शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

प्रधानमंत्री के टीवी शो पर अखबारों की राय

 

 

 

बृहस्पतिवार, फरवरी 17, 2011







हालांकि शो टीवी मीडिया का था पर प्रतिक्रियाएं अखबारों की माने रखतीं हैं। आज के अखबारों पर ध्यान दें प्रतिक्रयाएं एक जैसी नहीं हैं। कुछ अखबारों को प्रधानमंत्री की बात खबर ज्यादा लगी विचारणीय कम। टाइम्स ऑफ इंडिया का चलन है कि खबरों के साथ भी विचार लगा देता है, पर उसने प्रधानमंत्री के सम्पादक सम्मेलन पर टिप्पणी करना ठीक नहीं समझा। और सम्पादकीय पेज का खात्मा करने वाले डीएनए को आज यह पेज 1 पर सम्पादकीय लिखने लायक मौका लगा। हिन्दू ने परम्परा के अनुरूप इसपर शालीनता के साथ आलोचना से भरपूर सम्पादकीय लिखा। कोलकाता के टेलीग्राफ ने सम्पादकीय नहीं लिखा, पर मानिनी चटर्जी की खबर सम्पादकीय जैसी ही थी। हिन्दी में खास उल्लेखनीय कुछ नहीं था। पढ़ें अखबारों की राय

शुक्रवार, अक्तूबर 01, 2010

अयोध्या फैसले पर अखबारों की राय






फैसले के बाद

अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का बहुप्रतीक्षित फैसला आ गया और कहीं कुछ अप्रिय नहीं घटित हुआ। यह देश की जनता के संयम की जीत है और इसके लिए उसे बधाई मिलनी चाहिए, लेकिन संयम का यह प्रदर्शन भविष्य में भी होना चाहिए-न केवल अयोध्या विवाद के संदर्भ में, बल्कि अन्यमामलों में भी। वस्तुत: यही वह उपाय है जो भारत को सबल बनाएगा। चूंकि उच्च न्यायालय के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की घोषणा कर दी गई है और यह अपेक्षा के अनुरूप भी है इसलिए अब निगाहें शीर्ष अदालत पर होंगी। बावजूद इसके उच्च न्यायालय के फैसले की अपने-अपने हिसाब से व्याख्या होना स्वाभाविक है और वह होगी भी-इसलिए और भी अधिक, क्योंकि फैसले के बिंदु ही ऐसे हैं। उदाहरणस्वरूप यह बिंदु कि जब गिराया गया ढांचा मंदिर के स्थान पर बना था तो फिर एक तिहाई हिस्सा मुस्लिम संगठनों को देने का क्या आधार है, लेकिन यह ध्यान रहे कि इस बिंदु पर तीनों न्यायाधीश एकमत नहीं। हां, जिस एक बिंदु पर वे एकमत हैं वह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि जहां रामलला की मूर्तियां स्थापित हैं वह राम जन्म स्थान है। तीनों न्यायाधीशों के इस एक बिंदु पर एकमत होने से जहां हिंदू संगठनों का दावा सशक्त हुआ है वहीं मुस्लिम संगठनों को भी उच्चतम न्यायालय जाकर अपनी बात कहने का एक आधार मिला है, लेकिन जब तक अंतिम निर्णय नहीं आ जाता तब तक ऐसे किसी निष्कर्ष पर पहुंचने का कोई मतलब नहीं कि इस पक्ष की जीत अथवा उस पक्ष की हार हुई। ऐसे किसी निष्कर्ष पर न पहुंचने का एक प्रमुख कारण यह है कि उच्च न्यायालय का फैसला अंतिम नहीं है। यह भविष्य के गर्भ में है कि उच्च न्यायालय के फैसले पर उच्चतम न्यायालय का क्या निर्णय होगा, लेकिन यह अपेक्षा अवश्य की जाती है कि इस मसले पर अब वैसी देर न हो जैसी उच्च न्यायालय के स्तर पर हुई। एक अपेक्षा राजनीतिक दलों से भी है कि वे वैसी परिस्थितियां पैदा करने से बचें जैसी उच्च न्यायालय के फैसले को लेकर की गईं। यह ठीक नहीं होगा कि जब उच्चतम न्यायालय के निर्णय की बारी आए तो देश इसी तरह अनिष्ट की आशंका से घिर जाए। ऐसे परिदृश्य से बचने के प्रयास अभी से होने चाहिए और इसका एक बेहतर तरीका है-नए सिरे से आपसी सहमति से विवाद का हल निकालने की कोशिश। इसमें संदेह नहीं कि उच्च न्यायालय के फैसले के बाद विवादित स्थल पर भव्य राम मंदिर निर्माण के आकांक्षी हिंदू संगठनों को बल मिला है, लेकिन यह सही समय है जब दोनों पक्ष ऐसा माहौल बनाने की कोशिश करें जिससे विवाद का हल सुलह-समझौते से निकल आए। चंद दिन पहले तक ऐसी राह नहीं नजर आ रही थी, लेकिन बदली परिस्थितियों में उसे आसानी से खोजा जा सकता है। इसके लिए दोनों ही पक्षों को सक्रियता दिखानी होगी, क्योंकि ताली एक हाथ से नहीं बज सकती। यदि हमारे राजनेता और धर्माचार्य अयोध्या विवाद का समाधान जीत-हार के पलड़े में जाए बगैर करना चाहते हैं तो उन्हें इसके लिए पूरा जोर लगा देना चाहिए कि अयोध्या मसले का समाधान दोनों पक्षों की सहमति से निकल आए। ऐसा समाधान राष्ट्र में शांति-सद्भाव सुनिश्चित करने में कहीं अधिक सहायक होगा।


समाधान के लिए यही सबसे उपयुक्त समय

देश भर में जबरदस्त एहतियात और सुरक्षा इंतजामों के बीच अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का बहुप्रतीक्षित फैसला आ चुका है। इस विवाद के कानूनी पहलू जितने जटिल हैं और जैसे भावनात्मक पहलू इससे जुड़े हैं, यह फैसला भी उतनी ही धैर्यपूर्ण और दक्ष प्रतिक्रिया की मांग करता है। आने वाले दिनों में इसकी बारीकियों और जटिलताओं का अध्ययन व विश्लेषण किया जाएगा।

लेकिन गुरुवार को फैसला आने के बाद देश भर ने जितनी शांति और धैर्य से इसे सुना और समाज के सभी वर्गो ने जिस तरह जल्दबाज प्रतिक्रिया से परहेज किया, वह निश्चय ही आश्वस्त करने वाली बात है।
इस फैसले का ऐतिहासिक महत्व है। यह कहा जाता रहा है कि अयोध्या विवाद जिस तरह का है और जैसे मुद्दे इसमें शामिल हैं, उनका निर्णय न्यायिक फैसलों से नहीं हो सकता।

