रविवार, 9 सितंबर 2012

मीडिया के यश के लिए यशवंत / जेल प्रकरण पर खास (आयोजन )



 ( आत्मधिक्कार )
अनामी 
सलाम है .यशवंत आपके धैर्य्य, हिम्मत, साहसा और तेज को सलाम । मीडिया को आज सरकार सत्ता और माफिया डॉन से ज्यादा खतरा नहीं है । सबसे ज्यादा खतरा डॉन बन गए पत्रकारों से  है। पत्रकारिता में घुस आए लखपतिया पत्रकारों की वजह से ही यह पेशा अब धंधा बन गया । जिस तरह जीबीरोड़ में अधेड़ों का कोई राखनहार नही होता उसी तरह मालिक के तलवे चाटने वालों की भी कोई कद्र यहां नहीं होती। शिलाजीत और वियाग्रा के बूते खुद को जवान दिखा रहे नकली पत्रकार और असली दलाल सही मायने में दलालों की दुर्गति भूल गए है कि एक दलाल हमेशा दलाल ही होता और रहता है।, चाहे पत्रकारिता में वो खुद को कितना भी बड़ा क्यों ना मान ले ।  मीडिया के इन दुश्मनों के खिलाफ आपका यह साहस, अभियान और जेल यात्रा एकदम आजादी के दिनों की तरह ही माना जाएगा। क्योंकि आज मीडिया को आजाद रखना भी बहुत बड़ी चुनौती है। आपके साहस और हिम्मत को सलाम यश भाई। हम सब कथित पत्रकार तुम्हारे आभारी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस युद्ध में साथ होकर भी साथ नहीं रह सके। सच के राह में संकट तो है मगर दलालों को बेनकाब करने से यह संकट जरूर कम हो सकता है। फिर से कलम के इस बहादुर सिपाही को सलाम।

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य़शवंत जेल से रिहा। आपका स्वागत है यशवंत।  

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शाम को आठ बजे डासना जेल के मुख्य गेट से यशवंत सिंह बाहर आएं। चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। जिस तरह हंसते हुए गए थे, वैसे ही आएं। उनकी हंसी उनके तमाम विरोधियों और उनके खिलाफ साजिश रचने वालों को मुंह चिढ़ा रही थी। गोया कह रही हो, देख लो, मैं टूटा नहीं। अब भी वैसे ही अटल हूं। बल्कि पहले से ज्यादा मजबूत हूं। जो मित्र लेने पहुंचे थे, वो भावुक थे।  लेकिन बंदा एकदम बिंदास था। वहीं हंसी-मजाक शुरू। जेल के बाहर आते ही अपने स्वभाव के मुताबिक जेल के किस्से। उनकी बातों से मित्रों में एक ऊर्जा सी भर गई, जिसकी कमी वो बीते ढ़ाई महीने से महसूस कर रहे थे। यही यशवंत की खासियत है।
http://bhadas4media.com/images/2012last/06092012003.jpgगाड़ी में बैठने के बाद फोन शुरू। गाढ़े वक्त में साथ देने वाले मित्रों को धन्यवाद देने लगे। "गुरू, भैया, सर, बाबू, आ गया हूं। मिलते हैं।" जिससे जैसा नाता था, वैसे ही भाव थे। हालांकि यशवंत की बातों में थोड़ी शिकायत भी थी और थोड़ी बेचैनी भी। शिकायत उन मित्रों से थी, जिन्होंने इस मुश्किल दौर में उनका साथ नहीं दिया। और बेचैनी अपने साथी अनिल सिंह को छुड़ाने को लेकर थी। मस्ती कर लेने के बाद थोड़े संजीदा हुए तो मन की बात जबान पर आ गई। बोले- 'यार ऐसा वक्त भी आना चाहिए, अपना कौन है-पराया कौन, पता लग जाता है।' लेकिन दूसरे ही पल फिर मस्ती शुरू। "यार हम जैसे लोगों को जेल जरूर जाना चाहिए। बहुत अच्छी जगह है। बिला वजह डरते हैं हमलोग। वहां गजब की सामूहिकता है। वहां की लाइब्रेरी में बहुत किताबें हैं। बहुतों को पढ़ डाला। खूब योगा किया। " दिल्ली से बाहर रहने वाले एक वरिष्ठ और बुजुर्ग पत्रकार, जो हर वक्त यशवंत को लेकर चिंतित रहे, उनको फोन घुमा डाला। "दादा अच्छा हूं। पता चला कि आपने बहुत याद किया। ठीक हूं दादा।" घर पहुंचे तो मां और बाबूजी की आंखे डबडबाई थी, जो इनदोनों दिल्ली आकर रह रहे थे। पत्नी और बच्चों के चेहरे खिले थे। पत्नी ने टीका लगाया, आरती उतारी। पति का या यूं कहें हर आम मीडियाकर्मी के हीरो का सभी की तरफ से स्वागत किया। हम सबकी तरफ से आपका स्वागत है यशवंत।

