गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

संवेदनहीन होती हिंदी पत्रकारिता


आज भी पत्रकारिता ’मिशनरी पत्रकारिता’ या ’लोककल्याणी’ पत्रकारिता’ तो शायद नहीं रही है। गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा, व्यवसायीकरण, अखबारों पर उद्योगपतियों का कब्जा, पत्रकारिता के पीछे के छिपे निहित स्वार्थ, अखबारों व पत्रिकाओं को रोब गालिब करने, फायदा उठाने, आर्थिक संसाधनों की तरह प्रयोग करने, राजनीति की दिशा व राजनेताओं को मनमाफिक तरीके से साधने-बांधने की आकांक्षा रखने, अखबार को माध्यम बनाकर अपने ग्रुप के लिए आर्थिक लाभ लेने, ठेके, आबकारी, खनन, मिल जैसे लाइसेंस हासिल करने जैसे कृत्य अब आम हो चले हैं।
चाबुक , हर रविवार को छपने वाला एक नियमित स्तम्भ है , आप अगर चाबुक स्तम्भ मेँ लिखना चाहेँ तो हमेँ अपने लेख ” चाबुक ” विषयके साथ शुक्रवार केपहले मेल कर देँ . सर्वाधिक उप्युक्त लेख को चाबुक मेँ प्रकाशित किया जायेगा
बात उन दिनों की है जब आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ’सरस्वती’ का संपादन करते थे। एक सज्जन उन्हें अपनी एक रचना थमा गए, आशय था उसे ’सरस्वती’ में स्थान मिले। साथ में अपने गांव से कुछ गुड़ भी लेकर आए थे वे सज्जन। आचार्य को गांव व गुड़ दोनों से ही बेहद लगाव था। उक्त सज्जन के द्वारा दी गई सामग्री सरस्वती के कलेवर में व स्तर पर खरी नहीं उतरती थी सो उसे छापा नहीं गया।
कुछ दिनों बाद उक्त सज्जन ने आचार्य द्विवेदी से पूछा कि उन्हें गुड़ कैसा लगा और उनकी सामग्री क्यों नहीं छपी। हजारी प्रसाद अपनी कोठरी में अन्दर गए और जिस थैले में सज्जन गुड़ देकर गए थे, उसे बाहर लाए और सज्जन को थमाकर बोले-’’आपका गुड़ तो अच्छा ही होगा पर इस गुड़ या संबंधों के आधार पर मैं सरस्वती में रचनाएं नहीं छाप सकता।’’ सज्जन लौट गए।
उक्त प्रकरण बहुत ही आम और चर्चित है, पर उसे यहां देने का आशय उस समय पत्रकारिता के उच्च आदर्शों का याद दिलाना है जिनकी वजह से ’उद्दंत मात्र्तण्ड’ से शुरु हुआ पत्राकारिता का आंदोलन न केवल फला-फूला वरन् आकाश की ऊँचाईयों तक पहंुचा है। हो सकता है आज भी कुछ लोग आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी या गणेश शंकर विद्यार्थी के उच्च आदर्शों एवम् मानकों तथा संकल्पों के साथ पत्राकारिता कर रहे हो पर हिंदी पत्रकारिता का आम परिदृश्य क्या है, यह बताने की जरूरत नहीं है।
आज बेशक परिस्थितियां, मानक, आदर्श, आवश्यकताएं और माहौल यानी वातावरण में भारी बदलाव आया है और सब कुछ आज पैसे, पद व परिसंपत्तियों के आधार पर आंका जाने लगा है। अब उस समय के पत्रकारों या पत्रकारिता का वर्चस्व बनाए रखना शायद बहुत आसान तो नहीं ही रह गया है मगर जो हालात, खास तौर पर क्षेत्राीय एवं स्थानीय पत्रकारिता व पत्रकारों में देखने को मिलते हैं, उन्हें देखकर इस से लगाव व उम्मीद रखने वाले लोगों को निराशा व दुःख दोनों ही हो रहे हैं।
आज भी पत्रकारिता ’मिशनरी पत्रकारिता’ या ’लोककल्याणी’ पत्रकारिता तो शायद नहीं रही है। गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा, व्यवसायीकरण, अखबारों पर उद्योगपतियों का कब्जा, पत्राकारिता के पीछे के छिपे निहित स्वार्थ, अखबारों व पत्रिकाओं को रोब गालिब करने, फायदा उठाने, आर्थिक संसाधनों की तरह प्रयोग करने, राजनीति की दिशा व राजनेताओं को मनमाफिक तरीके से साधने-बांधने की आकांक्षा रखने, अखबार को माध्यम बनाकर अपने ग्रुप के लिए आर्थिक लाभ लेने, ठेके, आबकारी, खनन, मिल जैसे लाइसेंस हासिल करने जैसे कृत्य अब आम हो चले हैं।
कमोबेश इन तथ्यों को जानते तो सब हैं पर अपने-अपने निहित उद्देश्यों के चलते चारों तरफ चुप्पी पसरी पड़ी है तो इस पत्राकारिता के सुधरने की उम्मीद करना भी खुद को धोखा देने जैसा ही लगता है।
