शनिवार, 1 दिसंबर 2012

कमलेश थपलियाल को श्रद्धांजलि


padamji2.gif
 पदम पति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार
कुछ अन्यान्य कारणों से इधर लगभग दो महीनो से लेखन पर विराम सा लगा हुआ था पर 13 दिसंबर को वरिष्ठ पत्रकार साथी कमलेश थपलियाल के निधन की सूचना ने मुझे हिला कर रख दिया और स्वाभाविक `श्मशान दर्शन' दीवार पर नजर आने लगा. सचमुच, मृत्यु अंत नहीं है बल्कि मृत्यु जीवन समीकरण का अंतिम कोष्ठक है. जिसके बाद किसी व्यक्ति को मरणोपरांत समाज विवेचित करता है समीकरण के बीच छोड़े गए अंकों का योग -वियोग, गुणा-भाग और शेष क्या है।  मानवता के इतिहास में अधिकांश की मृत्यु में समीकरण फल शून्य ही रहा है। सिर्फ कुछ ही ऐसे खुशनसीब होते हैं जो काल की सीमाओं से परे के सत्य हैं। भाई कमलेश भी उनमे से एक हैं। जहाँ जीव विज्ञान सूत्र से पिता तक बरसी के पहले ही विस्मृत हो जाते हैं वहीं कमलेश कई बरसों तक प्रति वर्ष याद आयेंगे।
1966 से 1997 तक के अपने सक्रिय खेल पत्रकारिता सफ़र के दौरान कमलेश थपलियाल महज रिपोर्टिंग ड्यूटी बजाये होते तो उनकी गिनती ` आया राम, गए राम ' में हुई होती। परन्तु यह जुझारू उत्तराखंडी इस मामले में इतर था. कमलेश ने  हिंदी खेल पत्रकारिता को शब्दों के बहाने दुर्दशा से सुरक्षा में पहुँचाया और इस गंभीर प्रयास के आम को अपने सहज हास्य के पल्लवों के बीच पाला-पोसा। उनके रसीले आमों में इतना दम-ख़म था कि डालियाँ आजीवन झुकी-झुकी रहीं। ज्ञानी अहंकारी होते हैं, कमलेश विनम्र रहे।
स्मृति चारण में व्यक्तिगत पाने-गंवाने का लेखा झोखा नहीं होना चाहिए. लिहाजा मैंने क्या खोया, क्या पाया, यह आत्म प्रशंसा की निरर्थक मूर्खता है. हिंदी खेल पत्रकारिता ने उनसे क्या पाया और उनके जाने से क्या खोया , उस पर एक सरसरी निगाह ड़ाल सकते हैं।
जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि कमलेश महज खेल रिपोर्टर ही नहीं थे बल्कि वो खेलों के लिए पूर्ण समर्पित एक ऐसे शख्स थे जो हिंदी खेल पत्रकारिता को अंगरेजी के समतुल्य लाने के लिए आजीवन प्रयत्नशील रहे। ये जुनून ही तो था कि दशको तक सरकारी नौकरी के साथ ही खेलों की लेखनी के माध्यम से सेवा करते रहे और जब देखा कि नौकरी से पत्रकारिता बाधित हो रही है तो सरकार को प्रणाम कर पूर्णकालिक पत्रकार हो गए और 1981 से 1997 तक हिन्दुस्तान को अपनी सीवएं देते रहे। कमलेश उस टीम के प्रमुख हिस्सा थे जिसने विदेशी खेलो के तकनीकी शब्दों का हिंदी में ऐसा सरलीकरण किया कि देखते ही देखते देश के सभी हिन्दीभाषी अख़बारों ने उन्हें पूरी शिद्दत से अपना लिया था। यह बात दीगर है कि उनमे से अधिकांश शब्द लगभग खो से गए हैं। कम शब्दों में बहुत कुछ कह देना कमलेश का अपना वैशिष्ट्य था। 1990 हाकी विश्व कप के लिए पाकिस्तान से की गयी कमलेश की कवरेज आज भी पुरनियों की स्मृति में अब भी ताजा है। दिल्ली के फीरोजशाह कोटला मैदान के प्रेस बॉक्स में अगर जोरदार ठहाकों की आवाज़ गूंजी तो यह बताने की जरूरत नहीं पड़ती थी 80 और 90 के दशकों में कि कमलेश के किसी गंभीर अंदाज में सुनाये गए जोक पर उठा यह  शोर है। मैं नहीं जानता कि खुशवंत सिंह को कमलेश के निधन की सूचना मिली या नहीं पर अगर मिली तो वो अपने साप्ताहिक स्तम्भ में इस पत्रकार का उल्लेख करना शायद ही भूलेंगे. बहुतेरों को शायद यह नहीं पता होगा कि कमलेश ने वर्षों तक खुशवंत सिंह को उनके लोकप्रिय स्तम्भ `बुरा न मानो' के लिए जोक्स दिए। 2005 में जब माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्द्यालय से मुझे हिंदी खेल पत्रकारिता के इतिहास लेखन के लिए फेलोशिप मिली तो दिल्ली की खेल पत्रकारिता पर लिखने के लिए जो नाम मेरे ज़ेहन में आया, वो कमलेश का ही था और उन्होंने अपने इस अनुज समान मित्र के लिए लिखा। कमलेश ने कलम से सचमुच तत्कालीन हिंदी खेल पत्रकारिता का सार्विक चित्र खींचा।
जीवन के 75 वसंत देखने से कुछ माह पहले दिवंगत हुए कमलेश परदे के पीछे के सेनापति रहे। मौत ब्रूटस बन कर खा गयी इस जुलिअस सीज़र को सिजेरियन के जरिये। लेकिन उनके प्रशंसक अपने मन में अंतोनियो का वह भाषण बार-बार दोहराएंगे....`` कमलेश वाज एन ए आनरेबल मैन''


