकर जनता के हितों से जुड़ी सूचनायें उसके सामने रख कर अपने पेशे को आम-जनों में पहचान दिलाई। आज भी किसी को अगर कोई उम्मीद शेष होती है तो वह अंतत: पत्रकार के सामने ही अपना दुखड़ा रोता है क्योंकि उसे विश्वास है कि एक पत्रकार ही उसके बातों को आमजनों तक पहुंचा सकता है और उसे उसके कष्टों से मुक्ति दिला सकता है।

पुरानी कहावत है कि एक सड़ी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है और यह सही भी है लेकिन कभी भी हमें सिर्फ एक पक्ष को नहीं देखना चाहिए। न्याय का तकाजा होता है कि हम दोनों पक्षों को बराबर का मौका दें और इसके लिए धैर्य की जरूरत होती है। कानून में मशहूर कहावत है - भले ही दस दोषी छूट जाये लेकिन एक निर्दोष को सजा ना मिले और यही होना भी चाहिए, लेकिन इन दिनों जो देखा जा रहा है वो बिल्कुल इसके उलट देखा जा रहा है। औऱ वास्तविकता से उसका कोई लेना-देना नहीं है।

अगर, हम उदाहरण के तौर पर ज़ी न्यूज़ के संपादकों की गिरफ्तारी को ही लें तो इसका दूसरा पहलू यह है कि पुलिस ने इस केस में बहुत तेजी से काम किया। क्या यही पुलिस आतंकवादियों के सबूतों पर भी इतनी ही तेजी से काम करती है। अभी पिछले दिनों ही कोर्ट को दिल्ली के एक भीड़-भरे बाजार में बम विस्पोट के दोषी दो आतंकवादियों को सिर्फ इसलिए छोड़ना पड़ा था कि समय रहते पुलिस ने सबूतों को एकत्र नहीं किया और इस तरह से दोनों आतंकवादी सबूतों के अभाव में बरी हो गए। हाल ही में, सलमान खान के हिट एंड रन मामले में कोर्ट ने मुंबई पुलिस को सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने औऱ गवाहों को ना बुलाने के लिए फटकार लगाई है। मैं किसी भी पक्ष के साथ नहीं हूं। लेकिन अगर यह मामला कांग्रेस पार्टी के सांसद और कोयला घोटाला में कंठ तक धंसे कांग्रेस पार्टी से जुड़ा नहीं होता तो भी क्या पुलिस इतनी ही तेजी से काम करती। जब सारे साक्ष्य पुलिस और नवीन जिंदल के पास है तो दोनों संपादकों को अभी तक क्यों नहीं छोड़ा गया है। वे कौन से सबूत नष्ट कर सकते हैं। क्या यह सत्ता का इस्तेमाल करके सबक सिखाने की जिद नहीं है? जब धन का लेन-देन हुआ ही नहीं तो भारतीय दंड संहिता की धारा 384 क्यों लगाई गई जबकि इसके लिए धारा 385 था जिसमें जमानत का भी प्रावधान है। ऐसे कई सवाल हैं, जो पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं।

इस देश में फॉरेंसिक जांच विभाग या अन्य जांच विभाग सत्ताधारी पार्टी के दबाव में किस तरह से काम करती है इसका नमूना किसी को बताने की जरूरत है क्या? सबूतों के साथ छेड़छाड़ करना यहां नेता और सत्ताधारी पार्टी या बाहुबली अपना हर मानते आए हैं और इसके लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं।

हम मान भी लें कि सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया दोनों ही दोषी हैं, जबकि अभी कोर्ट में मामला लंबित है और अंतिम निर्णय आना बाकि है तो क्या कोयला ब्लॉक आवंटन में कोई घोटाला नहीं हुआ था। कपिल सिब्बल की जीरो लॉस थ्योरी की 2जी से लेकर कोयला ब्लॉक आवंटन सभी जगह थू-थू नहीं हुई थी? जब सरकार पर चौतरफा हमला होने लगा तो सरकार के प्रतिनिधि पार्टी अध्यक्ष, सोनिया गांधी के इशारों पर हमलावर रूख अख्तियार करने लगे और यह सारा खेल इसी का नतीजा है। ज़ी भारत का सबसे पुराना टेलीविजन चैनल और समूह है तथा इसकी अपनी एक अलग पहचान है। न्याय का तकाजा है कि जब आप एक आरोपी को गिरफ्तार करते हैं तो दूसरे को भी कटघरे में खड़ा होना पड़ता है ना कि उसे सत्ता का समर्थक होने के नाते छूट मिले।

दूसरी बात ज़ी के संपादकों की गिरफ्तारी में यह भी देखने को आ रही है कि विपक्षी चैनल खूब चटखारे ले रहे हैं। जबकि यह लड़ाई हरियाणा के हिसार के रहने वाले दो पड़ोसियों के बीच का है। ज़ी समूह के सुभाष चंद्रा औऱ नवीन जिंदल दोनों ही एक ही जगह के रहने वाले हैं, लेकिन जब हितों की टकराहट की बात आई तो दोनों ही एक-दूसरे को औकाद दिखाने पर उतर आए हैं। पत्रकारिता से इसका कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि, पत्रकारिता को इस मामले ने बहुत ही गंभीट चोट पहुंचाई है और इससे उबरने में पत्रकारिता को शायद जमाने लग जाए।

एक तरफ, एक पत्रकार अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए जान से भी खेलने को तैयार है तो दूसरी तरफ,  बिजनेस घराना अपने हितों के लिए पत्रकारिता के पेशे पर दाग लगाकर ही अपने आप को पाक-साफ करने पर तुला हुआ है। जबकि सच्चाई ठीक इसके विपरीत है। न्याय को भले ही इंतजार करना पड़ता है लेकिन अंतत: जीत उसी की होती है। 

जो पत्रकार विपरीत परिस्थितियों में भी डटे रहते हैं और अपने फर्ज को निभाना अपना कर्तव्य मानते हैं उनके लिए सचमुच यह कठिन घड़ी है जब आपके पहचान का संकट हो और लोग आपके पेशे को संदेह भरी नज़रों से देखते हों।

आइये इस संकट की घड़ी में हम सभी पत्रकार बंधु दुनिया को दिखा दें कि पत्रकारिता बिकाऊ वस्तु नहीं है जिसे कोई भी पैसे वाला खरीद सके या अपना गुलाम बना सके।

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