इसके बावजूद कई दशकों से मामला अदालतों में लंबित था, तो इसीलिए कि जब बातचीत से रास्ता नहीं निकल पा रहा हो, तब न्याय के मंदिरों पर निर्भर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं। अब एक बड़े फैसले में हाई कोर्ट ने मामले के कानूनी पहलुओं पर निर्णय सुना दिया है। इस तरह अदालत ने विवाद के कानूनी पहलुओं पर न्यायिक रोशनी की लकीर खींच दी है।

यहां से दो रास्ते खुलते हैं जिनसे होकर ऐतिहासिक अयोध्या विवाद के समाधान की तरफ जाया जा सकता है। जैसा कि किसी भी फैसले के साथ होता है, इस फैसले से एक पक्ष सहमत हो सकता है और दूसरा असहमत। इस पर और भी मतांतर सामने आ सकते हैं। असहमत पक्षों के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील का विकल्प खुला है।

इसमें फिर कुछ या कई साल लग सकते हैं। सर्वोच्च अदालत का फैसला जब भी आएगा, तब फिर उसकी भी सीमाएं होंगी। अंतिम रूप से बंधनकारी होते हुए भी उससे सहमत या असहमत पक्ष होंगे। दूसरा रास्ता यह है कि हाई कोर्ट के फैसले की रोशनी में संबंधित पक्ष नए सिरे से बातचीत करें, उदारता और न्याय की भावना का परिचय दें और मामले को बातचीत से पूर्णत: सुलझा लें।

यह विकल्प गुरुवार से पहले तक जितना कठिन था, अब शायद उतना न हो। क्योंकि उच्च न्यायालय ने न्यायिक कसौटी की रोशनी में विवाद को हमारे सामने रख दिया है। जब विवाद देश के दो सबसे बड़े समुदायों के बीच हो, तब अंतत: यदि उसे आपसी सौहार्द व सहमति से हल कर लिया जाए, तो इससे बेहतर कुछ नहीं। इसके लिए यही सबसे उपयुक्त समय है।




फैसला मानें भावना समझें
बेहतर होगा कि सभी पक्ष इस फैसले को मानें और इसकी भावना को समझते हुए आचरण करें।

अयोध्या विवाद पर हाई कोर्ट का जैसा फैसला आया है उससे सभी पक्षों को खुश होना चाहिए और मुल्क के सबसे विवादास्पद मसलों में स्थान रखनेवाले इस मामले को अदालत की भावना के अनुरूप ही सुलझाने में अपना-अपना योगदान करना चाहिए। रामलला की मूर्ति अपने स्थान पर रहे और पूरे विवादास्पद परिसर को तीन हिस्सों में बांटकर रामलला, निर्मोही अखाड़ा और वक्फ बोर्ड के हवाले कर दें, इस फैसले का मूल स्वर यही निकलता है कि मंदिर भी बने, नमाज भी हो और सीता रसोई-राम चबूतरा भी रहे। यह किसी किस्म की जय-पराजय से परे है। यह फैसला एक बड़ा अवसर बन सकता है कि सभी पक्ष मिलकर धर्मस्थल निर्माण कराएं। लेकिन इसके लिए यह भी जरूरी होगा कि विवादों को अदालत, संसद, विधानसभाओं या आपसी बातचीत से निपटाने की बुनियादी स्वीकृति सभी ओर से हो-दंगा, हंगामा, तोड़फोड़ का रास्ता किसी भी सूरत में मंजूर नहीं किया जा सकता। जिस विवाद को पांच सौ साल पुराना माना जाता है और जिसे लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले अंगरेजी अदालत ने लगभग आज की सूरत में ही स्वीकार करके उस परिसर के बाहर, जिसे तब मसजिद-ए-जन्मस्थान कहा जाता था, पूजा-अर्चना की इजाजत दी थी। उस पर 1886 के अंतिम निर्णय (जस्टिस जेइए चेंबर द्वारा दिया) और आज के निर्णय में बुनियादी फर्क है। जस्टिस चेंबर ने मंदिर-मसजिद साथ होने पर सदा टकराव के डर से राम चबूतरे पर मंदिर निर्माण की इजाजत निर्मोही अखाड़े के बाबा राघोदास को नहीं दी थी। आज तीन जजों के बेंच को ऐसे विवाद की आशंका नहीं लगती है, तो यह सिर्फ गुलाम और आजाद भारत का अंतर नहीं है, यह तब से बीते सवा सौ वर्षों में हमारे समाज के व्यवहार का असर भी है। सच कहें, तो अयोध्या विवाद हमारे धर्मनिरपेक्ष संविधान ही नहीं, हमारे समाज की बुनियादी मान्यताओं और आचरणों की एक बहुत बड़ी परीक्षा रहा है। यह माना जाता था कि ऐसे विवाद अदालत में नहीं सुलझते। पर हमने देखा है कि जब राजनीतिक दल, सरकारें और पंथों के नेतृत्व का दावा करनेवाले लोग मामले को नहीं सुलझा पाए, तो अदालत ने लंबी-चौड़ी सुनवाई और असंख्य साक्ष्यों और गवाहियों को जमा करके मामले को एक मुकाम तक ला दिया। संभव है, अभी कुछ लोग ऊपरी अदालत जाने के विकल्प को भी आजमाएं। यह रास्ता खुला है। पर अब यह फैसला सबके लिए एक नजीर है। बेहतर है कि सभी संबद्ध पक्ष इसे मानें और इसकी भावना के अनुरूप आगे बढ़कर इस मसले और हिंदू-मुसलमान टकराव के दूसरे मसलों को सदा के लिए निपटाने वाले अंदाज में विवाद को आगे न बढ़ाएं।

edit@amarujala.com



आस्था और कानून



अयोध्या मामले में फैसला देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कानून और आस्था के बीच का रास्ता निकाला है। उसने सरकारी दस्तावेजों को ही नहीं,

बल्कि ऐतिहासिक साक्ष्यों और सामाजिक-सांस्कृतिक विश्वासों को भी अपना आधार बनाया है। कोर्ट ने एक अहम पहलू की ओर इशारा किया है, जिसका अर्थ इस देश को समझना चाहिए। वह है साथ रहने की संस्कृति। दरअसल हमारे जीवन का पूरा तानाबाना एक साथ कई चीजों पर टिका हुआ है। हमारे पास न जाने कितनी स्मृतियां हैं, परंपराएं हैं, गाथाएं हैं, हमारे खुद के बनाए नियम-कानून हैं। पर इन सबको संभाले हुए अगर हम चल रहे हैं तो इसलिए कि हमारे भीतर साथ चलने का जज्बा है। अदालत ने यही बताना चाहा है। इस देश के सभी समुदाय मुल्क की विरासत के साझा हिस्सेदार हैं और हम किसी भी उलझन को आपस में मिलकर ही सुलझा सकते हैं। मिल- बांट कर चलने का भाव ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए अदालत का यह निर्णय विवादित स्थल के संतुलित बंटवारे का हल ही नहीं सुझाता, बल्कि इसी सूत्र के सहारे आगे का रास्ता तय करने का भी संदेश देता है।