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बधाई हो, यशवंत को जमानत मिल गई, जेल से रिहा होंगे ---2

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह को जमानत मिल गई है। जागरण मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने बुधवार को यशवंत को जमानत दे दी। कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद यशवंत कल 6 सितंबर को जेल से रिहा हो जाएंगे। इससे पहले दो अऩ्य मामलों में भी यशवंत को जमानत मिल चुकी थी, लेकिन जागरण द्वारा भी उन पर मुकदमा दर्ज करा दिया गया था,जिसकी वजह से वह रिहा नहीं हो पाए थे।
गौरतलब है कि यशवंत को 30 जून को नोएडा स्थित न्यूज एक्सप्रेस चैनल के बाहर से गिरफ्तार कर लिया गया था। यशवंत पर साक्षी जोशी, विनोद कापड़ी औऱ दैनिक जागरण ने अलग-अलग मामला दर्ज कराया था। यशवंत की गिरफ्तारी के बाद से ही मीडिया जगत में इसको लेकर काफी रोष था। यशवंत जिन आम पत्रकारों की आवाज बनकर उभरे थे, उऩ्होंने कड़े शब्दों में इसकी निंदा की और विभिन्न शहरों में प्रदर्शन कर अपना विरोध भी जताया। यशवंत सिंह के जमानत और जेल से रिहा होने की खबर मिलते ही उनके प्रशंसकों में खुशी की लहर दौड़ गई है। हालांकि यशवंत की गिरफ्तारी और लगातार जेल में रखने के बहाने के कारण पुलिस - प्रशासन की भूमिका इस पूरे मामले में संदिग्ध रही है। कुछ बड़े मीडिया घराने यशवंत के पीछे पड़े हैं, लेकिन यशवंत औऱ उऩके समर्थकों ने जिस तरह इस लड़ाई को लड़ा उससे यशवंत औऱ भड़ास4मीडिया के विरोधियों को करारा जवाब मिल चुका है। 

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यशवंत को जेल में सड़ाकर मनोबल तोड़ने की साजिश ---3

Printकरीबियों को प्रताडि़त व गिरफ्तार कर भड़ास को बंद करने का कुत्सित अभियान
साक्षी जोशी और विनोद कापड़ी द्वारा दर्ज कराये गये मुकदमों के आधार पर यशवंत को तुरत-फुरत जेल भेजने के बाद दैनिक जागरण प्रबंधन ने भी एक मुकदमा ठोंक दिया। साक्षी और विनोद कापड़ी द्वारा दर्ज कराये गये मुकदमों में यशवंत की जमानत टाल-मटोल के बाद दे दी गयी, लेकिन जागरण द्वारा दर्ज कराये गये मुकदमें में अभी तक यशवंत को जमानत नहीं दी मिली है। जागरण प्रबंधन ने इसी फर्जी मुकदमे में पुलिस पर दबाव बनाकर भड़ास के कंटेंट एडीटर अनिल सिंह को भी जेल भिजवा दिया।
साथ ही पुलिस ने यशवंत के घर पर छापामारी करके लैपटाप व कंम्यूमटर की हार्ड-डिस्क को जब्त कर लिया। नोएडा कोर्ट द्वारा जागरण के मुकदमें में यशवंत को जमानत न देकर, अर्जी को खारिज करके सिर्फ डेट पर डेट दी जा रही थी। जिस तरह के फर्जी मुकदमे यशवंत और अनिल पर लगाये गये हैं, उसमें अव्वल तो गिरफ्तारी की जरूरत ही नहीं थी। और अगर अपहरण के अंदाज में दोनों की आतंकवादियों सरीखी गिरफ्तारी की गयी तो उन्हें  कोर्ट से तुरंत बेल मिल जानी चाहिए थी। या फिर कुछ दिनों के भीतर ही जमानत मिल जानी ही चाहिए थी। लेकिन मीडिया के कुछ भ्रष्ट मालिकों व संपादकों ने मिलीभगत करके यूपी पुलिस को अपने प्रभाव में करके भड़ास टीम का मनोबल तोड़ने की साजिशें रचीं जिसके तहत जेल में उन दोनों को सड़ाने व डरा-धमका कर भड़ासको न चलाने देने के लिए कुत्सित अभियान चलाया जा रहा है। इसी अभियान का हिस्सा है यशवंत व अनिल को जमानत न दिया जाना। अनिल सिंह यशवंत की गिरफ्तारी के बाद उनकी रिहाई के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कनर काट रहे थे। अनिल को नोएडा कोर्ट के पास पुलिस ने अपहरण किया और इधर-उधर घुमाने के के बाद हवालात में रखा, फिर जेल भेज दिया।
इसी अंदाज में इससे पहले यशवंत का भी पुलिस ने पहले अपहरण किया था और यहां-वहां घुमाने के बाद उन्हेंप जेल भेजा था। यशवंत के घर पर भारी पुलिस बल ने छापा मार कर घरवालों को डराया-धमकाया और कंप्यूभटर-लैपटाप को जब्त  कर लिया। फिलहाल दैनिक जागरण समेत भ्रष्टा मीडिया मालिकों व संपादकों की टोली पूरा प्रयास कर रही है कि यशवंत और अनिल की जमानत न होने दी जाए और इन मामलों को लटकाए रख कर भड़ास के संस्थापक व हिन्दी न्यूज मीडिया के नेतृत्वटकारी यशवंत सिंह और तेज-तर्रार पत्रकार व भड़ास के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह को जेल में सड़ाया जाए। इस खेल में भ्रष्ट व प्रभावशाली लोग हाथ धोकर यशवंत के पीछे लगे हुए हैं।
पर पूरे मामले का दूसरा पक्ष यह है कि डासना जेल में अनिल और यशवंत निराश-हताश या परेशान होने की जगह गर्व और ताजे हौसलों से भरे हुए हैं कि उन्हें सच्ची पत्रकारिता करने और भ्रष्टाचार की पोल खोलने के कारण एक साजिश के तहत जेल भेजा गया है। इन दोनों का एक मुलाकात के दौरान कहना था कि हर दौर में खरी व सच्ची बात कहने-लिखने वालों को समाचार संस्थानों के मालिकों और प्रभावशाली लोगों द्वारा तरह-तरह से परेशान किया जाता रहा है, उसी कड़ी में हम लोग ताजा शिकार हैं।
उधर, आशंका व्यक्त की जा रही है कि यशवंत की पैरवी करने के कारण जिस तरह अनिल को निशाना बनाकर जेल में डाला गया है, उसी तरह कुछ अन्य भड़ास समर्थकों व पैरवीकर्ताओं का यूपी पुलिस अपहरण करके उन्हें जेल भेज सकती है। भ्रष्ट  मीडिया मालिकों व यूपी पुलिस की साजिश है कि भड़ास किसी भी हाल में अब न चले और इससे जुड़े लोग जेल में ही सड़ते रहें, तब तक जब तक उनके हौसले न टूट जाएं। लेकिन हमारे साथियों का हौसला तो इन प्रताड़नों के बावजूद बुलंद है। यशवंत और अनिल की गिरफ्तारी की बावजूद भड़ास का लगातार चलते रहना भड़ास-विरोधियों को पच नहीं रहा है।
नोएडा कोर्ट में पेशी के दौरान बातचीत में यशवंत ने बताया कि आर्थिक दिक्कलतों के कारण संभव है कि भड़ास कुछ समय के लिए बंद हो जाए, लेकिन यह भ्रष्टाचार विरोधी अभियान हरगिज रूकेगा नहीं। यह भी हो सकता है कि बाद में यह अभियान नये-नये नाम और शक्ल  से शुरू कर दिया जाए।
 यशवंत ने भड़ास को चाहने वालों से अपील की कि वे इस मुश्किल वक्त- में नैतिक रूप से भड़ास को सपोर्ट करें और भ्रष्ट  मीडिया मालिकों व निरंकुश यूपी पुलिस के खिलाफ अपने अपने स्त़र पर प्रतिरोध दर्ज करायें। यशवंत ने आशंका जाहिर की कि भ्रष्ट  मीडिया मालिकों व भ्रष्ट संपादकों की टोली पुलिस के साथ सांठगांठ कर उनपर कई और फर्जी मुकदमे लाद सकती है और जेल से बाहर निकलने पर जान से मरवा सकती है। यशवंत ने कहा कि वे अपने मिशन में मरते-दम जुटे रहेंगे, चाहे उन पर कितने भी जुल्म और सितम किये जाएं।
देखना है कि मीडिया, प्रशासन, पालिटिक्स आदि से जुड़े दूकानदार लोग यशवंत-अनिल की रिहाई के लिए अपने-अपने स्तर पर प्रयास करते हैं या फिर भ्रष्टाचार के इस दौर में अपना कर्तव्य निभाने की जगह मौन साधकर भ्रष्टापचारियों को मूक-समर्थन देते हैं
कहीं भी गया है-