यथार्थ के चश्मे से देखने पर पैसा, पावर, पोलिटिक्स, पजेशन और पत्रकारिता का चोली दामन का साथ ही नहीं वरन् इनका गठबंधन और घालमेल भी साफ नजर आता है।
पत्रकारिता के साथ राजनीति और राजनेताओं की दुरभिसंधि के चलते एक ’कनवर्जन’ गेम भी नजर में आ रहा दिखता है। एक खास मीडिया ग्रुप के मंच पर ’खास’ किस्म के नेताओं को आप ’स्तम्भ लेखक’ के रूप में ’लीडिंग राइटर्स’ के रूप देख सकते हैं। वहीं प्रभावशाली प्रकाशनों के खास प्रभाव वाले लोग पत्रकारिता के कोटे से राज्यसभा, प्रवर समितियों, संसदीय समितियों और यदाकदा तो मंत्रिमंडलों की शोभा बढ़ाते भी देख रहे होगें।
अपने पैसों से अपने अखबार में खुद को संपादक, प्रधान संपादक लिखने वाले ये पैसा-पावर-पाॅलिटिक्स के धुरंधर खिलाड़ी नाम, दाम तो कमाते ही हैं, वहीं किसी दूसरे को पी.आर.बी. एक्ट के अधीन समस्त सामग्री के लिए उत्तरदायी की लाइन छाप कर जिम्मेदारी से भी साफ बच निकलते हैं यानी ’पैसा फेंक, तमाशा देख’ का खेल पत्राकारिता में भी खूब चल-दौड़ रहा है।
25 से अधिक वर्षो से क्षेत्रा से जुड़ा होने के नाते यह लिखते शर्म और संकोच तो होता है पर यह सच है कि आज के युग में एक बड़े प्रतिशत में संबंध जोड़-जुगाड़, इधर की सामग्री उधर करने वाले लेखक अधिक छप रहे हैं, ज्यादा कमा रहे हैं जबकि प्रतिभाशाली और बेलाग लपट के लिखने वालों को कोने में लगा दिया गया है।
यदि डेस्क प्रभारियों व प्रभावशाली तत्त्वों से आप का अच्छा सम्पर्क व लेन-देन है तो आपका छपना तय है। बिना संबंध, संपर्क व पहचान के आपकी डाक, फैक्स, ई-मेल पढ़ भी ली जाए तो बड़ी बात है, छपना व मानदेय मिलना तो दूर की बात है। हां, बड़े-बड़े प्रकाशन गृहों तक में मामूली फेर बदल के साथ छोटे लेखक की सामग्री बड़े नाम के साथ छप जाती है और वह बेचारा कुछ भी नहीं कर पाता।
समाचारों व संपादकीय लेखों की गुणवत्ता की बात कैसे की जाए। इंटरनेट, एजेंसियों के तनखैये यानी वेतनभोगी कर्मचारियों के लेख बिना फेरबदल तक के क्षेत्राीय समाचार पत्रों में जस के तस छपते दिखते हैं। समाचारों का 60ः से ज्यादा हिस्सा ’टेबल न्यूज’ या ’विज्ञप्तियों’ के आधार पर छप रहा है। घटनाओं की कवरेज में संवाददाता तुरंत फुरत के ढर्रे में जाते हैं, रेडीमेड विज्ञप्ति और छपासरोगी खास लोगों के फोटो ले ’मय गिफ्ट’ या ’विज्ञापन’ अथवा कृपा राशि ले लौटते हैं तो उस समाचार की विश्वसनीयता क्या रहेगी, सार्थकता कहां बचेगी। सोचने का विषय है।
संवेदना व सृजनशीलता सदैव ही पत्राकारिता की प्राण वायु रहे हैं पर उनकी जगह अब सनसनी और मशीनीकरण ने ले ली है। बलात्कार या ’आॅनर किलिंग’ की शिकार युवतियों, बच्चियों का बस नाम छोड़कर इस तरह चटकारे ले कर छाप दिया जाता है कि समाज में उसके भविष्य पर एक फुलस्टाॅप भी लग जाए तो संवाददाता या संपादक की आत्मा कहीं उसे नहीं कचोटती। वह तो अगली ’बाइलाइन’, अगली सनसनी के पीछे दौड़ लेता है, संवेदना से परे, सहानुभूति से कोसों दूर।
ऐसा नहीं है कि पत्रकारिता में कुछ भी सकारात्मक बचा ही न हो। सजे-धजे, सुंदर, रंग-बिरंगे अखबार अच्छे लग रहे हैं, कुछ प्रकाशन गृह नए-नए प्रयोग कर रहे हैं, सात परदों के पीछे की खबर भी बाहर आ रही है। बड़े-बड़े खलीफा भी मीडिया के लपेटे से बाहर नहीं रहे है।
लोकतंत्रा में मतदाता का जागरण मीडिया कर रहा है। साहित्य परिशिष्टों के माध्यम से फिर लौट रहा है। मरती हुई कविताएं बस अखबारों व पत्रिकाओं के सहारे सांस ले रही हैं, यानी पत्रकारिता में अभी काफी कुछ बचा भी है पर यदि संवेदना के साथ मीडिया निस्पृह हो कर आगे आए तो ’मिशनरी पत्रकारिता’ का युग भी मरने से बच सकता है।
घनश्याम ’बादल’

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