इस फैसले में न किसी पक्ष की हार है, न किसी की जीत। इसने हमें एक ऐसे पड़ाव पर ला खड़ा किया है, जहां से हम एक मजबूत भारत की नई बुनियाद रख सकते हैं। हमारे पास यह साबित करने का बेहतरीन अवसर है कि धर्मस्थल का विवाद हमारे विकास के रास्ते में रोड़ा नहीं है। इस विवाद से निश्चिंत होकर हम वर्तमान चुनौतियों की तरफ देख सकते हैं और उन ताकतों को निराश कर सकते हैं, जो मानती हैं कि भारत संप्रदायवाद और जातिवाद के दलदल से कभी निकल ही नहीं सकता। अदालत के फैसले को लेकर पूरी दुनिया में उत्सुकता अकारण नहीं थी। अमेरिका के अखबार न्यू यॉर्क टाइम्स और ब्रिटेन के अखबार गार्जियन -दोनों का मानना है कि कोर्ट के आदेश पर आम आदमी की प्रतिक्रिया पर बहुत कुछ निर्भर करता है। लेकिन सचाई यह है कि अयोध्या विवाद से आम आदमी ने काफी पहले ही किनारा कर लिया है। वह धर्मस्थलों के मामले को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का शुरू से पक्षधर रहा है। उसे कभी यह मंजूर नहीं रहा कि इस पर राजनीति की जाए।

लोगों का यह रुझान पिछले कुछ चुनावों में दिखता रहा है। लोगों की इस सोच को भांपकर ही राजनीतिक पार्टियों को चुनावों में यह मुद्दा छोड़ना पड़ा और वे विकास के सवालों को उठाने को बाध्य हुईं। अब फैसले के बाद किसी पार्टी ने इस पर फिर से सियासत करने की कोशिश की, तो इसका उसे खमियाजा भुगतना पड़ सकता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि आज देश की करीब आधी आबादी 25 वर्ष से कम के युवाओं की है, जो मंदिर-मस्जिद जैसे भावनात्मक प्रश्नों से ज्यादा रोजमर्रा की जिंदगी के ठोस सवालों को तवज्जो देते हैं। उन्होंने मोबाइल और इंटरनेट के दौर में आंखें खोली हैं और वे ग्लोबल वर्ल्ड का हिस्सा बनने के लिए उत्सुक हैं। उन्हें एक बेहतर भविष्य देने के लिए सभी समुदायों को मिलजुल कर देश की तरक्की के लिए काम करना होगा।








Intriguing compromise could work

The majority verdict of the Allahabad High Court on the Ram Janmabhoomi-Babri Masjid dispute is a compromise calculated to hold the religious peace rather than an exercise of profound legal reflection. This search for a compromise informs the orders of Justice S.U. Khan and Justice Subir Agarwal even if they would seem to stretch the law and, at times, logic as well. The third judge, Justice D.V. Sharma, decided that the disputed structure could not be regarded as a mosque and ruled in favour of the Hindu plaintiffs. The effect of the majority judgments is that the disputed land of 2.77 acres is to be divided equally among the two Hindu plaintiffs, the Nirmohi Akhara and Bhagwan Sri Rama Virajman, the deity regarded as a jurisdic person that can own property, and the Sunni Central Board of Waqfs U.P. The portion of the inner courtyard where the central dome of the Babri Masjid stood before its demolition and where the makeshift temple now exists is to be given to the Hindu plaintiffs. The rest of the area where the Babri Masjid stood, including part of the inner courtyard and some part of the outer courtyard, is to be allotted to the Waqf Board. The Nirmohi Akhara is to be allotted the buildings that stood in the outer courtyard of the premises, including Ram Chabutra and the Sita Rasoi, while it is to share the unbuilt area of the outer courtyard with Bhagwan Sri Rama Virajman. To facilitate such a three-way division, and also to provide access, some part of the land acquired by the Central government around the disputed land could be used.




In arriving at his decision on the three-way division, Justice Khan has concluded that the disputed structure was a mosque constructed by or under orders of Emperor Babar and that it was built not after demolishing any temple but on an area where some temples were already in ruins. He notes that before the mosque was constructed, the Hindus believed that somewhere in the large area of land where the Babri Masjid came to stand later was the spot of birth of Lord Ram. After the mosque was constructed, they came to believe that the place where the mosque stood contained the birth spot, and much later in the decades before 1949 they came to identify that spot as the one under the central dome. He also holds that much before 1855, the adjoining Ram Chabutra and the Sita Rasoi existed and Hindus were worshipping there. According to his finding, the idol of Lord Ram was placed for the first time under the central dome of the Babri Masjid in the early hours of December 23, 1949. In view of the side-by-side worship and joint possession of the disputed site, he would declare both parties as joint title holders. However, that part of the land under the central dome of the Babri Masjid where the idols were placed and the makeshift temple now stands after demolition would be allotted to the Hindus.



However, Justice Agarwal who also favoured the division of the land differed from Justice Khan on some critical issues. He does not find evidence of Babar having built the mosque or any material to support the exact date when it was built, though he finds it was in existence before 1776. He finds also that the idol had been placed under the central dome on December 23, 1949 but wants that spot to be allotted to the Hindus. The Sunni Central Board of Waqfs is to get no less than one-third of the total area in dispute, including the rest of the area on which the mosque stood and some part of the outer courtyard. Justice Sharma finds that the idol was placed under the central dome on December 23, 1949 but in his other findings and conclusions he differs radically from his fellow judges on the Bench. He has ruled that as the disputed structure was built against Islamic tenets, it could not be regarded as a mosque.


At one level, from the standpoint of political morality, the verdict could be viewed as partially rewarding those who placed the idol overnight under the central dome of the mosque and those who in 1992 razed it to the ground. Nevertheless, the confusing mass of findings the reasons for which are not entirely clear and the compromise nature of the verdict along with the substantive outcome of dividing the disputed land have restrained any party from claiming outright victory or sulking in total defeat. The Sunni Waqf Board and the Sri Ramjanmabhoomi Trust have indicated that they would appeal against the verdict to the Supreme Court.