टिप्पणी

 

shradhanjaliकमलेश थपलियाल को श्रद्धांजलि

hindi ke senior sports journalist kamlesh ji ki maut mujhe aahat kar gaya we hamsabo ke liye ek mitra ke satho abhibhawak ki tarah bi the. b4m me just khabar dekh kar aikaek old yade taji ho gayi. aaj bi mujhe yad hai ki 1993 me jab hamne mayur vihar phase 3 me flat kharida to mere pas 5ooo rs. kam pad gaye to p.dealer ne flat par tala jad diya laxmi nagar wale makan me rakesh se bat karke mai 5000 ke jugad par bat kar hi raha tha ki kamlesh thapliyalji dusre room se bahar nikle aur mujhe 5000 dete huye kaha ki apne flay lo p.dealer se apne hath me lo. 5000 rs dekh kar mai samajh nahi pa raha tha ki kya bolu. maine saf kiya ki uncle mai ye abi nahi kah sakta ki ye rupees mai kab lauta paunga. is par we muskura pade aur bole anami no fikar mujhe pata hai ki jab tumhare pas paise ho jayenge to tum sabse pahle ghar par aaker 5000/ de jaoge. mai unke yakin par dang rah gaya. anami unka nahi balki unke bete rakesh thapliyaljo mujhse 10 sal chhota hoga ka dost tha aur aksar ghar par aata jata rahta tha. 2-3 dino me shabdarth ke liye maine 20-25 articles likh dala aur aalok tomarji se direct 5000/ le liye tab kahi jaker ghar par kamlesh uncle ko rashi lauta di we rakam lete huye fir muskura diye bole yar itni jaldi ki to nai ummid bi nahi ki thi bat bat pe hajirjawab kamlesh uncle ka majakiya face mere samne hai mujhe yad hai ki we bol rahe the ki kis tarah famous writer khushwant singh ne chutkula ke badle 40 rupees dene ka offeu diya tha jise kamlesh ji ne ye kah kar thukera diya tha ki 40 me kya hota hai really kt ka jana sports men ka jana h jo hamesha ek player ki tarah sakriya rahe unko last pranam
  • 22/11/2012
    पीयूष पांडे, साइबर पत्रकार

    काटून, व्यंग्य और आलोचना अभिव्यक्ति के तत्व हैं. हां, सोशल मीडिया में सक्रिय लोगों को थोड़ा संयम दिखाने की जरूरत है, पर इसे सेंसरशिप या पुलिसिया डंडे से नहीं रोका जा सकता।   
  • 19/11/2012
    संजय द्विवेदी, प्रोफेसर, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय
    हिंदी और भारतीय भाषाओं को लेकर समाज में एक अजीब सा सन्नाटा है। संचार व मीडिया की भाषा पर कोई बात नहीं करना चाहता। उसके जायज-नाजायज इस्तेमाल और भाषा में दूसरी भाषाओं खासकर अंग्रेजी की मिलावट को लेकर भी कोई प्रतिरोध नजर नहीं आ रहा है। ठेठ हिंदी का ठाठ जैसे अंग्रेजी के आतंक के सामने सहमा पड़ा है और हिंदी और भारतीय भाषाओं के समर्थक एक अजीब निराशा से भर उठे हैं। ऐसे में मीडिया की दुनिया में इन दिनों भाषा का सवाल काफी गहरा हो जाता है
  • 16/11/2012



    हरेश कुमार, वरिष्ठ संवाददाता,समाचार4मीडिया.कॉम
    राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर, प्रेस दिवस के सामने आ रही चुनौतियों और उपलब्धियों क मूल्यांकन करना जरूरी हो जाता है। प्रेस ने अपने स्थापना के शुरुआती समय से लेकर अब तक काफी अच्छे काम किए हैं और समाज में महत्वपूर्ण बदलाव लाने में सहायक की भूमिका निभाई है, वहीं दूसरी तरफ इसमें कुछ गलत तत्व भी सक्रिय हो गए हैं जिसके कारण इसकी स्वतंत्रता पर सवालिया निशाना लगता रहता है


  • 09/11/2012
    एस0 राजेन टोडरिया, पूर्व रेजिडेंट एडिटर, भास्कर हिमाचल
    सौ-डेढ़ सौ साल बाद कभी भारत के न्यूज चैनलों के आर्काइव में साल 2011 और 2012 के प्राइम टाइम डिबेट और खबरों से जुड़े फुटेज निकाले जाएं और उनके आधार पर भारत का राजनीतिक इतिहास लिखा जाए तो 22 वीं या 24 वीं सदी के इतिहासकार को लिखना होगा कि 21 वीं सदी के भारत में एक ऐसा शख्स भी पैदा हुआ जो गांधी से ज्यादा लोकप्रिय और आजादी के बाद का सबसे विराट व्यक्तित्व था
  • 05/11/2012
    संजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
    भारतीय मीडिया में संभवतः पहला मौका रहा होगा, जब 4 नवंबर 2012 को बिहार की राजधानी पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित एक राजनीतिक पार्टी की रैली को नयी मीडिया ने घंटो लाइव यानी जीवंत प्रसारण कर इतिहास रचा। इंटरनेट पर 93 हजार से ज्यादा लोगों ने रैली का लाइव प्रसारण देखा। किसी एक वेब साइट पर एक दिन में इतने सारे हिटस का होना बहुत बड़ी बात है


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें