गुरुवार, 6 सितंबर 2012

विकास की इबारतों का इलाका पश्चिमी यूपी / डॉ. विवेक क्षितिज








 
डॉ. विवेक क्षितिज
    पश्चिमी उत्तरप्रदेश के बारे में बहुत शुरुआत से बात करें तो, भारत में (वस्तुत: पाकिस्तान में) बड़े पैमाने पर पहली बार अन्न उत्पादन हुआ सिंधु नदी की घाटी में यानी पश्चिमी पंजाब और सिंध में। इसका समय है 3000-1700 ईसा पूर्व। तब खेती का असली विस्तार पूर्व की ओर 1800 किलोमीटर तक गंगा की घाटी में हुआ। पश्चिमी यूपी का इलाका इसी के बीच आता है। तो भारत का सबसे पुराना कृषक समाज, आधुनिक कृषक समाज यहां बसता है। इस समाज ने अन्न उत्पादन के सवर्थ भिन्न तरीके अपनाये और इसके साथ ही एक नई समाज व्यवस्था की भी जरूरत पड़ी। यह विस्तार कोई हजार साल तक यानी 700 ईसा पूर्व तक चला। फिर अगला मुख्य विस्तार सीधे प्रायद्वीप की ओर हुआ। इसी बीच 1500 ईसापूर्व के कुछ समय बाद तक ये समूह आपस में और पंजाब के कुछ आदिवासियों से लड़ते-झगड़ते रहे। फिर धीरे-धीरे गंगा की द्रोणी में नागरिक जीवन और सभ्यता की स्थापना हुई। इस तरह पश्चिमी उत्तरप्रदेश में सभ्यता की सबसे पुरानी इबारतें लिखी गई हैं।
  • इसके बाद शुरू हुई सांस्कृतिक नवीनीकरण की प्रक्रिया भारत के सभी क्षेत्रों में समान गति से नहीं चली है। किन्हीं क्षेत्रों को तो सांस्कृतिक कुण्ठा या जड़ता का केंद्र ही कहा जा सकता है। अर्थविज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सांस्कृतिक नवीनीकरण की तेज प्रक्रिया के क्षेत्र, यानी सामंती-साम्राज्यी सांस्कृतिक विकृतियों से मुक्ति के क्षेत्र जैसे पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश और बेशक पश्चिमी यूपी आदि आर्थिक विकास की दृष्टि से भी अधिक गतिमान हैं और सामंती-साम्राज्यी सांस्कृतिक विकृतियों, कुण्ठाओं या जड़ता के क्षेत्र जैसे पूर्वी यूपी, बिहार, पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा, राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि के अधिकांश हिस्से आर्थिक दृष्टि से भी पिछड़े हुए या विकास में मंदगति हैं। यानी, उन क्षेत्रों के आर्थिक विकास में कठिनाई आती है, जिनमें पुरानी संस्कृति के संस्कार और निष्ठाएं प्रबल हैं, जो लोक-परलोक और जीवन व्यवहार की सरलता-सत्यता को छोड़ कर्मकांड और कट्टरता को प्राथमिकता देते हैं। पश्चिमी यूपी का ज्यादातर हिस्सा इस जड़ता से मुक्त रहा है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने जो महाराष्ट्र में पैदा हुए थे, हिंदी पट्टी में खास कर पश्चिमी उत्तरप्रदेश के मेरठ और सहारनपुर आदि क्षेत्रों एवं पंजाब को अपना केंद्र बनाया था।
  • पश्चिमी यूपी का समाज ऊपरी तौर पर देखने से संपन्न ही लगता है, लेकिन यहां निर्धनता भी है। असल में ग्रामीण समाज में निर्धनता दो तरह की होती है। एक तो दीर्घकालिक निर्धनता, जो लंबे समय से चली आ रही है, कई पीढिय़ों से। लंबे समय की यह दीर्घकालिक निर्धनता अपना सांस्कृतिक-राजनीतिक लबादा तैयार कर लेती है। यह हीनता और कष्ट सहने की प्रवृत्ति का लबादा है। अल्पकालिक निर्धनता इसके उलट है। किसी व्यवसाय में घाटा, बीमारी या प्राकृतिक आपदा में या फिर अपराध का शिकार होकर निर्धन हो जाना इसके तहत आता है। इस तरह की निर्धनता अवसर खोजती है और कई बार क्रांतिकारी परिवर्तनों की बुनियाद बनती है। पश्चिमी यूपी में यह दूसरे किस्म की निर्धनता है, जो यहां की उथल-पुथल का बड़ा कारण है।