All sections of political opinion had issued appeals for calm and restraint on the eve of the verdict but apprehensions of disturbances remained, and a last minute effort was made to halt the judgment. The Supreme Court struck a blow for the rule of law and decided that the judicial process that has been winding slowly over the last 60 years ought not to be halted at the last minute for fear of disturbances and under some imaginary hope of the parties arriving at a negotiated settlement. If overall the reaction from the public and from large sections of political opinion has been subdued, much of it has to do with the mood of the nation in which the Ram Janmabhoomi-Babri Masjid issue does not find much traction any more — in striking contrast to the 1990s. On balance, the nature of the Allahabad High Court verdict should help the nation as a whole put a longstanding dispute behind. Secular India needs to move on and not be held hostage to grievances, real or imaginary, from the distant past. A great deal of the responsibility lies with political parties and religious groups to maintain harmony in the face of fundamentalist forces seeking to disturb the peace and profit from raising communal issues. They ought not to allow revanchist sentiment and any talk of revenge to come to the fore as many of them did in the 1980s and 1990s by their passivity or collaboration. For too long has the Ayodhya dispute remained an obsession with large sections of the people. It is to be hoped that after this major, even if not final, step in the judicial process it will cease to occupy the political stage.


© Copyright 2000 - 2009 The Hindu



                                                     


Beyond Mandir And Masjid

The Allahabad high court judgement may not bring closure to the Ayodhya dispute. The Sunni Waqf Board has indicated that it intends to move the Supreme Court on the judgement, which says that the land where the Babri masjid stood must be divided between Hindu and Muslim groups. The court has ordered that there must be a status quo at the site for the next three months. All must respect the verdict and due process must be followed in seeking redress. It's welcome that political parties and religious groups have stressed the need to maintain peace and have appealed to cadres not to take to the streets.

The court appears to have used non-legal categories like faith to come to conclusions about Ram's exact birthplace. The reasoning and evidence used by the court is hidden in the 8,000 pages that constitute the three-bench judgement. But we hope the judges have based their conclusions on sound legal principles. In any case, the court judgement can be a first rather than a final step in resolving the dispute. If any party feels aggrieved, it has the right to go up to the Supreme Court. Both sides could come to a mutually satisfactory out-of-court settlement as well.

It must also be kept in mind that the HC ruling doesn't condone the act of demolition of the Babri masjid carried out by the sangh parivar on December 6, 1992. The demolition wreaked havoc on the country's multi-religious fabric. It divided communities and set us back by many years. The wounds are healing, slowly. Any act that threatens to reopen old wounds must be avoided. A new resurgent 
India has emerged from the debris of the violent 1990s. A new generation has come of age since then and it doesn't want to be tied down by ancient hatreds. Simply put, a mandir at what is believed by some Hindus to be Ram's birthplace is not an existential issue for this country, especially its youth.

Political parties must recognise the shift in ground, which is best evident in the twin cities of Faizabad and Ayodhya. The local people, especially the youth, insist that their concern is not a mandir or a masjid at the disputed site but facilities that'll enable them to improve their material conditions. People have had enough of pitting Ram against Rahim. We need to move on and the onus is on the state, political parties and community elders to ensure that the issue is not kept simmering for too long.



Law and sacrifice

A compromise on Ram temple need action on Babri masjid demolition

The Lucknow bench’s verdict on Ayodhya is far from simple. And that is unsurprising: the judiciary was asked to respond to an entire block of issues, by one judge’s count as many as 30. And the exact implications of the judgment, the precedent it sets, and its relationship to settled law will be discussed and dissected for some time — which is as it should be. The most important thing, however, is that it be discussed calmly; and parties to the case give every evidence of being willing to do that, even as they weigh the merits of an immediate appeal to the Supreme Court.
That is, in fact, an indicator of the judgment’s broad thrust. None of the petitioners is completely happy, and each thinks an appeal might be called for. In effect, this is a reminder that maximalist positions of any sort will be either untenable or unimplementable. Whatever the way forward now, it will of necessity involve compromise and agreement. That is, in the three-judge bench’s opinion, the legal outcome; and that is also, by all appearance, the likely political requirement.

It is important, too, to take a step back and realise what was being asked of the courts and the people of India here. Our judicial institutions were being asked to address what has been one of the most divisive political issues that independent India has faced; and so many of India’s people, forward-looking and aspirational, have expected that a peaceful, legal mechanism will provide satisfactory closure to the problem. In this verdict, and in what appears for now to be a measured response to it, we see that hope in action. But what is true by implication is that, if the court’s verdict on this issue is to have political heft, other Ayodhya-related cases can’t be considered minor or forgettable. Nobody can stand behind the judicial process on this case — and in the matter of the Babri demolition case, for example, duck out of legal consequences. The question of culpability for that act is completely unrelated to the legal question of ownership of the Babri site. And those cases need to be pursued visibly and energetically. They, too, reflect the hope of the vast majority of Indians that our institutions are mature enough to deal with vexed questions without permitting the use of violence. Faith in the law requires stringent action against those who take the law into their own hands.










No legal clarity or scope for amicable settlement

The split verdict of the Lucknow bench of the neither brings legal clarity to the dispute nor paves the way for an amicable settlement . It is most apposite that one party to the case has decided to move the against the verdict.

The essential non-judiciability of the dispute has manifested itself in the verdict as a jumble of faith, evidence, compromise and an implicit appeal for a negotiated partition of the disputed site among three claimants, including the Muslim body that claims to own the site on which the Babri mosque stood before its undisputed demolition in 1992.

It is difficult to accept such a jumble as a reasoned judicial verdict. The Supreme Court needs to redeem the law from its deformation into a plea for pragmatic giveand-take . Granted, the Supreme Court is unlikely to find a legal solution to a problem that is not amenable to legal resolution. But, at least, it would be able to delineate the boundaries of what the law can establish and what it cannot . This is a task that has completely eluded the Lucknow bench of the Allahabad High Court in the present case.

A court verdict is but one of the many components that together constitute public life in India with its immense diversity of language, religion, region, ethnicity, community grouping, educational attainment and integration with globalised modernity. Such diversity is as much cause for celebration and cultural strength and richness as it is fraught with the threat of schism. What use we make of diversity is our collective choice. In making that choice, democracy has to distinguish itself from majoritarianism, which does not recognise the rights of assorted minorities.

A majoritarian campaign to redefine India’s nationhood in religious terms demolished the Babri mosque and weakened the secular foundations of the Republic. Judicial pronouncements, their articulation in state policy and political action must seek to reinforce those weakened foundations, not strike at them further. Political practice must now live up to this goal, even if the Ayodhya verdict has not. So far, the major political parties seem to agree. The Supreme Court can end fuzziness on the imperative of constructive political action to solve the dispute.

