रविवार, 2 दिसंबर 2012

एक औरत की व्यथा

 
 
 
Amarendra Kishore's photo.

( किसी के लिए भी प्रधानमंत्री का स्वागत करना और स्वागत में माला पहनाना बड़े गौरव और सम्मान अवसर होता है, मगर एक आदिवासी लड़की की पूरी जिंदगी ही इस कारण अभिशापित हो गई कि वह जवाहर लाल नेहरू को माला पहना दी। समाद ने उसे नेहरू को पतु की तरह देखा और समाज से निकाल बाहर कर दिया। काश इस सम्मान को आदिवासी समाज एकगौरव के साथ लेती। 54 स3ल के बाद भी पता नहीं बुधनी है भी या नहीं पर उसकी पीड़ा से मन आहत सा हो गया- अनामी शरण बबल 02.12.2012   
बुधनी एक संताल युवती थी, जिसने छह दिसंबर 1959 को डीवीसी योजना के तहत बन रहे मैथन डैम को प्रधानमंत्री नेहरु की विराट उपस्थिति में बटन दबा कर राष्ट्र के नाम समर्पित किया था। उस समय उसकी उम्र महज 15 साल की थी और वह मैथन डैम में दिहाड़ी मजदूर क
ा काम करती थी।परंतु उस घटना के बाद बुधनी का जीवन एक ऐसी त्रासदी में बदल गया, जो आज समूचे झारखंड की त्रासदी है। दिसंबर 1959 के उस समारोह में बुधनी ने नेहरु को माला पहनायी थी। उसका यह माला पहनाना उसके लिए एक ऐसा अभिशाप बना, जिसके कारण वह आजीवन अपने समाज और गांव ‘कारबोना’ से बहिष्कृत रही। माना गया कि उसने माला पहनाकर एक गैर आदिवासी नेहरु को अपने पति के रूप में वरण कर लिया है। संताल समाज ने उसके इस कृत्य के लिए सामाजिक निर्वासन का दंड दिया और उसे अपना घर-परिवार गांव-समाज तत्काल छोड़ देना पड़ा। परिवार-समाज से बहिष्कृत होने के बाद कुछ वर्षों के लिए पंचेत के एक बंगाली सज्जन सुधीर दत्ता ने उसे पनाह दी लेकिन पनाह की कीमत ‘रखैल’ के रूप में वसूली। जब उसने एक बच्ची को जन्म दिया तब दत्ता साहब ने भी उसे फिर से सड़क पर ला पटका।
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