बुधवार, 26 दिसंबर 2012

दिल्ली पुलिस की तीन ग़लतियां



बुधवार, 26 दिसंबर, 2012 को 15:22 IST तक के समाचार
दिल्ली की चलती बस में एक 23 वर्षीय लड़की से हुए सामूहिक बलात्कार का विरोध करने इंडिया गेट पर जमा हुए लोगों पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं.
क्या दिल्ली पुलिस सचमुच इन प्रदर्शनों को संभाल पाने में चूक गई?
बीबीसी ने बात की सुरक्षा बलों से जुड़े रहे तीन विशेषज्ञों से. पढ़िए क्या है उनकी राय?

किरण बेदी, पूर्व आईपीएस

1. दिल्ली पुलिस से चूक आज नहीं हुई है. दिल्ली पुलिस कई सालों से चूक रही है जिसकी भड़ास अब निकली है. दिल्ली पुलिस का समाज से संवाद खत्म हो गया है. दिल्ली पुलिस का ध्यान शिकायतों की संख्या कम करने पर होता है और पुलिस जनता की शिकायते दर्ज करने में ध्यान नहीं है. सबसे पहले तो पुलिस इस घटना को रोक पाने में नाकाम रही.
2. वर्षों से हमारी प्रथा है कि पुलिस नहीं थकेगी, विरोध करने वाला थकेगा, इसका मतलब ये है कि अगर आप बैठे हैं तो हम भी बैठे रहेंगे जब तक कि प्रदर्शनकारी हथियार लिए हुए हों और एक आम समस्या को लेकर बैठे हों. दिल्ली पुलिस यहां संयम दिखाने में चूक गई. इंडिया गेट को खाली करवाने की क्या जल्दी थी?
3. दिल्ली पुलिस की एक चूक ये रही कि पहले दिन से पुलिस ने किसी से बात नहीं की. युवा अपनी बात रखना चाहते थे, पुलिस को उनकी बात सुननी चाहिए थी, सुनना तो पुलिस की जिम्मेवारी है. पुलिस युवाओं के साथ संवाद स्थापित करने में नाकाम रही. अगर दिल्ली के उपराज्यपाल, मुख्यमंत्री और दिल्ली पुलिस आयुक्त पहले दिन युवाओं की बात सुन लेते तो ये विरोध इतना नहीं बढ़ता. ये किसी एक की चूक नहीं सामाजिक चूक है.
दिल्ली पुलिस शासन करने का हथियार ही रहेगी जबतक पुलिस राजनैतिक हस्तक्षेप से मुक्त नहीं होगी.

प्रकाश सिंह- पूर्व पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश

1. चूक की बात की जाए तो सबसे बड़ी चूक ये है कि इतनी बड़ी घटना दिल्ली में पुलिस की मौजूदगी में हुई. जिस बस में ये बलात्कार हुआ वो बस कई पुलिस चैक पोस्ट से गुजरी लेकिन कोई भी उस शक कि नज़र से नहीं देख पाया क्योंकि बस में पर्दे लगे हुए थे. आम तौर पर दिल्ली पुलिस बैरियर लगा देती है लेकिन जांच नहीं करती है इससे सिर्फ ट्रैफिक में व्यवधान होता है.
2. दूसरी चूक प्रदर्शन के दौरान हुई, अगर उस समय सोच विचार के कदम उठाए जाते तो ये मामला पहले ही सुलझ जाता. जो छात्र सड़कों पर आए थे वो पढ़े लिखे छात्र थे. वो बात को समझते हैं, उनके साथ कोई संवाद स्थापित करन की कोशिश नहीं की गई. पुलिस कहती है कि उनका कोई नेतृत्व नहीं था लेकिन असल में पुलिस को लोगों के बीच जाकर बात करनी चाहिए थी. हमारे पुलिस नेतृत्व की सोच ये है कि नेतृत्व हमारे पास आए और हमारे दफ्तर में मिलें. ये पुराना तरीका है, लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमें भी कोई पहली करनी चाहिए. संवादहीनता ना होती तो ये मामला पहले ही सुलझ गया होता.
पुलिस सरकार का सबसे आगे रहने वाला अंग है, मैं मानता हूं कि ये जो जनता का गुस्सा निकला, वो सरकार के खिलाफ गुस्सा है, जो पिछले कुछ मामलों में निकलता रहा है.
3. लोकतांकत्रिक व्यवस्था में लोगों को गुस्सा निकालने का अवसर देना चाहिए. उसको आपने रोकने की कोशिश की, धारा 144 लगाना एक मूर्खतापूर्ण फैसला था हालांकि वो बाद में वापस ले लिया गया. मेट्रो स्टेशन नहीं रोकने चाहिए थे, आम जनजीवन चलते रहने देना चाहिए था. ये सोचना की ट के बंद हो जाने में लोग इकट्ठा नहीं होंगे, ग़लत है. जिसको आंदोलन करना था वो तो जैसे तैसे पहुंच ही गया.
दिल्ली पुलिस सभी आदेश गृह मंत्रालय से पूछकर लेती है तो मैं समझता हूं कि इसमें ग़लती सिर्फ दिल्ली पुलिस की नहीं सरकार की भी है.

अजय राज शर्मा, पूर्व पुलिस आयुक्त दिल्ली

1. मैं ना सरकार में हूं ना पुलिस में. मेरा आंकलन अखबार और टीवी के आधार पर कर रहा हूं. जिस तरह की घटना हुई उसके बाद लोगों के प्रदर्शन जायज़ थे जब तक कि वो प्रदर्शन शांतीपूर्ण हों.
लेकिन कई बार प्रदर्शन में असामाजिक तत्व शामिल हो जाते या लोग ज्यादा जोश में आ जाते हैं तो कई बार ये होता है कि पुलिस को जितना बलप्रयोग करना चाहिए उससे ज्यादा बलप्रयोग कर देते हैं. जितना मैंने टीवी पर देखा उसके अनुसार भीड़ हट रही थी फिर भी वो दौड़ाकर पीट रहे थे, लाठी चला रहे थे.
2. जब प्रदर्शन हिंसक हों तो मेट्रों रोकने और धारा 144 लगाने कदम उठाने पड़ते हैं.

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