हिन्दू में सिद्धार्थ वर्धराजन का विश्लेषण भी पढ़ें


Force of faith trumps law and reason in Ayodhya case

Siddharth Varadarajan

If left unamended by the Supreme Court, the legal, social and political repercussions of the judgment are likely to be extremely damaging


New Delhi: The Lucknow Bench of the Allahabad High Court has made judicial history by deciding a long pending legal dispute over a piece of property in Ayodhya on the basis of an unverified and unsubstantiated reference to the “faith and belief of Hindus.”
The irony is that in doing so, the court has inadvertently provided a shot in the arm for a political movement that cited the very same “faith” and “belief” to justify its open defiance of the law and the Indian Constitution. That defiance reached its apogee in 1992, when a 500-year-old mosque which stood at the disputed site was destroyed. The legal and political system in India stood silent witness to that crime of trespass, vandalism and expropriation. Eighteen years later, the country has compounded that sin by legitimising the “faith” and “belief” of those who took the law into their own hands.
The three learned judges of the Allahabad High Court may have rendered separate judgments on the title suit in the Babri Masjid-Ramjanmabhoomi case but Justices Sudhir Agarwal, S.U. Khan and Dharam Veer Sharma all seem to agree on one central point: that the Hindu plaintiffs in the case have a claim to the disputed site because “as per [the] faith and belief of the Hindus” the place under the central dome of the Babri Masjid where the idols of Ram Lalla were placed surreptitiously in 1949 is indeed the “birthplace” of Lord Ram.
For every Hindu who believes the spot under the central dome of the Babri Masjid is the precise spot where Lord Ram was born there is another who believes something else. But leaving aside the question of who “the Hindus” referred to by the court really are and how their actual faith and belief was ascertained and measured, it is odd that a court of law should give such weight to theological considerations and constructs rather than legal reasoning and facts. Tulsidas wrote his Ramcharitmanas in 16th century Ayodhya but made no reference to the birthplace of Lord Rama that the court has now identified with such exacting precision five centuries later.
The “faith and belief” that the court speaks about today acquired salience only after the Vishwa Hindu Parishad and the Bharatiya Janata Party launched a political campaign in the 1980s to “liberate” the “janmasthan.”
Collectives in India have faith in all sorts of things but “faith” cannot become the arbiter of what is right and wrong in law. Nor can the righting of supposed historical wrongs become the basis for dispensing justice today. In 1993, the Supreme Court wisely refused to answer a Presidential Reference made to it by the Narasimha Rao government seeking its opinion on whether a Hindu temple once existed at the Babri Masjid site. Yet, the High Court saw fit to frame a number of questions that ought to have had absolutely no bearing on the title suit which was before it.
One of the questions the court framed was “whether the building has been constructed on the site of an alleged Hindu temple after demolishing the same.” Pursuant to this question, it asked the Archaeological Survey of India to conduct a dig at the site. This was done in 2003, during the time when the BJP-led National Democratic Alliance government was in power at the Centre. Not surprisingly, the ASI concluded that there was a “massive Hindu religious structure” below, a finding that was disputed by many archaeologists and historians.
The territory of India — as of many countries with a settled civilisation as old as ours — is full of buildings that were constructed after pre-existing structures were demolished to make way for them. Buddhist shrines made way for Hindu temples. Temples have made way for mosques. Mosques have made way for temples. So even if a temple was demolished in the 16th century to make way for the Babri Masjid, what legal relevance can that have in the 21st century? And if such demolition is to serve as the basis for settling property disputes today, where do we draw the line? On the walls of the Gyanvapi mosque in Varanasi can be seen the remnants of a Hindu temple, perhaps even of the original Vishwanath mandir. Certainly many “Hindus” believe the mosque is built on land that is especially sacred to them. The denouement of the Babri case from agitation and demolition to possession might easily serve as a precedent for politicians looking to come to power on the basis of heightening religious tensions.
Even assuming the tainted ASI report is correct in its assessment that a Hindu temple lay below the ruins of the Babri Masjid, neither the ASI nor any other expert has any scientific basis for claiming the architects of the mosque were the ones who did the demolishing. And yet two of the three High Court judges have concluded that the mosque was built after a temple was demolished.
From at least the 19th century, if not earlier, we know that both Hindus and Muslims worshipped within the 2.77 acre site, the latter within the Babri Masjid building and the former at the Ram Chhabutra built within the mosque compound. This practice came to an end in 1949 when politically motivated individuals broke into the mosque and placed idols of Ram Lalla within. After 1949, both communities were denied access though Hindus have been allowed to offer darshan since 1986. In suggesting a three way partition of the site, the High Court has taken a small step towards the restoration of the religious status quo ante which prevailed before politicians got into the act. But its reasoning is flawed and even dangerous. If left unamended by the Supreme Court, the legal, social and political repercussions of the judgment are likely to be extremely damaging.





© Copyright 2000 - 2009 The Hindu

शुक्रवार, सितम्बर 24, 2010

अयोध्या

कॉमनवैल्थ खेल के समांतर अयोध्या का मसला काफी रोचक हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला टाल दिया है। इससे कुछ लोगों ने राहत की साँस ली है और कुछ ने कहा है कि इतने साल बाद फैसले की घड़ी आने पर दो-चार दिन टाल देने से कोई समझौता हो जाएगा क्या? बहरहाल आज के सभी अखबारों ने इस विषय पर सम्पादकीय लिखने की ज़रूरत नहीं समझी है। कहा जा सकता है कि वे लिखते भी तो क्या लिखते। 


अंग्रेजी में हिन्दू और इंडियन एक्सप्रेस ने इस विषय पर टिप्पणी की है। टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स ने नहीं की। हिन्दी में जागरण, अमर उजाला और हिन्दुस्तान ने टिप्पणी की है। भास्कर और नवभारत टाइम्स ने नहीं की। संयोग से तीनों का शीर्षक एक ही है। ऐसा शीर्षक को रोचक बनाने के लिए या आसानी से उपलब्ध एक शीर्षक का इस्तेमाल करने के लिए किया गया है। 










