गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

सोशल मीडिया से स्फूर्त आन्दोलन के खतरे

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एन.के. सिंह, वरिष्ठ पत्रकार      
सोशल मीडिया जन धरातल (पब्लिक स्फीयर) में सम्प्रेषण का एक अच्छा माध्यम है. अपनी बात कहने के लिए ना तो किसी धन या संसाधन की ज़रुरत है ना हीं स्थापित एवं औपचारिक मीडिया संस्थानों की चिरौरी करने की. किसी भी द्वंदात्मक प्रजातंत्र में मुद्दे पहचानना, उन पर जन-मानस को शिक्षित करना और इस प्रक्रिया से उभरे जन-भावना के मार्फ़त सिस्टम पर दबाव डालना प्रजातंत्र की गुणवत्ता के लिए बेहद ज़रूरी होता है. इस बात को संविधान निर्माता और अमरीकी राष्ट्रपति थोमस जेफ़र्सन से लेकर नेहरु तक ने माना है. सोशल मीडिया इस गुणवत्ता को बेहतर कर सकता है जैसा कि बलात्कार के मामले में देखने में आया.
यह भी आशंका बनी रहती है कि स्थापित औपचारिक मीडिया - वह प्रिंट हो या टेलीविज़न-- अपनी लाभकारी उद्देश्यों को नहीं छोड़ा सकता और साथ हीं सरकार अपना दबाव बना सकती है लिहाजा उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न –चिन्ह लग सकते है. यह आशंका धीरे –धीरे और बलवती होती गयी क्योंकि मीडिया में पूँजी की भूमिका बढती गयी और फटे-हाल संपादकों द्वारा निकाले गए  प्रतिबद्ध चौपतिया अखबारों की जगह भारी-भरकम चिकने पन्ने वाले अखबारों ने जगह बना ली. इनमे जबर्दस्त पूँजी –निवेश होता है. टेलीविज़न न्यूज़ चैनल चूंकि उच्च तकनीक पर आश्रित था इसलिए यह मूलरूप से उच्च पूँजी निवेश के बिना असंभव हो गया. एक वर्ग ने यह आरोप लगाया कि उच्च पूँजी निवेश का सीधा मतलब है –जन-हित से ज्याद लाभ मूल उद्देश्य.       
यह भी सही है कि मिस्र हीं नहीं समूचे अरब में फैले जनांदोलन के पीछे सोशल मीडिया की अहम् भूमिका रही. यही नहीं भारत में पहली बार बलात्कार को लेकर उपजे युवा आन्दोलन में भी इस मीडिया की भूमिका जबरदस्त थी. लेकिन आज ज़रुरत इस बात को तौलने की है कि क्या बगैर स्थापित मीडिया के हम तर्क सम्मत और सभी तथ्यों और उनके परिणामों को समझे बिना जनमत बनाना खतरे से खाली नहीं होगा? और क्या महज एक ऐसे मीडिया के जरिये जिसका मूल हीं अमूर्त हो या जिसमे किरदार की पहचान ना हो सके हमें  राजपथ घेरने पहुँचना चाहिए?
तथ्यों की अल्प जानकारी, तर्क-शास्त्र की कमजोर समझ और भावनात्मक अतिरेक में बहने की आदत कई बार सोशल मीडिया के इस्तेमाल में भयंकर गलती का सबब बन जाते हैं. पिचले १८ मई को बुलंदशहर के एक युवा ने फेसबुक पर किसी सम्प्रदाय विशेष के  आराध्य के बारे में कुछ लिख दिया नतीजा यह हुआ कि अगले दिन मेरठ में उस सम्प्रदाय के सैकड़ों लोगों ने पूरा रास्ता जाम कर दिया और यह प्रदर्शन धीरे –धीरे उग्र होने लगा. गनीमत कहिये कि संप्रदाय के धर्मगुरुओं ने और चुस्त प्रशासन ने स्थिति काबू में की. यह युवा अपनी गलती से पकड़ा गया. अगर होशियार होता तो फर्जी ईमेल से यह काम कर लेता.
अमूर्त और गैर-जिम्मेवार सोशल मीडिया का एक और पहलू ज्यादा खतरनाक है. चूँकि इस मीडिया का आयाम परा-देशीय (ट्रांस-नेशनल) है और दुबई में बैठा या आई एस आई के मुख्यालय में बैठा एजेंट इसका इस्तेमाल ट्विटर या फेसबुक के ज़रिये भारत में अफवाह फ़ैलाने के लिए बड़े आराम से दंगे भड़काने के लिए कर सकता है लिहाज़ा हमे यह देखना हगा कि सोशल मीडिया का दुरूपयोग कहीं हमे बहकाने के लिए तो नहीं हो रहा है?
