बुधवार, 19 दिसंबर 2012

सौ करोड़ हर्जाना, मीडिया और बहस


 गुरुवार, 17 नवंबर, 2011 को 16:00 IST तक के समाचार

टाइम्स नाउ चैनल पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने 100 करोड़ का जुर्माना लगाया है
न्यूज़ चैनल टाइम्स नाओ पर लगे 100 करोड़ के जुर्माने ने भारत में एक नई बहस को जन्म दे दिया है.
भारतीय प्रेस परिषद के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू ने टाइम्स नाओ पर लगे मानहानि के एक मुक़दमे में लगाए जुर्माने को ग़लत ठहराया है और कहा है कि इस पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को पुनर्विचार करना चाहिए.
उन्होंने ये भी कहा कि 100 करोड़ रुपए का जुर्माना चैनल से हुई ग़लती को देखते हुए ज़रूरत से ज़्यादा है.
टाइम्स नाओ ने ग़ाज़ियाबाद प्रॉविडेंट फ़ंड घोटाला मामले की ख़बर दिखाते वक़्त जस्टिस पीके सामंत की तस्वीर की जगह जस्टिस पीबी सावंत की तस्वीर दिखा दी थी.
बाद में इस ग़लती के लिए चैनल ने बार-बार माफ़ी भी मांगी थी.

बहस

लेकिन भारत में चैनलों पर दिखाए जानेवाले कंटेंट को लेकर इस मुद्दे से एक बहस पैदा हो गई है कि मीडिया को नियंत्रित करने के लिए कोई बाहरी नियामक संगठन होना चाहिए या फिर मीडिया स्वयं ही अपनी ज़िम्मेदारी तय करे.
बुधवार को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के मौक़े पर मीडिया पर अंकुश लगाने की बहस एक बार फिर गरमा गई, जब उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और प्रेस परिषद के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू ने एक नियामक प्राधिकरण बनाने की पैरवी कर डाली.
उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा कि किसी सरकारी नियामक की अनुपस्थिति में मीडिया संस्थानों की ओर से आत्म नियंत्रण पर ज़ोर देने की ज़रूरत और बढ़ गई है.
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर सभी संबंधित पक्षों की राय लेने के बाद मीडिया नियमन के विभिन्न पहलुओं पर श्वेत पत्र जारी किया जाना चाहिए.

राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी, उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी और प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू
हामिद अंसारी ने कहा कि मीडिया की ओर से स्व-नियमन या सरकारी नियमन से काम नहीं चलेगा बल्कि इसकी जगह एक अलग तरह की व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें सभी पक्षों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो और मीडिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके.

नियमन

इस मौक़े पर अपनी राय रखने वालों में प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री राजीव शुक्ला, द हिंदू समूह के प्रमुख संपादक एन राम, वरिष्ठ पत्रकार सईद नक़वी और ज़फ़र आग़ा प्रमुख थे और इनमें से ज़्यादातर लोगों की राय यही थी कि मीडिया की ओर से स्व-नियमन की कोशिशों का अपेक्षित नतीजा नहीं निकला है.
हालांकि सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी की राय एकदम अलग थी. उन्होंने कहा कि मीडिया को नियंत्रित करने के लिए बाहरी नियामक इकाई के गठन की बजाए सबसे अच्छी बात ये होगी कि मीडिया ख़ुद अपना नियमन करे.
इसी मुद्दे पर बीबीसी से बात करते हुए गुरुवार को अंबिका सोनी ने कहा, ''यूपीए सरकार ने ये बात कभी नहीं कही कि वो मीडिया पर किसी तरह का नियंत्रण करना चाहती है. मैंने नियमन के बारे में राय देने के लिए एक टास्कफ़ोर्स का गठन किया. इस टास्कफ़ोर्स ने विभिन्न संबंधित समूहों के साथ विस्तृत चर्चा कर अपनी राय सरकार को बताई और फिर यही फ़ैसला हुआ कि जब तक संसद इस बारे में कोई ढांचा बनाने का फ़ैसला नहीं लेती तब तक सरकार मीडिया की ओर से स्व-नियमन की व्यवस्था का समर्थन करेगी.''
उन्होंने ये भी कहा कि जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने एक महत्वपूर्ण चर्चा छेड़ी है, लेकिन सरकार इस महत्वपूर्ण विषय पर पहले से ही विचार कर रही है. इसके लिए सरकार ने एक मंत्रियों का समूह भी बनाया है जिसके अध्यक्ष वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी हैं और पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल, शरद पवार जैसे मंत्री इसके सदस्य हैं और जो एक बेहतर रोडमैप बनाने के बारे में विचार कर रहे हैं.
उन्होंने मीडिया की ओर से बनाए गए दो नियामक संगठन न्यूज़ ब्रॉडकास्ट स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (एनबीएसए) और ब्रॉडकास्टिंग कंटेंट कंप्लेन्ट्स काउंसिल (बीसीसीसी) का उल्लेख करते हुए कहा कि इन दोनों स्व-नियामक इकाइयों को इस बात का ख़्याल रखना चाहिए कि मीडिया जो कुछ भी दिखा रही है उसे पूरा देश देख रहा है, इसलिए पर्याप्त सतर्कता बरतने की ज़रूरत है.
उन्होंने ये भी कहा, ''मीडिया की ओऱ से स्व-नियमन 21वीं सदी की ज़रूरतों के अनुकूल रास्ता है, इसे थोड़ा और समय दिया जाना चाहिए. अगर कल वो ख़ुद को साबित नहीं कर पाए तब हम देखेंगे कि क्या किया जाना चाहिए. फ़िलहाल मैं व्यक्तिगत रूप से मानती हूं कि स्व-नियमन एक अच्छा विकल्प है.''
ग़ौरतलब है कि एनबीएसए का गठन 2008 में किया गया था जबकि बीसीसीसी का गठन जून, 2011 में किया गया था.

मीडिया की राय

इस पूरी बहस के बारे में जब बीबीसी ने आईबीएन-7 के वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष से बात की, तो उन्होंने कहा कि मीडिया ने स्व-नियमन के ज़रिए जो तमाम आलोचना के बिंदु रहे हैं उन्हें दूर करने की कोशिश की है और एनबीएसए जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता में बहुत अच्छा काम कर रही है.
उन्होंने कहा, ''न्यूज़ चैनलों ने ख़ुद को ज़बरदस्त तरीक़े से बदला है. उदाहरण के तौर पर जब अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या रॉय की शादी हुई थी तो मीडिया कवरेज के लिए चैनलों की बहुत आलोचना की गई थी, लेकिन इस बार उनके बच्चे के जन्म के वक़्त टीवी चैनलों ने ये तय किया कि हमें उनकी निजी ज़िदगी में दखल नहीं देना है, हमको उस तरह की कवरेज नहीं करनी है जिसके लिए हम बदनाम रहे हैं. हमने ऐसा ही किया. इसलिए ये कहना ग़लत होगा कि मीडिया स्व-नियमन नहीं करती.
वहीं इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन (आईआईएमसी) के डायरेक्टर सुनीत टंडन का कहना है कि वर्तमान में जो संस्थाएं मीडिया का नियमन कर रही है, सभी न्यूज़ चैनल उनके अंतर्गत नहीं आते हैं, ऐसे में इसे बहुत कारगर नहीं माना जा सकता.
उन्होंने कहा कि अभी तक स्व-नियमन का बहुत प्रभावी नतीजा देखने को नहीं मिला है. इसीलिए ये विचार सामने आ रहे हैं कि कोई स्वायत्त इकाई होनी चाहिए जो मीडिया पर तटस्थ रूप से नज़र रख सके.

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