एक रुका हुआ फैसला
अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ की ओर से 24 सितंबर को आने वाले फैसले को लेकर जैसा तनावपूर्ण माहौल बना दिया गया था उसे देखते हुए उच्चतम न्यायालय का हस्तक्षेप तात्कालिक राहत देने वाला है। वैसे तो उच्चतम न्यायालय ने हाईकोर्ट के निर्णय सुनाने पर एक सप्ताह की ही रोक लगाई है, लेकिन देखना यह होगा कि वह सुलह-समझौते की अर्जी पर 28 सितंबर को क्या फैसला देता है? उसका फैसला कुछ भी हो, फिलहाल अयोध्या विवाद का समाधान आपसी सहमति से निकलने के आसार नजर नहीं आते। सुलह का मौका देने की गुहार लगाते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाने वाले याचिकाकर्ता को छोड़ दिया जाए तो न तो वादी-प्रतिवादी आपसी सहमति के रास्ते पर चलने को तैयार दिखते हैं और न ही प्रमुख राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक संगठन। राष्ट्रहित में इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता कि अयोध्या विवाद को आपसी बातचीत के माध्यम से हल किया जाए, लेकिन यह निराशाजनक है कि इसके लिए किसी भी स्तर पर ठोस प्रयास नहीं हो रहे हैं। क्या यह उम्मीद की जाए कि उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप ने जो अवसर प्रदान किया है उसका उपयोग करने के लिए वे लोग आगे आएंगे जो अयोध्या विवाद का समाधान परस्पर सहमति से खोजने के लिए उपयुक्त माहौल बनाने में सहायक हो सकते हैं? यदि दोनों पक्षों के धर्माचार्य और प्रमुख राजनीतिक दल इस दिशा में कदम उठाएं तो अभीष्ट की पूर्ति हो सकती है। यह सही है कि अतीत में ऐसे जो प्रयास हुए वे नाकाम रहे, लेकिन आखिर और अधिक निष्ठा के साथ एक और कोशिश करने में क्या हर्ज है? यह विचित्र है कि जो लोग ऐसी कोशिश कर सकते हैं उनमें से ही अनेक 24 सितंबर के फैसले को लेकर गैर जिम्मेदाराना बयान दे रहे हैं। ऐसे राजनेता एक ओर शांति-सद्भाव बनाए रखने का आग्रह कर रहे हैं और दूसरी ओर अपने बयानों के जरिये ऐसा माहौल रच रहे जैसे 24 सितंबर को आसमान टूटने जा रहा हो। परिणाम यह हुआ कि देश के कुछ हिस्सों में दहशत पैदा हो गई। कुछ राज्यों में तो स्कूलों में छुट्टी करने की तैयारी कर ली गई थी। इसमें दो राय नहीं कि पूरा देश अयोध्या विवाद पर उच्च न्यायालय का अभिमत जानने को उत्सुक है, लेकिन धीरे-धीरे इस उत्सुकता में आशंका घुल गई। इसके लिए चाहे जो जिम्मेदार हो, 24 सितंबर के फैसले को लेकर जैसे माहौल का निर्माणकिया गया उससे एक परिपक्व राष्ट्र की हमारी छवि को धक्का लगा है। यह आश्चर्यजनक है कि जब यह स्पष्ट था कि उच्च न्यायालय का फैसला अंतिम नहीं होगा तब भी आम जनता के बीच यह संदेश क्यों जाने दिया गया कि अयोध्या मामले में कोई निर्णायक फैसला होने जा रहा है। जिन परिस्थितियों में अयोध्या विवाद पर उच्च न्यायालय का फैसला रुका वे सुरक्षा तैयारियों को विस्तार देने वाली हैं। चूंकि उच्च न्यायालय की ओर से फैसला सुनाने वाले तीन में से एक न्यायाधीश एक अक्टूबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं इसलिए उच्चतम न्यायालय का यह हस्तक्षेप फैसला टलने का कारण भी बन सकता है। यदि अयोध्या विवाद पर सुलह की कोशिश भी नहीं होती और उच्च न्यायालय का फैसला भी लंबे समय के लिए टलता है तो आम जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर सकती है।












एक रुका हुआ फैसला

इस मामले में बातचीत के जरिये समाधान की कोशिशों को आखिर तक अवसर देना उचित है।

जिस राम जन्मभूमि-बाबरी मसजिद विवाद की कानूनी सुनवाई कभी पूरी न होने की बातें कही जाती रही हैं, उसकी सुनवाई पूरी होने के बाद निर्णय की तारीख से ठीक एक दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मसले को अदालत से बाहर सुलझाने के प्रयासों को अवसर देने की याचिका को मानकर 28 सितंबर की तारीख देना कई लोगों को थोड़ा अटपटा लग सकता है, पर बातचीत के जरिये समाधान तलाशने की कोशिशों को आखिर तक अवसर देना उचित है। अब अगर 28 सितंबर को याचिकाकर्ता रमेशचंद्र तिवारी की अर्जी को अदालत सुनवाई के बाद खारिज कर देती है, तो हाई कोर्ट 29 को फैसला दे सकता है। अदालती कामकाज में ‘सकता है’ या ‘होगा’ जैसे पदों का कोई मतलब नहीं होता, पर सुप्रीम कोर्ट को अदालती फैसले के बाहर हो रहे बीच-बचाव के गंभीर प्रयासों की जानकारी देकर ही तिवारी या उनके वकील अपनी अर्जी आगे बढ़ा सकते हैं। ऊपर से देखने पर ऐसी कोशिशें दिखाई नहीं दे रहीं, पर विहिप से जुड़े संतों के ठिकानों, सैयद कासिम रसूल इलियास जैसे पुराने मध्यस्थों की सक्रियता और कैबिनेट सचिवालय में एक पुराने अनुभवी अधिकारी की वापसी को कई लोग इन्हीं कोशिशों के रूप में देखते हैं। और भले ही छह दिसंबर, 1992 की घटना संघ परिवार की तैयारियों, कल्याण सिंह की सांविधानिक जिम्मेदारी न निभाने और टकराव की राजनीति के प्रबल होने के चलते घटी, पर उससे पहले आपसी बातचीत से समस्या का हल निकालने के कई गंभीर प्रयास हुए थे। 17-18 साल की घटनाओं ने सबको अपनी राय और तरीका बदलने पर भी मजबूर किया है। राजनीतिक दलों के नजरिये, राजनीति और शासन नीति को छोड़ भी दें, तो जो लोग कल तक अदालत की कार्यवाही कभी पूरी न होने की बात कह रहे थे, वही सुबूत जुटाने और गवाही देने में जुटे तथा मामले को फैसले तक ले आए। दोनों पक्षों में उग्रता घटी है। सभी अदालत के फैसले को मानने की बात करने लगे हैं। और फैसलेका वक्त आते-आते तक सभी डरने भी लगे हैं। ऐसे में साथ रहने, साथ जीवन गुजारने, अपनी-अपनी आस्था पर टिके रहकर भी दूसरे की आस्था का सम्मान करने के भाव से दोनों पक्ष बातचीत से मसले को सुलझा लें, तो इससे बेहतर और क्या होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने अभी कोई निर्णय नहीं दिया है, पर जो लोग उसके यहां इस विकल्प की मांग के साथ गए हैं, उन्हें अपनी विश्वसनीयता दिखाने के साथ सक्रियता का इतिहास और वर्तमान भी जाहिर करना चाहिए। अदालतें सिर्फ आदेश देने का काम करती नहीं है। उसकी मंशा न्याय करने और न्याय का एहसास कराने की भी होती है।

No more than a breather
Administrations at the Centre and in the States that have their hands full with daunting law and order challenges have obtained a breather from the Supreme Court's order deferring the Allahabad High Court's verdict on the Ayodhya title suits. Among the issues to be decided in the suits are: whether the Babri Masjid was built on the site of a Hindu temple after demolishing it and what the legal effect of such an action is; and whether Muslims had offered prayers from time immemorial at the Babri Masjid and if Hindu idols were placed inside. Some of the suits date back to 1950 and after consolidation in 1989, four have survived and it was in these four that judgments were to be pronounced today. The plea before the Supreme Court was that, given the implications of the impending high court decision for communal harmony and in the circumstances in which the Central and the State security forces were overstretched in dealing with the Maoists, the situation in Kashmir and the security for the Commonwealth Games, the parties should be given one more chance to work out a settlement through negotiations. This unusual last minute plea on a matter that has defied a negotiated settlement for over 60 years, and more particularly since it flared up in the 1990s, hinges on the hope that the parties would change their attitude and work towards an agreement when the Supreme Court takes up the matter. If that hope fails to materialise, the relief for the administrations would be short lived. It was with some reluctance that the Supreme Court bench decided to order the high court to defer its verdict for five days, with one of the two judges inclined to dismiss the petition.