वर्तमान बलात्कार के मामले को हीं लीजिये. युवा गुस्से में हज़ारों की तादात में राजपथ से राष्ट्रपति भवन तक खड़ा है. ऐसे में किसी ट्विटर या फेसबुक पर एक अफवाह डाल दी जाती है कि दवा के अभाव में पीड़ित बच्ची की हालत बिगड़ी. यह समझा जा सकता है कि इसके बाद राजपथ का सीन क्या होगा.
इसके ठीक विपरीत स्थापित औपचारिक इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ चैनल की स्थिति देखिये. पूरी तत्परता से राजपथ से न्यूज़ चैनलों के लोग घटना और पुलिस की कार्रवाही दिखा रहे थे. उसी समय यह पता चला कि आन्दोलनकारी युवाओं के बीच कुछ “प्रोफेशनल” उपद्रवकारी तत्व गुस आये हैं. और पुलिस पर हमले कर के उकसा रहे हैं ताकि फायरिंग हो सके.
ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन ने तत्काल संज्ञान लेते हुआ सभी न्यूज़ चैनलों को अतिशय सावधानी बरतने की सलाह दी और आगाह किया कि कोई आन्दोलन अगर उपद्रवियों के हाथ में चला गया जिनकी मंशा मूल उद्देश्य से अलग सरकार को बदनाम करने या देश में उपद्रव कराने की है तो ऐसे में औपचारिक मीडिया का मूल कर्त्तव्य सत्य (जो घटना के रूप में हो रहा है) नहीं है बल्कि ऐसे लोगों को एक्स्पोसे करना है , शांति –व्यवस्था बनाने में मदद करना है.
दूसरा. औपचारिक मीडिया चाहे कितना भी लाभ के लिए काम कर रहा हो, सत्य से हटने या ना दिखाने  अथवा असत्य दिखाने से दर्शकों द्वारा अंततोगत्वा ख़ारिज कर दिया जाता है और ख़ारिज होने के बाद ना तो उसे विज्ञापनदाता पूछता है ना हीं सरकार. लिहाजा बाज़ार के सिद्धांत के तहत भी उसे जाने-अनजाने जनोपादेय बनाना हीं पड़ता है.
तीसरा. औपचारिक मीडिया स्थूल है, टेलीकास्ट लाइसेंस व्यक्ति के नाम होता है और वह संविधान के अनुच्छेद १९(२) के प्रतिबंधों तथा भारतीय दंड संहिता के तमाम कानूनों से बंधा होता है. चैनल पर जो कुछ भी जा रहा है उसकी जिम्मेदारी उसके और उसके सम्पादक के उपर होती है.
लेकिन सोशल मीडिया पर इस तरह की कोई जिम्मेदारी नहीं होती क्योंकि वह ना तो मूर्त होता है ना हीं उस पर (परा- देशीय होने की वजह से)  बाध्यकारी अंकुश लगाये जा सकते हैं.
साथ हीं ऐसा नहीं था कि बलात्कार की घटना पूरी तरह सोशल मीडिया से उद्भूत हुई थी. दरअसल पहले इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया ने अपनी सार्थकता और प्रतिबद्धता दिखाते हुए इसे पहले दो दिन जबरदस्त रूप से दिखाया. तब जा के सोशल मीडिया के ज़रिये इस पर प्रतिक्रीया आने लगी.
लेकिन जिस तरह पहली बार सोशल मीडिया के इस्तेमाल के ज़रिये एक इतना बड़ा आन्दोलन खड़ा किया गया इससे औपचारिक मीडिया के लिए और ज्याद सतर्कता की ज़रुरत महसूस होने लगी है. कहीं सस्ती बेलगाम और निरंकुश सोशल मीडिया इसके विकल्प के रूप में तो नहीं आ रही है. अगर ऐसा है तो औपचारिक मीडिया को अपने अन्दर झांकना होगा और ज्यादा से ज्यादा जनोन्मुख होना पडेगा.
लेखक के ब्लॉग से साभार..

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