  • पश्चिमी उत्तरप्रदेश अपेक्षकृत संपन्न इलाका है। खेत में जोड़ घटने और आबादी बढऩे से बेरोजगारी की समस्या से हालात बदलने लगे अन्यथा गंगा-यमुना नदी के बीच के दोआब के किसान अपने बूते पर अपना घर चलाते थे। हर शहर किसी-न-किसी लघु और घरेलू उद्योग के लिए मशहूर है।
  • गाजियाबाद से लेकर बदायूं और मुरादाबाद से लेकर आगरा तक के हर छोटे-बड़े कस्बे में कोई न कोई महत्वपूर्ण घरेलू या लघु उद्योग वर्षों से चल रहा है। फिरोजाबाद में कांच की चूड़ी, आगरा के जूते और चमड़े का काम, अलीगढ़ के ताले, मुरादाबाद के पीतल का सामान, सहारनपुर का बेंत का सामान, खुर्जा के चीनी मिट्टी के बर्तन, मेरठ का कैंची और सरौता, मेरठ, पिलखुआ, हापुड़, बुलंदशहर आदि शहरों के हैंडलूम के काम देश में ही नहीं दुनिया में मशहूर हैं। करोड़ों का मांस का व्यापार हर साल पश्चिमी उत्तरप्रदेश से होता है। चमड़े, जानवरों की हड्डी, खून से दवा बनाने आदि ऐसे तमाम कारोबार हैं, जिनसे सभी शहर-कस्बे आत्मनिर्भर हैं। एक समय ऐसा था जब गन्ने से गुड़ बनाना फायदेमंद होता था, तो किसान गन्ना चीनी मिलों में देने से कतराते थे। इसी से हापुड़ की मंडी देश के नक्शे में प्रमुख स्थान रखती है। इसी तरह की मंडी मुजफ्फरनगर में भी है।
  • शुरू से ही पश्चिमी उत्तरप्रदेश के मैदानी इलाकों में जाट, गूजर, यादव, कुर्मी, राजपूत और त्यागी मजबूत जातियां थीं। यहां आर्य समाज आंदोलन का असर रहा है। इसके बावजूद गरीबी और बेकारी की मार और 90 के बाद की राजनीति ने इलाके को भाजपाई बना डाला। राजनीतिक तौर पर एक तथ्य और याद रखने योग्य है कि बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद के समय उत्तरप्रदेश की राजनीति में दबदबा रखनेवाले सभी बड़े नेता कल्याण सिंह, मुलायम सिंह, अजित सिंह, नारायण दत्त तिवारी और मायावती इसी पश्चिमी उत्तरप्रदेश के रहने वाले थे।
  • नब्बे के दशक से पश्चिमी उत्तरप्रदेश आज तक जाति और सांप्रदायिक बंटवारे से नहीं उबर पाया है। प्रशासन ने तो पहले भी इलाके को विकसित करने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की थी न अब करना चाहता है। आबादी बढऩे और रोजगार घटने से आम लोगों की परेशानी बढ़ी है। किसानों की जोत घटने से फसल के दाम ठीक नहीं मिल रहे हैं। बावजूद इसके अभी भी प्रकृति के साथ होने और दिल्ली के करीब होने से कारोबार के अवसर ज्यादा होने के कारण पश्चिमी उत्तरप्रदेश देश के कई राज्यों से बेहतर आर्थिक स्थिति में है।
  • ( इस तरह देखें तो ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक-राजनीतिक कारकों की उपस्थिति के आधार पर कहा जा सकता है कि यहां विकास की संभावनाएं अन्य क्षेत्रों से कई गुना ज्यादा हैं।  )
(लेखक इतिहास के आर्थिक आधारों पर शोधरत हैं

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