The Babri Masjid-Ramjanmabhoomi issue would no longer seem to inflame passions to the extent that it did in the 1990s, although the court verdict could still have a significant impact on communal harmony. No one would quarrel with the desirability of a fair and equitable negotiated settlement if only that were possible. Yet, if the judicial process itself were to be held hostage to fears of disturbances, it would amount to giving rioters a veto over the law-abiding and would have disturbing implications for the rule of law. The country has come a long way since the turbulent 1990s, and the lessons of that period have hopefully been learnt — the appeals for calm from all parts of the political spectrum are a good augury. Reasonable people on both sides of the communal divide should have no problems in accepting the judicial verdict whichever way it goes, and it would in any case be open to appeal. The nation as a whole should face the Allahabad High Court verdict squarely and demonstrate its commitment to the rule of law, with issues being resolved in judicial and other institutions of the state rather than on the streets.

Calls for calm
The broad based hope for a mature reaction to the Babri verdict, whwenever it may come

An eighteen-year wait is about to get a little longer. The Supreme Court has deferred pronouncing on whether or not the Allahabad high court’s judgment on the Babri title suit should be deferred till September 28 — which means the lower court will not be delivering its verdict on September 24, as planned. It might mean the judgment has been pushed back by just a week, but could well lead to an even longer wait. However, this is unlikely to stem the interventions that have urged everyone to keep their cool.
Indeed, that has been the most remarkable feature of this period of anticipation, the way people and organisations from across the political and ideological spectrum have called for calm, regardless of the judgment’s content. Not just from the people who really need to, like Union Home Minister P. Chidambaram. Or from chief ministers responsible for law and order, like Gujarat CM Narendra Modi, who warned, in his characteristically high-pitched style, that “enemies of the country are in search of opportunities to disturb its social fabric.” No, the interesting point is how near universal is the fear that a judgment that displeases one group or another will toss us back into an earlier and damaging politics, how pervasive the concern that the irresponsible will seize control of the situation and use it, violently, to mar the India story. Various individual members of the All-India Muslim Personal Law Board have gone on the record as urging “patience”, regardless of outcome. Intriguingly, in some sensitive parts of Karnataka, the police have brought together Muslim community leaders and local VHP and RSS heads to jointly urge that the situation stay under control. Even the Shiv Sena’s Uddhav Thackeray called a party meeting to announce that “no Shiv Sainik will indulge in violence”, and got on the phone to Maharashtra Chief Minister Ashok Chavan, apparently to coordinate security for Ganesh Chaturthi processions.
That’s from the most direct stakeholders in the process. But all of us, in truth, have a stake in ensuring that no self-destructive spiral of rancorous bitterness is embarked upon. That’s evident in the fervent, broad-based expressions of hope that any reactions to the verdict, whenever it comes, are mature and forward-looking — expressions visible online, in conversations, in paid advertisements, from Hindi film stars discussing their movies. The final judgment may have been postponed, but the demands for calm will not go away.




रामचन्द्र गुहा का लेख
आज के हिन्दुस्तान में प्रकाशित रामचन्द्र गुहा का यह लेख भी ध्यान देने योग्य है।




मिल्ली गज़ट में राजिन्दर सच्चर का यह लेख भी पढ़ें

सोमवार, मई 24, 2010

क्या हमें विचार और ज्ञान की ज़रूरत नहीं?