माफ़ करना यशवंत, हम रीढविहीन लोग हैं!

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Written by अनाम
कुछ खुश हैं. कुछ नाराज़. कुछ आक्रोशित. भड़ास 4 मीडिया के संचालक और संपादक यशवंत सिंह की गिरफ़्तारी यहाँ बहसतलब है. नॉएडा पुलिस ने एक बनावटी मामले में उन्हें गिरफ्तार कर लिया है.  बनावटी क्योंक्योंकि, यशवंत पर जो आरोप लगाये गए हैं, वे कत्तई सही नहीं हैं. झूठे हैं. पुलिसिया भाषा में लिखे गए हैं. फंसाने के लिए. क्या विनोद कापड़ी और उनकी दूसरी पत्नी साक्षी यशवंत को पहले से नहीं जानते थे? अगर जानते थे, तो यह बनावटी घटनाक्रम क्यों?
सीधे कह देते क़ि यशवंत ने उनसे रंगदारी मांगी है. दो बाइक सवार लड़के. एक का भागना. पुलिस का जाल बिछा कर पकड़ना. शर्म कीजिये. जिन पत्रकारों ने भड़ास को अपना मुखपत्र बनाया, उन्ही ने ऐसी खबर चलाई. घिन्न आती है, ऐसी कौम पर. अख़बारों के मालिक तो उनका विरोध करेंगे ही, क्योंकि वह शख्स  अख़बार मालिकों के शोषण के खिलाफ लिखता रहता था. दफ्तरों में भड़ास खोलने-पढने पर प्रतिबन्ध है. फिर भी प्रोक्सी से खोलकर भड़ास पढ़ते थे पत्रकार. फिर भी उनकी गिरफ़्तारी का विरोध नहीं? आश्चर्य है.
मोहल्ला वाले अविनाश से सुबह बात हो रही थी. फ़ोन पर. उन्होंने बताया क़ि उन्हें किसी महिला पत्रकार ने बताया है क़ि यशवंत डासना जेल भेज दिए गए हैं. इसके ठीक बाद जब मैंने यशवंत के सहायक अनिल को फ़ोन मिलाया तो पता चला क़ि अभी जमानत की अर्जी दाखिल की जाने वाली है. संजय तिवारी समेत कई लोग मौजूद हैं वहां पर. बाद में शाम 4 बजे अदालत ने उनकी जमानत अर्जी रद्द कर दी. फिर उन्हें डासना जेल ले जाया गया.
जाहिर है यह अखबार मालिकों और पुलिस के गठजोड़ की सोची-समझी साजिश थी. जब जमानत की अर्जी दाखिल ही नहीं हुई, तो उस पत्रकार महोदया को पता कैसे चला क़ि यशवंत जेल भेज दिए गए हैं. ऐसी कई बातें हैं. कई सवाल हैं एक बार सोचिये दोस्तों. आज अगर चुप बैठ गए, तो कल हमारी बारी आने वाली है. बेहतर होगा क़ि सड़क पर विरोध किया जाये पुलिस के खिलाफ. और अदालत में देश का अच्छे से अच्छा वकील खड़ा किया जाये, ताकि जमानत मिल सके. बाद में इस लड़ाई को मुकाम तक पहुँचाने की जरुरत है. सच सामने आना चाहिए.

बची बात शराब पीने की तो हम सब शराबी हैं. शराब पीते हैं. हाँ संभव है यशवंत शराब के नशे में कुछ उलुल जुलूल हरकते करते हों, लेकिन यहाँ यह बात प्रासंगिक नहीं है. अगर उनके शराब पीने के कारण मुकदमा हुआ होता या ऐसा कुछ आरोप भी होता तो हम इस पर बहस कर लेते. ऐसा नहीं है. लिहाजा, अनुरोध होगा क़ि इस विषय को यही छोड़ दें.
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एक बात और. मैं यह लेख आपने नाम से नहीं लिख रहा. नाम लिखूंगा, तो नौकरी जाएगी. नौकरी बचानी इसलिए आवश्यक है, क्योंकि, इसी से घर चलता है.  हाँ, आप सब और यशवंत मुझे माफ़ कर देंगे. मैं इस कौम का एक रीढविहीन सदस्य हूँ. पत्रकारिता क़ी नौकरी में रीढविहीन होना आज नौकरी चलने की पहली और सबसे महत्वपूर्ण शर्त है. अपील यह क़ि यशवंत के पक्ष में खड़े हों. आज इसकी जरूरत है. वरना जिस वैकल्पिक मीडिया की हम बात करते हैं, उसका कोई मतलब नहीं रह जायेगा.
(लेखक बिहार के एक युवा पत्रकार हैं. एक बड़े अखबार में बड़े पद पर हैं. नाम सार्वजनिक नहीं करने की उन्होंने विनम्र अपील की है. उन्होंने यह एक जुलाई 2012 को लिखकर मेल किया था.
यशवंत की गिरफ्तारी अफसोसनाक
एएन शिबली
भड़ास4मिडिया के संपादक यशवंत सिंह के खिलाफ जो भी आरोप लगाए जा रहे हों, यह एक हकीकत है और इसे हर कोई समझ रहा है कि यशवंत को एक साज़िश के तहत गिरफ्तार किया गया है. इस साज़िश में कई बड़े नाम शामिल हो सकते हैं. हर कोई इस तथ्य से अवगत है कि आज मीडिया में यशवंत जितना ईमानदार और बेबाकी से लिखने वाला कोई नहीं है. उसने बड़ी इमानदारी से हमेशा हर किसी के बारे में लिखा. कभी यह ख्याल नहीं किया फलां चैनेल छोटा है और फलां चैनेल बड़ा या फिर यह कि फलां पत्रकार छोटा है और फलां बड़ा.
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यशवंत ने इमानदारी से लिखते हुए हर किसी कि बखिया उधेरी और पत्रकारों कि आवाज़ भी उठायी तो पत्रकारों कि ग़लत हरकत को भी उजागर किया. यह यशवंत का ही कमाल है कि जिस प्रकार नेट इस्तमाल करने वाले जिस प्रकार गूगल को जानते हैं उसी प्रकार देश का लगभग हर पत्रकार भड़ास को जनता है. यशवंत कि सिर्फ यह गलती है कि वह हद से ज्यादा ईमानदार आदमी है और यही वजह है कि उसने कभी किसी के खिलाफ लिखें में संकोच नहीं किया चाहे वह व्यात्क्ति कितना ही बड़ा कियूं न हो. यही कारण है कि देश के कई बड़े अखबारों के दफ्तर और चैनेल के दफ्तर में भड़ास पढने पर पाबंदी लगी है.
मैं यह बात नहीं मान सकता कि यशवंत ने किसी को धमकी दी होगी या फिर किसी से फिरौती मांगी होगी. अगर यशवंत इस नेचर के होते तो भड़ास को चलने के लिए वह बार बार पाठकों से आर्थिक मदद कि अपील क्यूं करते. वह किसी भी चैनेल के मालिक से कह सकते थे कि मुझे पैसे देते रहो, तुम्हारे बारे में कभी कुछ नहीं लिखूंगा मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया. मुझे याद है जब उन्होंने पहली बार भड़ास पर आर्थिक मदद कि अपील डाली तो मैंने उन्हें १००० रूपये की मामूली मदद का चेक भेजा.
मुझे तब बड़ी हैरानी हुई जब उन्होंने इस मामूली मदद को न सिर्फ कबूल किया बल्कि मुझे फ़ोन करके बताया कि शिबली भाई सबसे पहली मदद आपकी ओर से ही आई है. यही नहीं, उन्होंने इस मदद को खबर बना कर भड़ास पर चेक की फोटो के साथ लगा भी दिया. अब गौर कीजिये, क्या ऐसा करने वाला आदमी उगाही के लिए किसी को धमकी दे सकता है? यशवंत की गिरफ्तारी एक बड़ी साज़िश का हिस्सा है और इसमें वह सब बेईमान मीडिया वाले शामिल हैं, जो खुद को इमानदार कहते हैं और बड़े चैनल http://www.bhadas4media.com/images/stories/anshibali.jpgहोने का ढिंढोरा पीटते

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