प्रमोद जोशी
इस महीने भारतीय सिविल सेवा परीक्षा के परिणाम आने के बाद एनडीटीवी के अंग्रेजी चैनल ने पंजाब की एक सफल प्रतियोगी संदीप कौर से बात प्रसारित की। संदीप कौर के पिता चौथी श्रेणी के कर्मचारी हैं। यह सफलता बेटी की लगन और पिता के समर्थन की प्रेरणादायक कहानी है। जिस इलाके में स्त्री-पुरुष अनुपात बहुत खराब है और जहाँ से बालिका भ्रूण हत्या की खबरें बहुत ज्यादा आती हैं, उम्मीद है वहां संदीप कौर समाज के सामने नया आदर्श पेश करेगी। पंजाब सरकार ने इस दिशा में पहल भी की है।
संदीप कौर ने यह परीक्षा बगैर किसी कोचिंग के पास की। उसने एक बात और मार्के की कही। वह कहती हैं कि मेरी तैयारी का सबसे महत्वपूर्ण तत्व था दैनिक अखबार द हिन्दू को नियमित रूप से पढ़ना। संदीप के पिता या चचेरा भाई घर से करीब 20 किमी दूर खरड़ कस्बे से हिन्दू खरीद कर लाते थे। रोज़ अखबार नहीं मिलता था, तो अखबार का एजेंट उसके लिए दो-तीन दिन का अखबार अपने पास रखता था। संदीप का कहना है कि मैने हिन्दू के सम्पादकीय पेज पर छपे सारे लेख पढ़े हैं। इसके अलावा अखबार के ओपीनियन सेक्शन की सारी सामग्री भी पढ़ी। इस अखबार में करेंट अफेयर्स, नेशनल और इंटरनेशनल डेवलपमेंट की प्रॉपर इनसाइट मिलती है।
संदीप कौर का हिन्दू पढ़ना व्यक्तिगत पसंद का मामला है, पर पत्रकारिता को लेकर ज़ेहन में एक-दो बातें आतीं हैं। प्रतियोगिताओं की तैयारी करने वालों को हिन्दू पढ़ना पसंद है। इस अखबार में ही राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों को उचित पृष्ठभूमि के साथ छापा जाता है। बीस साल पहले दूसरे अंग्रेजी अखबार भी इसी तरह पढ़े जाते थे। पर अब शायद हिन्दू ही इस काम के लिए बचा है। इस बात का क्या पत्रकारिता से कोई रिश्ता है? कुछ समय पहले तक अखबार देश-काल का दर्पण होता था। पिछले दो दशक में सारे नहीं तो बड़ी संख्या में अखबारों ने टेबलॉयड अखबारों की सनसनी को अंगीकार कर लिया। एक ने किया तो दूसरे ने उसकी नकल की। बड़ी से बड़ी खबरें मिस होने पर भी अखबारों को शर्मिन्दगी नहीं होती। सामान्य खबरें और उनके फॉलोअप छापना अखबारों की प्राथमिकता में शामिल नहीं।
हिन्दू के बारे में दो-तीन बातें ऐसी हैं, जिन्हें सब मानते हैं। एक खबरों का वज़न तय करने का उसका परम्परागत ढंग है। यह अखबार सनसनी में भरोसा नहीं करता। उसकी एक राजनैतिक लाइन है, जिसे हम नापसंद कर सकते हैं। पर खबरें लिखते वक्त वह पत्रकारीय मर्यादाओं का पालन करता है। रेप विक्टिम का नाम नहीं छापना है, तो हिन्दू उसका पालन करता है। उसकी डिज़ाइन बहुत आकर्षक न लगती हो, पर वह विषय को पाठक पर आरोपित भी नहीं करती। खेल, विज्ञान, विदेशी मामलों से लेकर लोकल खबरों तक उसकी खबरें ऑब्जेक्टिविटी की परिभाषा पर खरी उतरतीं हैं। उसकी फेयरनेस पर आँच आने के भी एकाध मौके आए हैं। खासतौर से बंगाल में सिंगूर की हिंसा के दौरान उसकी कवरेज में एक पक्ष नज़र आया। यह उसकी नीति है। और किसी अखबार को उसका हक होता है। उसकी इस नीति और विचारधारा की आलोचना की जा सकती है, पर उसके सम्पादकीय और ऑप-एडिट पेज की गुणवत्ता के बारे में दो राय नहीं हो सकतीं।
इस लेख को शुरू करते वक्त मेरा उद्देश्य हिन्दू की प्रशंसा करना नहीं था। मैं दो-तीन बातों को हाइलाइट करना चाहता था। उसमें एक तो यह बात कि कुछ साल पहले तक अखबारों में अपने व्यवसाय को लेकर भी सामग्री पढ़ने को मिल जाती थी। मसलन जस्टिस गजेन्द्र गडकर की अध्यक्षता में बने पहले प्रेस आयोग की सिफारिश थी कि पत्र उद्योग को शेष उद्योग से डिलिंक किया जाय। यह विषय अखबारों के सम्पादकीय पेज पर भी उपस्थित था। आज का मीडिया अपने कारोबार के बारे में डिसकस करने को तैयार नहीं। इसलिए पेड न्यूज़ का मामला जब आया तब पी साईंनाथ के लेखों के लिए सिर्फ हिन्दू में ही जगह थी। ऐसा उसकी ओनरशिप के कारण हुआ। बेशक इंडियन एक्सप्रेस, टेलिग्राफ और टाइम्स ऑफ इंडिया का कवरेज स्तर आज भी काफी अच्छा है, पर कारोबार के मामले में उनपर पक्का यकीन नहीं किया जा सकता।
अखबारों के सम्पादकीय पेज और सम्पादकीय के बारे में भी सोचने का ज़माना शायद गया। यह सब मैं अंग्रेज़ी के अच्छे अखबारों के संदर्भ में कह रहा हूँ। हिन्दी अखबारों की बात अभी नहीं है। किसी ने कहा कि डीएवीपी की शर्त है कि सम्पादकीय होना चाहिए, वर्ना इसकी ज़रूरत ही क्या है। वास्तव में ज़रूरत नहीं है। जब जेब में विचार ही नहीं है, तब चेहरे पर विचारक की मुद्रा बनाने की ज़रूरत भी नहीं होनी चाहिए। संदीप कौर को एडिट पेज की ज़रूरत इसलिए थी क्योंकि सिविल सेवा परीक्षा के जनरल स्टडीज़ में करेंट अफेयर्स के सवाल पूछे जाते हैं। आज कौन बनेगा करोड़पति जैसा कोई कार्यक्रम भी नहीं है, जो लोगों को सामान्य ज्ञान की ज़रूरत हो। वास्तव में प्रथमिकता हमारी रोजी से तय होती है और हमारी रोजी में ज्ञान की ज़रूरत नहीं रह गई है।
किसी ने सलाह दी कि अखबार में विचार के पेज का मतलब क्या है। आप समाचार दीजिए पाठक अपने विचार बना लेगा। यों भी एडिट पेज को चार-छह फीसदी लोग ही पढ़ते हैं। बात सच है, पर हम अपने आसपास देखें। हमें ओपीनियन लीडर्स की ज़रूरत होती है। ऐसा न होता तो चैनलों पर सनसनीखेज खबर आते ही उसका विश्लेषण करने वालों की ज़रूरत महसूस होने लगती है। हाँ यह भी सही है कि मरे हुए विचार, पिटा-पिटाए तरीके से पेश करके हम विचार की बेइज्जती करते हैं। ऐसा क्यों है और रास्ता क्या है? इसका उत्तर देने के बजाय हम विचार की अवधारणा को ही त्याग देंगे, तो जो शून्य पैदा होगा वह खौफनाक होगा।
हिन्दी अखबार की सबसे बड़ी ज़रूरत पृष्ठभूमि देने की है। हमारा पाठक जानना चाहता है। उसे ज़मीन से आसमान तक की बातों की ज़रूरत है। हम उसे फैशन परेड की तस्वीरें, पार्टियां, मस्ती वगैरह पेश कर रहे हैं। यह सब भी ठीक है, पर उसके पहले बुनियादी ज्ञान की ज़रूरत है। संदीप कौर को कोई हिन्दी अखबार पसंद क्यों नहीं था? इसकी एक वजह यह भी है कि कोई हिन्दी अखबार हिन्दू जैसा बनना नहीं चाहता। हिन्दी में ज्ञान से जुड़ी बातें अधकचरा और अविश्वसनीय होतीं हैं। ज़रूरत इस बात की है कि हम युवा पत्रकारों को ज्ञान और विचार के लिए तैयार करें। चूंकि इस काम को प्रफेशनल ढंग से नहीं किया गया है इसलिए विचार की डोर एक्टिविस्ट्स के हाथों चली गई है। उनके पास विचार तो हैं, पर किसी एक संगठन या विचार से जुड़े हुए। वे अपने प्रतिस्पर्धी विचार को दबाना चाहते हैं। बहरहाल इस रास्ते पर सोचना चाहे। सम्पादकीय पेज पर फिल्मी कलाकारों के या सेलेब्रिटीज़ के लेख छापकर पाठकों का ध्यान तो खींचा जा सकता है, पर एक समझदार समाज की रचना नहीं हो सकती। पता नहीं समझदार समाज की रचना अखबार की जिम्मेदारी है भी या नहीं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें